अथर्ववेद — काण्ड २, सूक्त २.१
(परम गुहा ब्रह्म तत्त्व)
मन्त्र १
मन्त्र:
वेनस्तत्पश्यत्परमं गुहा यद्यत्र विश्वं भवत्येकरूपम् । इदं पृश्निरदुहज्जायमानाः स्वर्विदो अभ्यनूषत व्राः ॥
वेनस्तत्पश्यत्परमं गुहा यद्यत्र विश्वं भवत्येकरूपम् । इदं पृश्निरदुहज्जायमानाः स्वर्विदो अभ्यनूषत व्राः ॥
Word by Word:
वेनः = ज्ञानी दृष्टा
तत् = उस परम तत्व को
पश्यत् = देखता है
परमम् = सर्वोच्च
गुहा = हृदय गुहा में
यत्र = जहाँ
विश्वम् = सम्पूर्ण जगत
एकरूपम् = एक स्वरूप हो जाता है
पृश्निः = प्रकृति
अदुहत् = प्रकट करती है
स्वर्विदः = प्रकाश जानने वाले
वेनः = ज्ञानी दृष्टा
तत् = उस परम तत्व को
पश्यत् = देखता है
परमम् = सर्वोच्च
गुहा = हृदय गुहा में
यत्र = जहाँ
विश्वम् = सम्पूर्ण जगत
एकरूपम् = एक स्वरूप हो जाता है
पृश्निः = प्रकृति
अदुहत् = प्रकट करती है
स्वर्विदः = प्रकाश जानने वाले
हिंदी व्याख्या:
ज्ञानी पुरुष उस परम ब्रह्म को हृदय की गुहा में देखता है जहाँ सम्पूर्ण विश्व एक ही स्वरूप बन जाता है। यह अद्वैत स्थिति है। प्रकृति उसी परम चेतना से प्रकट होती है। जो स्वर्गीय प्रकाश को जान लेते हैं वे उसी सत्य का अनुभव करते हैं।
ज्ञानी पुरुष उस परम ब्रह्म को हृदय की गुहा में देखता है जहाँ सम्पूर्ण विश्व एक ही स्वरूप बन जाता है। यह अद्वैत स्थिति है। प्रकृति उसी परम चेतना से प्रकट होती है। जो स्वर्गीय प्रकाश को जान लेते हैं वे उसी सत्य का अनुभव करते हैं।
English Explanation:
The seer perceives the Supreme hidden in the cave of the heart where the entire universe becomes one form. Nature emerges from that supreme consciousness. Those who realize divine light perceive this unity.
The seer perceives the Supreme hidden in the cave of the heart where the entire universe becomes one form. Nature emerges from that supreme consciousness. Those who realize divine light perceive this unity.
मन्त्र २
मन्त्र:
प्र तद्वोचेदमृतस्य विद्वान् गन्धर्वो धाम परमं गुहा यत्। त्रीणि पदानि निहिता गुहास्य यस्तानि वेद स पितुष्पितासत्॥
प्र तद्वोचेदमृतस्य विद्वान् गन्धर्वो धाम परमं गुहा यत्। त्रीणि पदानि निहिता गुहास्य यस्तानि वेद स पितुष्पितासत्॥
Word by Word:
अमृतस्य = अमर तत्व का
विद्वान् = ज्ञानी
गन्धर्वः = दिव्य चेतना
धाम = धाम / निवास
त्रीणि पदानि = तीन अवस्थाएँ
निहिता = स्थित
यः वेद = जो जानता है
पितुः पितासः = कारण का कारण
अमृतस्य = अमर तत्व का
विद्वान् = ज्ञानी
गन्धर्वः = दिव्य चेतना
धाम = धाम / निवास
त्रीणि पदानि = तीन अवस्थाएँ
निहिता = स्थित
यः वेद = जो जानता है
पितुः पितासः = कारण का कारण
हिंदी व्याख्या:
ज्ञानी उस अमृत ब्रह्म के परम धाम को जानता है जो हृदय गुहा में स्थित है। वहाँ तीन पद — जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाएँ — स्थित हैं। जो इन्हें जान लेता है वह कारण के भी कारण को जान लेता है।
ज्ञानी उस अमृत ब्रह्म के परम धाम को जानता है जो हृदय गुहा में स्थित है। वहाँ तीन पद — जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाएँ — स्थित हैं। जो इन्हें जान लेता है वह कारण के भी कारण को जान लेता है।
English Explanation:
The wise understands the immortal abode hidden within. Three states of existence reside there. Knowing them leads one to the ultimate cause beyond all causes.
