अथर्ववेद 4.18.1 मंत्र में **सत्य और प्रकाश का समान रूप** प्रस्तुत किया गया है।
साधक यह प्रार्थना करता है कि उसके विचार, कर्म और ऊर्जा **सूर्य की तरह सम्पूर्ण और संतुलित** हों।
यह मंत्र जीवन के प्रत्येक क्षण में सत्य के पालन और ज्ञान के प्रकाश को स्थापित करने का संदेश देता है।
मंत्र में दिन और रात दोनों का समावेश किया गया है, यह दर्शाता है कि **सत्य और ज्ञान का पालन समय और परिस्थिति की परवाह किए बिना होना चाहिए।**
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शब्दार्थ
- समं = समान, संतुलित, स्थिर
- ज्योतिः = प्रकाश
- सूर्येण = सूर्य के समान
- अह्ना = दिन
- रात्री = रात
- समावती = समान रूप से व्यापी, सभी में उपस्थित
- कृणोमि = मैं करता हूँ, मैं स्थापित करता हूँ
- सत्यम् = सत्य, सच्चाई
- ऊतये = प्राप्ति के लिए
- अरसाः = इच्छाएँ, कार्य या उद्देश्य
- सन्तु = हों, स्थापित हों
- कृत्वरीः = कर्ता, क्रियाशील व्यक्ति
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सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि उसका **सत्य का प्रकाश सूर्य की तरह दिन-रात समान रूप से उजागर हो**।
उसके कर्म, विचार और ऊर्जा हमेशा सत्य और संतुलन में हों।
इस मंत्र में व्यक्त आध्यात्मिक लक्ष्य यह है कि **मनुष्य अपने जीवन में स्थायीत्व और ज्ञान प्राप्त करे।**
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वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ सूर्य = स्थायीत्व, निरंतर ऊर्जा और प्रकाश
✔ दिन और रात = समय का सतत प्रवाह, जीवन चक्र
✔ सत्य = ऊर्जा का उच्चतम रूप, चेतना का प्रकाश
✔ कृत्वरीः = कर्मशीलता, सक्रिय जीवन
यह बताता है कि **सत्य और ज्ञान का प्रकाश निरंतर होना चाहिए**, न कि केवल कुछ समय या परिस्थितियों तक सीमित।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ सत्य और ज्ञान का निरंतर पालन
✔ कर्म और विचारों में स्थायीत्व
✔ जीवन में संतुलन और प्रकाश का अनुभव
✔ दिव्य चेतना का उत्थान
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योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्राणायाम के माध्यम से चेतना में प्रकाश स्थापित करना
✔ कर्म और वाणी में सत्य और स्थिरता बनाए रखना
✔ दिन और रात दोनों समय ऊर्जा का संतुलन
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ स्थायी सत्य और ज्ञान मानसिक स्थिरता प्रदान करता है
✔ कर्म और उद्देश्य में संतुलन जीवन को सरल और सुखद बनाता है
✔ निरंतर प्रकाश और ऊर्जा का अनुभव जीवन में प्रेरणा लाता है
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
सूर्य की तरह निरंतर ऊर्जा और संतुलित जीवन शक्ति स्वास्थ्य और मानसिक स्थिरता बढ़ाती है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
सत्य और ज्ञान का निरंतर पालन चेतना को उच्चतम स्तर पर ले जाता है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
सत्य और प्रकाश का निरंतर प्रवाह जीवन और चेतना में पूर्णता लाता है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.18.1 मंत्र यह संदेश देता है कि:
✔ प्रकाश = ज्ञान और चेतना का उजागर रूप
✔ सूर्य और दिन-रात = स्थायीत्व और निरंतरता
✔ सत्य = जीवन का मूल आधार
✔ साधक = कर्मशील और चेतन व्यक्ति
मंत्र का पालन करने से साधक **सत्य, प्रकाश और स्थायीत्व में जीवन का अनुभव** प्राप्त करता है।
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English Insight
May my actions, thoughts, and consciousness
shine like the Sun, equally bright in day and night,
bringing forth truth, balance, and clarity in all endeavors.
