AtharvaVeda, kand 4 sukta 10

शब्दार्थ

वातात् = वायु से जातः = उत्पन्न हुआ अन्तरिक्षात् = आकाश/मध्यलोक से विद्युतः = विद्युत् से, बिजली से ज्योतिषः परि = प्रकाश से घिरा हुआ सः = वह नः = हमें हिरण्यजाः = स्वर्णमय, दिव्य तेज से उत्पन्न शङ्खः = शंख कृशनः = तेजस्वी, दीप्तिमान पातु = रक्षा करे अंहसः = पाप, संकट, कष्ट ---

सरल हिन्दी अर्थ

जो शंख वायु से उत्पन्न हुआ, अंतरिक्ष से प्रकट हुआ, विद्युत और दिव्य प्रकाश से युक्त है— वह स्वर्णमय तेजस्वी शंख हमें पाप और संकटों से रक्षा करे। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

अथर्ववेद 4.10 का यह प्रथम मंत्र शंख की दिव्य उत्पत्ति और उसकी रक्षात्मक शक्ति का वर्णन करता है। यहाँ शंख केवल एक भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक है। “वाताज्जातो” — शंख का जन्म वायु से हुआ है। वायु वेदों में प्राण का प्रतीक है। इसका अर्थ है कि शंख प्राणशक्ति से जुड़ा हुआ है। जब शंख बजता है, तो वह वायु के कंपन से ध्वनि उत्पन्न करता है, जो वातावरण को शुद्ध करती है। “अन्तरिक्षाद्विद्युतो ज्योतिषस्परि” — शंख की उत्पत्ति आकाश, बिजली और प्रकाश से जुड़ी बताई गई है। यह संकेत करता है कि इसकी शक्ति केवल पृथ्वी तक सीमित नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय है। विद्युत् ऊर्जा और ज्योति ज्ञान और चेतना के प्रतीक हैं। अतः शंख ज्ञान, ऊर्जा और प्रकाश का माध्यम है। “स नो हिरण्यजाः शङ्खः” — हिरण्य (स्वर्ण) दिव्यता और शुद्धता का प्रतीक है। स्वर्णमय शंख का अर्थ है ऐसा शंख जो तेज, पवित्रता और दिव्य शक्ति से युक्त हो। “कृशनः पात्वंहसः” — वह हमें अंहस (पाप, संकट, कष्ट) से बचाए। यहाँ पाप का अर्थ केवल नैतिक दोष नहीं, बल्कि मानसिक अशुद्धि, भय, नकारात्मकता और रोग भी है। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ शंख ब्रह्मांडीय ऊर्जा और प्राण का प्रतीक है। ✔ इसकी ध्वनि नकारात्मक शक्तियों को दूर करती है। ✔ यह प्रकाश, ज्ञान और चेतना का आह्वान करता है। वेदों में ध्वनि को सृष्टि का मूल माना गया है। शंख की ध्वनि “ॐ” के कंपन का स्मरण कराती है। यह सृष्टि की मूल तरंग है। ---

योगिक दृष्टि

✔ शंख की ध्वनि प्राणायाम और श्वास से जुड़ी है। ✔ यह विशुद्धि चक्र (कंठ केंद्र) को सक्रिय करती है। ✔ मानसिक शुद्धि और ऊर्जा संतुलन में सहायक है। ---

मनोवैज्ञानिक अर्थ

✔ शंख की ध्वनि आत्मविश्वास बढ़ाती है। ✔ भय और तनाव को कम करती है। ✔ वातावरण में सकारात्मकता लाती है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज के युग में शंख का प्रयोग केवल पूजा तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि शंख की ध्वनि कंपन वातावरण के सूक्ष्म जीवों को प्रभावित कर सकती है और मानसिक तनाव कम कर सकती है। यह मंत्र हमें सिखाता है कि ध्वनि, प्रकाश और प्राण की शक्ति से जीवन को शुद्ध और सुरक्षित बनाया जा सकता है। ---

सारांश

1. शंख वायु, आकाश और विद्युत् से उत्पन्न दिव्य शक्ति का प्रतीक है। 2. यह स्वर्णमय तेज से युक्त है। 3. इसकी ध्वनि पाप, संकट और नकारात्मकता से रक्षा करती है। 4. शंख प्राण, प्रकाश और चेतना का प्रतीक है। ---

English Insight

Born of the wind, arising from the sky, surrounded by lightning and light— may the golden radiant conch protect us from sin and suffering. The conch symbolizes cosmic vibration, purifying sound, and divine protection. Its resonance connects breath, energy, and consciousness.