The wise understands the immortal abode hidden within. Three states of existence reside there. Knowing them leads one to the ultimate cause beyond all causes.
मन्त्र ३
मन्त्र:
स नः पिता जनिता स उत बन्धुर्धामानि वेद भुवनानि विश्वा । यो देवानां नामध एक एव तं संप्रश्नं भुवना यन्ति सर्वा ॥
स नः पिता जनिता स उत बन्धुर्धामानि वेद भुवनानि विश्वा । यो देवानां नामध एक एव तं संप्रश्नं भुवना यन्ति सर्वा ॥
Word by Word:
सः = वही
पिता = पिता
जनिता = उत्पन्न करने वाला
बन्धुः = मित्र
धामानि = सभी लोक
देवानाम् = देव शक्तियों का
एक एव = एक ही
सः = वही
पिता = पिता
जनिता = उत्पन्न करने वाला
बन्धुः = मित्र
धामानि = सभी लोक
देवानाम् = देव शक्तियों का
एक एव = एक ही
हिंदी व्याख्या:
वही परम तत्व हमारा पिता, उत्पन्नकर्ता और बन्धु है। वह सभी लोकों और देव शक्तियों का मूल है। समस्त भुवन उसी एक सत्य की खोज में हैं।
वही परम तत्व हमारा पिता, उत्पन्नकर्ता और बन्धु है। वह सभी लोकों और देव शक्तियों का मूल है। समस्त भुवन उसी एक सत्य की खोज में हैं।
English Explanation:
That Supreme is father, creator, and friend. He is the origin of all worlds and divine forces. All beings seek that one truth.
That Supreme is father, creator, and friend. He is the origin of all worlds and divine forces. All beings seek that one truth.
मन्त्र ४
मन्त्र:
परि द्यावापृथिवी सद्य आयमुपातिष्ठे प्रथमजामृतस्य । वाचमिव वक्तरि भुवनेष्ठा धास्युरेष नन्वेषो अग्निः ॥
परि द्यावापृथिवी सद्य आयमुपातिष्ठे प्रथमजामृतस्य । वाचमिव वक्तरि भुवनेष्ठा धास्युरेष नन्वेषो अग्निः ॥
Word by Word:
द्यावा-पृथिवी = आकाश और पृथ्वी
प्रथमजम् = प्रथम उत्पन्न
अमृतस्य = अमर तत्व का
अग्निः = चेतना की अग्नि
द्यावा-पृथिवी = आकाश और पृथ्वी
प्रथमजम् = प्रथम उत्पन्न
अमृतस्य = अमर तत्व का
अग्निः = चेतना की अग्नि
हिंदी व्याख्या:
यह अमृत का प्रथमज अग्नि तत्व सम्पूर्ण द्युलोक और पृथ्वी को धारण करता है। जैसे वाणी वक्ता में स्थित होती है वैसे ही चेतना सम्पूर्ण सृष्टि में स्थित है।
यह अमृत का प्रथमज अग्नि तत्व सम्पूर्ण द्युलोक और पृथ्वी को धारण करता है। जैसे वाणी वक्ता में स्थित होती है वैसे ही चेतना सम्पूर्ण सृष्टि में स्थित है।
English Explanation:
The primal immortal fire pervades heaven and earth. As speech resides in the speaker, consciousness abides in creation.
The primal immortal fire pervades heaven and earth. As speech resides in the speaker, consciousness abides in creation.
मन्त्र ५
मन्त्र:
परि विश्वा भुवनान्यायमृतस्य तन्तुं विततं दृशे कम् । यत्र देवा अमृतमानशानाः समाने योनावध्यैरयन्त ॥
परि विश्वा भुवनान्यायमृतस्य तन्तुं विततं दृशे कम् । यत्र देवा अमृतमानशानाः समाने योनावध्यैरयन्त ॥
Word by Word:
विश्वा भुवनानि = समस्त लोक
अमृतस्य तन्तुम् = अमरता का सूत्र
विततम् = विस्तृत
देवाः = दिव्य शक्तियाँ
समाने योनौ = एक मूल में
विश्वा भुवनानि = समस्त लोक
अमृतस्य तन्तुम् = अमरता का सूत्र
विततम् = विस्तृत
देवाः = दिव्य शक्तियाँ
समाने योनौ = एक मूल में
हिंदी व्याख्या:
सम्पूर्ण विश्व अमृत के सूत्र से बंधा है। सभी देव शक्तियाँ उसी एक मूल चेतना में स्थित हैं। यह अद्वैत ब्रह्म की घोषणा है।
सम्पूर्ण विश्व अमृत के सूत्र से बंधा है। सभी देव शक्तियाँ उसी एक मूल चेतना में स्थित हैं। यह अद्वैत ब्रह्म की घोषणा है।
English Explanation:
All worlds are woven into the thread of immortality. Divine forces rest in one common source — the Supreme Consciousness.