भूमिका
अथर्ववेद 4.18.2 मंत्र में **देवताओं द्वारा किए गए कर्मों** और उनके संरक्षण का उल्लेख है।
साधक यह प्रार्थना करता है कि देवता जैसे अपनी मातृभूमि और गृहनिर्माण का संरक्षण करते हैं, वैसे ही उसकी जीवन शक्ति, घर और परिवार की रक्षा करें।
यह मंत्र जीवन में सुरक्षा, मार्गदर्शन और समग्र संरक्षण का प्रतीक है।
“वत्सो धारुरिव मातरं” – जैसा वत्स (बछड़ा) अपनी माता को सुरक्षित रखता है, वैसे ही देवता जीवन की रक्षा करें।
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शब्दार्थ
- यो = जो
- देवाः = देवता, दिव्य शक्ति
- कृत्यां कृत्वा = कर्मों को पूरा करके, दायित्व निभाकर
- हरादिविदुषः = हरण और संरक्षण में निपुण
- गृहम् = घर, आवास, परिवार
- वत्सः = बछड़ा, पुत्र
- धारुरिव = जैसे धारुर (माँ का पालन करने वाला)
- मातरम् = माता
- तं = उसे
- प्रत्यगुप = सुरक्षित, संरक्षित
- पद्यताम् = स्थिर रूप से, सुरक्षित होकर
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सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि जैसे देवता अपने कर्तव्य निभाते हुए घर और परिवार की रक्षा करते हैं,
वैसे ही वे उसे भी सुरक्षित रखें।
जैसे बछड़ा अपनी माता को सुरक्षित रखता है, देवता जीवन और गृहनिर्माण की सुरक्षा करें।
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वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ कर्तव्य पालन = जिम्मेदारी और अनुशासन
✔ देवताओं का संरक्षण = उच्च नैतिक और आध्यात्मिक मूल्य
✔ घर और परिवार की सुरक्षा = सामाजिक और मानसिक संतुलन
यह मंत्र यह भी सिखाता है कि **सुरक्षा और मार्गदर्शन केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना और जीवन मूल्य से आती है।**
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ देवता = उच्च चेतना और मार्गदर्शन शक्ति
✔ कर्म और संरक्षण = जीवन में स्थिरता और सुरक्षा
✔ वत्स और माता = प्रेम और जिम्मेदारी का प्रतीक
✔ साधक = संरक्षण और मार्गदर्शन प्राप्त करने वाला व्यक्ति
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योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्रार्थना के माध्यम से सुरक्षा की ऊर्जा का अनुभव
✔ कर्म और जीवन के कर्तव्यों में संतुलन
✔ आंतरिक शक्ति और स्थिरता
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ जीवन और परिवार की सुरक्षा मानसिक संतुलन बढ़ाती है
✔ कर्तव्य पालन और जिम्मेदारी जीवन में स्थिरता लाती है
✔ आध्यात्मिक मार्गदर्शन से भय और चिंता कम होती है
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
सुरक्षा और संरक्षण जीवन में स्थायीत्व और मानसिक शक्ति बढ़ाते हैं।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति की रक्षा दिव्य शक्तियाँ करती हैं।
दोनों मिलकर कहते हैं —
कर्तव्य और संरक्षण जीवन में सामंजस्य और सफलता लाते हैं।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.18.2 मंत्र हमें यह सिखाता है कि:
✔ कर्तव्य पालन = जीवन का स्थिर आधार
✔ देवताओं का संरक्षण = मार्गदर्शन और सुरक्षा
✔ घर और परिवार = प्रेम, जिम्मेदारी और सुरक्षा का प्रतीक
✔ साधक = संरक्षित और संतुलित जीवन प्राप्त करता है
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English Insight
Just as the divine beings protect and guide their responsibilities,
may they safeguard my home, family, and life,
as a calf lovingly protects its mother, with steady vigilance and care.
