अथर्ववेद 4.20.1 मंत्र में **सर्वदृश्यता और ब्रह्मांडीय दृष्टि** का वर्णन है।
साधक यह प्रार्थना करता है कि उसकी चेतना **सर्वत्र दृष्टि रखने वाली** बनी रहे – ऊपर आकाश से लेकर पृथ्वी तक, सभी दिशाओं और सभी जीवों पर उसकी दृष्टि बनी रहे।
- “आ पश्यति प्रति पश्यति” – यह चेतना प्रत्येक वस्तु और प्राणी को देखती है।
- “परा पश्यति पश्यति” – ऊर्जावान और परावर्ती दृष्टि से देखती है।
- “दिवमन्तरिक्षमाद्भूमिं सर्वं” – आकाश, अंतरिक्ष और पृथ्वी सहित संपूर्ण ब्रह्मांड।
- “तद्देवि पश्यति” – देवी की दृष्टि, ईश्वर की जागरूकता।
यह मंत्र **सर्वव्यापी चेतना और ब्रह्मांडीय जागरूकता** का प्रतीक है।
---
शब्दार्थ
- आ पश्यति = देखती है, दृष्टि डालती है
- प्रति पश्यति = प्रत्येक वस्तु और प्राणी को देखती है
- परा पश्यति = परावर्तित और दिव्य दृष्टि से देखती है
- दिवम् = आकाश
- अन्तरिक्षम् = अंतरिक्ष, आकाशगंगा
- आद्भूमिम् = पृथ्वी
- सर्वम् = संपूर्ण, सभी
- तद्धेवी = देवी या दिव्य चेतना
- पश्यति = देखती है, अनुभव करती है
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सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- उसकी चेतना और दृष्टि संपूर्ण ब्रह्मांड में फैली रहे।
- वह सभी प्राणियों और घटनाओं को देख सके।
- उसकी चेतना ईश्वर के समान जागरूक और सर्वव्यापी बनी रहे।
- आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष तक उसकी दृष्टि विस्तृत हो।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ सर्वदृश्य = चेतना का विस्तृत अनुभव
✔ दिव्य दृष्टि = सूक्ष्म और व्यापक चेतना
✔ ब्रह्मांडीय दृष्टि = सम्पूर्ण जीवन और प्रकृति का अनुभव
यह दर्शाता है कि **सच्ची चेतना और जागरूकता सभी दिशाओं और स्तरों में फैलती है।**
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ साधक के भीतर जागरूक और सर्वव्यापी चेतना का विकास
✔ ईश्वर के समान दृष्टि और समझ
✔ जीवन, प्रकृति और ब्रह्मांड के संतुलन का अनुभव
✔ मानसिक और आध्यात्मिक विस्तार
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योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और ध्यानाभ्यास से समग्र दृष्टि का विकास
✔ प्राणायाम और मानसिक अभ्यास से चेतना का विस्तार
✔ ब्रह्मांडीय ऊर्जा और सभी प्राणियों का अनुभव
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ सर्वव्यापी चेतना मानसिक संतुलन और समझ बढ़ाती है
✔ जीवन और कर्म के विभिन्न पहलुओं पर जागरूक दृष्टि
✔ साधक का ध्यान जीवन में सतर्कता और विवेक लाता है
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
दृश्यता और जागरूकता का विस्तार अनुभव और पर्यवेक्षण को बढ़ाता है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
सर्वव्यापी दृष्टि साधक को ईश्वर समान चेतना प्रदान करती है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
सर्वदृश्य चेतना और ब्रह्मांडीय जागरूकता जीवन, कर्म और अनुभव का सर्वोच्च विकास है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.20.1 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ चेतना सभी दिशाओं और ब्रह्मांड में फैली हो
✔ सभी प्राणियों और घटनाओं की जागरूक दृष्टि हो
✔ साधक का मानसिक और आध्यात्मिक विस्तार सुनिश्चित हो
✔ ईश्वर समान जागरूकता और अनुभव प्राप्त हो
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English Insight
May the consciousness see all around, beyond, and above.