शब्दार्थ

यः = जो अग्रतः = आगे, प्रारम्भ में रोचनानाम् = प्रकाशमय लोकों का, द्यु-लोकों का समुद्रात् अधि = समुद्र से ऊपर, समुद्र से उत्पन्न जज्ञिषे = उत्पन्न हुआ शङ्खेन = शंख के द्वारा हत्वा = मारकर, नष्ट करके रक्षांसि = राक्षस, दुष्ट शक्तियाँ अत्रिणः = भक्षक, हानि पहुँचाने वाले वि षहामहे = हम परास्त करते हैं, जीतते हैं ---

सरल हिन्दी अर्थ

जो प्रकाशमय लोकों के अग्रभाग में, समुद्र से उत्पन्न हुआ— उस शंख के द्वारा हम राक्षसों और हानि पहुँचाने वाली शक्तियों को नष्ट कर विजय प्राप्त करते हैं। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र शंख की दिव्य उत्पत्ति और उसकी रक्षात्मक शक्ति को और अधिक स्पष्ट करता है। “यो अग्रतो रोचनानाम्” — रोचन शब्द प्रकाश, तेज और द्यु-लोक का द्योतक है। शंख को उन प्रकाशमय लोकों के अग्रभाग में स्थित बताया गया है। इसका अर्थ है कि शंख केवल भौतिक समुद्र का उत्पाद नहीं, बल्कि दिव्य प्रकाश और ब्रह्मांडीय ऊर्जा से संबद्ध है। “समुद्रादधि जज्ञिषे” — शंख का जन्म समुद्र से माना गया है। समुद्र वेदों में अनंत संभावनाओं, गहराई और सृष्टि के मूल स्रोत का प्रतीक है। जैसे सृष्टि के रत्न समुद्र से उत्पन्न होते हैं, वैसे ही शंख भी दिव्य रत्न के समान है। समुद्र यहाँ चेतना की गहराई का भी प्रतीक है। जब व्यक्ति अपने भीतर की गहराई में उतरता है, तब वह दिव्य ध्वनि (नाद) को अनुभव करता है। शंख उसी नाद का भौतिक प्रतीक है। “शङ्खेन हत्वा रक्षांसि” — शंख की ध्वनि को राक्षसों और दुष्ट शक्तियों का विनाश करने वाला बताया गया है। यहाँ राक्षस केवल पौराणिक प्राणी नहीं, बल्कि अज्ञान, भय, रोग, नकारात्मक विचार और मानसिक विकार भी हैं। जब शंख की ध्वनि गूँजती है, तो वह वातावरण में एक विशेष कंपन उत्पन्न करती है। यह कंपन नकारात्मक ऊर्जा को विचलित करता है और सकारात्मक शक्ति को जागृत करता है। “अत्रिणो वि षहामहे” — अत्रिण शब्द का अर्थ है भक्षक या हानि पहुँचाने वाला। हम शंख की शक्ति से उन सभी बाधाओं और हानिकारक तत्वों को परास्त करते हैं। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ शंख दिव्य प्रकाश और समुद्रीय गहराई का प्रतीक है। ✔ इसकी ध्वनि अज्ञान और भय का नाश करती है। ✔ यह आत्मरक्षा और आध्यात्मिक जागरण का साधन है। शंख की ध्वनि को “नाद ब्रह्म” का रूप माना गया है। यह ध्वनि ब्रह्मांडीय कंपन का स्मरण कराती है। ---

योगिक दृष्टि

✔ शंख की ध्वनि कंठ चक्र को सक्रिय करती है। ✔ यह प्राणशक्ति को संतुलित करती है। ✔ ध्यान में शंखनाद मानसिक स्पष्टता लाता है। ---

मनोवैज्ञानिक अर्थ

✔ शंख की ध्वनि आत्मविश्वास और साहस बढ़ाती है। ✔ भय और तनाव को कम करती है। ✔ नकारात्मक विचारों को शांत करती है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज के युग में “राक्षस” का अर्थ तनाव, अवसाद, भय और मानसिक अस्थिरता भी हो सकता है। शंखनाद वातावरण को सकारात्मक बनाता है और मन को स्थिर करता है। यह मंत्र हमें सिखाता है कि ध्वनि और प्रकाश की शक्ति से जीवन के संकटों पर विजय पाई जा सकती है। ---

सारांश

1. शंख प्रकाशमय लोकों और समुद्र से उत्पन्न दिव्य वस्तु है। 2. इसकी ध्वनि राक्षसों और नकारात्मक शक्तियों का नाश करती है। 3. यह आत्मरक्षा और आध्यात्मिक जागरण का साधन है। 4. शंखनाद साहस, शुद्धि और विजय का प्रतीक है। ---

English Insight

Born from the cosmic ocean and placed before the realms of light, the conch empowers us to defeat harmful forces. Its sound symbolizes divine vibration that destroys negativity and grants strength, clarity, and victory.