All worlds are woven into the thread of immortality. Divine forces rest in one common source — the Supreme Consciousness.
अथर्ववेद — काण्ड २, सूक्त २
(गन्धर्व तत्त्व)
मन्त्र १
मन्त्र:
दिव्यो गन्धर्वो भुवनस्य यस्पतिरेक एव नमस्यो विक्ष्वीड्यः । तं त्वा यौमि ब्रह्मणा दिव्य देव नमस्ते अस्तु दिवि ते सधस्थम् ॥
दिव्यो गन्धर्वो भुवनस्य यस्पतिरेक एव नमस्यो विक्ष्वीड्यः । तं त्वा यौमि ब्रह्मणा दिव्य देव नमस्ते अस्तु दिवि ते सधस्थम् ॥
Word by Word अर्थ:
दिव्यः = दिव्य, आकाशीय
गन्धर्वः = सूक्ष्म देव सत्ता / चेतना
भुवनस्य = जगत का
यः पतिः = जो स्वामी है
एकः एव = केवल वही
नमस्यः = वंदनीय
विक्षु = प्राणियों में
ईड्यः = स्तुति योग्य
तं = उस
त्वा = आपको
यौमि = मैं स्तुति करता हूँ
ब्रह्मणा = ब्रह्मज्ञान से
दिवि = स्वर्ग में
सधस्थम् = निवास स्थान
दिव्यः = दिव्य, आकाशीय
गन्धर्वः = सूक्ष्म देव सत्ता / चेतना
भुवनस्य = जगत का
यः पतिः = जो स्वामी है
एकः एव = केवल वही
नमस्यः = वंदनीय
विक्षु = प्राणियों में
ईड्यः = स्तुति योग्य
तं = उस
त्वा = आपको
यौमि = मैं स्तुति करता हूँ
ब्रह्मणा = ब्रह्मज्ञान से
दिवि = स्वर्ग में
सधस्थम् = निवास स्थान
हिंदी भावार्थ:
यह मन्त्र दिव्य गन्धर्व को समस्त जगत का स्वामी बताता है। वह एकमात्र वंदनीय चेतना है जो सभी प्राणियों में विद्यमान है। साधक ब्रह्मज्ञान द्वारा उसकी स्तुति करता है। यहाँ गन्धर्व ब्रह्म की सूक्ष्म अभिव्यक्ति है।
यह मन्त्र दिव्य गन्धर्व को समस्त जगत का स्वामी बताता है। वह एकमात्र वंदनीय चेतना है जो सभी प्राणियों में विद्यमान है। साधक ब्रह्मज्ञान द्वारा उसकी स्तुति करता है। यहाँ गन्धर्व ब्रह्म की सूक्ष्म अभिव्यक्ति है।
English Explanation:
The divine Gandharva is described as the lord of the universe and the only worthy of worship. He represents subtle cosmic consciousness present in all beings. The seeker praises him through sacred knowledge.
The divine Gandharva is described as the lord of the universe and the only worthy of worship. He represents subtle cosmic consciousness present in all beings. The seeker praises him through sacred knowledge.