It perceives the sky, space, and earth – the entire universe.
This cultivates universal awareness, omnipresence, and supreme insight.
भूमिका
अथर्ववेद 4.20.2 मंत्र में **दिशाओं और भूत प्राणियों की दृष्टि** का वर्णन है।
साधक यह प्रार्थना करता है कि उसकी चेतना **सभी दिशाओं और सभी जीवों में फैलकर** उन्हें देख सके और उनके कर्मों और ऊर्जा को समझ सके।
- “तिस्रो दिवस्तिस्रः” – तीन आकाश और तीन पृथ्वी के क्षेत्र।
- “षट्चेमाः प्रदिशाः पृथक्” – पृथक-प्रत्येक छः दिशाएँ।
- “त्वयाहं सर्वा भूतानि पश्यानि” – देवी, ईश्वर या जागरूक चेतना के द्वारा सभी प्राणी दृष्टिगत हों।
- “देव्योषधे” – सभी प्राणी और औषधियाँ, यानी जीव, ऊर्जा और प्रकृति का सम्पूर्ण ज्ञान।
यह मंत्र **सर्वव्यापी दृष्टि और ऊर्जा ज्ञान** का प्रतीक है।
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शब्दार्थ
- तिस्रो = तीन
- दिवः = आकाश
- तिस्रः = तीनfold, तीन स्तर
- पृथिवीः = पृथ्वी
- षट्चेमाः = छः
- प्रदिशाः = दिशाएँ
- पृथक् = पृथक-प्रत्येक, अलग-अलग
- त्वया = तुम्हारे द्वारा
- अहं = मैं
- सर्वा भूतानि = सभी जीव, प्राणी और तत्व
- पश्यानि = दृष्टिगत, अनुभव किए जाने वाले
- देव्योषधे = देवी, औषधियाँ, ऊर्जा और प्राणियों की दिव्य दृष्टि
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सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- उसकी चेतना तीन आकाश और तीन पृथ्वी स्तरों में फैली रहे।
- सभी छः दिशाओं में उसकी दृष्टि पहुंचे।
- सभी प्राणी और ऊर्जा, औषधियाँ और प्राकृतिक तत्व दृष्टिगत हों।
- साधक सभी जीवन और ऊर्जा के पहलुओं का अनुभव और ज्ञान प्राप्त करे।
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वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ दिशाएँ और स्तर = जीवन और चेतना के सभी आयाम
✔ भूत = जीव, ऊर्जा, प्राकृतिक तत्व
✔ देव्योषधे = जीवन शक्ति और औषधियाँ
✔ सर्वव्यापी दृष्टि = व्यापक जागरूकता
यह दर्शाता है कि **सच्ची चेतना और जागरूकता सभी दिशाओं और स्तरों में फैलती है।**
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ साधक की चेतना सभी दिशाओं और स्तरों में फैली हुई
✔ सभी जीवों, ऊर्जा और तत्वों की जागरूक दृष्टि
✔ ब्रह्मांडीय संतुलन और ऊर्जा का अनुभव
✔ दिव्य दृष्टि और चेतना का विकास
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योगिक दृष्टि
✔ ध्यान, साधना और प्राणायाम से चेतना का विस्तार
✔ ऊर्जा केंद्र और जीवन मार्गों में सर्वव्यापक दृष्टि
✔ जीवन और प्रकृति के समेकित अनुभव का विकास
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ सभी दिशाओं और प्राणियों की जागरूकता मानसिक संतुलन लाती है
✔ जीवन, ऊर्जा और अनुभव के विभिन्न पहलुओं को समझने में सहायता
✔ साधक का ध्यान जीवन में समग्र दृष्टि और विवेक लाता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
सभी दिशाओं और स्तरों में दृष्टि और जागरूकता अनुभव और पर्यवेक्षण को बढ़ाती है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
सर्वव्यापी दृष्टि साधक को ब्रह्मांडीय चेतना प्रदान करती है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
सर्वदृश्य चेतना जीवन, ऊर्जा और अनुभव का सर्वोच्च विकास है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.20.2 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ सभी दिशाओं और स्तरों में चेतना फैली हो
✔ सभी प्राणी, ऊर्जा और तत्व दृष्टिगत हों
✔ साधक का ध्यान जीवन, चेतना और प्रकृति में सर्वोच्च स्थायीत्व लाए
✔ दिव्य और सर्वव्यापी दृष्टि जीवन और कर्म में सर्वोच्च जागरूकता प्रदान करे
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English Insight
May your consciousness extend through the three skies and three earths,
reaching all six directions.
