अथर्ववेद 4.19.1 मंत्र में **प्राकृतिक और सामाजिक संतुलन** का वर्णन है।
साधक प्रार्थना करता है कि सभी कर्म, क्रियाएँ और प्रजाएँ (जीव और समाज)
सही और संतुलित मार्ग पर चलें, जैसे वर्षा संतुलित रूप से भूमि को सींचती है।
“उतो अस्यबन्धुकृदुतो असि नु जामिकृत्” – जो बंधु और कर्तव्य निभाता है,
“उतो कृत्याकृतः प्रजां नदमिवा छिन्धि वार्षिकम्” – जो कर्म और कर्तव्य के अनुसार प्रजा का पालन करता है,
सभी की जीवन ऊर्जा और सामाजिक ऊर्जा का संतुलन बनाए रखे।
यह मंत्र **जीवन, कर्म और सामाजिक संतुलन** का प्रतीक है।
---
शब्दार्थ
- उत = और, भी
- अस्य = इसका, इसके
- बन्धु = सम्बन्धी, कर्ता
- कृतुतो = कर्म करने वाला, कार्यशील
- असि = हो
- नु = निश्चित रूप से
- जामिकृत् = वर्षा, भूमि को सींचना
- कृत्याकृतः = कर्म और कर्तव्य के अनुसार
- प्रजां = प्रजा, जीव, समुदाय
- नदमिवा = संगीत, संतुलित, व्यवस्थित
- छिन्धि = फैलाता है, वितरित करता है
- वार्षिकम् = वर्ष भर, समय के अनुसार
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सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- सभी जीव और समाज कर्म और कर्तव्य के अनुसार व्यवस्थित हों।
- जैसे वर्षा संतुलित रूप से भूमि को सींचती है, वैसे ही जीवन और समाज का ऊर्जा प्रवाह संतुलित हो।
- कर्म, प्रयास और प्रजा का सही प्रबंधन जीवन और चेतना में संतुलन लाता है।
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वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ कर्म और कर्तव्य = सामाजिक और प्राकृतिक नियम
✔ प्रजा = जीवन और ऊर्जा केंद्र
✔ नदमिवा छिन्धि = संतुलित वितरण और ऊर्जा प्रवाह
✔ वार्षिकम् = समय और ऋतुओं के अनुसार संतुलन
यह दर्शाता है कि **जीवन और समाज का संतुलित संचालन प्रकृति और चेतना के संयोजन से संभव है।**
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ कर्म और कर्तव्य का पालन
✔ जीवन ऊर्जा का संतुलित प्रवाह
✔ समाज और प्रकृति का सामंजस्य
✔ साधक के प्रयास से चेतना और जीवन में स्थायीत्व
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योगिक दृष्टि
✔ प्राणायाम और ध्यान से ऊर्जा केंद्रों का संतुलन
✔ कर्म और जिम्मेदारी के अनुसार जीवन का मार्ग
✔ प्राकृतिक और सामाजिक ऊर्जा का संरक्षण
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ संतुलित कर्म और जिम्मेदारी मानसिक स्थिरता लाती है
✔ जीवन और समाज में सामंजस्य और ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है
✔ नियम और अनुशासन जीवन में सुरक्षा और स्थायीत्व लाते हैं
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
संतुलित कर्म और जीवन ऊर्जा का प्रवाह स्वास्थ्य, जीवन शक्ति और प्राकृतिक संतुलन को बढ़ाता है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
सही दिशा में कर्म और प्रजा का नियंत्रण आध्यात्मिक और सामाजिक कल्याण सुनिश्चित करता है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलित कर्म, ऊर्जा और जीवन प्रबंधन से मानव और समाज का सर्वोच्च कल्याण संभव है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.19.1 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ कर्म और कर्तव्य का पालन करें
✔ जीवन और प्रजा का संतुलित प्रबंधन करें
✔ ऊर्जा और चेतना का प्रवाह संतुलित रखें
✔ साधक = जीवन और समाज के कल्याण में योगदान करता है
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English Insight
May all actions, duties, and life energies be balanced,
like rain distributing water to the land.
Through proper deeds and responsibilities,
both human and natural energies remain in harmony.