मन्त्र २
मन्त्र:
दिवि स्पृष्टो यजतः सूर्यत्वगवयाता हरसो दैव्यस्य । मृडात्गन्धर्वो भुवनस्य यस्पतिरेक एव नमस्यः सुशेवाः ॥
दिवि स्पृष्टो यजतः सूर्यत्वगवयाता हरसो दैव्यस्य । मृडात्गन्धर्वो भुवनस्य यस्पतिरेक एव नमस्यः सुशेवाः ॥
Word by Word अर्थ:
दिवि = आकाश में
स्पृष्टः = स्पर्श किया हुआ
यजतः = पूजनीय
सूर्यत्वक् = सूर्य के समान तेज
हरसः = तेजस्विता
दैव्यस्य = दिव्य शक्ति का
मृडात् = कृपालु हो
सुशेवाः = मंगलकारी
दिवि = आकाश में
स्पृष्टः = स्पर्श किया हुआ
यजतः = पूजनीय
सूर्यत्वक् = सूर्य के समान तेज
हरसः = तेजस्विता
दैव्यस्य = दिव्य शक्ति का
मृडात् = कृपालु हो
सुशेवाः = मंगलकारी
हिंदी भावार्थ:
यह मन्त्र गन्धर्व को सूर्य समान तेजस्वी और दिव्य शक्ति से युक्त बताता है। वह कृपालु है और मंगल प्रदान करता है। यह प्रकाश-चेतना का प्रतीक है जो अज्ञान को दूर करती है।
यह मन्त्र गन्धर्व को सूर्य समान तेजस्वी और दिव्य शक्ति से युक्त बताता है। वह कृपालु है और मंगल प्रदान करता है। यह प्रकाश-चेतना का प्रतीक है जो अज्ञान को दूर करती है।
English Explanation:
The Gandharva is radiant like the sun and filled with divine brilliance. He is benevolent and auspicious. This symbolizes illumination of consciousness that removes ignorance.
The Gandharva is radiant like the sun and filled with divine brilliance. He is benevolent and auspicious. This symbolizes illumination of consciousness that removes ignorance.
मन्त्र ३
मन्त्र:
अनवद्याभिः समु जग्म आभिरप्सरास्वपि गन्धर्व आसीत्। समुद्र आसां सदनं म आहुर्यतः सद्य आ च परा च यन्ति ॥
अनवद्याभिः समु जग्म आभिरप्सरास्वपि गन्धर्व आसीत्। समुद्र आसां सदनं म आहुर्यतः सद्य आ च परा च यन्ति ॥
Word by Word अर्थ:
अनवद्याभिः = निर्दोष शक्तियों से
अप्सरासु = अप्सराओं में
आसीत् = स्थित था
समुद्रः = चेतना का सागर
सदनम् = निवास स्थान
अनवद्याभिः = निर्दोष शक्तियों से
अप्सरासु = अप्सराओं में
आसीत् = स्थित था
समुद्रः = चेतना का सागर
सदनम् = निवास स्थान
हिंदी भावार्थ:
गन्धर्व अप्सराओं अर्थात सूक्ष्म ऊर्जाओं के साथ स्थित है। उनका मूल निवास चेतना-सागर है। सृष्टि ऊर्जा की तरंगों से संचालित है।
गन्धर्व अप्सराओं अर्थात सूक्ष्म ऊर्जाओं के साथ स्थित है। उनका मूल निवास चेतना-सागर है। सृष्टि ऊर्जा की तरंगों से संचालित है।
English Explanation:
The Gandharva dwells among apsaras, symbolic of subtle energies emerging from the ocean of consciousness. Creation functions through waves of energy.
The Gandharva dwells among apsaras, symbolic of subtle energies emerging from the ocean of consciousness. Creation functions through waves of energy.
मन्त्र ४
मन्त्र:
अभ्रिये दिद्युन् नक्षत्रिये या विश्वावसुं गन्धर्वं सचध्वे । ताभ्यो वो देवीर्नम इत्कृणोमि ॥
अभ्रिये दिद्युन् नक्षत्रिये या विश्वावसुं गन्धर्वं सचध्वे । ताभ्यो वो देवीर्नम इत्कृणोमि ॥
Word by Word अर्थ:
अभ्रिये = मेघ में
दिद्युन् = विद्युत में
नक्षत्रिये = नक्षत्रों में
विश्वावसुं = सर्वधनयुक्त
सचध्वे = संग रहती हैं
अभ्रिये = मेघ में
दिद्युन् = विद्युत में
नक्षत्रिये = नक्षत्रों में
विश्वावसुं = सर्वधनयुक्त
सचध्वे = संग रहती हैं
हिंदी भावार्थ:
मेघ, विद्युत और नक्षत्रों में स्थित दिव्य शक्तियाँ गन्धर्व से संबद्ध हैं। सम्पूर्ण ब्रह्मांडीय व्यवस्था एक ही चेतना से जुड़ी है।
मेघ, विद्युत और नक्षत्रों में स्थित दिव्य शक्तियाँ गन्धर्व से संबद्ध हैं। सम्पूर्ण ब्रह्मांडीय व्यवस्था एक ही चेतना से जुड़ी है।
English Explanation:
Clouds, lightning, and stars represent cosmic forces aligned with the Gandharva. The universe operates under unified consciousness.
