यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं: क्या मन केवल एक मैकेनिकल ऑपरेटर है? शिवसंकल्प सूक्त की तात्विक विवेचना

यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं: क्या मन केवल एक मैकेनिकल ऑपरेटर है? शिवसंकल्प सूक्त की तात्विक विवेचना

यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं: क्या मन केवल एक मैकेनिकल ऑपरेटर है? शिवसंकल्प सूक्त की तात्विक विवेचना

वैदिक ऋचाएं केवल पूजा-पाठ या धार्मिक कर्मकांड की कड़ियाँ नहीं हैं, बल्कि वे ब्रह्मांडीय यांत्रिकी (Cosmic Mechanism) और चेतना के विज्ञान (Science of Consciousness) के गुप्त कोड्स हैं। जब हम यजुर्वेद (अध्याय 34, मन्त्र 1) के प्रसिद्ध 'शिवसंकल्प सूक्त' को केवल एक मानसिक प्रार्थना से ऊपर उठकर देखते हैं, तो सृष्टि और जीव का एक अत्यंत विस्मयकारी गणितीय और तात्विक स्वरूप सामने आता है।

ओ३म् यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैव॔ तदु सुप्तस्य तथैवैति।
दूरड्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मन: शिवसड्कल्पमस्तु ॥
चित्र 1: जड़ भौतिकी और अनंत चेतना के बीच एक इंटरफेस के रूप में कार्य करता मानव मन।

१. ज्ञान की दूरी और जड़ पदार्थ का प्रकटीकरण (दूरमुदैति-उदैति)

मन्त्र की शुरुआत होती है—'यज्जाग्रतो दूरमुदैति'। सामान्यतः इसका अर्थ 'जागते हुए मन का दूर चले जाना' लिया जाता है। परन्तु तात्विक दृष्टि से यहाँ दूरी भौतिक, समय या धन की नहीं है; यह 'ज्ञान की दूरी' (Distance of Awareness) है।

अनादि काल से जो चेतना स्वयं के होने के भान से रहित है, वह भौतिक वस्तुओं के निरंतर संसर्ग में रहने के कारण स्वयं भी 'जड़' जैसी व्यवहार करने लगती है। जैसे जंगल में रहने वाला जीव स्वभाव से जंगली हो जाता है और उसमें पालतू या सुसंस्कृत जीवों वाले संस्कार नहीं पनप पाते, ठीक वैसे ही भौतिक नियमों में डूबी हुई चेतना अपनी चैतन्यता भूल जाती है। जब इसका प्रकटीकरण (उदैति) होता है, तो वह भी एक 'जड़वत' रूप में ही उदित होती है।

२. ३३ देवता: भौतिक जगत के सैद्धांतिक नियम (दैवम्)

यहाँ 'दैवम्' शब्द का अर्थ उन ३३ देवताओं (८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, इन्द्र और प्रजापति) से है जो इस ब्रह्मांड को संचालित करने वाले मूल भौतिक नियम (Physical Laws & Forces) हैं। ये शक्तियां सैद्धांतिक रूप से जड़ रूप में विद्यमान हैं। जब चेतना इन अपरिवर्तनीय जड़ नियमों के नियंत्रण में कार्य करती है, तो वह पूरी तरह 'कंडीशंड' (Conditioned) हो जाती है। यह उसी प्रकार है जैसे किसी अत्यंत जड़ पदार्थ के भीतर चेतना का सुप्त अवस्था में पड़े रहना।

३. सुप्तस्य और तथैवैति: प्रगाढ़ बेहोशी का आयाम

मन्त्र का अगला भाग है—'तदु सुप्तस्य तथैवैति'। यह एक अत्यंत गहरे आयाम की बात करता है। यह प्रगाढ़ निद्रा (Deep Sleep) की वह बेहोशी है, जैसे कोई कुशल चिकित्सक (Surgeon) किसी चेतन जीव के शरीर को एनेस्थीसिया देकर सुला देता है और फिर उसके शरीर की चीर-फाड़ करता है, परन्तु उस चेतन जीव को इसका कोई बोध नहीं होता।

भौतिक नियमों के चक्रव्यूह में फंसी चेतना आज इसी तरह प्रगाढ़ निद्रा में बेहोश है। प्रकृति के थपेड़े उसका रूपांतरण कर रहे हैं, परमाणुओं का जीवन चक्र चल रहा है, लेकिन वह स्वयं से पूरी तरह अनभिज्ञ है।