शब्दार्थ

शङ्खेन = शंख के द्वारा अमीवाम् = रोग, पीड़ा अमतिम् = दुर्बुद्धि, नकारात्मक विचार उत = तथा सदान्वाः = निरंतर आने वाली विपत्तियाँ शङ्खः = शंख नः = हमारा विश्वभेषजः = समस्त जगत का औषध, सार्वभौमिक औषधि कृशनः = तेजस्वी, दीप्तिमान पातु = रक्षा करे अंहसः = पाप, संकट, कष्ट ---

सरल हिन्दी अर्थ

हम शंख के द्वारा रोग और दुर्बुद्धि को दूर करते हैं, और निरंतर आने वाली विपत्तियों को भी हटाते हैं। वह तेजस्वी शंख, जो समस्त जगत की औषधि है, हमें पाप और कष्टों से रक्षा करे। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र शंख की महिमा को एक सार्वभौमिक औषधि (विश्वभेषज) के रूप में प्रस्तुत करता है। “शङ्खेन अमीवाम् अमतिम्” — अमीव का अर्थ है रोग या शारीरिक पीड़ा, और अमति का अर्थ है दुर्बुद्धि या मानसिक अशुद्धि। मंत्र कहता है कि शंख के माध्यम से हम शारीरिक रोग और मानसिक विकार दोनों को दूर कर सकते हैं। यहाँ शंख केवल एक पूजा का उपकरण नहीं, बल्कि ध्वनि-ऊर्जा का स्रोत है। शंखनाद से उत्पन्न कंपन वातावरण को शुद्ध करता है और मन में सकारात्मकता लाता है। “शङ्खेनोत सदान्वाः” — सदान्वा वे विपत्तियाँ हैं जो बार-बार जीवन में आती रहती हैं। शंख की ध्वनि उन निरंतर आने वाले कष्टों को शांत करने का प्रतीक है। “शङ्खो नो विश्वभेषजः” — यह अत्यंत महत्वपूर्ण पद है। विश्वभेषज का अर्थ है “समस्त संसार की औषधि”। यह शंख को एक सार्वभौमिक उपचार के रूप में प्रस्तुत करता है। वेदों में ध्वनि को चिकित्सा का साधन माना गया है। “नाद” शरीर और मन पर गहरा प्रभाव डालता है। शंख की गूंजती ध्वनि प्राणशक्ति को संतुलित करती है। “कृशनः पात्वंहसः” — कृशन का अर्थ है तेजस्वी, प्रकाशमान। शंख का तेज हमें पाप, भय और संकट से बचाए। यह मंत्र स्पष्ट करता है कि शंख तीन स्तरों पर कार्य करता है: 1. शारीरिक स्तर — रोग से रक्षा 2. मानसिक स्तर — दुर्बुद्धि और नकारात्मक विचारों से रक्षा 3. आध्यात्मिक स्तर — पाप और अज्ञान से रक्षा ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ शंख ध्वनि-ऊर्जा के माध्यम से चेतना को शुद्ध करता है। ✔ यह अज्ञान और मानसिक अंधकार को दूर करता है। ✔ शंखनाद ईश्वरीय संरक्षण का प्रतीक है। ---

योगिक दृष्टि

✔ शंखनाद कंठ चक्र और प्राण प्रवाह को संतुलित करता है। ✔ ध्वनि-चिकित्सा का प्राचीन स्वरूप है। ✔ ध्यान और साधना में सहायक है। ---

मनोवैज्ञानिक अर्थ

✔ शंख की ध्वनि भय और तनाव को कम करती है। ✔ आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच को बढ़ाती है। ✔ नकारात्मक मानसिक प्रवृत्तियों को दूर करती है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज विज्ञान भी मानता है कि ध्वनि-तरंगें मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालती हैं। शंखनाद एक प्राकृतिक ध्वनि-चिकित्सा है। यह मंत्र हमें सिखाता है कि सकारात्मक कंपन और ध्वनि के माध्यम से जीवन को स्वस्थ और संतुलित बनाया जा सकता है। ---

सारांश

1. शंख रोग और दुर्बुद्धि को दूर करने वाला है। 2. यह निरंतर आने वाली विपत्तियों को शांत करता है। 3. शंख “विश्वभेषज” अर्थात सार्वभौमिक औषधि है। 4. यह पाप और संकट से रक्षा करता है। ---

English Insight

With the conch we dispel disease and negative thought. With the conch we overcome recurring misfortune. The radiant conch, the universal medicine, may it protect us from sin and suffering.