भूमिका
अथर्ववेद 4.19.2 मंत्र में **ब्राह्मणों और औषधियों के माध्यम से सुरक्षा** का वर्णन है।
साधक यह प्रार्थना करता है कि ब्राह्मणों और योग्य मंत्रों द्वारा
औषधियों और प्राकृतिक शक्तियों का प्रयोग कर जीवन और समाज में भय और संकट न रहे।
“ब्राह्मणेन पर्युक्तासि कण्वेन नार्षदेन” – योग्य ब्राह्मण और ऋषियों के निर्देशानुसार,
“सेनेवैषि त्विषीमती न तत्र भयमस्ति” – जहाँ इनका पालन होता है वहाँ कोई भय नहीं।
“यत्र प्राप्नोष्योषधे” – और जहाँ औषधियों का प्रयोग सही तरीके से होता है, वहां सभी संकट नष्ट होते हैं।
यह मंत्र **सुरक्षा, चिकित्सा और सामाजिक संतुलन** का प्रतीक है।
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शब्दार्थ
- ब्राह्मणेन = ब्राह्मण के द्वारा, ज्ञान और कर्म के मार्ग से
- पर्युक्तासि = निर्देशित, उपयोग किया गया
- कण्वेन = ऋषि कण्व द्वारा, ज्ञानी मार्गदर्शन
- नार्षदेन = अन्य ऋषियों द्वारा
- सेनेवैषि = सेना, शक्ति, या सुरक्षा
- त्विषीमती = प्रभावशाली, सशक्त
- न = नहीं
- तत्र = वहाँ
- भयम् = भय, संकट
- अस्ति = है
- यत्र = जहाँ
- प्राप्नोष्य = प्राप्त हो
- औषधे = औषधियाँ, चिकित्सा या प्राकृतिक उपचार
---
सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- योग्य ब्राह्मणों और ऋषियों के मार्गदर्शन से
- औषधियों और प्राकृतिक उपायों का सही प्रयोग करके
- जीवन और समाज में भय, संकट और नकारात्मक प्रभाव न रहें।
- जहाँ इनका पालन और प्रयोग होता है, वहाँ स्थिरता और सुरक्षा बनी रहती है।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ ब्राह्मण और ऋषि = ज्ञान, अनुभव और मार्गदर्शन
✔ औषधि = प्राकृतिक विज्ञान और चिकित्सा
✔ भयमुक्ति = जीवन और समाज में सुरक्षा और संतुलन
✔ साधक = जीवन और सामाजिक ऊर्जा का नियंत्रक
यह दर्शाता है कि **ज्ञान, औषधि और मार्गदर्शन का संयोजन जीवन और समाज की सुरक्षा में महत्वपूर्ण है।**
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ योग्य साधक और ब्राह्मण मार्गदर्शन द्वारा सुरक्षा
✔ प्राकृतिक और औषधीय शक्ति का सही उपयोग
✔ जीवन और समाज में स्थायीत्व और संतुलन
✔ भय और संकट से मुक्ति
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योगिक दृष्टि
✔ साधना और मंत्र के माध्यम से मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा
✔ औषधि और प्राकृतिक शक्ति का संयोजन जीवन शक्ति बढ़ाता है
✔ ज्ञान और अनुभव का पालन जीवन में स्थायीत्व लाता है
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ ज्ञान और औषधि का सही प्रयोग भय को दूर करता है
✔ मार्गदर्शन और अनुशासन मानसिक संतुलन बढ़ाते हैं
✔ जीवन और समाज में सुरक्षा और सामंजस्य सुनिश्चित होता है
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
सही औषधि, मार्गदर्शन और प्राकृतिक शक्ति जीवन स्वास्थ्य और सुरक्षा को बढ़ाते हैं।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
साधक, ब्राह्मण और ऋषियों के ज्ञान का पालन, जीवन और समाज के कल्याण का आधार है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
ज्ञान, औषधि और अनुशासन से जीवन, चेतना और समाज का सर्वोच्च संरक्षण संभव है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.19.2 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ योग्य ब्राह्मण और ऋषियों का मार्गदर्शन आवश्यक है
✔ औषधियों और प्राकृतिक उपायों का सही प्रयोग जीवन में सुरक्षा लाता है
✔ साधक = जीवन और समाज की सुरक्षा और स्थिरता का आधार
✔ भय और संकट से मुक्ति प्राप्त होती है
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English Insight
Through the guidance of knowledgeable sages and proper use of medicines,
life and society remain protected.
