जाबालि आश्रम का आध्यात्मिक शिखर: कादम्बरी पृष्ठ 40 और परिसंख्या अलंकार

कादम्बरी पृष्ठ 40, परिसंख्या अलंकार बाणभट्ट, Vedic Hermitage Daily Life, Sanskrit Literary Analysis, Banabhatta Style Philosophy
Vedic Sages in Deep Meditation at Jabali Ashram with Sacrificial Smoke 8K



नसंसुयमाणमुनिहोमहुताशनमारब्यातचरुचारुगन्धमर्पकपुरोडासपुण्यपरिमामोदितमविच्छिन्नाज्यधाराहतिहुतभुग्ुंकारमुखरितमुपचर्यमाणातिथिवर्गं पूज्यमानपितृदैवतमर्च्यमानहरिहरपितामहमुद्दिश्यमानश्राद्धकल्पं व्याख्यायमानयज्ञविद्यामालोच्यमानधर्मशास्त्रं वाच्यमानविविधपुस्तकं विचार्यमाणसकलशास्त्रार्थमारभ्यमाणपर्णशालमुपरुष्यमाणआजिरमुपमृज्यमानोटजाभ्यन्तरमाबध्यमानध्यानं साध्यमानमन्त्रमभ्यस्यमानयोगमुपदिश्यमानवनदेवताबलिं निर्वर्त्यमानमौञ्जीमेखलं प्रक्षाल्यमानवल्कलमुपसंगृह्यमाणसमिधमुपसंस्क्रियमाणकृष्णाजिनं गृह्यमाणगवेधुकं शोष्यमाणपुष्करबीजं ग्रथ्यमानाक्षमालां न्यस्यमानवेणुदण्डं संस्क्रियमाणपरित्राजकमापूर्यमाणकमण्डलमदृष्टपूर्वं ऋषिकाण्डमपरिचितमनृतस्याश्रुतपूर्वमनङ्गस्याब्जयोनिमिव त्रिभुवनवन्दितमुरारिमिव प्रकटितवराहनरसिंहरूपं साङ्ख्यमिव कपिलाधिष्ठितं , मधुगोपवनमिव बलावलीढदपितधेनुकमुदयनमिवानन्दितवत्सकं रिपुरुषाधिराज्यमिव मुनिजनगृहीतजलकलशाभिषिच्यमानद्रुमं निदाधसमयावसानमिव प्रत्यासन्नजलप्रपातं जलधरसमयमिव वनगहनमध्यसुखसुप्रहारं द्युमन्तमिव शिखाशकलहारसंचूर्णितआकाशअस्थिसंचयं खाण्डवविनाशोद्यतार्जुनमिव प्रारब्धाग्निकार्यं सुरभिविलेपनधरमपि सतताविरभूतहव्यधूमगन्धं मातङ्गमुखाध्यासितमपि पवित्रमुद्सितधूमकेतुशतमपि प्रशान्तोपद्रवं प्रिपूणंद्विजपतिमण्डलसनाथमपि सदासंनिहिततरुगहनान्धकारमतिरमणीयमग्रमिव ब्रह्मलोकमआश्रममपश्यम्‌ । यत्र च मलिनता हविधूमेषु न चरितेषु मुखरागः शुकेषु न कोपेषु तीक्ष्णता कुशाग्रेषु न स्वभावेषु चञ्चलता कदलीदलेषु न मनःसु...
व्याकरण-विमर्श एवं शब्दार्थ: १. हुतभुग्ुंकारमुखरितम्: - हुतं भुङ्क्ते इति 'हुतभुक्' (अग्निः), तस्य हुंकारः (ज्वालानां शब्दः), तेन मुखरितं (व्याप्तम्) । २. व्याख्यायमानयज्ञविद्याम्: - यज्ञस्य विद्या (षष्ठी तत्पुरुषः), सा व्याख्यायमाना (Explain/Expound) यत्र सः आश्रमः । ३. साङ्ख्यमिव कपिलाधिष्ठितम्: - (श्लेषालङ्कारः) साङ्ख्यदर्शनं यथा 'कपिलमुनिना' प्रवर्तितम्, तथा आश्रमः 'कपिलाभिः' (धेनुभिः) अधिष्ठितः । ४. बलावलीढदपितधेनुकम्: - (श्लेषालङ्कारः) 'बल' नामक-असुरस्य दमनम्, आश्रमपक्षे तु 'बलेन' (शक्त्या) पुष्टाः धेनवः । ५. मलिनता हविधूमेषु न चरितेषु: - (परिसंख्या अलङ्कारः) मलिनता (कृष्णता) केवलं धूम्र (धुएँ) में थी, मुनियों के चरित्र में नहीं ।
शास्त्रीय टिप्पणी: अत्र बाणभट्टेन 'परिसंख्या' अलङ्कारस्य चमत्कारिकः प्रयोगः कृतः । यथा— तीक्ष्णता (Sharpness) केवलं कुश के अग्रभाग में थी, मुनियों के स्वभाव में नहीं । चञ्चलता केवल कदली (केले) के पत्तों में थी, मुनियों के मन में नहीं । एतेन तपोवनस्य शान्तिः शुद्धिः च व्यज्यते ।
मैंने एक ऐसे आश्रम को देखा जो साक्षात् 'ब्रह्मलोक' के समान प्रतीत होता था। जहाँ मुनियों द्वारा दी जाने वाली आहुतियों की सुगंध (चरु और पुरोडाश) चारों ओर फैली हुई थी। घी की निरंतर धाराओं से प्रज्वलित अग्नि 'हुँकार' कर रही थी। वहाँ अतिथियों का सत्कार, पितरों का तर्पण और ब्रह्मा-विष्णु-महेश की उपासना निरंतर हो रही थी।

