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ऋग्वेद 8.16.5-6)</h2>

यज्ञ के लाभ

यः समिधा य प्राहुती यो वेदेन ददाश मर्तो अग्नये। यो नमसा स्वध्वरः॥ तस्येदर्वन्तो रहयन्त पाशवस्तस्य धुम्नितमं यशः। न तमहो देवकृतं कुतश्चन न मयंकृतं नशत् ।। (ऋ०८ । १६ । ५-६)

शब्दार्थ-- (स्वध्वरः) उत्तम रीति से यज्ञ करनेवाला (यः मतः) जो मनुष्य (समिधा) समिधा से (यः प्राहुती:) जो आहुति से (यः वेदेन) जो वेद से (य: नमसा) जो श्रद्धा से (अग्नये ददाश) प्रकाशस्वरूप परमात्मा के लिए समर्पण कर देता है (तस्य इत्) उसके ही (पाशवः अर्वन्तः रंयन्त) तीवगामी घोड़े दौड़ते हैं (तस्य यशः धुम्नितमम्) उसका यश महान् होता है (तं) उसे (कुतश्चन) कहीं से भी (देवकृतम्) देवों का किया और (मर्त्यकृतम्) मनुष्यों का किया (अंहः) पाप, अनिष्ट (न नशत्) नहीं प्राप्त होता।

भावार्थ-इन मन्त्रों में अग्निहोत्र के लाभों का वर्णन है। जो व्यक्ति प्रतिदिन यज्ञ करता है उसके घर में तीव्रगामी अश्व होते हैं, उसका यश दूर-दूर तक फैल जाता है। देव-अग्नि, वायु, जल, शुद्ध हो जाने के कारण उसका कुछ अनिष्ट नहीं कर सकते। मनुष्य भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

पाठक कहेंगे, यज्ञ तो हम भी करते हैं । हमें तो यज्ञ से कोई लाभ होता दिखाई नहीं देता? इसका कारण है। हम यज्ञ करते हैं परन्तु विधिहीन । यज्ञ करने से सब कुछ मिलता है । परन्तु कब ? जब उत्तमरीति से यज्ञ किया जाए। ठीक प्रकार से यज्ञ करना क्या है? यज्ञ की भावना को समझो। जिस प्रकार समिधा और सामग्री अग्नि में आहुति होती हैं उसी प्रकार हम भी आत्माग्नि की आहुति दे दें। अपने जीवन को प्रभु के लिए श्रद्धापूर्वक समर्पित कर दें तो हमें संसार में किसी वस्तु का प्रभाव नहीं रहेगा।

 

विश्वाहा ते सदमिद्धरेमाश्वायेव तिष्ठते जातवेदः।  रायस्पोषेण समिषा मदन्तो मा ते अग्ने प्रतिवेशा रिषाम॥

ब्राह्मणों की सेवा

विश्वाहा ते सदमिद्धरेमाश्वायेव तिष्ठते जातवेदः।

रायस्पोषेण समिषा मदन्तो मा ते अग्ने प्रतिवेशा रिषाम॥

(अथर्व०३।१५। ८)

शब्दार्थ-(जातवेदः) हे ज्ञानी! विद्वन् ! (इव) जिस प्रकार (तिष्ठते अश्वाय) अपने स्थान पर खड़े हुए, रथ आदि में न जुतनेवाले घोड़े के लिए घास और दाना निरन्तर दिया ही जाता है इसी प्रकार हम (ते) तेरे लिए (सदम् इत्) सदा ही (विश्वाहा) सब दिन (भरेम) मर्यादा रूप में प्रदान करें (अग्ने) हे तेजस्वी ब्राह्मण ! हम (रायस्पोषेण) धन और पुष्टि कारक पदार्थो से (इषा) अन्नों से, खाद्य पदार्थों से (सम् मदन्तः) खूब हृष्ट-पुष्ट होते हुए (ते प्रतिवेशाः) तेरे सेवक बनकर (मा रिषाम) कभी नष्ट न हों।

भावार्थ-आज घरों में कुत्ते पाले जाते हैं । कुत्ते पालनेवाले स्वर्ग में नहीं जा सकते । हमें कीट-पतंग और कुत्तों को भी अपने अन्न में से देना चाहिए परन्तु इससे आगे भी बढ़ना चाहिए।

धनवानों को अपने घर में ब्राह्मण रखने चाहिएँ। उनकी इतनी आजीविका निश्चित कर देनी चाहिए जिससे उन्हें किसी वस्तु का प्रभाव न रहे और वे रात-दिन वेद आदि शास्त्रों का अध्ययन करते रहें। वेद ने एक सुन्दर उपमा दी है। जिस प्रकार घोड़ा चाहे काम पर हो अथवा अपने स्थान पर खड़ा हो उसे घास और दाना दिया ही जाता है इसी प्रकार विद्वान् चाहे उपदेश दे या न दे, शास्त्रार्थ करे या न करे, उसका भरण-पोषण होना ही चाहिए। जैसे पहलवान चाहे कुश्ती लड़े या न लड़े उसे भोजन दिया ही जाता है इसी प्रकार ब्राह्मण की सेवा होनी चाहिए।