Where wisdom and natural remedies are applied,
fear and harm are removed, ensuring balance and safety.
भूमिका
अथर्ववेद 4.19.3 मंत्र में **औषधियों और ज्योति (प्रकाश/ऊर्जा) के माध्यम से सुरक्षा और नकारात्मक शक्तियों का नाश** वर्णित है।
साधक प्रार्थना करता है कि औषधियाँ और ज्ञान की ज्योति सभी हानिकारक राक्षसों, नकारात्मक शक्तियों और बाधाओं को नष्ट करें।
“अग्रमेष्योषधीनां ज्योतिषेवाभिदीपयन्” – औषधियों को प्रकाश की तरह जागृत करना।
“उत त्रातासि पाकस्याथो हन्तासि रक्षसः” – इससे न केवल जीवन की सुरक्षा होती है बल्कि हानिकारक शक्तियों का नाश भी होता है।
यह मंत्र **जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा, नकारात्मक शक्तियों का नाश और औषधियों के ज्ञान का प्रयोग** सिखाता है।
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शब्दार्थ
- अग्र = श्रेष्ठ, मुख्य
- एष्योषधीनाम् = औषधियों के द्वारा
- ज्योति = प्रकाश, ऊर्जा
- एव = ही, जैसे
- अभिदीपयन् = प्रज्वलित करना, जागृत करना
- उत = और, भी
- त्रातासि = बचाते हो, सुरक्षा करते हो
- पाकस्य = जीवन, भोजन, या कर्म
- अथो = अथवा
- हन्तासि = नष्ट करते हो
- रक्षसः = हानिकारक शक्तियाँ, नकारात्मक तत्व
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सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- औषधियाँ प्रकाश की तरह जीवन शक्ति और चेतना को जागृत करें।
- इससे जीवन और कर्म सुरक्षित रहें।
- नकारात्मक शक्तियाँ और राक्षस नष्ट हों।
- ज्ञान और औषधियों के माध्यम से जीवन, स्वास्थ्य और समाज में सुरक्षा और स्थायीत्व आए।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ औषधि = प्राकृतिक विज्ञान और चिकित्सा
✔ ज्योति = ऊर्जा, चेतना और जागरूकता
✔ राक्षस = हानिकारक या नकारात्मक प्रभाव
✔ सुरक्षा और नाश = जीवन और सामाजिक ऊर्जा का संतुलन
यह दर्शाता है कि **ज्ञान, औषधि और ऊर्जा का सही संयोजन जीवन, स्वास्थ्य और समाज में स्थायीत्व लाता है।**
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ जीवन शक्ति और चेतना की सुरक्षा
✔ नकारात्मक शक्तियों और बाधाओं का नाश
✔ साधक के प्रयास से स्वास्थ्य, चेतना और समाज में स्थायीत्व
✔ ज्ञान और औषधियों का आध्यात्मिक उपयोग
---
योगिक दृष्टि
✔ प्राणायाम और ध्यान से ऊर्जा केंद्रों को जागृत करना
✔ औषधियों और प्राकृतिक उपायों से जीवन शक्ति बढ़ाना
✔ नकारात्मक शक्तियों के नाश से मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ ज्ञान और औषधियों का प्रयोग मानसिक और शारीरिक सुरक्षा देता है
✔ नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति और जीवन में सामंजस्य
✔ साधक की सक्रिय भागीदारी जीवन और समाज को सुरक्षित बनाती है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
औषधियों और ऊर्जा के सही प्रयोग से जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा होती है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
ज्ञान और औषधियों के माध्यम से नकारात्मक शक्तियों का नाश और जीवन में स्थायीत्व आता है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
साधक की सक्रियता, ज्ञान और औषधि जीवन, चेतना और समाज के सर्वोच्च संरक्षण का आधार हैं।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.19.3 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ औषधियों और ज्ञान से जीवन और चेतना जागृत करें
✔ नकारात्मक शक्तियों और राक्षसों का नाश करें
✔ साधक = जीवन, स्वास्थ्य और समाज में सुरक्षा लाने वाला
✔ प्रकाश और ऊर्जा के माध्यम से जीवन स्थिर और सुरक्षित हो
---
English Insight
By illuminating medicines like light,
you protect life and destroy harmful forces.
Knowledge and remedies awaken energy,
ensuring health, safety, and harmony in life and society.