शब्दार्थ

दिवि = आकाश में, स्वर्गलोक में जातः = उत्पन्न हुआ समुद्रजः = समुद्र से जन्मा सिन्धुतः परि आभृतः = सिन्धु (जल) से चारों ओर से आवृत, जल द्वारा पोषित सः = वह नः = हमारा हिरण्यजाः = स्वर्णमय, तेजस्वी शङ्खः = शंख आयुः-प्रतरनः = आयु को पार ले जाने वाला, दीर्घायु देने वाला मणिः = रत्न, दिव्य आभूषण ---

सरल हिन्दी अर्थ

जो आकाश में जन्मा, समुद्र से उत्पन्न हुआ, और जल से पोषित है— वह स्वर्णमय शंख हमारे लिए आयु को बढ़ाने वाला दिव्य रत्न बने। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र शंख को एक दिव्य रत्न (मणि) और आयुष्यवर्धक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है। “दिवि जातः” — शंख की उत्पत्ति केवल समुद्र तक सीमित नहीं मानी गई है, बल्कि उसका संबंध दिवि (आकाश/स्वर्ग) से भी जोड़ा गया है। इसका अर्थ है कि शंख में आकाशीय और आध्यात्मिक ऊर्जा निहित है। “समुद्रजः” — शंख समुद्र से उत्पन्न होता है। वेदों में समुद्र अनंत चेतना, गहराई और सृष्टि का मूल स्रोत है। समुद्र से निकला शंख सृष्टि के रहस्यों और गहन ऊर्जा का प्रतीक है। “सिन्धुतस्पर्याभृतः” — वह जल से पोषित और घिरा हुआ है। जल जीवन का मूल तत्व है। अतः शंख जीवनदायी ऊर्जा से पूर्ण है। “स नो हिरण्यजाः शङ्ख” — हिरण्य (स्वर्ण) दिव्यता, पवित्रता और प्रकाश का प्रतीक है। स्वर्णमय शंख का अर्थ है ऐसा शंख जो तेजस्वी, शुद्ध और दिव्य शक्ति से युक्त हो। “आयुष्प्रतरणो मणिः” — यह अत्यंत महत्वपूर्ण पद है। आयुष्प्रतरण का अर्थ है आयु को आगे ले जाने वाला, दीर्घायु प्रदान करने वाला। मणि का अर्थ है रत्न। यहाँ शंख को एक ऐसे रत्न के रूप में देखा गया है जो जीवन की रक्षा करता है और आयु को बढ़ाता है। यह मंत्र बताता है कि शंख केवल ध्वनि उत्पन्न करने वाला उपकरण नहीं, बल्कि जीवन-संरक्षक ऊर्जा का प्रतीक है। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ शंख आकाश और समुद्र की संयुक्त शक्ति का प्रतीक है। ✔ यह जीवन को संतुलित और संरक्षित करता है। ✔ आयुष्य और आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम है। ---

योगिक दृष्टि

✔ शंखनाद प्राण प्रवाह को संतुलित करता है। ✔ दीर्घ श्वास के माध्यम से जीवनशक्ति बढ़ती है। ✔ आयु और ऊर्जा में वृद्धि का प्रतीक। ---

मनोवैज्ञानिक अर्थ

✔ शंख की ध्वनि मन को स्थिर करती है। ✔ भय और तनाव कम होते हैं। ✔ जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज के युग में आयुष्य और स्वास्थ्य सबसे बड़ी संपत्ति है। शंखनाद एक प्राकृतिक ध्वनि-चिकित्सा है, जो वातावरण को शुद्ध करता है और मानसिक संतुलन देता है। यह मंत्र हमें सिखाता है कि प्रकृति और दिव्य ऊर्जा से जुड़कर जीवन को दीर्घ और सुरक्षित बनाया जा सकता है। ---

सारांश

1. शंख आकाश और समुद्र से उत्पन्न दिव्य रत्न है। 2. यह जल से पोषित और स्वर्णमय तेज से युक्त है। 3. आयुष्य और जीवन-संरक्षण का प्रतीक है। 4. शंखनाद स्वास्थ्य, संतुलन और सुरक्षा प्रदान करता है। ---

English Insight

Born in heaven, arising from the ocean, nourished by the waters— may the golden conch, the jewel of life, carry us safely across the span of years. It symbolizes vitality, longevity, and divine protection through cosmic energy.

