नीचे मंत्र 4 —
“अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद्
द्रविणस्युर्विपन्यया।
समिद्धः शुक्र आहुतः॥ (4)”
की सार-गर्भित, दार्शनिक, आध्यात्मिक तथा आधुनिक जीवन के परिप्रेक्ष्य में गहन व्याख्या प्रस्तुत है। यह मंत्र अग्नि की संघर्ष-नाशक, बाधा-विध्वंसक और समृद्धि-दायिनी शक्ति को प्रकट करता है।
🔥 मंत्र 4 की समग्र व्याख्या
“अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद्…”
1. मंत्र का शुद्ध पाठ
अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद्
द्रविणस्युर्विपन्यया।
समिद्धः शुक्र आहुतः॥
2. शब्दार्थ (सूक्ष्म भाव सहित)
- अग्निः – अग्नि (चेतना, तेज, ज्ञान)
- वृत्राणि – अवरोध, बाधाएँ, अज्ञान, राक्षसी प्रवृत्तियाँ
- जङ्घनद् – नष्ट करता है, परास्त करता है
- द्रविणस्युः – धन, शक्ति, संसाधन देने वाला
- विपन्यया – स्तुति, ज्ञानपूर्ण वाणी से
- समिद्धः – प्रज्वलित, प्रखर रूप से प्रकट
- शुक्रः – शुद्ध, तेजस्वी
- आहुतः – आहुतियों से पूजित
3. स्थूल (बाह्य) अर्थ
अग्नि सभी बाधाओं और दुष्ट शक्तियों को नष्ट करती है।
वह धन और समृद्धि देने वाली है।
स्तुति और आहुतियों से प्रज्वलित होकर
वह शुद्ध और तेजस्वी बनती है।
4. मंत्र का मूल भाव
यह मंत्र बताता है कि—
अग्नि केवल शांत प्रकाश नहीं,
वह संघर्ष करने वाली, बाधाएँ तोड़ने वाली शक्ति है।
यहाँ अग्नि योद्धा भी है और पालक भी।
5. “वृत्र” का दार्शनिक अर्थ
वृत्र को केवल पौराणिक राक्षस समझना अधूरा है।
वैदिक दर्शन में—
- वृत्र = जड़ता
- वृत्र = भय
- वृत्र = आलस्य
- वृत्र = अज्ञान
- वृत्र = आंतरिक अवरोध
👉 जो चेतना के प्रवाह को रोक दे, वही वृत्र है।
अग्नि इन सबका संहार करती है।
6. “जङ्घनद्” – आंतरिक क्रांति
यह शब्द अत्यंत शक्तिशाली है।
यह केवल नाश नहीं, बल्कि—
पूर्ण परास्ति और निर्णायक विजय का सूचक है।
इसका अर्थ है—
जब अग्नि जाग्रत होती है,
तो अज्ञान टिक नहीं पाता।
7. “द्रविणस्युः” – समृद्धि का रहस्य
अग्नि को धनदायिनी कहा गया है।
यह धन केवल—
- भौतिक संपत्ति नहीं
- बल्कि बुद्धि, साहस, स्वास्थ्य, अवसर भी है
आधुनिक भाषा में— 👉 अग्नि = Prosperity Generator
क्योंकि जहाँ—
- परिश्रम है
- विवेक है
- ऊर्जा है
वहाँ समृद्धि स्वयं आती है।
8. “विपन्यया” – ज्ञानपूर्ण स्तुति
यह मंत्र स्पष्ट करता है—
अग्नि अंधभक्ति से नहीं,
बुद्धिपूर्ण स्तुति से प्रज्वलित होती है।
अर्थात्—
- समझ के साथ किया गया जप
- भाव से किया गया कर्म
ही फलदायी होता है।
9. “समिद्धः शुक्रः” – प्रज्वलित शुद्ध चेतना
जब अग्नि—
- निरंतर साधना से
- सही कर्म से
- सत्य आचरण से
प्रज्वलित होती है,
तो वह शुक्र (निर्मल, तेजस्वी) बनती है।
10. आध्यात्मिक व्याख्या
यह मंत्र साधक को सिखाता है—
यदि तुम्हें जीवन की बाधाएँ हटानी हैं,
तो भीतर की अग्नि को जगाना होगा।
यह मंत्र वीर-भाव का मंत्र है।
11. आधुनिक जीवन में उपयोग
(क) मानसिक स्तर
- भय और हीनभावना का नाश
- आत्मविश्वास में वृद्धि
- अवसाद से मुक्ति
(ख) कर्म और संघर्ष
- प्रतियोगिता में सफलता
- कठिन परिस्थितियों में साहस
- आलस्य पर विजय
(ग) धन और कार्यक्षेत्र
- अवसरों की प्राप्ति
- मेहनत का फल
- स्थायी उन्नति
12. ब्रह्मज्ञान की दृष्टि से
ब्रह्मज्ञान में—
- ब्रह्म = शुद्ध चेतना
- अग्नि = उसका गतिशील रूप
जब यह मंत्र जपा जाता है—
ब्रह्मचेतना साधक के भीतर
विघ्नों का संहार करती है।
13. साधनात्मक प्रयोग (आज के समय में)
- प्रातः सूर्य उदय के समय
- दीपक या अग्नि के सामने
- 11 / 21 बार जप
- भाव:
“मेरे भीतर का भय और आलस्य नष्ट हो”
14. मंत्र का जीवन-सूत्र
जहाँ अग्नि जाग्रत है,
वहाँ बाधाएँ टिक नहीं सकतीं।
15. निष्कर्ष
मंत्र 4—
- संघर्ष से भागना नहीं सिखाता
- संघर्ष को जीतने की शक्ति देता है
- यह अग्नि का वीर रूप प्रकट करता है



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