Clouds, lightning, and stars represent cosmic forces aligned with the Gandharva. The universe operates under unified consciousness.
मन्त्र ५
मन्त्र:
याः क्लन्दास्तमिषीचयोऽक्षकामा मनोमुहः । ताभ्यो गन्धर्वभ्योऽप्सराभ्योऽकरं नमः ॥
याः क्लन्दास्तमिषीचयोऽक्षकामा मनोमुहः । ताभ्यो गन्धर्वभ्योऽप्सराभ्योऽकरं नमः ॥
Word by Word अर्थ:
क्लन्दाः = आकर्षित करने वाली
तमिषीचयः = अंधकारमय शक्तियाँ
अक्षकामा = इन्द्रिय विषय चाहने वाली
मनोमुहः = मन को मोहित करने वाली
क्लन्दाः = आकर्षित करने वाली
तमिषीचयः = अंधकारमय शक्तियाँ
अक्षकामा = इन्द्रिय विषय चाहने वाली
मनोमुहः = मन को मोहित करने वाली
हिंदी भावार्थ:
यह मन्त्र उन सूक्ष्म शक्तियों को नमस्कार करता है जो मन को आकर्षित करती हैं। यह चेतावनी भी देता है कि ऊर्जा का संतुलित उपयोग ही आध्यात्मिक उन्नति देता है।
यह मन्त्र उन सूक्ष्म शक्तियों को नमस्कार करता है जो मन को आकर्षित करती हैं। यह चेतावनी भी देता है कि ऊर्जा का संतुलित उपयोग ही आध्यात्मिक उन्नति देता है।
English Explanation:
The mantra acknowledges subtle forces that enchant the mind. Awareness and balance are essential for spiritual growth.
The mantra acknowledges subtle forces that enchant the mind. Awareness and balance are essential for spiritual growth.
अथर्ववेद — काण्ड २, सूक्त २.३
(भेषज — रोगनाश मंत्र)
मन्त्र १
मन्त्र:
अदो यदवधावत्यवत्कमधि पर्वतात्। तत्ते कृणोमि भेषजं सुभेषजं यथाससि ॥
अदो यदवधावत्यवत्कमधि पर्वतात्। तत्ते कृणोमि भेषजं सुभेषजं यथाससि ॥
Word by Word:
अदः = वह
अवत्कम् = नीचे गिरा हुआ
पर्वतात् = पर्वत से
भेषजम् = औषधि
सुभेषजम् = उत्तम औषधि
अदः = वह
अवत्कम् = नीचे गिरा हुआ
पर्वतात् = पर्वत से
भेषजम् = औषधि
सुभेषजम् = उत्तम औषधि
हिंदी व्याख्या:
जैसे पर्वत से औषधि नीचे आती है, वैसे ही यह उपचार रोग को शांत करे। यहाँ औषधि केवल भौतिक नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक उपचार का प्रतीक है।
जैसे पर्वत से औषधि नीचे आती है, वैसे ही यह उपचार रोग को शांत करे। यहाँ औषधि केवल भौतिक नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक उपचार का प्रतीक है।
English Explanation:
As healing herbs descend from the mountains, may this remedy cure completely. The mantra signifies both physical and spiritual healing.
As healing herbs descend from the mountains, may this remedy cure completely. The mantra signifies both physical and spiritual healing.
मन्त्र २
मन्त्र:
आदङ्गा कुविदङ्ग शतं या भेषजानि ते । तेषामसि त्वमुत्तममनास्रावमरोगणम् ॥
आदङ्गा कुविदङ्ग शतं या भेषजानि ते । तेषामसि त्वमुत्तममनास्रावमरोगणम् ॥
Word by Word:
शतम् = सैकड़ों
भेषजानि = औषधियाँ
उत्तमम् = सर्वोत्तम
अरोगणम् = रोगनाशक
शतम् = सैकड़ों
भेषजानि = औषधियाँ
उत्तमम् = सर्वोत्तम
अरोगणम् = रोगनाशक
हिंदी व्याख्या:
सैकड़ों औषधियों में यह सर्वोत्तम है जो रक्तस्राव और रोग को रोकती है। आयुर्वेदिक दृष्टि से यह रोग-प्रतिरोधक शक्ति का आह्वान है।
सैकड़ों औषधियों में यह सर्वोत्तम है जो रक्तस्राव और रोग को रोकती है। आयुर्वेदिक दृष्टि से यह रोग-प्रतिरोधक शक्ति का आह्वान है।
English Explanation:
Among hundreds of medicines, this is supreme — stopping disease and bleeding. It invokes natural immunity and vitality.
