अजमनज्मि मंत्रों का भाव और व्याख्या

 


4.14 – अजमनज्मि मंत्रों का भाव और व्याख्या

मंत्र 1:

अजो ह्यग्नेरजनिष्ट शोकात्सो अपश्यज्जनितारमग्रे ।
तेन देवा देवतामग्रा आयन् तेन रोहान् रुरुहुर्मेध्यासः ॥१॥

भाव:
अजमनज्मि का जन्म शोक और अज्ञान के बीच होता है, लेकिन उसकी चेतना स्वाभाविक रूप से उज्ज्वल और प्रकट है। यह दिखाता है कि साधक जन्म से ही चेतना का वाहक है, और शरीर उसकी साधना का माध्यम। जैसे शारीरिक जन्म होता है, वैसे ही आंतरिक चेतना जन्म लेती है।

  • व्यावहारिक दृष्टि: व्यक्ति का जीवन चाहे सामान्य हो, भीतर की चेतना हमेशा महान कार्यों के लिए सक्षम होती है।
  • ब्रह्मांडीय अर्थ: इस चेतना का विकास, धीरे-धीरे ब्रह्मांडीय संतुलन में योगदान करता है।

मंत्र 2:

क्रमध्वमग्निना नाकमुख्यान् हस्तेषु बिभ्रतः ।
दिवस्पृष्ठं स्वर्गत्वा मिश्रा देवेभिराध्वम् ॥२॥

भाव:
अजमनज्मि हाथों और ऊर्जा के माध्यम से यज्ञ करता है। हाथ और मुख उसके साधन हैं। यह दर्शाता है कि शरीर और अंग साधक की चेतना के अधीन हैं

  • व्यावहारिक दृष्टि: हमारे कर्म और कार्य केवल हमारी चेतना का विस्तार हैं।
  • ब्रह्मांडीय अर्थ: कर्म और ध्यान के माध्यम से जीवन और ब्रह्मांड में संतुलन स्थापित होता है।

मंत्र 3:

पृष्ठात्पृथिव्या अहमन्तरिक्षमारुहमन्तरिक्षाद्दिवमारुहम् ।
दिवो नाकस्य पृष्ठात्स्वर्ज्योतिरगामहम् ॥३॥

भाव:
अजमनज्मि पृथ्वी से लेकर आकाश तक अपने अस्तित्व का अनुभव करता है। यह सूक्ष्म चेतना का स्थूल और विस्तार रूप दर्शाता है।

  • व्यावहारिक दृष्टि: साधक अपने शरीर और चारों ओर के तत्वों के माध्यम से ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ता है।
  • ब्रह्मांडीय अर्थ: चेतना केवल शरीर में सीमित नहीं; यह ब्रह्मांड में फैलती है और जीवन को संतुलित करती है।

मंत्र 4:

स्वर्यन्तो नापेक्षन्त आ द्यां रोहन्ति रोदसी ।
यज्ञं ये विश्वतोधारं सुविद्वांसो वितेनिरे ॥४॥

भाव:
सूर्य और आकाश की शक्तियों का संतुलन साधक के ध्यान और यज्ञ में होता है। यह दिखाता है कि चेतना और प्रकृति का समन्वय जरूरी है

  • व्यावहारिक दृष्टि: साधक के अभ्यास और कर्मों से केवल उसका ही नहीं, बल्कि समाज और प्रकृति का कल्याण भी होता है।
  • ब्रह्मांडीय अर्थ: ऊर्जा का संतुलन और जीवन का प्रवाह यज्ञ और साधना से संभव है।

मंत्र 5:

अग्ने प्रेहि प्रथमो देवतानां चक्षुर्देवानामुत मानुषानाम् ।
इयक्षमाणा भृगुभिः सजोषाः स्वर्यन्तु यजमानाः स्वस्ति ॥५॥

भाव:
अजमनज्मि देवताओं और मानवों के बीच सेतु का कार्य करता है। उसकी चेतना सभी जीवों में कल्याणकारी ऊर्जा फैलाती है

  • व्यावहारिक दृष्टि: साधक समाज में मार्गदर्शक और संरक्षक का कार्य करता है।
  • ब्रह्मांडीय अर्थ: चेतना केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सार्वभौमिक प्रभाव डालती है।

मंत्र 6:

अजमनज्मि पयसा घृतेन दिव्यं सुपर्णं पयसं बृहन्तम् ।
तेन गेष्म सुकृतस्य लोकं स्वरारोहन्तो अभि नाकमुत्तमम् ॥६॥

भाव:
अजमनज्मि दिव्य पदार्थों और ऊर्जा का वितरण करता है। यह ऊर्जा का प्रसार और कल्याणकारी कार्य है।

  • व्यावहारिक दृष्टि: साधक अपने ज्ञान और कर्मों से दूसरों का जीवन समृद्ध बनाता है।
  • ब्रह्मांडीय अर्थ: ऊर्जा का यह प्रसार ब्रह्मांडीय संतुलन को बनाए रखता है।