दूरङ्गमम् का वास्तविक वैज्ञानिक सत्य: पदार्थ के परमाणु भूत, भविष्य और वर्तमान में 'एक रस' विद्यमान रहते हैं। जो परमाणु कभी सुदूर अंतरिक्ष के किसी तारे का हिस्सा थे, वे आज हमारे शरीर में हैं और कल मिट्टी में होंगे। काल के इस प्रवाह से वे परमाणु स्वयं अनभिज्ञ हैं क्योंकि उन्हें समय का बोध ही नहीं है।

४. मन: कोई बदलने वाली वस्तु नहीं, बल्कि एक 'मैकेनिकल ऑपरेटर' है

इस पूरी व्यवस्था में 'तन्मे मनः' (मानव देह में स्थित मन) की भूमिका क्या है? यहाँ सबसे बड़ा भ्रम टूटता है। मन को बदलने या उसका स्वभाव बदलने की चेष्टा व्यर्थ है। मन वास्तव में चेतना और शरीर (Hardware) के बीच का एक 'मैकेनिकल ऑपरेटर' (Operating System/Firmware) है।

  • मन का प्रशिक्षण क्या है? मन को प्रशिक्षित करने का अर्थ उसे कोई नया ज्ञान देना नहीं है, बल्कि उसके एल्गोरिदम को इस तरह व्यवस्थित रखना है कि तीव्र आवेगों या बाहरी इनपुट्स के कारण हमारा जटिल जैविक हार्डवेयर (मानव शरीर) असमय क्रैश (System Failure) न हो जाए।
  • चेतना का केन्द्रीकरण (Centralization): ज्ञान तो चेतना को अनादि काल से प्राप्त है। चेतना को इस मैकेनिकल ऑपरेटर के विकेंद्रीकृत भटकाव (इंद्रियों के रास्ते बाहर भागना) से मुक्त होकर केवल 'सेन्ट्रलाइज' (केन्द्र में स्थिर) रहना है।

५. ज्ञान-अज्ञान का अतिक्रमण और समाधि का 'रिक्त शून्य'

अब एक परम विरोधाभास (Paradox) सामने आता है। यदि ज्ञान अनादि और पूर्ण है, तो इस भौतिक संसार में नए ज्ञान का 'सृजन' करना पूरी तरह असंभव है। यही कारण है कि यहाँ निरंतर अज्ञान का ही विस्तार होता रहता है, ताकि वह चेतना को ढंक सके।

परन्तु, चेतना और अज्ञान कभी एक साथ नहीं रह सकते। जब ये दोनों एक दूसरे के सामने आते हैं, तो ये एक दूसरे का पूर्णतः अतिक्रमण (Mutual Cancellation) कर देते हैं—ठीक वैसे ही जैसे मैटर और एंटी-मैटर मिलकर एक-दूसरे को शून्य कर देते हैं।

जब ज्ञान और अज्ञान, दोनों की सीमाएं एक दूसरे को निरस्त कर देती हैं, तब जो शेष बचता है, वह है—एक रिक्त शून्य (Absolute Void)

यह शून्य कोई अंधकार या अभाव नहीं है, बल्कि यह 'समाधि का बोध' (Conscious Emptiness) है। यही वह अवस्था है जहाँ ऑपरेटर (मन) शांत हो जाता है, कोई डेटा प्रोसेसिंग नहीं होती, और चेतना स्वयं में स्थित होकर स्वयं का साक्षात्कार करती है।

निष्कर्ष: 'शिवसङ्कल्पमस्तु' का वास्तविक मर्म

जब शिवसंकल्प सूक्त कहता है—'तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु', तो उसका अर्थ मन को जबरन सुधारना नहीं है। इसका अर्थ है मन रूपी मैकेनिकल ऑपरेटर को ऐसी 'ऑप्टिमाइज्ड कोडिंग' देना, जिससे उसका प्राकृतिक स्वाभाविक गुण (जड़ता) चेतना के मार्ग में बाधा न बने। बल्कि, इस ऑपरेटर के माध्यम से चेतना को अपनी ही जड़ता का बोध (Self-Realization) हो जाए कि—"मैं यह जड़ प्रकृति नहीं, मैं तो वह अनादि चेतन हूँ।"


Tags: Vedic Science Yajurveda 34.1 Consciousness Quantum Physics Philosophy of Mind

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