Among hundreds of medicines, this is supreme — stopping disease and bleeding. It invokes natural immunity and vitality.
मन्त्र ३
मन्त्र:
नीचैः खनन्त्यसुरा अरुस्राणमिदं महत्। तदास्रावस्य भेषजं तदु रोगमनीनशत्॥
नीचैः खनन्त्यसुरा अरुस्राणमिदं महत्। तदास्रावस्य भेषजं तदु रोगमनीनशत्॥
Word by Word:
नीचैः = नीचे से
खनन्ति = खोदते हैं
भेषजम् = औषधि
रोगम् = रोग
नीचैः = नीचे से
खनन्ति = खोदते हैं
भेषजम् = औषधि
रोगम् = रोग
हिंदी व्याख्या:
गहराई से निकाली गई औषधि रक्तस्राव और रोग को दूर करती है। यह दर्शाता है कि उपचार का मूल प्रकृति की गहराई में है।
गहराई से निकाली गई औषधि रक्तस्राव और रोग को दूर करती है। यह दर्शाता है कि उपचार का मूल प्रकृति की गहराई में है।
English Explanation:
The herb dug from the depths removes disease and bleeding. Healing comes from nature’s profound sources.
The herb dug from the depths removes disease and bleeding. Healing comes from nature’s profound sources.
मन्त्र ४
मन्त्र:
उपजीका उद्भरन्ति समुद्रादधि भेषजम् । तदास्रावस्य भेषजं तदु रोगमशीशमत्॥
उपजीका उद्भरन्ति समुद्रादधि भेषजम् । तदास्रावस्य भेषजं तदु रोगमशीशमत्॥
Word by Word:
समुद्रात् = समुद्र से
उद्भरन्ति = निकालते हैं
भेषजम् = औषधि
समुद्रात् = समुद्र से
उद्भरन्ति = निकालते हैं
भेषजम् = औषधि
हिंदी व्याख्या:
समुद्र से प्राप्त औषधि रोग को शांत करती है। समुद्र यहाँ जीवन के आदिम स्रोत का प्रतीक है।
समुद्र से प्राप्त औषधि रोग को शांत करती है। समुद्र यहाँ जीवन के आदिम स्रोत का प्रतीक है।
English Explanation:
Medicine arising from the cosmic ocean cures disease. The ocean symbolizes the primordial source of life.
Medicine arising from the cosmic ocean cures disease. The ocean symbolizes the primordial source of life.
मन्त्र ५
मन्त्र:
अरुस्राणमिदं महत्पृथिव्या अध्युद्भृतम् । तदास्रावस्य भेषजं तदु रोगमनीनशत्॥
अरुस्राणमिदं महत्पृथिव्या अध्युद्भृतम् । तदास्रावस्य भेषजं तदु रोगमनीनशत्॥
Word by Word:
पृथिव्या = पृथ्वी से
उद्भृतम् = उत्पन्न
भेषजम् = औषधि
पृथिव्या = पृथ्वी से
उद्भृतम् = उत्पन्न
भेषजम् = औषधि
हिंदी व्याख्या:
पृथ्वी से उत्पन्न महान औषधि रोगों का नाश करती है। पृथ्वी ही आरोग्य की माता है।
पृथ्वी से उत्पन्न महान औषधि रोगों का नाश करती है। पृथ्वी ही आरोग्य की माता है।
English Explanation:
The great remedy born of Earth destroys disease. Earth is the universal mother of healing.
The great remedy born of Earth destroys disease. Earth is the universal mother of healing.