यदि आज दस-बीस घनिक कुछ विद्वानों को बैठा दें तो भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर जो आक्रमण हो रहे हैं वे समाप्त हो सकते हैं । मन्त्र के उत्तरार्द्ध में इसी बात की ओर संकेत है।

 

प्रवीरामिव मामयं शरारुरभि मन्यते।  उताहमस्मि वीरिणीन्द्रपत्नी मरुत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः॥

 नारी अबला नहीं सबला

प्रवीरामिव मामयं शरारुरभि मन्यते।

उताहमस्मि वीरिणीन्द्रपत्नी मरुत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः॥

(ऋ० १०।८६।६)

शब्दार्थ-(अयं शरारुः) यह घातक, शत्रु, पाक्रान्ता (माम्) मुझे (अवीराम् इव) अबला की भाँति (अभि मन्यते) मानता है। मैं अबला नहीं हूँ (वीरिणी अस्मि) वीराङ्गना हूँ (इन्द्रपत्नी) मैं वीर की पत्नी हूँ (मरुत् सखा) मृत्यु से न डरनेवाले, प्राणों को हथेली पर रखनेवाले वीर सैनिकों की मैं मित्र हूँ (इन्द्रः) ऐश्वर्यशाली मेरा पति (विश्वस्मात् उत्तरः) संसार में सबसे श्रेष्ठ है।

भावार्थ-वेद में नारी का जो गौरव, प्रतिष्ठा, मान और सम्मान है वह संसार के अन्य साहित्य में कहीं भी नहीं है। प्रस्तुत मन्त्र में एक नारी की अपने सम्बन्ध में प्रबल सिहगर्जना है

१. अरे! यह शत्रु मुझे अबला समझता है । सुन, कान खोलकर सुन! मैं अबला नहीं हूँ, सबला हूँ। समय-समय पर नारियों ने अपनी वीरता के जौहर दिखाए हैं। झांसी की रानी को कौन भूल सकता है?

२. मैं वीर-पत्नी हूँ।

३. मैं कायरों, भीरुयों के साथ मैत्री नहीं करती, उनके साथ सहानुभूति नहीं रखती, अपितु जो मरने-मारने के लिए तैयार रहते हैं उन्हें ही अपना सखा बनाती हूँ।

४. मेरा पति इतना वीर है कि संसार में उस-जैसा कोई दूसरा वीर नहीं है।

सुमङ्गली प्रतरणी गृहाणां सुशेवा पत्ये श्वसुराय शंभूः।। स्योना श्वव प्र गृहान्विशेमान् ॥ (अथर्व०१४ । २ । २६)


ऐसी हों नारियां

सुमङ्गली प्रतरणी गृहाणां सुशेवा पत्ये श्वसुराय शंभूः।। स्योना श्वव प्र गृहान्विशेमान् ॥ (अथर्व०१४ । २ । २६)

शब्दार्थ-हे देवी! तू (गृहाणाम्) घरों, गृहस्थों, घर के लोगों की (सुमङ्गली) कल्याणकारिणी (प्रतरणी) तारनेवाली, पार ले जानेवाली नौका के समान है। तू (पत्ये) पति के लिए (सुशेवा) सुसेवाकारिणी बन । (श्वसुराय) श्वसुर के लिए (शंभूः) शान्तिदायक और कल्याणदात्री हो (श्वव) सास के लिए (स्योना) सुख देनेवाली होकर (इमान् गृहान्) इन घरों, इन गृहस्थों में (प्रविश) प्रवेश कर ।

भावार्थ-घर में प्रवेश करनेवाली नववधुओं में क्या-क्या गुण और विशेषताएं होनी चाहिए, वेद ने बहुत थोड़े-से परन्तु अत्यन्त सारगर्भित और मार्मिक शब्दों में वर्णन कर दिया है

१. नववधुओं को पारिवारिक जनों को दूःखों से तारनेवाली होना चाहिए।

२. पति की सेवा और सुश्रूषा करके उसे सदा प्रसन्न रखना चाहिए।

३. श्वसुर के लिए शान्ति और कल्याणदात्री होना चाहिए। ४. सास के लिए सुख देनेवाली होना चाहिए।

५. इन चार गुणों से युक्त होकर ही वधुओं को पति-गृह में प्रवेश करना चाहिए। __जिन घरों में ऐसी सुशीला नारियाँ होती हैं वे घर स्वर्ग बन जा हैं, वहाँ दुःख और कष्ट नहीं होते। सभी व्यक्ति प्रसन्न और हर्षित रहते हैं।