भूमिका
अथर्ववेद 4.18.3 मंत्र में **पाप और नकारात्मक ऊर्जा का नाश** करने की प्रक्रिया का वर्णन है।
साधक यह प्रार्थना करता है कि जो भी उसके प्रति द्वेष या नकारात्मकता उत्पन्न करता है, उसके प्रयास स्वयं पर ही उलट जाएँ।
यह मंत्र सुरक्षा, आत्म-संरक्षण और न्याय का प्रतीक है।
“अमा कृत्वा पाप्मानं” – अर्थात जिसने किसी पर पाप किया, उसका कर्म स्वतः उसे प्रभावित करे।
“अश्मानस्तस्यां दग्धायां बहुलाः फट्करिक्रति” – उसके पाप के कार्य, जैसे फटकार और शूल, उसे ही जलाएँ।
यह दर्शाता है कि **ब्रह्मांडीय न्याय और ऊर्जा का संतुलन हमेशा बनता है।**
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शब्दार्थ
- अमा कृत्वा = करने वाला, कार्य करने के द्वारा
- पाप्मानं = पाप, नकारात्मक कर्म
- यस्तेन = उसके द्वारा
- अन्यं = दूसरे, पर
- जिघांसति = आकांक्षा करता है, ईर्ष्या या हानि चाहता है
- अश्मानस्तस्यां = उसके कार्यों के परिणाम, पाप या शूल के रूप
- दग्धायां = जलाए जाएँ, नष्ट किए जाएँ
- बहुलाः = अनेक, विस्तृत
- फट्करिक्रति = पाप के कार्यों का प्रतिकार, उलट प्रभाव
---
सरल अर्थ
साधक यह प्रार्थना करता है कि जो कोई उसके प्रति नकारात्मक भाव या पापकारी कार्य करता है,
उसका कर्म स्वयं उसके ऊपर प्रभाव डाले।
जैसे फटकार या शूल उसे झेलने पड़ते हैं, वैसे ही उसका नकारात्मक कर्म उसे नुकसान पहुँचाए।
यह मंत्र **सुरक्षा, न्याय और आत्म-संरक्षण का प्रतीक** है।
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वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ कर्म = ऊर्जा और कार्य का परिणाम
✔ नकारात्मकता = मानसिक और भौतिक असंतुलन
✔ फट्कार और अश्म = परिणामों का प्रतीक
✔ उलट प्रभाव = कर्म का प्रतिफल
यह मंत्र यह भी बताता है कि **जैसा कर्म, वैसा परिणाम**।
सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा अपने स्रोत की ओर लौटती है।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ पाप और नकारात्मक कर्म का नाश
✔ दिव्य न्याय और ऊर्जा का संतुलन
✔ साधक का जीवन और चेतना सुरक्षित रहना
✔ कर्मफल का अनुभव और चेतना में स्थिरता
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योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्रार्थना के माध्यम से नकारात्मक ऊर्जा का नाश
✔ मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा सुनिश्चित करना
✔ सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बनाए रखना
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ नकारात्मकता और द्वेष को अनदेखा करना और उसके परिणामों से सीखना
✔ आत्म-संरक्षण और मानसिक स्थिरता बनाए रखना
✔ जीवन में संतुलन और सुरक्षा की भावना विकसित करना
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
नकारात्मक कर्म और ऊर्जा का प्रतिफल हमेशा अपने स्रोत की ओर लौटता है।
सुरक्षित जीवन के लिए मानसिक और भौतिक संतुलन आवश्यक है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाले साधक की रक्षा दिव्य शक्तियाँ करती हैं।
जो नकारात्मकता फैलाता है, उसका कर्म स्वयं उसे प्रभावित करता है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
कर्म का परिणाम और ऊर्जा का संतुलन जीवन और चेतना में स्थायीत्व लाता है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.18.3 मंत्र यह सिखाता है कि:
✔ नकारात्मक कर्म = स्वयं पर प्रभाव डालता है
✔ पाप और द्वेष = नष्ट होने चाहिए
✔ साधक = सुरक्षित और संतुलित जीवन प्राप्त करता है
✔ ऊर्जा का संतुलन = मानसिक और आध्यात्मिक स्थायीत्व
मंत्र का पालन करने से साधक **जीवन में न्याय, सुरक्षा और संतुलन** का अनुभव करता है।
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English Insight
Whoever commits sinful acts intending harm to others,
let those actions return to him,
like sparks and stones that burn their source,
ensuring balance, protection, and the triumph of righteousness.
