AtharvaVeda kand 3 Sukta 25

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उत्तुदः = उद्दीपन करने वाला, व्याकुल करने वाला त्वा = तुम्हें उत्तुदतु = उद्दीप्त करे, व्याकुल करे मा = मत धृथाः = स्थिर रहो, टिके रहो शयने = शय्या पर, विश्राम में स्वे = अपने इषुः = बाण कामस्य = काम (प्रेम, इच्छा) का या = जो भीमा = प्रबल, तीव्र, प्रभावशाली तया = उसी से विध्यामि = मैं बेधता हूँ, भेदता हूँ त्वा = तुम्हें हृदि = हृदय में

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र प्रेम और आकर्षण की भावनात्मक शक्ति का काव्यमय चित्रण करता है। “उत्तुदस्त्वोत्तुदतु”—अर्थात् वह उद्दीपन करने वाली शक्ति तुम्हें व्याकुल करे। “मा धृथाः शयने स्वे”—तुम अपने शयन में स्थिर न रहो, अर्थात् तुम्हारा मन शांत न रहकर प्रेमभाव से आंदोलित हो। यहाँ “कामस्य इषुः”—कामदेव का बाण—एक रूपक है। वैदिक साहित्य में काम केवल इंद्रियसुख नहीं, बल्कि सृजन की मूल प्रेरणा भी है। “काम” को सृष्टि की प्रारंभिक इच्छा माना गया है। इस मन्त्र में प्रेम की तीव्रता को “भीमा इषुः”—प्रबल बाण—कहा गया है, जो हृदय को भेद देता है। “तया विध्यामि त्वा हृदि”—मैं उस प्रेमबाण से तुम्हारे हृदय को बेधता हूँ। यह वाक्य प्रतीकात्मक है, जिसमें प्रेम की गहन अनुभूति और आकर्षण की शक्ति व्यक्त होती है। यह बाहरी हिंसा नहीं, बल्कि भावनात्मक स्पर्श का संकेत है। यह मन्त्र मानवीय संबंधों की उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ प्रेम मन को व्याकुल करता है, व्यक्ति को स्थिर नहीं रहने देता। प्रेम की यह व्याकुलता ही मिलन की प्रेरणा बनती है। दार्शनिक दृष्टि से देखें तो “काम” सृजन का बीज है। जब तक इच्छा नहीं, तब तक कर्म नहीं। इसलिए काम को नकारात्मक नहीं, बल्कि नियंत्रित और पवित्र रूप में देखा गया है। यहाँ प्रेम की तीव्रता को सकारात्मक ऊर्जा के रूप में चित्रित किया गया है, जो हृदय को जागृत करती है। मन्त्र यह भी सिखाता है कि भावनाएँ मनुष्य जीवन का स्वाभाविक अंग हैं। प्रेम, आकर्षण और व्याकुलता जीवन को गतिशील बनाते हैं। परंतु यह सब धर्म और मर्यादा के भीतर होना चाहिए। आध्यात्मिक अर्थ में “काम का बाण” आत्मा की उस तड़प का प्रतीक भी हो सकता है, जो परम सत्य की खोज में मन को बेचैन करती है। जैसे प्रेम व्यक्ति को प्रिय के प्रति आकर्षित करता है, वैसे ही आत्मा परमात्मा की ओर आकर्षित होती है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: प्रेम और इच्छा जीवन की प्रेरक शक्तियाँ हैं। नियंत्रित और पवित्र काम सृजन और संबंधों का आधार है।
  • विज्ञान: आकर्षण और भावनात्मक उत्तेजना मनोवैज्ञानिक और जैविक प्रक्रियाओं से जुड़ी हैं, जो संबंध निर्माण में सहायक होती हैं।
  • ब्रह्मज्ञान: काम की तीव्रता आत्मा की परम सत्य के प्रति तड़प का प्रतीक है। जब यह ऊर्जा शुद्ध होती है, तो वह आध्यात्मिक मिलन का मार्ग बनती है।

English Explanation

This mantra poetically describes the power of love and desire. It invokes the stimulating force of Kāma (divine desire) to awaken the heart. The “arrow of Kāma” symbolizes intense emotional attraction that pierces the heart and disturbs inner stillness. In Vedic thought, Kāma is not merely sensual desire but the primal impulse of creation. Properly guided, it becomes a sacred motivating force. Spiritually, the arrow of love can also represent the soul’s longing for the Divine. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Desire, when pure and controlled, is a creative force.
  • Science: Emotional attraction involves psychological and biological mechanisms.
  • Brahma-Gyan: The longing awakened by love symbolizes the soul’s yearning for ultimate union.