कहीं धर्मशास्त्रों पर विचार हो रहा था, कहीं पर्णशालाएँ बनाई जा रही थीं, और कहीं मुनिजन ध्यान-मग्न थे। वह आश्रम सांख्य दर्शन की तरह 'कपिल' (सिद्ध मुनि/कपिला गायों) से युक्त था।

बाणभट्ट ने यहाँ आश्रम की पवित्रता का वर्णन **'परिसंख्या अलंकार'** के माध्यम से किया है, जो अत्यंत अद्भुत है:
  • मलिनता (कालिमा): केवल यज्ञ के धुएँ में थी, ऋषियों के चरित्र में नहीं।
  • मुख-राग (लालसा/रंग): केवल तोतों के मुख में था (लाल चोंच), मनुष्यों के मन में किसी के प्रति अनुराग या आसक्ति नहीं थी।
  • तीक्ष्णता (पैनापन): केवल कुश के अग्रभाग में थी, ऋषियों के स्वभाव में कठोरता नहीं थी।
  • चंचलता: केवल कदली (केले) के पत्तों में थी, मुनियों के मन स्थिर और शांत थे।
"जहाँ दोष केवल प्रकृति की वस्तुओं में दिखाई देते थे, मनुष्यों के आचरण में केवल गुण ही व्याप्त थे।"
यह आश्रम सांसारिक उपद्रवों से पूरी तरह मुक्त और आध्यात्मिक शांति का सर्वोच्च शिखर था।
The narrator describes the hermitage as a second 'Brahmaloka' (the realm of the Creator). It was a place where the fragrance of sacrificial offerings (Charu and Purodasha) permeated the air, and the rhythmic sound of ghee poured into the fire echoed like sacred chants.

Banabhatta employs the 'Parisankhya Alankara' (a figure of speech based on exclusion) to highlight the absolute purity of the residents:
  • Darkness (Malinata): Existed only in the smoke of the holy fires, not in the conduct of the sages.
  • Redness (Raga/Passion): Was seen only in the beaks of the parrots, while the hearts of the monks were free from any worldly passion or attachment.
  • Sharpness (Tikshnata): Was found only at the tips of the Kusha grass, never in the temperament of the ascetics.
  • Fickleness (Chanchalata): Was observed only in the swaying leaves of the plantain trees, while the minds of the sages remained steady and meditative.
"The hermitage was a sanctuary where 'faults' were assigned only to insentient objects of nature, leaving the human spirit in its most pristine and divine state."
It was a domain where the Kapila cows (symbolizing the Samkhya philosophy of Sage Kapila) grazed peacefully, and every action—from washing bark garments to drying lotus seeds—was a step toward liberation.
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