भूमिका
अथर्ववेद 4.18.4 मंत्र में **सहस्रधाम और दिव्य कार्यों का वर्णन** है।
साधक यह प्रार्थना करता है कि वह जैसे सहस्रधाम में स्थित शक्तियों और दिव्य कार्यों को देखता और अनुभव करता है, वैसे ही उसके जीवन में भी दिव्य कार्य और संतुलन स्थापित हों।
“सहस्रधामन्” – हजारों निवास स्थान, यह ब्रह्मांडीय शक्तियों और ऊर्जा केंद्रों का प्रतीक है।
“विशिखान् विग्रीवां” – जैसे क्रियाएँ और ऊर्जा प्रकाश में फैलती हैं।
“छायया त्वम्” – आपकी छाया, अर्थात दिव्य मार्गदर्शन और संरक्षण।
साधक प्रार्थना करता है कि उसके कर्म हमेशा प्रिय और कल्याणकारी हों।
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शब्दार्थ
- सहस्रधामन् = हजारों धाम, दिव्य निवास या ऊर्जा केंद्र
- विशिखान् = क्रियाओं, उद्देश्यों
- विग्रीवां = फैलाने वाला, विस्तृत करने वाला
- छायया = छाया, मार्गदर्शन
- त्वम् = तुम, साधक का ईश्वर या दिव्य शक्ति
- प्रति स्म = प्रत्येक के लिए
- चक्रुषे = दृष्टि डालना, देखना
- कृत्यां = कार्य, कर्म
- प्रियां = प्रिय, कल्याणकारी
- प्रियावते = प्रिय और संतोषजनक
- हर = हरिवंश, दिव्य शक्ति या भगवान
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सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि जैसे **सहस्रधाम में दिव्य शक्ति और ऊर्जा फैलती है**, वैसे ही उसके कर्म और उद्देश्य भी कल्याणकारी और प्रिय हों।
वह चाहता है कि उसकी दृष्टि और प्रयास **दिव्य मार्गदर्शन के अनुसार सही दिशा में** जाएँ।
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वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ सहस्रधाम = ब्रह्मांडीय ऊर्जा केंद्र और सूक्ष्म चेतना
✔ क्रियाएँ = कर्म और कार्यक्षमता
✔ छाया = मार्गदर्शन, संरक्षण
✔ प्रिय कार्य = ऊर्जा का सकारात्मक प्रवाह
यह मंत्र यह दर्शाता है कि **सकारात्मक कर्म और दिव्य मार्गदर्शन का संयोजन जीवन में संतुलन और सफलता लाता है।**
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ हजारों दिव्य धामों में ऊर्जा का अनुभव
✔ कर्मों और उद्देश्यों का ब्रह्मांडीय स्तर पर संतुलन
✔ साधक की दृष्टि और प्रयासों में दिव्य मार्गदर्शन
✔ जीवन में कल्याण और स्थिरता
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्रार्थना के माध्यम से ऊर्जा केंद्रों का अनुभव
✔ कर्म और ध्यान का समन्वय
✔ दिव्य मार्गदर्शन का पालन कर कार्यों में सफलता
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ दिव्य मार्गदर्शन और सकारात्मक ऊर्जा मानसिक स्थिरता लाती है
✔ कर्म और उद्देश्य का संतुलन जीवन में सामंजस्य बनाए रखता है
✔ स्वयं की शक्तियों और लक्ष्यों के प्रति जागरूकता बढ़ती है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
सकारात्मक ऊर्जा और ध्यान का संयोजन मानसिक शक्ति और कार्यक्षमता बढ़ाता है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
सहस्रधाम और दिव्य कार्यों के अनुसार जीवन के कर्म और उद्देश्य कल्याणकारी बनते हैं।
दोनों मिलकर कहते हैं —
सकारात्मक कर्म और दिव्य मार्गदर्शन से जीवन में स्थायीत्व और सफलता प्राप्त होती है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.18.4 मंत्र यह सिखाता है कि:
✔ सहस्रधाम = ब्रह्मांडीय ऊर्जा और शक्ति
✔ कर्म और कार्य = दिव्य मार्गदर्शन के अनुसार
✔ प्रिय कार्य = कल्याण और स्थिरता
✔ साधक = सकारात्मक ऊर्जा और मार्गदर्शन प्राप्त करता है
मंत्र का पालन करने से साधक **जीवन में ऊर्जा, संतुलन और कल्याण** का अनुभव करता है।
---
English Insight
May my actions and intentions,
like the countless divine abodes,
be guided by Your shadow,
expanding positively and beneficially in all directions,
bringing grace, balance, and success.