भूमिका
अथर्ववेद 4.19.4 मंत्र में **देव और असुरों के संघर्ष और औषधियों के माध्यम से मार्गदर्शन** का वर्णन है।
साधक यह प्रार्थना करता है कि जहां देवों ने असुरों के प्रभाव को रोका, वहाँ औषधियों और जलमार्ग (अपामार्ग) से जीवन और चेतना को संरक्षित किया जाए।
- “यददो देवा असुरांस्त्वयाग्रे निरकुर्वत” – देवों ने असुरों का सामना किया और उनका नाश किया।
- “ततस्त्वमध्योषधेऽपामार्गो अजायथाः” – उसी तरह औषधियों और जलमार्ग से जीवन और ऊर्जा का मार्ग सुरक्षित हुआ।
यह मंत्र **औषधियों, जलमार्ग और जीवन ऊर्जा के संरक्षण** का प्रतीक है।
---
शब्दार्थ
- यद = जब
- अदो = देवों द्वारा किया गया कार्य
- देवा = देवता, सकारात्मक शक्तियाँ
- असुरान् = नकारात्मक शक्तियाँ, बाधाएँ
- त्व = तुम
- अग्रे = पहले, अग्रभाग में
- निरकुर्वत = नष्ट किया, रोका
- ततः = इसके बाद
- त्वम् = तुम
- अद्य = अब
- औषधे = औषधियों
- अपामार्गः = जलमार्ग, प्राकृतिक प्रवाह मार्ग
- अजायथाः = उत्पन्न हुए, स्थापित हुए
---
सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- जैसे देवों ने असुरों का नाश किया,
- वैसे ही औषधियों और जलमार्ग के प्रयोग से जीवन और चेतना का मार्ग सुरक्षित हो।
- नकारात्मक प्रभाव और बाधाएँ नष्ट हों।
- प्राकृतिक और औषधीय शक्तियों से जीवन में संतुलन और सुरक्षा बनी रहे।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ देव = सकारात्मक, संरक्षक शक्ति
✔ असुर = नकारात्मक प्रभाव, बाधाएँ
✔ औषधि = प्राकृतिक और चिकित्सा विज्ञान
✔ अपामार्ग = जल और ऊर्जा प्रवाह, प्राकृतिक मार्ग
✔ संतुलन = जीवन और चेतना की सुरक्षा
यह दर्शाता है कि **जीवन और चेतना का संरक्षण ज्ञान, औषधि और प्राकृतिक मार्ग के संयोजन से संभव है।**
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ जीवन और चेतना की रक्षा
✔ नकारात्मक शक्तियों का नाश
✔ साधक के प्रयास से जीवन में स्थायीत्व और सुरक्षा
✔ प्राकृतिक और औषधीय मार्ग का पालन
---
योगिक दृष्टि
✔ प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से ऊर्जा केंद्रों को संरक्षित करना
✔ औषधि और जलमार्ग से मानसिक और शारीरिक सुरक्षा
✔ नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ मार्गदर्शन और औषधि का प्रयोग भय और नकारात्मकता को दूर करता है
✔ जीवन और चेतना में स्थायीत्व और सामंजस्य बढ़ाता है
✔ साधक की सक्रियता जीवन सुरक्षा का आधार है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
औषधि और जलमार्ग के माध्यम से जीवन ऊर्जा और प्राकृतिक संतुलन सुरक्षित रहता है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
साधक और ज्ञान के मार्गदर्शन से नकारात्मक शक्तियों का नाश और जीवन की स्थिरता संभव है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
औषधि, मार्गदर्शन और ऊर्जा प्रवाह के संयोजन से जीवन और चेतना का सर्वोच्च संरक्षण होता है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.19.4 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ सकारात्मक शक्ति और मार्गदर्शन से जीवन संरक्षित करें
✔ औषधियों और जलमार्ग का सही उपयोग जीवन और चेतना को सुरक्षित बनाता है
✔ नकारात्मक प्रभाव और बाधाओं का नाश
✔ साधक = जीवन और चेतना के मार्ग का संरक्षक
---
English Insight
Just as the gods destroyed the demons,
so too, through medicines and natural water pathways,
life and consciousness are safeguarded.
Knowledge, remedies, and energy flow ensure balance, protection, and spiritual security.