शब्दार्थ

समुद्रात् जातः = समुद्र से उत्पन्न मणिः = रत्न, दिव्य रत्न वृत्रात् जातः = वृत्र से उत्पन्न / मेघ-विनाश से प्रकट दिवाकरः = प्रकाश देने वाला, सूर्य समान तेजस्वी सः = वह अस्मान् = हमें सर्वतः = चारों ओर से पातु = रक्षा करे हेत्या = शस्त्र, आक्रमण, हानिकारक शक्ति देव-असुरेभ्यः = देवों और असुरों (दोनों प्रकार की शक्तियों) से ---

सरल हिन्दी अर्थ

समुद्र से उत्पन्न वह दिव्य मणि, वृत्र से प्रकट होकर सूर्य समान प्रकाश देने वाला— वह हमें चारों ओर से देव और असुरों की आक्रामक शक्तियों से रक्षा करे। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र शंख (या दिव्य मणि) की शक्ति को और अधिक व्यापक रूप में प्रस्तुत करता है। “समुद्राज्जातो मणिः” — समुद्र से उत्पन्न मणि का उल्लेख हमें पुनः समुद्र की गहराई और सृष्टि के मूल स्रोत की ओर ले जाता है। समुद्र वेदों में अनंत चेतना, सामर्थ्य और जीवन-ऊर्जा का प्रतीक है। शंख या मणि उस अनंत शक्ति का साकार रूप है। “वृत्राज्जातो दिवाकरः” — वृत्र का अर्थ है आवरण करने वाला, मेघ या अंधकार का प्रतीक। वृत्र-वध के बाद सूर्य का प्रकट होना प्रकाश और विजय का प्रतीक है। यहाँ शंख को उस शक्ति के रूप में देखा गया है जो अंधकार को हटाकर प्रकाश उत्पन्न करती है। दिवाकर का अर्थ है सूर्य समान प्रकाश देने वाला। अर्थात् यह मणि केवल रक्षण ही नहीं करता, बल्कि प्रकाश और ज्ञान भी प्रदान करता है। “सो अस्मान्त्सर्वतः पातु” — वह हमें चारों दिशाओं से रक्षा करे। यहाँ सर्वतः का प्रयोग व्यापक संरक्षण को दर्शाता है—शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक सभी स्तरों पर। “हेत्या देवासुरेभ्यः” — हेत्या का अर्थ है आक्रमण या शस्त्र। देव और असुर दोनों प्रकार की शक्तियाँ यहाँ उल्लेखित हैं। इसका संकेत है कि कभी-कभी संकट केवल नकारात्मक शक्तियों से ही नहीं, बल्कि अत्यधिक सकारात्मक या असंतुलित शक्तियों से भी उत्पन्न हो सकता है। अतः संतुलन और सुरक्षा आवश्यक है। यह मंत्र हमें बताता है कि शंख/मणि केवल रक्षा का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रकाश, संतुलन और दिव्य संरक्षण का प्रतीक है। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ समुद्र = अनंत चेतना ✔ वृत्र = अज्ञान और अंधकार ✔ दिवाकर = ज्ञान और प्रकाश यह मंत्र सिखाता है कि जब अज्ञान का आवरण हटता है, तब ज्ञान का सूर्य उदित होता है। शंख उस जागरण का प्रतीक है। ---

योगिक दृष्टि

✔ शंखनाद प्राणशक्ति को संतुलित करता है। ✔ यह नकारात्मक ऊर्जा को हटाकर सकारात्मक प्रकाश लाता है। ✔ आंतरिक संतुलन और सुरक्षा का माध्यम है। ---

मनोवैज्ञानिक अर्थ

✔ भय और मानसिक अंधकार को दूर करता है। ✔ आत्मबल और स्पष्टता प्रदान करता है। ✔ जीवन में संतुलन स्थापित करता है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज के युग में बाहरी आक्रमण केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक तनाव, सूचना-आक्रमण और नकारात्मक वातावरण के रूप में भी होते हैं। यह मंत्र हमें आंतरिक प्रकाश और संतुलन के माध्यम से स्वयं की रक्षा करना सिखाता है। ---