भूमिका
अथर्ववेद 4.18.5 मंत्र में **ओषधियों, जीवन क्षेत्र और प्राणियों के संरक्षण** का वर्णन है।
साधक यह प्रार्थना करता है कि सभी औषधियाँ, खेत, पशु और मनुष्य सुरक्षित और शुद्ध रहें।
“अनयाहमोषध्या सर्वाः कृत्या अदूदुषम्” – अर्थात सभी औषधियाँ और जीवनशक्ति, कर्मों और उद्देश्य से दूषित न हों।
यह मंत्र प्राकृतिक संतुलन और जीवन संरक्षण का प्रतीक है।
---
शब्दार्थ
- अनयाः = ये, सभी
- औषध्या = औषधियाँ, जड़ी-बूटियाँ, स्वास्थ्य-संरक्षण साधन
- सर्वाः = सभी
- कृत्या = कर्म, क्रियाएँ
- अदूदुषम् = दूषित न होने वाली, सुरक्षित
- यां = जो
- क्षेत्रे = खेत, भूमि, क्षेत्र
- चक्रुर्यां = बनाई गई
- गोषु = गायों और पशुओं में
- वा = या
- ते = उनके
- पुरुषेषु = मनुष्यों में
---
सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- सभी औषधियाँ और जीवन-रक्षा साधन शुद्ध रहें।
- खेत, पशु और मनुष्य सुरक्षित और संतुलित रहें।
- कर्म और क्रियाएँ जीवन के लिए हानिकारक न हों।
यह मंत्र जीवन और प्राकृतिक संतुलन का संरक्षण करता है।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ औषधियाँ = स्वास्थ्य और जीवन ऊर्जा
✔ खेत और क्षेत्र = प्राकृतिक संसाधन
✔ गोषु = पशु पालन और जीवन संतुलन
✔ पुरुष = मानव समाज
यह दर्शाता है कि **जीवन और प्रकृति का संरक्षण, स्वास्थ्य और कल्याण के लिए आवश्यक है।**
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ प्राकृतिक और मानव संसाधनों का संरक्षण
✔ कर्मों का शुद्ध और कल्याणकारी होना
✔ जीवन शक्ति और चेतना का संतुलन
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्रार्थना के माध्यम से प्रकृति और जीवन की ऊर्जा का अनुभव
✔ शरीर, मन और चेतना के संतुलन के लिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण
✔ जीवन और कर्मों में कल्याणकारी प्रभाव
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ जीवन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से मानसिक स्थिरता
✔ संतुलित कर्म और उद्देश्य से जीवन में सामंजस्य
✔ सुरक्षा और स्वास्थ्य की भावना का विकास
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
स्वस्थ औषधियाँ, खेत और पशु जीवन शक्ति बढ़ाते हैं और जीवन को संतुलित बनाते हैं।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
संतुलित और शुद्ध कर्म, मानव और प्रकृति के कल्याण के लिए आवश्यक हैं।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलन, सुरक्षा और स्वास्थ्य के माध्यम से जीवन में स्थायीत्व और कल्याण संभव है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.18.5 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ सभी औषधियाँ और जीवनशक्ति शुद्ध रहें
✔ खेत, पशु और मनुष्य सुरक्षित रहें
✔ कर्म और क्रियाएँ जीवन के लिए हानिकारक न हों
✔ साधक = जीवन और प्राकृतिक ऊर्जा का संतुलन प्राप्त करता है
---
English Insight
May all medicinal herbs and life-sustaining forces remain pure and uncorrupted.
Let the fields, cattle, and humans in this land be protected,
ensuring balance, health, and well-being for all.