भूमिका
अथर्ववेद 4.19.5 मंत्र में **सृजन, विभाजन और पिता की शक्ति** का वर्णन है।
साधक यह प्रार्थना करता है कि जैसे पिता के शक्ति द्वारा शाखाएँ विभाजित होती हैं, वैसे ही सभी कार्य, ऊर्जा और चेतना संतुलित और व्यवस्थित रूप से फैलें।
- “विभिन्दती शतशाखा” – शक्ति और प्रभाव की सैकड़ों शाखाएँ फैलती हैं।
- “विभिन्दन् नाम ते पिता” – यह पिता (सृजनकर्ता) की शक्ति है जो सब विभाजित करती है।
- “प्रत्यग्वि भिन्धि त्वं तं यो अस्मामभिदासति” – साधक प्रार्थना करता है कि यह शक्ति हमारे जीवन में और कर्म में सही दिशा में विभाजित हो।
यह मंत्र **सृजनात्मक ऊर्जा, पिता या सृजनकर्ता की शक्ति और जीवन में संतुलन** का प्रतीक है।
---
शब्दार्थ
- विभिन्दती = विभाजित करती है, फैलाती है
- शतशाखा = सैकड़ों शाखाएँ, अनेक दिशा और प्रभाव
- नाम = शक्ति, नाम, प्रभाव
- ते = तुम्हारी
- पिता = सृजनकर्ता, संरक्षक
- प्रत्यग्वि = प्रत्येक, हर एक में
- भिन्धि = विभाजित कर, व्यवस्थित कर
- त्वं = तुम
- अस्माम् = हमारे
- अभिदासति = लागू होती है, प्रदान होती है
---
सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- पिता (सृजनकर्ता) की शक्ति जीवन और चेतना में सही दिशा में विभाजित हो।
- सृजन और ऊर्जा के प्रभाव सैकड़ों शाखाओं की तरह फैलें।
- सभी कर्म और ऊर्जा संतुलित और व्यवस्थित रूप में संचालित हों।
- यह शक्ति जीवन और चेतना में स्थिरता और संतुलन लाए।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ पिता = सृजन, नियंत्रण और संतुलन
✔ शाखाएँ = ऊर्जा, कार्य और प्रभाव के क्षेत्र
✔ विभाजन = सृजनात्मक और व्यवस्थित ऊर्जा का प्रवाह
✔ शक्ति = जीवन, चेतना और कर्म का नियंत्रण
यह दर्शाता है कि **सृजनात्मक ऊर्जा और शक्ति का सही दिशा में विभाजन जीवन और चेतना में स्थायीत्व लाता है।**
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ सृजनकर्ता की शक्ति जीवन में संचालित हो
✔ ऊर्जा और कर्म का संतुलन
✔ सभी कार्य और प्रभाव सही दिशा में फैलें
✔ साधक के मार्गदर्शन से स्थायीत्व
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और साधना के माध्यम से ऊर्जा केंद्रों को संतुलित करना
✔ सृजनात्मक शक्ति का जागरित और व्यवस्थित प्रवाह
✔ जीवन और चेतना में स्थिरता
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ ऊर्जा और कर्म का संतुलित वितरण मानसिक स्थिरता बढ़ाता है
✔ जीवन और चेतना में संतुलन और सामंजस्य सुनिश्चित होता है
✔ पिता या सृजनकर्ता की शक्ति का सही मार्गदर्शन सफलता लाता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
सृजनात्मक ऊर्जा और शक्ति का सही दिशा में विभाजन जीवन, चेतना और समाज में स्थिरता और सामंजस्य लाता है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
सृजनकर्ता की शक्ति का संरेखण और शाखाओं का व्यवस्थित प्रवाह आध्यात्मिक और सामाजिक ऊँचाई प्रदान करता है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
शक्ति का सही विभाजन और संतुलन जीवन, चेतना और कर्म का सर्वोच्च संरक्षण संभव करता है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.19.5 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ पिता (सृजनकर्ता) की शक्ति जीवन और कर्म में विभाजित हो
✔ ऊर्जा और सृजनात्मक प्रभाव शाखाओं की तरह फैलें
✔ साधक = जीवन और चेतना में स्थायीत्व और संतुलन लाने वाला
✔ सही दिशा और वितरण जीवन और समाज में सुरक्षा और सामंजस्य लाता है
---
English Insight
The power of the creator (Father) spreads in hundreds of branches,
organizing life and consciousness.