Word by Word

आधीपर्णाम् = पत्तों (पंखों) से युक्त, सुशोभित काम-शल्याम् = काम (प्रेम/इच्छा) का शल्य, नुकीला बाण इषुम् = बाण संकल्प-कुल्मलाम् = संकल्प रूपी अग्रभाग वाली, इच्छा से अंकुरित ताम् = उस सुसंनताम् = अच्छी तरह सीधी की हुई, ठीक से चढ़ाई हुई कृत्वा = बनाकर, तैयार करके कामः = कामदेव, प्रेम की शक्ति विध्यतु = बेधे, भेदे त्वा = तुम्हें हृदि = हृदय में

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र प्रेम और संकल्प की संयुक्त शक्ति का अत्यंत काव्यमय चित्रण है। यहाँ “कामशल्या इषुः”—काम का नुकीला बाण—एक प्रतीक है। “आधीपर्णाम्” का अर्थ है पंखों से युक्त, अर्थात् वह बाण सुगठित और संतुलित है। पंख बाण को दिशा और स्थिरता देते हैं। इसी प्रकार प्रेम को भी दिशा देने के लिए संयम और संतुलन आवश्यक है। “संकल्पकुल्मलाम्”—जिसका अग्रभाग संकल्प से बना है। यहाँ संकल्प को बाण की नोक कहा गया है। इसका अर्थ है कि केवल भावनात्मक आवेग पर्याप्त नहीं; उसके साथ स्पष्ट इच्छा और मानसिक निश्चय भी होना चाहिए। जब भावना (काम) और संकल्प (निश्चय) मिलते हैं, तब प्रभाव गहरा होता है। “तां सुसंनतां कृत्वा”—उसे ठीक प्रकार से चढ़ाकर, सीधा करके। यह आत्मनियंत्रण का संकेत है। जैसे धनुर्धर बाण को सावधानी से चढ़ाता है, वैसे ही मनुष्य को अपनी भावनाओं और इच्छाओं को संयमित और नियंत्रित रखना चाहिए। “कामो विध्यतु त्वा हृदि”—प्रेम की वह शक्ति तुम्हारे हृदय को भेदे। यहाँ भेदन का अर्थ हिंसा नहीं, बल्कि गहन स्पर्श है। प्रेम का प्रभाव इतना गहरा हो कि वह हृदय में प्रवेश कर उसे रूपांतरित कर दे। दार्शनिक दृष्टि से यह मन्त्र बताता है कि इच्छा (काम) और संकल्प (इच्छाशक्ति) मिलकर सृजनात्मक ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। यदि इच्छा अनियंत्रित हो, तो वह अशांति ला सकती है; यदि संकल्प बिना भावना के हो, तो वह कठोर हो सकता है। दोनों का संतुलन जीवन को पूर्ण बनाता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो आकर्षण केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी होता है। स्पष्ट संकल्प और गहरी भावना मिलकर स्थायी संबंधों की नींव रखते हैं। आध्यात्मिक अर्थ में “काम का बाण” आत्मा की उस तड़प का प्रतीक हो सकता है जो परम सत्य की ओर उन्मुख करती है। जब संकल्प शुद्ध हो और इच्छा पवित्र हो, तब वह ऊर्जा साधना और भक्ति का रूप ले लेती है। इस प्रकार यह मन्त्र प्रेम की शक्ति को अनुशासित, संकल्पित और सृजनात्मक रूप में प्रस्तुत करता है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: इच्छा और संकल्प का संतुलन ही प्रभावशाली और स्थायी परिणाम देता है।
  • विज्ञान: भावनात्मक आकर्षण और मानसिक निश्चय का संयोजन संबंधों को मजबूत बनाता है।
  • ब्रह्मज्ञान: शुद्ध संकल्प और पवित्र इच्छा आत्मा को परम लक्ष्य की ओर अग्रसर करते हैं।

English Explanation

This mantra poetically describes the arrow of Kāma, feathered and sharpened with resolve. The feathers symbolize balance and direction; the tip represents determination (saṅkalpa). Love becomes powerful when emotion and firm intention unite. The prayer asks that this well-prepared arrow of desire pierce the heart—not violently, but as a deep transformative touch. Spiritually, it may symbolize the soul’s focused longing directed toward its ultimate goal. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Desire guided by clear intention becomes creative and transformative.
  • Science: Emotional and cognitive alignment strengthens attachment and commitment.
  • Brahma-Gyan: Pure intention and refined desire lead the soul toward higher realization.