भूमिका
अथर्ववेद 4.18.6 मंत्र में **आत्मसंयम, तप और सकारात्मक कर्म का वर्णन** है।
साधक यह प्रार्थना करता है कि जो व्यक्ति नकारात्मक कर्मों और पापकारी इच्छाओं को रोककर
अपने आप को तप और अनुशासन के मार्ग पर लाता है, वह स्वयं और समाज के लिए कल्याणकारी बनता है।
“यश्चकार न शशाक” – जिसने नकारात्मक कार्य न किया।
“कर्तुं शश्रे पादमङ्गुरिम्” – किसी पर हानि या नकारात्मक प्रभाव डालने का प्रयास नहीं किया।
“चकार भद्रमस्मभ्यमात्मने तपनं तु सः” – उसने अपने लिए तप और अनुशासन किया।
यह मंत्र **स्व-नियंत्रण, नैतिकता और आध्यात्मिक अनुशासन** का प्रतीक है।
---
शब्दार्थ
- यः = जो व्यक्ति
- चकार = किया
- न = नहीं
- शशाक = हानि, नकारात्मक कार्य
- कर्तुं = करने के लिए
- शश्रे = दूसरों पर
- पादमङ्गुरिम् = शारीरिक या मानसिक हानि, कष्ट
- चकार = किया
- भद्रम् = शुभ, कल्याणकारी
- अस्मभ्यम् = हमारे लिए, समाज या साधक के लिए
- आत्मने = स्वयं के लिए
- तपनम् = तप, अनुशासन और साधना
- तु = परंतु
- सः = वह व्यक्ति
---
सरल अर्थ
साधक यह प्रार्थना करता है कि:
- जो व्यक्ति दूसरों को हानि पहुँचाने से बचता है,
- नकारात्मक कर्म नहीं करता,
- अपने लिए तप, अनुशासन और सकारात्मक कर्म करता है,
- वह स्वयं और समाज के लिए कल्याणकारी बनता है।
यह मंत्र **आत्मनियंत्रण, तप और नैतिकता** के महत्व को स्पष्ट करता है।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ आत्मसंयम = मानसिक संतुलन और स्थिरता
✔ तप = अनुशासन, ध्यान और प्रयास
✔ नकारात्मक कर्म का परिहार = सामाजिक और मानसिक सुरक्षा
✔ कल्याणकारी कार्य = ऊर्जा का सकारात्मक प्रवाह
यह दर्शाता है कि **जो व्यक्ति अपने कर्मों और इच्छाओं को नियंत्रित करता है,
वह जीवन और चेतना के उच्चतम स्तर तक पहुँचता है।**
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ नकारात्मक कार्यों का त्याग
✔ आत्म-संयम और तप के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति
✔ स्वयं और समाज के लिए कल्याणकारी परिणाम
✔ साधक का जीवन ऊर्जा और चेतना में स्थिर
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्राणायाम के माध्यम से मानसिक अनुशासन
✔ तप और साधना से नकारात्मक प्रवृत्तियों का नियंत्रण
✔ आत्मशुद्धि और आत्मसाक्षात्कार
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ आत्मनियंत्रण मानसिक शक्ति बढ़ाता है
✔ अनुशासन और तप सामाजिक और व्यक्तिगत सुरक्षा देते हैं
✔ सकारात्मक कर्म जीवन में सामंजस्य और स्थायीत्व लाते हैं
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
आत्मसंयम और अनुशासन मानसिक स्थिरता और स्वास्थ्य बढ़ाते हैं।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
तप और अनुशासन के मार्ग पर चलने वाला साधक
स्वयं और समाज के कल्याण के लिए दिव्य ऊर्जा प्राप्त करता है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
आत्मसंयम और तप से व्यक्ति जीवन में स्थायीत्व, सुरक्षा और आध्यात्मिक ऊँचाई प्राप्त करता है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.18.6 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ नकारात्मक कर्म और हानि से बचें
✔ आत्मसंयम और तप अपनाएँ
✔ स्वयं और समाज के कल्याण के लिए कार्य करें
✔ साधक = सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक स्थायीत्व प्राप्त करता है
---
English Insight
Whoever refrains from harming others and commits no negative acts,
and instead disciplines himself through austerity and self-control,
performs auspicious deeds beneficial to himself and society,
attaining spiritual growth and balance.
