कादम्बरी: महर्षि जाबालि का साक्षात् ब्रह्म-स्वरूप और शास्त्रीय विवेचन


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पुण्यरज्जुभिरिवोपसंगृहीताभिरविदूरप्रवृद्धस्य पुण्यतरोः कुसुममञ्जरीभिरिवोद्गताभिजटाभिरुपशोभमानमुपरचितभस्मपुण्ड्रकेण तिर्यक्प्रवृत्तत्रिपथगास्त्रोतस्येणेव हिमगिरिशिलातलेन ललाटफलकेनोपेतमधोमुखचन्द्रकराकाराभ्यामवलम्बितविशिथिराभ्यां भ्रूलताभ्यामवष्टम्यमानदृष्टिमनवरतमन्वाश्चराभ्यासविदरताधरपुटतया निपतद्गिरतिस्वच्छिभिः सलयप्ररोहैरिव स्वच्छेन्द्रियवृत्तिभिरिव करुणाप्रवाहैरिव दशनमयूखैर्धवलितपुरोभागमुद्गमद्गंगप्रवाहमिव जह्नुमविरतसोमोद्गारसुगन्धिनिश्वासावकृेष्टुमिरिव शापाक्षरैः सदा मुखाभागसंनिहितैः परिभ्रद्भिरिव ब्रह्मविद्याक्षरैः सदा मुखाभागसंनिहितैः... समुन्नतविरलास्थिपरमंसावलम्बि धवलयज्ञोपवीतमनिर्वरजनिततनुतरंगमङ्गुद्भवमानमृणामिव मन्दाकिनीप्रवाहमकलुषभङ्गमुद्वहन्तममरस्फटिकरकषटिकाक्षमवलम्ब्य... स्थैर्येणाचलानां गाम्भीर्येण सागराणां तेजसा सवितुः ।
व्याकरण-विशेष एवं अलंकार: १. तिर्यक्प्रवृत्तत्रिपथगास्त्रोतस्येणेव: - यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है। महर्षि के ललाट पर लगा भस्म का त्रिपुण्ड ऐसा लग रहा था मानो हिमालय की शिला पर गंगा (त्रिपथगा) की तीन धाराएँ बह रही हों। २. दशनमयूखै: - दाँतों की कान्ति (किरणें)। जब वे बोलते थे, तो उनके दाँतों की धवल आभा ऐसी लगती थी मानो करुणा का प्रवाह बह रहा हो। ३. धवलयज्ञोपवीतम्: - उनका सफेद जनेऊ (यज्ञोपवीत) उनके ऊँचे कंधों से ऐसे लटक रहा था मानो आकाशगंगा (मन्दाकिनी) की पतली धारा स्वर्ग से उतर रही हो। ४. गाम्भीर्येण सागराणाम्: - उपमा अलंकार। उनकी गम्भीरता समुद्र के समान थी और तेज सूर्य (सवितुः) के समान। ५. मन्वाश्चराभ्यास: - मन्त्रों के निरंतर अभ्यास से उनके होंठ (अधरपुट) हिल रहे थे। शब्दार्थ: अक्षमाला: रुद्राक्ष या स्फटिक की माला। त्रिदण्ड: सन्यासियों का दंड। पुण्ड्रक: तिलक।
महर्षि जाबालि का मस्तक विशाल था, जिस पर लगा भस्म का त्रिपुण्ड ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो हिमालय की शिला पर गंगा की तीन धाराएँ प्रवाहित हो रही हों। उनकी सफेद जटाएँ ऐसी लगती थीं मानो पुण्य के वृक्षों पर फूलों के गुच्छे खिले हों। निरंतर मन्त्रों के जाप के कारण उनके होंठ हिल रहे थे और उनके दाँतों की चमक ऐसी धवल थी मानो उनके मुख से करुणा की साक्षात् नदी बह रही हो।

उनके कंधों पर पड़ा श्वेत यज्ञोपवीत (जनेऊ) आकाशगंगा की पतली धारा जैसा प्रतीत होता था। उनके शरीर पर झुर्रियों का जाल किसी पुराने कल्पवृक्ष की लताओं के समान था। वे पर्वत के समान स्थिर, समुद्र के समान गम्भीर और सूर्य के समान तेजस्वी थे। उनके समीप रखा स्फटिक का कमण्डलु ऐसा लग रहा था मानो किसी राजहंस ने श्वेत कमल को अपनी चोंच में थाम रखा हो। वे साक्षात् ब्रह्म-तेज के पुंज थे।
Sage Jabali's forehead was wide and majestic, adorned with three lines of sacred ash (Tripundra) that looked like the three streams of the Ganges flowing over a Himalayan rock. His white matted hair resembled clusters of flowers on the tree of virtue. As he continuously hummed sacred mantras, the brilliance of his white teeth shone like a river of compassion flowing from his mouth.

The sacred white thread (Yagnopavita) draped over his skeletal shoulders appeared like the thin, silvery flow of the celestial Mandakini river. His presence commanded the stability of mountains, the depth of oceans, and the radiance of the sun. Even his crystal water-pot (Kamandalu) seemed as divine as a royal swan holding a blooming white lotus. He was the living embodiment of Brahma-Tejas (divine brilliance).
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