Word by Word

या = जो प्लीहानम् = प्लीहा (तिल्ली/अंतरंग अंग; यहाँ अंतःकरण का प्रतीक) शोषयति = सुखा देती है, क्षीण करती है कामस्य = काम (प्रेम/इच्छा) का इषुः = बाण सुसंनता = भली प्रकार चढ़ाया हुआ, सुस्थिर किया हुआ प्राचीन-पक्षा = पीछे की ओर पंखों से युक्त, संतुलित पंखों वाला व्योṣा (व्योषा) = तीव्र, वेग से जाने वाली तया = उसी से विध्यामि = मैं भेदता हूँ त्वा = तुम्हें हृदि = हृदय में

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र प्रेम की तीव्रता और उसके आंतरिक प्रभाव का अत्यंत प्रभावशाली रूपक प्रस्तुत करता है। यहाँ “कामस्य इषुः”—काम का बाण—फिर से प्रयुक्त हुआ है, परंतु इस बार उसकी शक्ति को और भी गहराई से चित्रित किया गया है। “या प्लीहानं शोषयति”—जो प्लीहा को शोषित कर देती है। प्लीहा (तिल्ली) शरीर का एक आंतरिक अंग है; वैदिक प्रतीकवाद में यह अंतःकरण या भीतर की भावनात्मक अवस्था का द्योतक हो सकता है। “शोषयति” का अर्थ है सुखा देना, व्याकुल कर देना। प्रेम की तीव्रता व्यक्ति के भीतर ऐसी तड़प उत्पन्न करती है कि उसका आंतरिक संतुलन बदल जाता है। “सुसंनता”—अच्छी तरह चढ़ाया हुआ बाण। यह संकेत करता है कि यह भावना आकस्मिक नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण और केंद्रित है। “प्राचीनपक्षा”—जिसके पंख पीछे की ओर संतुलित हैं। बाण के पंख उसे सीधा और लक्ष्यभेदी बनाते हैं। यह रूपक बताता है कि प्रेम की शक्ति संतुलित और लक्षित है। “व्योṣा”—तीव्र वेग से चलने वाली। यह प्रेम की आकस्मिकता और तीव्र प्रभाव का संकेत है। जब प्रेम का बाण चलता है, तो वह अचानक और गहराई से हृदय को स्पर्श करता है। “तया विध्यामि त्वा हृदि”—मैं उसी बाण से तुम्हारे हृदय को भेदता हूँ। यहाँ “भेदन” का अर्थ है गहन भावनात्मक प्रभाव। यह कोई शारीरिक आघात नहीं, बल्कि हृदय में प्रेम का प्रवेश है, जो व्यक्ति को भीतर से रूपांतरित कर देता है। दार्शनिक दृष्टि से यह मन्त्र इच्छा की उस शक्ति को दर्शाता है जो मनुष्य को निष्क्रियता से निकालकर सक्रिय बनाती है। प्रेम की तड़प व्यक्ति को लक्ष्य की ओर अग्रसर करती है। मनोवैज्ञानिक रूप से प्रेम में उत्पन्न व्याकुलता, अनिद्रा, ध्यान का विचलन—ये सभी भावनात्मक गहराई के संकेत हैं। मन्त्र इन्हें काव्यात्मक रूप में “शोषण” और “भेदन” के माध्यम से व्यक्त करता है। आध्यात्मिक स्तर पर यह आत्मा की परमात्मा के प्रति उत्कट आकांक्षा का प्रतीक भी हो सकता है। जब यह आकांक्षा तीव्र होती है, तो वह भीतर की अशुद्धियों को “शोषित” कर आत्मा को शुद्ध करती है। इस प्रकार मन्त्र प्रेम की तीव्र, लक्षित और रूपांतरकारी शक्ति का काव्यमय स्तवन है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: प्रेम की तीव्रता आंतरिक परिवर्तन का कारण बनती है।
  • विज्ञान: गहन भावनाएँ शरीर और मन दोनों को प्रभावित करती हैं।
  • ब्रह्मज्ञान: उत्कट आकांक्षा आत्मा को शुद्ध कर उसे परम लक्ष्य की ओर अग्रसर करती है।

English Explanation

This mantra continues the metaphor of the arrow of Kāma. It describes a well-fitted, swift arrow that dries up the inner being—symbolizing the intense emotional impact of love. The balanced feathers indicate direction and precision, while the piercing of the heart signifies deep transformation. Spiritually, the drying effect may represent the purification of inner impurities through intense longing. Thus, the arrow of desire becomes a force of awakening and transformation. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Intense love brings inner change.
  • Science: Strong emotions affect both physiology and psychology.
  • Brahma-Gyan: Deep longing purifies the soul and directs it toward the highest truth.