भूमिका
अथर्ववेद 4.18.7 मंत्र में **जलमार्ग, शपथ और सुरक्षा की दिव्य प्रार्थना** का वर्णन है।
साधक यह प्रार्थना करता है कि अपामार्ग (जल की दिशाएँ), शपथ और क्षेत्र की सुरक्षा पूर्ण रूप से बनी रहे।
“अपामार्गोऽप मार्ष्टु क्षेत्रियं” – जलमार्ग और क्षेत्र की रक्षा हो।
“शपथश्च यः अपाह यातुधानीरप” – शपथ के अनुसार जो भी नकारात्मक या हानिकारक शक्ति है, उसे नष्ट किया जाए।
यह मंत्र प्राकृतिक और सामाजिक संतुलन, सुरक्षा और जीवन शक्ति का प्रतीक है।
---
शब्दार्थ
- अपामार्गः = जल मार्ग, नदियाँ, समुद्री मार्ग
- अप = भी, यथा भी
- मार्ष्टु = सुरक्षित रहें, नष्ट न हों
- क्षेत्रियं = भूमि, क्षेत्र
- शपथः = प्रतिज्ञा, नियम, अनुशासन
- च = और
- यः = जो
- अपाह = नष्ट करे, दूर करे
- यातुधान = हानिकारक शक्ति, दैत्य
- ईरप = दुष्ट, नकारात्मक तत्व
- सर्वा = सभी
- अराय्यः = सुरक्षित रहें, निरस्त हों
---
सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- सभी जलमार्ग और भूमि सुरक्षित रहें।
- शपथों और नियमों का पालन करके हानिकारक शक्तियाँ और नकारात्मक तत्व नष्ट हों।
- प्राकृतिक और सामाजिक संतुलन बना रहे।
यह मंत्र **जीवन, जल और भूमि की सुरक्षा** का उच्चतम संदेश देता है।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ अपामार्ग = जल संसाधनों का संरक्षण
✔ क्षेत्र = भूमि और जीवन का आधार
✔ शपथ = सामाजिक और नैतिक अनुशासन
✔ यातुधानी = नकारात्मक या हानिकारक तत्व
यह दर्शाता है कि **प्राकृतिक संसाधनों और सामाजिक नियमों की सुरक्षा जीवन और चेतना के संतुलन के लिए आवश्यक है।**
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ जलमार्ग, भूमि और समाज की रक्षा
✔ नकारात्मक ऊर्जा और हानिकारक शक्तियों का नाश
✔ साधक के जीवन में सुरक्षा और कल्याण
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योगिक दृष्टि
✔ प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से ऊर्जा केंद्रों और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण
✔ नकारात्मक प्रवृत्तियों और हानिकारक शक्तियों का नियंत्रित नाश
✔ समाज और जीवन में स्थायीत्व और संतुलन
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ जीवन और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा मानसिक स्थिरता बढ़ाती है
✔ नियम और अनुशासन से समाज में सामंजस्य और संतुलन आता है
✔ नकारात्मक शक्तियों का नाश जीवन में सुरक्षा और सकारात्मक ऊर्जा लाता है
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
जलमार्ग और भूमि की सुरक्षा प्राकृतिक ऊर्जा, जीवन शक्ति और संसाधनों की स्थिरता बढ़ाती है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
संतुलित जल और भूमि संरक्षण, नकारात्मक तत्वों का नाश, और शपथ का पालन
जीवन और चेतना के सर्वोच्च कल्याण का मार्ग है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
प्राकृतिक संसाधन, सामाजिक नियम और नकारात्मक शक्तियों की सुरक्षा जीवन में स्थायीत्व और संतुलन प्रदान करती है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.18.7 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ जलमार्ग और भूमि सुरक्षित रहें
✔ शपथ और नियम का पालन करें
✔ नकारात्मक शक्तियाँ और हानिकारक तत्व नष्ट हों
✔ साधक = जीवन और समाज के कल्याण में सक्रिय योगदान देता है
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English Insight
May all water pathways and lands remain protected.
Through vows and discipline, let all harmful forces be destroyed,
ensuring balance, safety, and well-being for nature, humans, and society.