 

नारियों की चाल-ढाल  अधः पश्यस्व मोपरि सन्तरां पादको हर।  मा ते कशप्लको दृशन् स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ ॥

नारियों की चाल-ढाल

अधः पश्यस्व मोपरि सन्तरां पादको हर।

मा ते कशप्लको दृशन् स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ ॥

(ऋ० ८ । ३३ । १६)

शब्दार्थ-हे नारि! (अधः पश्यस्व) नीचे देख (मा उपरि) ऊपर मत देख । (पादको सन्तरां हर) दोनों पैरों को ठीक प्रकार से एकत्र करके रख । (ते कशप्लको) तेरे कशप्लक-दोनों स्तन, पीठ और पेट, दोनों नितम्ब, दोनों जाँघ, दोनों पिण्डलियों और दोनों टखने (मा दृशन्) दिखाई न दें। यह सब-कुछ किसलिए? (हि) क्योंकि (स्त्री) स्त्री (ब्रह्मा) ब्रह्मा, निर्माणकर्की (बभूविथ) हुई है। __

_ भावार्थ-मन्त्र में नारी के शील का बहुत ही सुन्दर चित्रण किया गया है। प्रत्येक स्त्री को इन गुणों को अपने जीवन में धारण करना चाहिए।

१. स्त्रियों को अपनी दृष्टि सदा नीचे रखनी चाहिए, ऊपर नहीं । नीचे दृष्टि रखना लज्जा और शालीनता का चिह्न है। ऊपर देखना निर्लज्जता और प्रशालीनता का द्योतक है।

२. स्त्रियों को चलते समय दोनों पैरों को मिलाकर बडी सावधानी से चलना चाहिए । इठलाते हुए, मटकते हुए, हाव-भावों का प्रदर्शन करते हुए, चंचलता और चपलता से नहीं चलना चाहिए।

३. नारियों को वस्त्र इस प्रकार धारण करने चाहिएँ कि उनके गुप्त अङ्ग-स्तन, पेट, पीठ, जंघाएँ, पिण्डलियाँ आदि दिखाई न दें। अपने अङ्गों का प्रदर्शन करना विलासिता और लम्पटता का द्योतक है।

४. नारी के लिए इतना बन्धन क्यों? ऐसी कठोर साधना किसलिए? इसलिए कि नारी ब्रह्मा है, वह जीवन-निर्मात्री और सृजनकी है। यदि नारी ही बिगड़ गई तो सृष्टि भी बिगड़ जाएगी।

माता और बहनो ! अपने अङ्गों का प्रदर्शन मत करो।

 

श्रेष्ठ धन  इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहि चित्ति वक्षस्य सुभगत्वमस्मे। पोषं रयीणामरिष्टि तननां स्वाद्यानं वाचः सुविनत्वमह्नाम् ॥

श्रेष्ठ धन

इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहि चित्ति वक्षस्य सुभगत्वमस्मे। पोषं रयीणामरिष्टि तननां स्वाद्यानं वाचः सुविनत्वमह्नाम् ॥

(ऋ०२।२१।६)

शब्दार्थ-(इन्द्र) हे ऐश्वर्यशाली परमात्मन् ! (अस्मे) हम लोगों के लिए (श्रेष्ठानि) श्रेष्ठ (द्रविणानि) धन, ऐश्वर्य (धेहि) प्रदान कीजिए। (दक्षस्य) उत्साह का (चित्तिम्) ज्ञान दीजिए। (सुभगत्वम्) उत्तम सौभाग्य दीजिए। (रयीणाम् पोषम्) धनों की पुष्टि दीजिए (तननाम्) शरीरों की (अरिष्टिम्) अक्षति, नीरोगिता प्रदान कीजिए (वाचः) वाणी का (स्वाद्यानम्) मिठास दीजिए और (सुदिनत्वम् अह्नाम्) दिनों का सुदिनत्व दीजिए

भावार्थ-भक्त भगवान् से श्रेष्ठ धन प्रदान करने की प्रार्थना करता है । वह श्रेष्ठ धन कौन-सा है जिसे एक भक्त चाहता है।

१. हमारे मनों में उत्साह होना चाहिए क्योंकि जागृति के प्रभाव में कोई भी कार्य सम्पन्न नहीं हो सकता।

२. हमारा भाग्य उत्तम होना चाहिए। ३. हमारे पास धन-धान्य और ऐश्वर्य की पुष्टि होनी चाहिए। ४. हमारे शरीर नीरोग, सबल, सुदृढ़ होने चाहिएं।

५. हमारी वाणी में माधुर्य और मिठास होना चाहिए। हम मीठा और मधुर ही बोले।

६. हमारे दिन सुदिन बनें । हमारे दिन उत्तम प्रकार व्यतीत होने चाहिए।


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