मन्त्र ६
मन्त्र:
शं नो भवन्त्वप ओषधयः शिवाः । इन्द्रस्य वज्रो अप हन्तु रक्षस आराद्विसृष्टा इषवः पतन्तु रक्षसाम् ॥
शं नो भवन्त्वप ओषधयः शिवाः । इन्द्रस्य वज्रो अप हन्तु रक्षस आराद्विसृष्टा इषवः पतन्तु रक्षसाम् ॥
Word by Word:
अपः = जल
ओषधयः = औषधियाँ
शिवाः = मंगलकारी
इन्द्रस्य वज्रः = शक्ति का वज्र
रक्षसाम् = रोगकारी शक्तियाँ
अपः = जल
ओषधयः = औषधियाँ
शिवाः = मंगलकारी
इन्द्रस्य वज्रः = शक्ति का वज्र
रक्षसाम् = रोगकारी शक्तियाँ
हिंदी व्याख्या:
जल और औषधियाँ हमारे लिए मंगलकारी हों। दिव्य शक्ति सभी रोगकारक तत्वों का नाश करे। यह सम्पूर्ण आरोग्य की प्रार्थना है।
जल और औषधियाँ हमारे लिए मंगलकारी हों। दिव्य शक्ति सभी रोगकारक तत्वों का नाश करे। यह सम्पूर्ण आरोग्य की प्रार्थना है।
English Explanation:
May waters and herbs be auspicious for us. May divine power destroy all harmful forces. This is a complete prayer for holistic healing.
May waters and herbs be auspicious for us. May divine power destroy all harmful forces. This is a complete prayer for holistic healing.
अथर्ववेद — काण्ड २, सूक्त २.४
(जङ्गिड मणि — रक्षा एवं आयुष्यम्)
मन्त्र १
मन्त्र:
दीर्घायुत्वाय बृहते रणायारिष्यन्तो दक्षमाणाः सदैव । मणिं विष्कन्धदूषणं जङ्गिडं बिभृमो वयम् ॥
दीर्घायुत्वाय बृहते रणायारिष्यन्तो दक्षमाणाः सदैव । मणिं विष्कन्धदूषणं जङ्गिडं बिभृमो वयम् ॥
Word by Word:
दीर्घायुत्वाय = दीर्घ आयु के लिए
बृहते = महान
रणाय = संघर्ष हेतु
मणिम् = ताबीज / रत्न
विष्कन्धदूषणम् = बाधा नाशक
जङ्गिडम् = जङ्गिड औषधि
बिभृमः = धारण करते हैं
दीर्घायुत्वाय = दीर्घ आयु के लिए
बृहते = महान
रणाय = संघर्ष हेतु
मणिम् = ताबीज / रत्न
विष्कन्धदूषणम् = बाधा नाशक
जङ्गिडम् = जङ्गिड औषधि
बिभृमः = धारण करते हैं
हिंदी अर्थ:
हम दीर्घ आयु और शक्ति के लिए इस जङ्गिड मणि को धारण करते हैं, जो सभी बाधाओं और रोगों को दूर करने वाला है।
हम दीर्घ आयु और शक्ति के लिए इस जङ्गिड मणि को धारण करते हैं, जो सभी बाधाओं और रोगों को दूर करने वाला है।
English Explanation:
We wear the Jangida amulet for long life and strength. It is believed to remove obstacles and harmful forces.
We wear the Jangida amulet for long life and strength. It is believed to remove obstacles and harmful forces.
मन्त्र २
मन्त्र:
जङ्गिडो जम्भाद्विशराद्विष्कन्धादभिशोचनात्। मणिः सहस्रवीर्यः परि णः पातु विश्वतः ॥
जङ्गिडो जम्भाद्विशराद्विष्कन्धादभिशोचनात्। मणिः सहस्रवीर्यः परि णः पातु विश्वतः ॥
Word by Word:
जम्भात् = जड़ता से
विष्कन्धात् = बाधा से
सहस्रवीर्यः = हजारों शक्तियों वाला
पातु = रक्षा करे
विश्वतः = चारों ओर से
जम्भात् = जड़ता से
विष्कन्धात् = बाधा से
सहस्रवीर्यः = हजारों शक्तियों वाला
पातु = रक्षा करे
विश्वतः = चारों ओर से
हिंदी अर्थ:
यह सहस्र शक्ति वाला जङ्गिड मणि हमें जड़ता, रोग और सभी बाधाओं से चारों ओर से रक्षा करे।
यह सहस्र शक्ति वाला जङ्गिड मणि हमें जड़ता, रोग और सभी बाधाओं से चारों ओर से रक्षा करे।
English Explanation:
May this thousand-powered amulet protect us from disease, weakness and every obstruction.
May this thousand-powered amulet protect us from disease, weakness and every obstruction.