Word by Word

मृदुः = कोमल, सौम्य निमन्युः = क्रोधरहित, शान्तचित्त केवली = केवल मेरी (एकनिष्ठ) प्रियवादिनी = मधुर बोलने वाली अनुव्रता = आज्ञाकारी, अनुरक्त, व्रत का पालन करने वाली आजामि = मैं ले आता हूँ, आकर्षित करता हूँ त्वा = तुम्हें अजन्या = जन्मस्थान से परि = चारों ओर से, दूर से मातुः = माता से अथो = तथा पितुः = पिता से

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र प्रेम संबंधों में अपेक्षित गुणों और भावनात्मक सामंजस्य का सूक्ष्म चित्रण करता है। यहाँ पहले भाग में प्रार्थना की जाती है कि प्रिय व्यक्ति “मृदुः”—कोमल स्वभाव वाली हो, “निमन्युः”—क्रोधरहित और शांतचित्त हो। यह स्पष्ट संकेत है कि स्थायी संबंध के लिए कोमलता और संयम अत्यंत आवश्यक हैं। “केवली”—एकनिष्ठ। इसका अर्थ है कि प्रेम में निष्ठा और समर्पण हो। “प्रियवादिनी”—मधुर वाणी बोलने वाली। वाणी का प्रभाव संबंधों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। मधुर शब्द मन को जोड़ते हैं, जबकि कठोर वचन दूरी उत्पन्न करते हैं। “अनुव्रता”—जो साथ निभाने वाली, व्रत का पालन करने वाली हो। यहाँ यह दांपत्य निष्ठा और पारस्परिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है। दूसरे भाग में कहा गया है—“आजामि त्वा अजन्या परि मातुः अथो पितुः”—मैं तुम्हें तुम्हारे जन्मस्थान, माता-पिता से (यहाँ) लाता हूँ। यह विवाह की वैदिक परंपरा का संकेत है, जहाँ कन्या अपने माता-पिता के घर से पति के घर आती है। यह केवल भौतिक स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि जीवन के एक नए अध्याय का प्रारंभ है। दार्शनिक रूप से यह मन्त्र बताता है कि प्रेम केवल आकर्षण नहीं, बल्कि गुणों का संगम है—कोमलता, शांति, मधुर वाणी और निष्ठा। ये गुण ही संबंध को दीर्घकालिक बनाते हैं। सामाजिक दृष्टि से यह मन्त्र वैदिक विवाह संस्कार की झलक देता है, जहाँ दोनों पक्षों के परिवारों का सम्मान होता है। “मातुः अथो पितुः” का उल्लेख इस बात का संकेत है कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का भी संबंध है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो संबंधों में क्रोधरहित स्वभाव और मधुर वाणी तनाव को कम करते हैं। पारस्परिक सम्मान और समर्पण भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करते हैं। आध्यात्मिक अर्थ में यह मन्त्र आत्मा और परमात्मा के संबंध का भी प्रतीक हो सकता है। आत्मा जब संसारिक बंधनों (माता-पिता रूपी मूल) से ऊपर उठती है, तो वह दिव्य मिलन की ओर अग्रसर होती है। वहाँ कोमलता, शांति और समर्पण आवश्यक गुण हैं। इस प्रकार मन्त्र प्रेम को केवल भावनात्मक आकर्षण नहीं, बल्कि सद्गुणों पर आधारित पवित्र बंधन के रूप में प्रस्तुत करता है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: कोमलता, मधुर वाणी और निष्ठा संबंधों की आधारशिला हैं।
  • विज्ञान: शांत स्वभाव और सकारात्मक संचार स्थायी संबंधों को सुदृढ़ करते हैं।
  • ब्रह्मज्ञान: समर्पण और शुद्ध भाव आत्मा को उच्चतर मिलन की ओर ले जाते हैं।

English Explanation

This mantra highlights the virtues desired in a loving relationship—gentleness, absence of anger, sweet speech, and fidelity. It also reflects the traditional transition of marriage, where the bride comes from her parents’ home to begin a new life. Symbolically, it teaches that love must be grounded in character and commitment. Spiritually, it may represent the soul leaving its limited attachments to unite with the Divine through gentleness and devotion. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Gentle nature and loyalty sustain love.
  • Science: Emotional regulation and positive communication strengthen bonds.
  • Brahma-Gyan: Devotion and surrender elevate the soul toward higher union.