May this power be rightly divided in all actions and energies,
ensuring balance, stability, and harmonious flow in our existence.
भूमिका
अथर्ववेद 4.19.6 मंत्र में **कर्म, पृथ्वी और न्याय** का वर्णन है।
साधक यह प्रार्थना करता है कि असद्भूमि (असत्य या अधर्मी भूमि) के प्रभाव से उत्पन्न कर्मों और घटनाओं का नाश हो और जीवन में सत्य और न्याय स्थापित हो।
- “असद्भूम्याः समभवत्तद्यामेति महद्व्यचः” – असत्य भूमि या अधर्मी प्रभाव से बड़े परिणाम उत्पन्न होते हैं।
- “तद्वै ततो विधूपायत्प्रत्यक्कर्तारमृच्छतु” – साधक प्रार्थना करता है कि कर्मों का परिणाम सीधे उस व्यक्ति तक पहुँचे जो उसे अंजाम दे रहा है।
यह मंत्र **कर्म, न्याय और जीवन में परिणाम की स्पष्टता** का प्रतीक है।
---
शब्दार्थ
- असद्भूम्याः = असत्य, अधर्मी भूमि या नकारात्मक प्रभाव
- समभवत्त = उत्पन्न हुआ, फैल गया
- तत् = वह
- द्यामेति = कहते हैं, संकेत करता है
- महद्व्यचः = बड़ा परिणाम, व्यापक प्रभाव
- तद्वै = उसी के अनुसार
- ततो = उसके द्वारा
- विधूपायत = नष्ट हो, समाप्त हो
- प्रत्यक्कर्तारम् = कर्म करने वाले तक
- ऋच्छतु = पहुँचे, प्राप्त हो
---
सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- असत्य और अधर्मी प्रभाव से उत्पन्न कर्म और परिणाम फैलते हैं।
- साधक चाहता है कि इन कर्मों का नाश हो और उनका प्रभाव केवल दोषी तक पहुँचे।
- जीवन और समाज में न्याय, संतुलन और स्थिरता बनी रहे।
- कर्म का उचित फल केवल उसे मिले जो इसे करता है, अन्य निर्दोषों को इसका नुकसान न हो।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ असद्भूमि = नकारात्मक वातावरण या परिस्थितियाँ
✔ महद्व्यचः = बड़े परिणाम, प्रभाव का फैलाव
✔ प्रत्यक्कर्तारम् = कर्मफल का न्यायसंगत वितरण
✔ विधूपायत = नकारात्मक प्रभाव का नाश
यह दर्शाता है कि **कर्म का परिणाम न्यायपूर्ण होना चाहिए और नकारात्मक प्रभाव का नाश आवश्यक है।**
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ जीवन और कर्म में न्याय और संतुलन बनाए रखना
✔ नकारात्मक प्रभाव और अधर्म का नाश
✔ साधक के प्रयास से समाज और चेतना में स्थायीत्व
✔ कर्म का उचित फल केवल दोषी तक पहुँचना
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योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और साधना से मन और कर्म का शुद्धिकरण
✔ नकारात्मक प्रवृत्तियों का नाश
✔ कर्मफल का नियंत्रण और न्यायसंगत वितरण
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ न्यायसंगत कर्मफल मानसिक शांति लाता है
✔ नकारात्मक प्रभावों का नाश जीवन में स्थायीत्व और सामंजस्य लाता है
✔ साधक की सक्रिय भागीदारी जीवन और समाज को संतुलित रखती है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
नकारात्मक परिस्थितियाँ और प्रभाव फैलते हैं, उनका नियंत्रित नाश आवश्यक है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
साधक और कर्म का उचित वितरण न्याय और स्थिरता सुनिश्चित करता है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
कर्म और परिणाम का संतुलित नियंत्रण जीवन और समाज में सर्वोच्च सुरक्षा और स्थायीत्व लाता है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.19.6 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ असद्भूमि और नकारात्मक प्रभाव का नाश आवश्यक है
✔ कर्मफल केवल दोषी तक पहुँचे
✔ साधक = न्याय और स्थिरता लाने वाला
✔ जीवन और चेतना में संतुलन और सुरक्षा स्थापित हो
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English Insight
From the untruthful or adharmic ground arise vast consequences.