सारांश

1. शंख समुद्र से उत्पन्न दिव्य मणि है। 2. यह अंधकार हटाकर सूर्य समान प्रकाश देता है। 3. चारों दिशाओं से रक्षा करता है। 4. संतुलन और सुरक्षा का प्रतीक है। ---

English Insight

Born from the ocean, radiant like the sun that rises after darkness, may this divine jewel protect us from all directions— from every harmful force, whether divine or demonic. It symbolizes illumination after ignorance and complete spiritual protection.

शब्दार्थ

हिरण्यानाम् = स्वर्णमय वस्तुओं में एकः असि = तुम अद्वितीय हो सोमात् अधि जज्ञिषे = सोम से उत्पन्न हुए हो रथे = रथ में त्वम् असि दर्शतः = तुम दर्शनीय, शोभायमान हो इषुधौ = तरकश में, अस्त्रागार में रोचनः = प्रकाशमान, तेजस्वी त्वम् = तुम प्र ण = हमारे प्राणों को आयूंषि तारिषत् = आयु को पार ले जाओ, दीर्घायु प्रदान करो ---

सरल हिन्दी अर्थ

तुम स्वर्णमय वस्तुओं में अद्वितीय हो, सोम से उत्पन्न हुए हो। रथ में तुम शोभायमान हो, तरकश में तुम प्रकाशमान हो। तुम हमारे प्राणों को सुरक्षित रखते हुए आयु को पार ले जाओ। ---

विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मंत्र शंख या दिव्य मणि को बहुआयामी प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करता है। “हिरण्यानामेकोऽसि” — स्वर्ण वस्तुओं में तुम अद्वितीय हो। स्वर्ण वेदों में पवित्रता, अमूल्यता और दिव्यता का प्रतीक है। इसका तात्पर्य है कि यह मणि या शंख सर्वोच्च मूल्य और तेज से युक्त है। “सोमात्त्वमधि जज्ञिषे” — सोम आनंद, अमृतत्व और दिव्य रस का प्रतीक है। सोम से उत्पन्न होने का अर्थ है कि यह शक्ति अमृतमयी, जीवनदायिनी और आनंद से परिपूर्ण है। “रथे त्वमसि दर्शत” — रथ गति और कर्म का प्रतीक है। जीवन एक रथ के समान है। इस रथ में यह दिव्य शक्ति शोभायमान है, अर्थात् जीवन की यात्रा में यह हमारा संरक्षक है। “इषुधौ रोचनस्त्वं” — इषुधि (तरकश) युद्ध और संघर्ष का प्रतीक है। यहाँ यह संकेत है कि संघर्ष की स्थिति में भी यह दिव्य मणि प्रकाश प्रदान करती है। अंधकार और युद्ध में भी यह दिशा दिखाने वाली शक्ति है। “प्र ण आयूंषि तारिषत्” — यह पद अत्यंत गूढ़ है। इसका अर्थ है कि यह हमारे प्राणों को आयु के पार ले जाए, अर्थात् दीर्घायु, सुरक्षा और जीवन की पूर्णता प्रदान करे। यह मंत्र जीवन के तीन आयामों को जोड़ता है: 1. आनंद (सोम) 2. कर्म और गति (रथ) 3. संघर्ष और रक्षा (इषुधि) इन तीनों में यह दिव्य शक्ति प्रकाश और संरक्षण प्रदान करती है। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ सोम = अमृत और आनंद ✔ रथ = जीवन-यात्रा ✔ इषुधि = संघर्ष और कर्म यह मंत्र बताता है कि जीवन की हर अवस्था में दिव्य प्रकाश और संरक्षण उपलब्ध है। ---

योगिक दृष्टि

✔ प्राणशक्ति का संतुलन ✔ आनंद और उत्साह की वृद्धि ✔ संघर्ष में मानसिक स्पष्टता ---

मनोवैज्ञानिक अर्थ

✔ आत्मविश्वास बढ़ाता है ✔ जीवन के संघर्षों में साहस देता है ✔ सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है ---

आधुनिक संदर्भ

आज जीवन एक निरंतर दौड़ और संघर्ष है। यह मंत्र सिखाता है कि यदि हमारे भीतर दिव्य प्रकाश (चेतना) जागृत हो, तो हम आनंद, कर्म और संघर्ष—तीनों में संतुलन बनाए रख सकते हैं। ---