मंत्र 7:

पञ्चौदनं पञ्चभिरङ्गुलिभिर्दर्व्योद्धर पञ्चधैतमोदनम् ।
प्राच्यां दिशि शिरो अजस्य धेहि दक्षिणायां दिशि दक्षिणं धेहि पार्श्वम् ॥७॥

भाव:
अजमनज्मि अपने शरीर के अंगों और दिशाओं में ऊर्जा का अनुभव करता है। शरीर और ब्रह्मांडीय दिशाएँ जुड़ी हुई हैं

  • व्यावहारिक दृष्टि: शरीर के प्रत्येक अंग को समझना और नियंत्रित करना साधना का हिस्सा है।
  • ब्रह्मांडीय अर्थ: ऊर्जा का संतुलन शरीर से ब्रह्मांड तक फैलता है।

मंत्र 8:

प्रतीच्यां दिशि भसदमस्य धेह्युत्तरस्यां दिश्युत्तरं धेहि पार्श्वम् ।
ऊर्ध्वायां दिश्यजस्यानूकं धेहि दिशि ध्रुवायां धेहि पाजस्यमन्तरिक्षे मध्यतो मध्यमस्य ॥८॥

भाव:
अजमनज्मि शरीर और दिशा के बीच सामंजस्य स्थापित करता है। यह ऊर्जा की केन्द्रित और विस्तारित धारा का संकेत है।

  • व्यावहारिक दृष्टि: साधक का अभ्यास केवल अंगों तक सीमित नहीं; उसका प्रभाव आसपास फैलता है।
  • ब्रह्मांडीय अर्थ: चेतना के केंद्र से ऊर्जा का प्रवाह सभी दिशाओं में संतुलन लाता है।

मंत्र 9:

शृतमजं शृतया प्रोर्णुहि त्वचा सर्वैरङ्गैः संभृतं विश्वरूपम् ।
स उत्तिस्ठेतो अभि नाकमुत्तमं पद्भिश्चतुर्भिः प्रति तिष्ठ दिक्षु ॥९॥

भाव:
अजमनज्मि ब्रह्मांडीय रूप धारण करता है। शरीर और चेतना का सामंजस्य उसे विश्वरूप बना देता है, जो ब्रह्मांड के कल्याण के लिए कार्य करता है।

  • व्यावहारिक दृष्टि: साधक का अंतिम उद्देश्य केवल स्वयं का विकास नहीं, बल्कि सर्वलोक कल्याण है।
  • ब्रह्मांडीय अर्थ: यह मंत्र दिखाता है कि चेतना और शरीर मिलकर ब्रह्मांडीय ऊर्जा के वाहक बनते हैं।

सारांश

  • 4.14 के ये 9 मंत्र मनुष्य में चेतना के विकास, शरीर के माध्यम और ब्रह्मांडीय संतुलन को स्पष्ट करते हैं।
  • अजमनज्मि साधक की चेतना का प्रतीक है, जो जन्म से लेकर ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रकट होने तक सत्य, कर्म और ध्यान के माध्यम से कल्याणकारी कार्य करती है।
  • यह व्याख्या वास्तविक जीवन और विज्ञान के दृष्टिकोण से भी समझने योग्य है, जैसे शरीर, ऊर्जा, दिशा, और अभ्यास के माध्यम से साधक का विकास।


अथर्ववेद 4.14.9 के मंत्र –

शृतमजं शृतया प्रोर्णुहि त्वचा सर्वैरङ्गैः संभृतं विश्वरूपम् ।
स उत्तिस्ठेतो अभि नाकमुत्तमं पद्भिश्चतुर्भिः प्रति तिष्ठ दिक्षु ॥९॥

– का गहन अर्थ, नीरुक्त, अष्टाध्यायी, महाभाष्य और उपनिषद-दर्शन के संदर्भों के साथ विस्तारपूर्वक समझते हैं।


1. मंत्र का मूल भाव

मंत्र का मुख्य विषय विश्वरूप अज (अजन्मा दिव्य ऊर्जा) का संपूर्ण शरीर और चेतना में संचरण है।

  • शृतमजं – यह “अजन्मा” या “जन्महीन” और “श्रुत” (ज्ञान और शिक्षा से ज्ञात) है।
  • त्वचा सर्वैरङ्गैः संभृतं – अज को केवल मन या चेतना के केंद्र में ही नहीं बल्कि संपूर्ण शरीर और अंगों के माध्यम से व्यवस्थित किया जाता है।
  • विश्वरूपम् – यह अज सम्पूर्ण ब्रह्मांड का रूप लेता है; इसका विस्तार microcosm (शरीर) और macrocosm (ब्रह्मांड) दोनों में है।
  • स उत्तिस्ठेतो अभि नाकमुत्तमं – नाकमार्ग ऊर्जा का उच्चतम केंद्र है। योग और प्राणायाम में नासिका के माध्यम से प्राण ऊर्जा का संचरण और चेतना का आरोहण होता है।
  • पद्भिश्चतुर्भिः प्रति तिष्ठ दिक्षु – शरीर के चारों दिशा में ऊर्जा का प्रवाह और संतुलन सुनिश्चित करता है।