भूमिका
अथर्ववेद 4.18.8 मंत्र में **जलमार्ग और नकारात्मक शक्तियों का नाश** का वर्णन है।
साधक यह प्रार्थना करता है कि जलमार्ग और अन्य जीवन स्रोतों से जुड़े हानिकारक और नकारात्मक तत्व पूरी तरह नष्ट हों।
“अपमृज्य यातुधानान् अप” – सभी नकारात्मक शक्तियों को दूर किया जाए।
“अपामार्ग त्वया वयं सर्वं तदप मृज्महे” – हम सभी जलमार्ग और जीवन ऊर्जा को शुद्ध और सुरक्षित बनाने के लिए इस क्रिया में भागीदार हैं।
यह मंत्र **जीवन शक्ति, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा और नकारात्मक शक्तियों के नाश** का प्रतीक है।
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शब्दार्थ
- अपमृज्य = दूर कर, मिटा कर
- यातुधानान् = हानिकारक या नकारात्मक शक्तियाँ
- अप = भी, यथा भी
- सर्वा = सभी
- अराय्यः = नष्ट हों, सुरक्षित रहें
- अपामार्ग = जलमार्ग, नदियाँ, समुद्री मार्ग
- त्वया = तुम्हारे द्वारा, साधक की क्रिया से
- वयं = हम
- सर्वं = सब कुछ
- तदप = उस दिशा में
- मृज्महे = शुद्ध और सुरक्षित बनाते हैं
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सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- सभी नकारात्मक शक्तियाँ और हानिकारक तत्व नष्ट हों।
- जलमार्ग और प्राकृतिक जीवन स्रोत शुद्ध और सुरक्षित रहें।
- हम सभी मिलकर जीवन शक्ति और प्राकृतिक ऊर्जा को सुरक्षित बनाने में योगदान दें।
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वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ अपामार्ग = जल संसाधनों और जीवन ऊर्जा का संरक्षण
✔ यातुधान = नकारात्मक और हानिकारक शक्तियाँ
✔ शुद्धिकरण = ऊर्जा और संसाधनों का संतुलन
✔ साधक और समाज = प्राकृतिक और सामाजिक संतुलन का समन्वय
यह दर्शाता है कि **प्राकृतिक संसाधनों और जीवन शक्ति का संरक्षण नकारात्मक प्रभावों के नाश के माध्यम से संभव है।**
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ नकारात्मक शक्तियों का नाश और जीवन शक्ति का संरक्षण
✔ साधक की सक्रिय भागीदारी जीवन और प्राकृतिक ऊर्जा के संतुलन में
✔ आध्यात्मिक ऊँचाई और चेतना की सुरक्षा
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योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्राणायाम से नकारात्मक ऊर्जा का नाश
✔ प्राकृतिक और जल संसाधनों के माध्यम से चेतना का संतुलन
✔ साधक का जीवन और कर्म प्राकृतिक और आध्यात्मिक ऊर्जा से संरेखित
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ नकारात्मक शक्तियों के नाश से मानसिक शांति
✔ प्राकृतिक संसाधनों और जीवन ऊर्जा के संरक्षण से संतुलन
✔ सक्रिय भागीदारी से जीवन में सुरक्षा और स्थायीत्व
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
प्राकृतिक जलमार्ग और ऊर्जा स्रोतों का संरक्षण जीवन और स्वास्थ्य को बढ़ाता है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
संतुलित जलमार्ग और नकारात्मक शक्तियों का नाश आध्यात्मिक और सामाजिक कल्याण सुनिश्चित करता है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
साधक की प्रार्थना और क्रियाशीलता के माध्यम से जीवन, चेतना और प्राकृतिक ऊर्जा का सर्वोच्च संरक्षण संभव है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.18.8 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ नकारात्मक शक्तियाँ और हानिकारक तत्व नष्ट हों
✔ जलमार्ग और जीवन स्रोत शुद्ध और सुरक्षित रहें
✔ साधक = जीवन शक्ति और प्राकृतिक ऊर्जा का संरक्षण करता है
✔ सक्रिय भागीदारी से समाज और प्रकृति में संतुलन और कल्याण
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English Insight
By removing all harmful forces and purifying the water pathways,
we collectively ensure the safety and balance of life energy,
creating a protected and harmonious environment for all.
दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
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