कादम्बरी: महर्षि जाबालि का दिव्य स्वरूप और तपोवन की अलौकिकता



परिसंख्या अलंकार, बाणभट्ट की शैली, Sanskrit Literature Analysis, Sage Jabali description.
चक्षुरागः कोटिषु न परकलत्रेषु कण्ठग्रहः कमण्डलुषु न सुरतेषु मेखलाबन्धो व्रतेषु नेर्ष्याकलहेषु स्तनस्पर्शो होमधेनुषु न कामिनीषु पक्षपातः शिखण्डिषु न विद्याविवादेषु भ्रान्तिरनलप्रदक्षिणासु न शास्त्रार्थेषु वसुसंकीर्तनं दिव्यकथासु न तृष्णासु गणनाक्षरवलयेषु न शरीरेषु मुनिबालनाशः क्रतुदीक्षया न मृत्युना समानुरागो रामायणेन न यौवनेन मुखभङ्गविकारो जरया न धनाभिमानेन । यत्र च महाभारते शकुनिवधः पुराणे वायुप्रलपितं वयःपरिणामे द्विजपतनमुपवनचन्दनेषु जाड्यमग्नीनां भूतिमत्त्वमेणकाणां गीतश्रवणव्यसनं शिखण्डिनां नृत्यपक्षपातो भुजङ्गानां भोगः कपीनां श्रीफलाभिलाषो मूलानामधोगतिः । तस्य चैवंविधस्य... रक्तअशोकतरोरधश्छायायामुपविष्टं... समन्तान्महर्षिभिः परिवारितमपश्यम्‌ ।
व्याकरण-विशेष एवं अलंकार: १. परिसंख्या अलङ्कारः: इस अंश में बाणभट्ट ने 'परिसंख्या' का प्रयोग कर विरोधाभास उत्पन्न किया है। जैसे— 'द्विजपतनम्' (दांतों का गिरना) केवल आयु बीतने पर होता था, 'द्विज' (ब्राह्मणों) का पतन (चरित्र से गिरना) आश्रम में नहीं था। २. शकुनिवध: यहाँ श्लेष है। महाभारते शकुनिवधः: महाभारत में शकुनि (गान्धार नरेश) का वध होता है, किन्तु आश्रम में 'शकुनि-वध' (पक्षियों की हत्या) नहीं होती थी। ३. कण्ठग्रहः: कमण्डलु को गर्दन से पकड़ा जाता है (कण्ठग्रह), किन्तु कामासक्ति में आलिंगन (कण्ठग्रह) वहाँ वर्जित था। ४. वायुप्रलपितम्: पुराणों में 'वायु-पुराण' का वर्णन है (वायुप्रलपित), किन्तु ऋषियों को 'वायु-विकार' (पागलपन या वात रोग) नहीं था। ५. भूतिमत्त्वम्: अग्नि 'भूति' (राख) से युक्त होती है, किन्तु ऋषि 'भूति' (ऐश्वर्य/सम्पत्ति) के मोह से मुक्त थे। विशेष पद-सिद्धि: 'अनुरागो रामायणेन': यहाँ तृतीया विभक्ति का प्रयोग 'सहानुराग' के अर्थ में है। ऋषियों का प्रेम केवल रामायण (कथा) से था, यौवन के काम-विकारों से नहीं।
उस आश्रम में दोष केवल नाम मात्र के लिए और वस्तुओं में थे। ऋषियों की आँखों में 'राग' (लालिमा) केवल धनुष की कोटि (कोनों) को देखते समय होती थी, पराई स्त्रियों के प्रति अनुराग (राग) उनमें नहीं था। वे कमण्डलु को तो गले से पकड़ते थे (कण्ठग्रह), पर काम-क्रीड़ा में आलिंगन उन्हें ज्ञात न था।

वहाँ 'शकुनि-वध' केवल महाभारत की कथा तक सीमित था, वास्तविक पक्षियों की हत्या वहाँ असम्भव थी। वृद्धावस्था में केवल दाँत गिरते थे (द्विज-पतन), पर किसी ब्राह्मण (द्विज) का अपने धर्म से पतन नहीं होता था। अग्नि राख (भूति) से युक्त थी, पर मुनि ऐश्वर्य (भूति) के लोभ से कोसों दूर थे। सांपों के पास ही केवल 'भोग' (फन/कुण्डली) था, ऋषियों के जीवन में विलासिता का भोग नहीं था।

ऐसे दिव्य वातावरण के बीच, एक विशाल लाल अशोक वृक्ष की शीतल छाया में, शिष्यों से घिरे हुए साक्षात् तपस्या के पुंज महर्षि जाबालि विराजमान थे।
In that sacred grove, contradictions existed only in language, not in life. The only 'Shakuni-vadha' (slaughter of Shakuni) happened in the stories of Mahabharata, for no bird (Shakuni) was ever harmed there. 'Falling of the twice-born' (Dwija-patana) referred only to the falling of teeth in old age, as no Brahmin (Dwija) ever fell from his virtuous conduct.

The sages held affection (Anuraga) for the Ramayana, but were strangers to the passions of youth. 'Bhoga' (enjoyment/coils) belonged only to the serpents, for the monks knew no worldly luxury. Stability resided in their minds, while 'fickleness' was left to the leaves of the plantain trees. Amidst this surreal purity, seated under the shade of a crimson Ashoka tree, was the great Sage Jabali, appearing like an embodiment of the Sun itself, surrounded by his devoted disciples.
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