सारांश: मंत्र बताता है कि साधक को अपने शरीर और चेतना को विश्वरूप अज के अनुसार व्यवस्थित करना चाहिए।


2. नीरुक्त दृष्टि

नीरुक्त में शब्दों के भाव और प्रयोग पर विशेष ध्यान दिया गया है।

  • शृतमजं – “श्रुत” का अर्थ है जो शास्त्रों और ऋषियों से ज्ञात है। यहाँ यह सिद्धान्तिक और अनुभवात्मक दिव्य शक्ति को दर्शाता है।
  • संभृतं – नीरुक्त के अनुसार, यह शब्द विन्यस्त और संरक्षित के अर्थ में आता है।
  • विश्वरूपम् – नीरुक्त में वर्णित रूप से, यह अन्तरंग (microcosm) और बाह्य (macrocosm) दोनों का प्रतिनिधित्व है।

नीरुक्त स्पष्ट करता है कि यह शक्ति संपूर्ण ब्रह्मांडीय और शरीर दोनों स्तरों पर व्याप्त है।


3. अष्टाध्यायी और महाभाष्य दृष्टि

संस्कृत व्याकरण के दृष्टिकोण से:

  • प्रोर्णुहि – क्रियापद रूप ‘प्र + ऊर्ध्व + नि’; “ऊर्ध्व दिशा में फैलाना, स्थापित करना”
  • उत्तिस्ठेतो – ‘उत् + स्था’ (उठना, आरोहण)
  • पद्भिश्चतुर्भिः – ‘पद् + चतुर्भि’; चारों दिशाओं में स्थिर करना

महाभाष्य में इन शब्दों के प्रयोग से स्पष्ट है कि

  • मंत्र केवल आभासी/आध्यात्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह दिशाओं और शरीर के अंगों के संतुलन का निर्देश देता है।
  • इसे योग और प्राणायाम के सिद्धांत से भी जोड़ा गया है, जहाँ नासिका और अंगों का संयोजन चेतना और प्राणशक्ति के संतुलन हेतु आवश्यक है।

4. उपनिषद दर्शन से संबंध

उपनिषदों में ब्रह्म और जीव का समन्वय इस मंत्र से मेल खाता है।

  • छान्दोग्य उपनिषद् 6.2.1 – “तत्सवितुरेवात्मा सर्वेभ्यः प्राणभ्यः” – यहां ब्रह्म/अज का स्वरूप सभी प्राणों और शरीर में व्याप्त बताया गया है।
  • प्राणायाम और ध्यान उपदेश – शरीर के अंग, नाकमार्ग और चारों दिशाओं का ध्यान
    → मंत्र में “त्वचा सर्वैरङ्गैः संभृतं, पद्भिश्चतुर्भिः प्रति तिष्ठ” के माध्यम से दिखाया गया।

दर्शनिक अर्थ:

  • शरीर microcosm है और विश्व macrocosm।
  • अजन्मा शक्ति (शृतमज) दोनों का पूरक रूप है।
  • दिशा और अंगों का संतुलन → चेतना का संतुलन → मोक्ष या ब्रह्म चेतना की प्राप्ति।

5. योग और विज्ञान

  1. नाकमार्ग और प्राणायाम:

    • नासिका (नाक) के माध्यम से प्राण ऊर्जा का संचरण।
    • मंत्र में “अभि नाकमुत्तमं” → चेतना का सर्वोच्च आरोहण।
  2. चारों दिशाएँ और शरीर:

    • पंचांगुलि, अंग और दिशाओं का समन्वय
    • शरीर में ऊर्जा केंद्रों (चक्र) और दिशा संतुलन।
  3. विश्वरूप अज:

    • शरीर में microcosm और ब्रह्मांड में macrocosm का समन्वय।
    • साधक का अनुभव: ऊर्जा, चेतना और ज्ञान का सर्वव्यापी प्रवाह।

6. सारांश / समग्र व्याख्या

  • मंत्र का लक्ष्य: साधक अपने शरीर और चेतना को विश्वरूप अज के अनुरूप व्यवस्थित करे।
  • विधि:
    • त्वचा और अंगों में ऊर्जा का संचरण
    • नाकमार्ग से उच्चतम चेतना प्राप्ति
    • चारों दिशाओं में ऊर्जा का संतुलन
  • उद्देश्य:
    • चेतना का आरोहण
    • शरीर, मन और आत्मा का सामंजस्य
    • ब्रह्म (विश्व चेतना) के साथ मेल

सारांश वाक्य:

"शरीर, अंग और चेतना के माध्यम से अज (विश्वरूप शक्ति) का सम्यक् संरेखण साधक को उच्चतम चेतना और ब्रह्म अनुभव तक ले जाता है।"



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