Word by Word

आजामि = मैं ले आता हूँ / आकर्षित करता हूँ त्वा = तुम्हें अजन्या = जन्मस्थान से परि = चारों ओर से, दूर से मातुः = माता से अथो = तथा पितुः = पिता से यथा = जिस प्रकार मम = मेरा क्रतौ = संकल्प में, इच्छा में अवसः = स्थित हो, सहायक हो मम = मेरा चित्तम् = मन उपायसि = आकर मिलो, समीप आओ

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र पूर्ववर्ती भाव का विस्तार है। इसमें वाचक प्रिय व्यक्तित्व को उसके जन्मस्थान—माता और पिता के गृह से—अपने जीवन में आमंत्रित करता है। “आजामि त्वा अजन्या परि मातुः अथो पितुः”—यह केवल भौतिक स्थान परिवर्तन का उल्लेख नहीं है, बल्कि जीवन के एक नए आश्रय, नए दायित्व और नए संकल्प में प्रवेश का प्रतीक है। दूसरी पंक्ति में कहा गया है—“यथा मम क्रतौ अवसः मम चित्तम् उपायसि।” यहाँ “क्रतु” का अर्थ संकल्प, उद्देश्य या दृढ़ निश्चय है। वाचक कामना करता है कि जैसे मेरा संकल्प दृढ़ है, वैसे ही तुम मेरे चित्त में आकर उसी भावना से एकरूप हो जाओ। यह एक मानसिक और आध्यात्मिक सामंजस्य की प्रार्थना है। इस मन्त्र का केंद्रीय संदेश है—केवल शारीरिक या सामाजिक मिलन पर्याप्त नहीं; मन और संकल्प का भी एकत्व आवश्यक है। जब दो व्यक्तियों के विचार, उद्देश्य और भावनाएँ एक दिशा में प्रवाहित होती हैं, तब ही संबंध स्थिर और सुखद बनता है। वैदिक परिप्रेक्ष्य में विवाह केवल दैहिक या सामाजिक अनुबंध नहीं था, बल्कि “संकल्प-साम्य” का बंधन था। पति-पत्नी का एक ही ध्येय, एक ही जीवन-दृष्टि और एक ही नैतिक आधार होना आवश्यक माना गया। इसीलिए यहाँ चित्त के मिलन पर विशेष बल दिया गया है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो सफल संबंधों की जड़ मानसिक संगति (mental compatibility) में होती है। यदि उद्देश्य और मूल्य अलग-अलग हों, तो संघर्ष उत्पन्न होता है। परंतु जब दोनों का “क्रतु” समान हो, तो जीवन की चुनौतियाँ भी सरल हो जाती हैं। आध्यात्मिक रूप से यह मन्त्र आत्मा और परमात्मा के संयोग का प्रतीक भी हो सकता है। साधक कहता है—हे दिव्य शक्ति! जैसे मैं संकल्पपूर्वक साधना करता हूँ, वैसे ही तुम मेरे चित्त में आकर स्थित हो जाओ। यहाँ “चित्त में प्रवेश” का अर्थ है—ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव। इस प्रकार यह मन्त्र प्रेम, संकल्प और मानसिक एकता का आदर्श प्रस्तुत करता है। यह सिखाता है कि संबंध केवल बाहरी व्यवस्था नहीं, बल्कि अंतर्मन की एकसूत्रता है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: सफल संबंधों के लिए संकल्प और चित्त की एकता आवश्यक है।
  • विज्ञान: मानसिक सामंजस्य और साझा लक्ष्य संबंधों को स्थायी बनाते हैं।
  • ब्रह्मज्ञान: जब चित्त दिव्य संकल्प से जुड़ता है, तब आत्मिक एकत्व की अनुभूति होती है।

English Explanation

This mantra expresses the desire not only to bring the beloved from her parental home but also to unite minds and intentions. “Kratu” means resolve or sacred intention. The speaker prays that just as his resolve is firm, she may enter and harmonize with his mind. It emphasizes mental and spiritual unity beyond physical or social union. Symbolically, it may represent the soul inviting the Divine to dwell in its consciousness, aligning intention and awareness into one purpose. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Shared intention sustains relationships.
  • Science: Mental compatibility strengthens emotional bonds.
  • Brahma-Gyan: When the mind aligns with higher resolve, divine unity is realized.