May their effects be nullified, and the fruits of actions reach only the doer.
This ensures justice, balance, and protection in life and society.
भूमिका
अथर्ववेद 4.19.7 मंत्र में **दिशाओं, मार्गों और सुरक्षा** का वर्णन है।
साधक यह प्रार्थना करता है कि सभी दिशाएँ और मार्ग (विशेषकर जीवन और चेतना के मार्ग) सुरक्षित रहें और नकारात्मक शक्तियों से संरक्षित हों।
- “प्रत्यङ्हि संबभूविथ प्रतीचीनफलस्त्वम्” – प्रत्येक दिशा और उसकी शक्ति स्थिर और फलदायी हो।
- “सर्वान् मच्छपथामधि वरीयो यावया वधम्” – जीवन के सभी मार्गों में श्रेष्ठता बनी रहे और बाधाएँ दूर हों।
यह मंत्र **सुरक्षा, मार्गदर्शन और जीवन शक्ति के संरक्षण** का प्रतीक है।
---
शब्दार्थ
- प्रत्यङ्हि = प्रत्येक, चारों ओर
- संबभूविथ = स्थिर हुआ, उत्पन्न हुआ
- प्रतीचीनफलस्त्वम् = पूर्व की दिशा का फलदायी प्रभाव
- सर्वान् = सभी
- मच्छपथम् = मार्ग, विशेषकर जलमार्ग या जीवन मार्ग
- अधि = ऊपर, माध्यम से
- वरीयो = श्रेष्ठ, श्रेष्ठतम
- यावया = तुम्हारे अनुसार
- वधम् = बाधाओं का नाश
---
सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- चारों दिशाओं में ऊर्जा और मार्ग स्थिर और फलदायी हों।
- जीवन और चेतना के सभी मार्ग सुरक्षित और श्रेष्ठतम रहें।
- नकारात्मक प्रभावों और बाधाओं का नाश हो।
- साधक का जीवन और कर्म सुरक्षा और स्थायीत्व में विकसित हों।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ दिशाएँ = ऊर्जा का प्रवाह, मार्गों की सुरक्षा
✔ मच्छपथ = जीवन मार्ग और ऊर्जा केंद्र
✔ वरीयो = श्रेष्ठ मार्ग और स्थायीत्व
✔ वधम् = नकारात्मक प्रभावों का नाश
यह दर्शाता है कि **सभी मार्ग और दिशाएँ संतुलित और सुरक्षित हों, तभी जीवन और चेतना का सर्वोच्च अनुभव संभव है।**
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ साधक की प्रार्थना से सभी मार्गों में सुरक्षा और स्थायीत्व
✔ चारों दिशाओं में ऊर्जा का नियंत्रण
✔ जीवन और चेतना के मार्गों में बाधाओं का नाश
✔ साधक का मार्गदर्शन जीवन में सर्वोच्च स्थायीत्व लाता है
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योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और प्राणायाम से जीवन मार्गों का संतुलन
✔ ऊर्जा केंद्रों और मार्गों का संयोजन
✔ नकारात्मक प्रभावों का नाश और जीवन शक्ति का संरक्षण
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ जीवन के मार्ग और ऊर्जा केंद्र सुरक्षित रहने से मानसिक स्थिरता बढ़ती है
✔ बाधाओं और नकारात्मक प्रभावों का नियंत्रण जीवन में सामंजस्य लाता है
✔ साधक का सक्रिय मार्गदर्शन जीवन को सुरक्षित बनाता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
मार्ग और दिशाओं में संतुलन जीवन और चेतना के लिए आवश्यक है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
साधक की प्रार्थना और ऊर्जा का संरेखण सभी मार्गों में स्थायीत्व और सुरक्षा लाता है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलित दिशा और मार्ग जीवन और चेतना का सर्वोच्च संरक्षण सुनिश्चित करते हैं।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.19.7 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ चारों दिशाओं और मार्गों का संतुलन बनाए रखें
✔ जीवन और चेतना के मार्गों को श्रेष्ठतम बनाएं
✔ साधक = मार्गदर्शन और सुरक्षा का स्रोत
✔ नकारात्मक प्रभाव और बाधाओं का नाश आवश्यक है
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English Insight
May all directions and pathways be stable and fruitful.
Through them, life’s journey remains protected, free from obstacles,
and the energy flows in harmony, ensuring safety and optimal outcomes.