सारांश

1. यह मणि स्वर्ण समान अद्वितीय है। 2. सोम से उत्पन्न होकर अमृतमयी है। 3. जीवन-यात्रा और संघर्ष दोनों में प्रकाश देती है। 4. दीर्घायु और प्राण-सुरक्षा प्रदान करती है। ---

English Insight

Unique among golden treasures, born of Soma’s nectar, radiant in the chariot of life and in the quiver of struggle— may this divine jewel carry our life-breath safely across the span of years. It symbolizes joy, protection, and enduring vitality.

शब्दार्थ

देवानाम् = देवताओं का अस्थि = अस्थि, हड्डी कृशनम् = उज्ज्वल, चमकीला बभूव = हुआ तत् = वह आत्मन्वत् = चेतनयुक्त, जीवनयुक्त चरति = चलता है अप्सु अन्तः = जल के भीतर तत् ते = वही तुम्हारे लिए बध्नामि = मैं बाँधता हूँ (धारण कराता हूँ) आयुषे = आयु के लिए वर्चसे = तेज, ओज बलाय = शक्ति के लिए दीर्घायुत्वाय = दीर्घायु के लिए शत-शारदाय = सौ शरदों (वर्षों) तक जीवित रहने हेतु कार्शनः = कृशन/कर्षण नामक दिव्य रक्षक त्वा अभि रक्षतु = तुम्हारी रक्षा करे ---

सरल हिन्दी अर्थ

यह देवताओं की उज्ज्वल अस्थि के समान बना, जो जल के भीतर चेतनयुक्त चलता है। मैं उसे तुम्हारे लिए आयु, तेज और बल की प्राप्ति हेतु बाँधता हूँ, दीर्घायु और सौ वर्षों तक जीवन के लिए। कर्षण नामक दिव्य शक्ति तुम्हारी रक्षा करे। ---

विस्तृत व्याख्या

यह मंत्र शंख (या समुद्रज मणि) को “देवानामस्थि” — देवताओं की अस्थि के समान बताता है। अस्थि शरीर का आधार है। उसी प्रकार यह दिव्य मणि जीवन का आधार और संरक्षण का प्रतीक है। “कृशनं बभूव” — उज्ज्वल और प्रकाशमान। अर्थात् यह केवल भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि तेजस्विता का प्रतीक है। “तदात्मन्वच्चरत्यप्स्वन्तः” — वह जल के भीतर भी जीवंत है। यह संकेत है कि जीवन के गहनतम स्तरों (अवचेतन, भावनात्मक संसार) में भी यह दिव्य चेतना विद्यमान है। “तत्ते बध्नामि” — यहाँ वैदिक परंपरा में रक्षा-सूत्र या ताबीज की भाँति धारण कराने की क्रिया का संकेत है। यह केवल बाहरी बंधन नहीं, बल्कि आंतरिक संकल्प है। आयुषे — दीर्घ जीवन वर्चसे — तेज और प्रतिष्ठा बलाय — शारीरिक व मानसिक शक्ति दीर्घायुत्वाय शतशारदाय — सौ वर्षों तक पूर्ण जीवन यहाँ स्पष्ट रूप से स्वास्थ्य, ऊर्जा और दीर्घायु की प्रार्थना है। “कार्शनस्त्वाभि रक्षतु” — कार्शन (कृशन) को रक्षक रूप में पुकारा गया है। यह एक दिव्य संरक्षक शक्ति का प्रतीक है। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ दिव्य चेतना जीवन का आधार (अस्थि) है। ✔ भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर रक्षा। ✔ दीर्घायु और तेज की प्राप्ति। ---

योगिक संकेत

✔ प्राण और ओज का संरक्षण ✔ शरीर-मन का संतुलन ✔ दीर्घ और स्वस्थ जीवन ---

मनोवैज्ञानिक दृष्टि

✔ आत्मविश्वास और आंतरिक सुरक्षा ✔ मानसिक स्थिरता ✔ जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण ---

आधुनिक संदर्भ

आज के समय में दीर्घायु केवल वर्षों की संख्या नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण जीवन है। यह मंत्र सिखाता है कि यदि हम भीतर की दिव्य ऊर्जा से जुड़े रहें, तो स्वास्थ्य, तेज और शक्ति बनाए रख सकते हैं। ---

सार

यह मंत्र शंख-मणि को देवताओं की अस्थि समान आधार, जीवनदायिनी ऊर्जा, दीर्घायु, तेज और बल का स्रोत और दिव्य संरक्षण का प्रतीक घोषित करता है। ---

English Insight

Born like the radiant bone of the gods, living within the waters— may this divine charm be bound for long life, for brilliance, strength, and a hundred autumns. May the sacred guardian protect you.

