दशवृक्ष = दस वृक्षों की शक्ति से
मुञ्च = मुक्त कर
इमम् = इस (रोगी को)
रक्षसः = राक्षसी/हानिकारक शक्ति से
ग्राह्या = पकड़ने वाली शक्ति
अधि = ऊपर से
येनम् = जिसने इसे
जग्राह = पकड़ लिया
पर्वसु = अंगों/संधियों में
अथो = फिर
एनम् = इसे
वनस्पते = हे वनस्पति
जीवानाम् = जीवितों के
लोकम् = लोक में
उन् नय = ऊपर ले जा, उठाओ
हिन्दी व्याख्या
यह मंत्र रोगी को दुष्ट ग्रह या रोगकारी शक्ति से मुक्त करने की प्रार्थना है। “दशवृक्ष” औषधीय वृक्षों की सामूहिक शक्ति का प्रतीक है। रोग को “रक्षस” कहा गया है जो शरीर के संधियों में पकड़ लेता है। ऋषि वनस्पति से प्रार्थना करते हैं कि वह रोगी को मृत्यु-समान स्थिति से उठाकर पुनः जीवितों के लोक में स्थापित करे। यह स्पष्ट रूप से चिकित्सा और पुनर्जीवन का मंत्र है।
English Scholarly Explanation
The mantra addresses a pathological condition described metaphorically as a demonic seizure (rakṣas) affecting the joints (parvasu). “Daśavṛkṣa” likely symbolizes a group of medicinal trees employed in healing rituals. The herb (vanaspati) is invoked to release the afflicted person and restore him to the realm of the living. This reflects Atharvavedic therapeutic ritualism where disease is personified and healing involves both herbal and spiritual intervention.
Word by Word
आगात् = वापस आया
उदगात् = ऊपर उठा
अयम् = यह (रोगी)
जीवानाम् = जीवितों के
व्रातम् = समूह में
अपि अगात् = पुनः पहुँचा
अभूत् = बन गया
पुत्राणाम् = पुत्रों का
पिता = पिता
नृणाम् = मनुष्यों में
च = और
भगवत्तमः = अत्यंत सौभाग्यशाली
हिन्दी व्याख्या
यहाँ रोगी के स्वस्थ होकर समाज में पुनः स्थापित होने का वर्णन है। वह जीवितों के समूह में लौट आता है। वह अपने पुत्रों का पिता और समाज में सम्मानित व्यक्ति बन जाता है। यह केवल शारीरिक स्वास्थ्य नहीं, सामाजिक और पारिवारिक पुनर्स्थापन का भी संकेत है।
English Scholarly Explanation
This verse celebrates recovery. The patient “returns” (āgāt, udagāt) to the community of the living. Restoration is not merely biological survival but reintegration into social and familial roles. The phrase “bhagavattamaḥ” implies renewed prosperity and divine favor. Healing is thus holistic — physical, social, and spiritual.
Word by Word
अधीतीः = अध्ययन/विद्याएँ
अध्यगात् = प्राप्त की
अयम् = इसने
अधि = पुनः
जीवपुरा = जीवित नगर में
अगान् = गया
शतम् = सौ
हि = निश्चय ही
अस्य = इसके लिए
भिषजः = वैद्य
सहस्रम् = हजार
उत = और
वीरुधः = औषधियाँ
हिन्दी व्याख्या
यह मंत्र चिकित्सा की व्यापकता को दर्शाता है। रोगी जीवितों के नगर में पुनः प्रवेश करता है। उसके लिए सैकड़ों वैद्य और हजारों औषधियाँ उपलब्ध हैं। यह वैदिक काल की चिकित्सा परंपरा की समृद्धि और विविधता को प्रकट करता है।
English Scholarly Explanation
The verse metaphorically states that “a hundred physicians and a thousand herbs” exist for healing. This hyperbolic expression emphasizes the abundance of therapeutic knowledge. Atharvaveda preserves one of the earliest records of organized healing practices integrating ritual specialists and medicinal plants.
Word by Word
देवाः = देवताओं ने
ते = तेरी
चीतिम् = चेतना/जीवन शक्ति
अविदन् = जानी
ब्रह्माणः = ब्राह्मण/मंत्रज्ञ
उत = और
वीरुधः = औषधियाँ
विश्वे देवा = सभी देवता
भूम्याम् अधि = पृथ्वी पर
हिन्दी व्याख्या
देवता, ब्राह्मण और औषधियाँ — सभी जीवन शक्ति को जानते हैं। यहाँ चिकित्सा को दैवीय, आध्यात्मिक और भौतिक तीनों स्तरों पर स्वीकार किया गया है। पृथ्वी पर स्थित औषधियाँ भी दिव्य ज्ञान से युक्त मानी गई हैं।
English Scholarly Explanation
The life-force (cīti) is recognized by gods, priests, and herbs alike. This suggests a unified cosmology where divine knowledge, ritual authority, and natural medicine operate together. Healing is perceived as participation in cosmic intelligence embedded within the earth.
Word by Word
यः = जिसने
चकार = किया
सः = वही
निष्करत् = दूर करे
सः एव = वही ही
सुभिषक्तमः = श्रेष्ठ वैद्य
तुभ्यम् = तुम्हारे लिए
भेषजानि = औषधियाँ
कृणवन् = बनाता हुआ
भिषजा = वैद्य द्वारा
शुचिः = पवित्र
हिन्दी व्याख्या
जिसने रोग उत्पन्न किया वही उसे दूर भी कर सकता है — यह दैवी न्याय का संकेत है। सच्चा वैद्य पवित्र और कुशल होता है। वह रोगी के लिए औषधियाँ तैयार करता है। यहाँ चिकित्सा को एक पवित्र कर्म माना गया है।
English Scholarly Explanation
The verse concludes with theological nuance: the same cosmic power that permits disease can also remove it. The “subhiṣaktamaḥ” (excellent physician) is pure and skilled. Medicine is sanctified as a sacred vocation. The Atharvavedic worldview thus integrates causality, remedy, and divine order within one continuum.
दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
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