भूमिका
अथर्ववेद 4.19.8 मंत्र **सुरक्षा, बल और दिव्य संरक्षण** का वर्णन करता है।
साधक यह प्रार्थना करता है कि वह और उसका जीवन **सुरक्षित और शक्तिशाली** रहे, और सभी बाधाओं और नकारात्मक प्रभावों से संरक्षित हो।
- “शतेन मा परि पाहि” – हमें सौ-सौ तरह से और पूर्ण सुरक्षा प्रदान कर।
- “सहस्रेणाभि रक्षा मा” – हजारों प्रकार की शक्तियों और उपायों से रक्षा हो।
- “इन्द्रस्ते वीरुधां पत” – इन्द्र (सशक्त और दिव्य ऊर्जा) तुम्हें वीर और शक्तिशाली बनाए।
- “उग्र ओज्मान मा दधत्” – तुम्हें प्रबल शक्ति और तेज दे।
यह मंत्र **सशक्त जीवन, दिव्य संरक्षण और साहस** का प्रतीक है।
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शब्दार्थ
- शतेन = सौ-सौ प्रकार से, पूर्ण रूप से
- मा = हमें
- परि पाहि = चारों ओर से सुरक्षा दे
- सहस्रेणाभि = हजारों उपायों, शक्तियों से
- रक्षा = सुरक्षा
- इन्द्रः = देवता, शक्ति और साहस का प्रतीक
- ते = तुम्हें
- वीरुधां = वीर, साहसी और शक्तिशाली
- पत = बनाए
- उग्र = प्रबल, तीव्र
- ओज्मान = शक्ति, ऊर्जा
- मा दधत् = प्रदान करे
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सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- उसे और उसके कर्मों को हर प्रकार से सुरक्षित रखा जाए।
- हजारों उपायों और शक्तियों से रक्षा प्राप्त हो।
- दिव्य शक्ति और साहस उसे प्रदान किया जाए।
- नकारात्मक प्रभावों और बाधाओं से जीवन सुरक्षित और समर्थ बने।
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वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ सुरक्षा = जीवन और चेतना का संरक्षण
✔ वीरता और शक्ति = मानसिक और शारीरिक ऊर्जा
✔ सहस्र उपाय = विविध साधन और तैयारी
✔ इन्द्र = दिव्य ऊर्जा और मार्गदर्शन
यह दर्शाता है कि **सुरक्षा, शक्ति और तैयारी जीवन और चेतना में संतुलन और स्थायीत्व लाती है।**
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ साधक की प्रार्थना से सभी नकारात्मक प्रभाव नष्ट हों
✔ दिव्य शक्ति और ऊर्जा का संरक्षण
✔ साहस और वीरता का विकास
✔ जीवन और कर्मों में स्थायीत्व और सुरक्षा
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योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और साधना से मानसिक और ऊर्जा केंद्रों का संरक्षण
✔ प्राणायाम और शक्ति अभ्यास से वीरता और साहस में वृद्धि
✔ नकारात्मक प्रभावों का नाश और दिव्य सुरक्षा
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ सुरक्षा और शक्ति की अनुभूति मानसिक स्थिरता बढ़ाती है
✔ साहस और वीरता बाधाओं का सामना करने में मदद करती है
✔ साधक का सक्रिय संरक्षण जीवन और चेतना में सामंजस्य लाता है
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
सुरक्षा, ऊर्जा और शक्ति का समेकित नियंत्रण जीवन और चेतना में स्थायीत्व लाता है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
साधक की प्रार्थना और दिव्य शक्ति जीवन में संरक्षण और साहस सुनिश्चित करती है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
सुरक्षा, शक्ति और साहस का संयोजन जीवन, चेतना और समाज का सर्वोच्च संरक्षण सुनिश्चित करता है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.19.8 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ जीवन और कर्मों की हर प्रकार से सुरक्षा आवश्यक है
✔ दिव्य शक्ति और साहस से साधक समर्थ बने
✔ नकारात्मक प्रभाव और बाधाओं का नाश
✔ साधक = सुरक्षा, शक्ति और वीरता का स्रोत
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English Insight
May you be protected in hundreds of ways and by thousands of powers.
May Indra make you brave and strong,
and may intense energy and divine strength uphold you.
This ensures ultimate protection, courage, and empowerment.
दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
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