भूमिका

अथर्ववेद का चतुर्थ काण्ड, दशम सूक्त (4.10) शङ्ख या समुद्रज मणि की महिमा का वर्णन करता है। यह सूक्त केवल एक भौतिक वस्तु की स्तुति नहीं, बल्कि दिव्य संरक्षण, दीर्घायु, तेज, बल और आध्यात्मिक प्रकाश का गूढ़ प्रतीक है। ---

1. उत्पत्ति का रहस्य

सूक्त में शङ्ख/मणि को — ✔ समुद्र से उत्पन्न ✔ आकाश से सम्बद्ध ✔ सोम से जन्मा ✔ देवताओं की अस्थि के समान बताया गया है। समुद्र = अनंत चेतना आकाश = दिव्यता सोम = अमृत और आनंद देव-अस्थि = जीवन का आधार अर्थात यह दिव्य वस्तु ब्रह्माण्डीय तत्वों का संयोग है। ---

2. प्रकाश और विजय का प्रतीक

वृत्र-वध के पश्चात सूर्य का उदय जिस प्रकार अंधकार को हटाता है, उसी प्रकार यह मणि अज्ञान और भय को दूर करती है। ✔ रोचन (प्रकाशमान) ✔ दिवाकर (सूर्य समान तेज) ✔ हिरण्य (स्वर्णमय पवित्रता) यह ज्ञान, स्पष्टता और आत्मबल का प्रतीक है। ---

3. जीवन-रक्षा और दीर्घायु

सूक्त में बार-बार प्रार्थना की गई है — ✔ आयुषे (दीर्घ जीवन) ✔ वर्चसे (तेज, प्रतिष्ठा) ✔ बलाय (शक्ति) ✔ शतशारदाय (सौ वर्षों का जीवन) यह केवल आयु-वृद्धि नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण, तेजस्वी और बलवान जीवन की कामना है। ---

4. रक्षा का व्यापक आयाम

सूक्त में रक्षा की बात चारों दिशाओं से की गई है — ✔ देवासुरेभ्यः (सभी शक्तियों से) ✔ हेत्या (आक्रमणों से) ✔ रोग, अमीवा, दुष्प्रभावों से यह बाहरी और आंतरिक दोनों स्तरों की सुरक्षा है। ---

5. आध्यात्मिक संकेत

यह सूक्त सिखाता है कि — 🔶 जीवन एक रथ है। 🔶 संघर्ष एक युद्ध है। 🔶 आनंद सोम है। 🔶 चेतना शंखनाद है। जब भीतर दिव्य प्रकाश जागृत होता है, तो जीवन संतुलित, सुरक्षित और दीर्घ बनता है। ---

6. योगिक एवं मनोवैज्ञानिक अर्थ

✔ शंखनाद प्राणशक्ति को संतुलित करता है। ✔ ध्वनि-चिकित्सा से वातावरण शुद्ध होता है। ✔ आत्मविश्वास और मानसिक स्थिरता बढ़ती है। ---

7. आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

आज तनाव, भय और असंतुलन से भरे युग में यह सूक्त हमें याद दिलाता है कि — ✨ वास्तविक सुरक्षा भीतर की चेतना से आती है। ✨ प्रकाश अज्ञान को हराता है। ✨ संतुलन ही दीर्घायु का आधार है। ---

समग्र सार

अथर्ववेद 4.10 सूक्त का केंद्रीय संदेश है — दिव्य चेतना ही जीवन की रक्षा करती है। वही तेज देती है। वही शक्ति देती है। वही आयु को पूर्ण करती है। शङ्ख या मणि केवल बाहरी वस्तु नहीं, बल्कि आंतरिक प्रकाश और दिव्य संरक्षण का प्रतीक है। ---

English Thematic Insight

Atharvaveda 4.10 celebrates the divine conch as a cosmic jewel — born of ocean, heaven, and Soma. It represents: • Illumination over darkness • Protection from all harm • Strength, vitality, and long life • Inner awakening and spiritual security The true “jewel” is awakened consciousness within.

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