मन्त्र ३
मन्त्र:
अयं विष्कन्धं सहतेऽयं बाधते अत्त्रिणः । अयं नो विश्वभेषजो जङ्गिडः पात्वंहसः ॥
अयं विष्कन्धं सहतेऽयं बाधते अत्त्रिणः । अयं नो विश्वभेषजो जङ्गिडः पात्वंहसः ॥
Word by Word:
सहते = सहन करता है
बाधते = नष्ट करता है
विश्वभेषजः = सार्वभौम औषधि
अंहसः = पाप / संकट
सहते = सहन करता है
बाधते = नष्ट करता है
विश्वभेषजः = सार्वभौम औषधि
अंहसः = पाप / संकट
हिंदी अर्थ:
यह जङ्गिड समस्त बाधाओं को सहन कर उन्हें नष्ट करता है। यह सर्वरोगनाशक औषधि हमें संकट से बचाए।
यह जङ्गिड समस्त बाधाओं को सहन कर उन्हें नष्ट करता है। यह सर्वरोगनाशक औषधि हमें संकट से बचाए।
English Explanation:
This universal remedy withstands and destroys obstacles. May it protect us from distress and sin.
This universal remedy withstands and destroys obstacles. May it protect us from distress and sin.
मन्त्र ४
मन्त्र:
देवैर्दत्तेन मणिना जङ्गिडेन मयोभुवा । विष्कन्धं सर्वा रक्षांसि व्यायामे सहामहे ॥
देवैर्दत्तेन मणिना जङ्गिडेन मयोभुवा । विष्कन्धं सर्वा रक्षांसि व्यायामे सहामहे ॥
Word by Word:
देवैः दत्तेन = देवों द्वारा दिया हुआ
मयोभुवा = सुखदायक
रक्षांसि = दुष्ट शक्तियाँ
सहामहे = पराजित करते हैं
देवैः दत्तेन = देवों द्वारा दिया हुआ
मयोभुवा = सुखदायक
रक्षांसि = दुष्ट शक्तियाँ
सहामहे = पराजित करते हैं
हिंदी अर्थ:
देवप्रदत्त जङ्गिड मणि द्वारा हम सभी दुष्ट शक्तियों और रोगकारक तत्वों को परास्त करते हैं।
देवप्रदत्त जङ्गिड मणि द्वारा हम सभी दुष्ट शक्तियों और रोगकारक तत्वों को परास्त करते हैं।
English Explanation:
With this divine amulet we overcome negative and harmful forces.
With this divine amulet we overcome negative and harmful forces.
मन्त्र ५
मन्त्र:
शणश्च मा जङ्गिडश्च विष्कन्धादभि रक्षताम् । अरण्यादन्य आभृतः कृष्या अन्यो रसेभ्यः ॥
शणश्च मा जङ्गिडश्च विष्कन्धादभि रक्षताम् । अरण्यादन्य आभृतः कृष्या अन्यो रसेभ्यः ॥
Word by Word:
रक्षताम् = रक्षा करें
अरण्यात् = वन से
कृष्या = कृषि भूमि से
रसेभ्यः = रस से उत्पन्न
रक्षताम् = रक्षा करें
अरण्यात् = वन से
कृष्या = कृषि भूमि से
रसेभ्यः = रस से उत्पन्न
हिंदी अर्थ:
वन और कृषि भूमि से उत्पन्न औषधियाँ हमारी रक्षा करें।
वन और कृषि भूमि से उत्पन्न औषधियाँ हमारी रक्षा करें।
English Explanation:
May herbs from forest and field protect us from all harm.
May herbs from forest and field protect us from all harm.
मन्त्र ६
मन्त्र:
कृत्यादूषिरयं मणिरथो अरातिदूषिः । अथो सहस्वान् जङ्गिडः प्र ण आयुंषि तारिषत्॥
कृत्यादूषिरयं मणिरथो अरातिदूषिः । अथो सहस्वान् जङ्गिडः प्र ण आयुंषि तारिषत्॥
Word by Word:
कृत्या = अभिचार
अराति = शत्रुता
दूषिः = नाशक
आयुंषि = आयु
तारिषत् = बढ़ाए
कृत्या = अभिचार
अराति = शत्रुता
दूषिः = नाशक
आयुंषि = आयु
तारिषत् = बढ़ाए
हिंदी अर्थ:
यह मणि अभिचार और शत्रुता का नाश करता है। यह जङ्गिड हमारी आयु को बढ़ाए।
यह मणि अभिचार और शत्रुता का नाश करता है। यह जङ्गिड हमारी आयु को बढ़ाए।
English Explanation:
This amulet removes negativity and hostility. May it extend our lifespan and vitality.
This amulet removes negativity and hostility. May it extend our lifespan and vitality.



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