Word by Word

व्यस्यै = उसके (उस स्त्री के) मित्रावरुणौ = मित्र और वरुण (देवता) हृदः = हृदय से चित्तानि = विचार, भावनाएँ अस्यतम् = दूर करें, अलग करें अथ = तब एनाम् = उसे अक्रतुम् = बिना अपने संकल्प के, मेरे संकल्प के अनुरूप कृत्वा = बनाकर मम एव = केवल मेरे कृणुतम् = कर दो वशे = वश में, अधीन

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र वैदिक काव्य में प्रयुक्त आकर्षण एवं अभिचार भाव की शैली को दर्शाता है। इसमें “मित्र” और “वरुण” देवताओं का आह्वान किया गया है। मित्र और वरुण वैदिक साहित्य में ऋत (सत्य और व्यवस्था) के रक्षक माने जाते हैं। वे संबंधों, अनुशासन और नैतिक संतुलन के प्रतीक हैं। पहली पंक्ति में प्रार्थना की जाती है कि वे उसके हृदय और चित्त के अन्य विचारों को दूर कर दें—“हृदश्चित्तान्यस्यतम्।” इसका भाव यह है कि प्रिय व्यक्ति का मन अन्यत्र न जाकर एक दिशा में स्थिर हो। दूसरी पंक्ति—“अथ एनाम् अक्रतुम् कृत्वा मम एव कृणुतं वशे”—कहती है कि उसे मेरे संकल्प के अनुरूप कर दो, मेरे वश में कर दो। यहाँ “अक्रतु” का अर्थ है उसके भिन्न संकल्पों को हटाकर उसे मेरे संकल्प से एकरूप करना। आधुनिक दृष्टि से इस मन्त्र को शाब्दिक रूप में नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक रूप में समझना अधिक उचित है। यह किसी पर अन्यायपूर्ण नियंत्रण की प्रेरणा नहीं देता, बल्कि मानसिक एकाग्रता और संबंध में एकनिष्ठता की इच्छा का काव्यात्मक रूप है। वैदिक युग में ऐसे मन्त्र आकर्षण, सामंजस्य और दांपत्य स्थिरता के लिए प्रयुक्त होते थे। इसका उद्देश्य यह था कि दोनों के मनों में परस्पर अनुराग और एकाग्रता बनी रहे। दार्शनिक दृष्टि से यह मन की चंचलता को हटाने और एक लक्ष्य में स्थिर करने का संकेत है। जब मन अनेक दिशाओं में भटकता है, तो अस्थिरता उत्पन्न होती है। परंतु जब वह एक संकल्प में स्थित होता है, तो शक्ति बढ़ती है। आध्यात्मिक अर्थ में “मित्रावरुण” आंतरिक विवेक और अनुशासन के प्रतीक हो सकते हैं। साधक प्रार्थना करता है कि मेरे हृदय के विक्षेप दूर हों और मेरा चित्त एक ही दिव्य लक्ष्य में स्थिर हो जाए। “वशे” का अर्थ यहाँ आत्म-नियंत्रण भी हो सकता है—जहाँ मन उच्चतर संकल्प के अधीन हो। इस प्रकार यह मन्त्र मानसिक एकाग्रता, निष्ठा और संकल्प-साम्य की प्रार्थना के रूप में समझा जा सकता है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: संबंधों में मानसिक एकनिष्ठता और संकल्प-साम्य आवश्यक है।
  • विज्ञान: ध्यान और भावनात्मक फोकस से मन की चंचलता कम होती है।
  • ब्रह्मज्ञान: जब चित्त विक्षेपों से मुक्त होकर एक लक्ष्य में स्थिर होता है, तब आत्मिक उन्नति संभव होती है।

English Explanation

This mantra invokes Mitra and Varuṇa to remove distracting thoughts from the beloved’s heart and align her will with the speaker’s intention. Symbolically, it expresses the desire for exclusive emotional focus and unity of resolve. In a deeper sense, it may represent the removal of mental distractions so that consciousness becomes centered on a single purpose. Spiritually, it can symbolize the discipline required to bring the wandering mind under higher guidance. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Focused intention strengthens relationships and purpose.
  • Science: Emotional concentration reduces mental distraction.
  • Brahma-Gyan: Mastery over wandering thoughts leads toward spiritual realization.

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