Let all beings, energies, and natural elements be visible to you,
so that universal insight and awareness prevail.
भूमिका
अथर्ववेद 4.20.3 मंत्र में **दिव्य सुपर्ण और पृथ्वी का आरोहण** वर्णित है।
साधक यह प्रार्थना करता है कि उसकी चेतना **दिव्य रूप में स्वतंत्र और ऊर्जावान** बने,
और वह पृथ्वी और प्रकृति की सभी शक्तियों का अनुभव कर सके।
- “दिव्यस्य सुपर्णस्य तस्य हासि कनीनिका” – दिव्य पक्षी (सुपर्ण) के पंखों की गति और शक्ति का प्रतीक।
- “सा भूमिमा रुरोहिथ” – वह पृथ्वी को आरोहण करती है, यानी ऊर्जा और चेतना का विस्तार।
- “वह्यं श्रान्ता वधूरिव” – बाहरी बाधाओं और श्रम से परे, जैसे युवा और शक्तिशाली वधू गति करती है।
यह मंत्र **ऊर्जा, दिव्यता और चेतना के विस्तार** का संकेत है।
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शब्दार्थ
- दिव्यस्य = दिव्य
- सुपर्णस्य = पंखों वाला, दिव्य पक्षी
- तस्य = उसका
- हासि = गति, उड़ान
- कनीनिका = पंख की नोक, ऊर्जा और शक्ति का केंद्र
- सा = वह
- भूमिमा = पृथ्वी
- रुरोहिथ = आरोहण करती है, ऊपर उठती है
- वह्यं = बाहरी
- श्रान्ता = श्रमहीन, शक्तिशाली
- वधूरिव = वधू की तरह, ऊर्जावान और तेज
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सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- उसकी चेतना दिव्य सुपर्ण की तरह मुक्त और ऊर्जावान हो।
- उसकी चेतना और शक्ति पृथ्वी और प्रकृति में फैल जाए।
- बाहरी बाधाओं और श्रम के बावजूद वह सहज, तेज और ऊर्जावान बनी रहे।
- चेतना का विस्तार और ऊर्जा का संचरण हो।
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वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ सुपर्ण = दिव्य ऊर्जा और चेतना का प्रतीक
✔ पंख की गति = चेतना और शक्ति का विस्तार
✔ पृथ्वी आरोहण = ऊर्जा और चेतना का विकास
✔ बाहरी बाधाओं का पार = जीवन में प्रगति और सामर्थ्य
यह दर्शाता है कि **सच्ची चेतना और ऊर्जा बाहरी बाधाओं से स्वतंत्र होकर फैलती है।**
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ दिव्य सुपर्ण के माध्यम से चेतना का विस्तार
✔ पृथ्वी और प्रकृति की ऊर्जा का अनुभव
✔ बाहरी बाधाओं से मुक्त और शक्तिशाली चेतना
✔ साधक की दिव्यता और ऊर्जावान स्थिति का विकास
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योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और साधना से चेतना की ऊर्जावान उड़ान
✔ प्राणायाम और शक्ति अभ्यास से ऊर्जा का विस्तार
✔ बाहरी बाधाओं और नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ ऊर्जावान चेतना मानसिक और भावनात्मक शक्ति बढ़ाती है
✔ बाधाओं का सामना करने में साहस और सामर्थ्य
✔ साधक का ध्यान जीवन में सामंजस्य और प्रगति लाता है
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
ऊर्जा और चेतना का विस्तार मानसिक, शारीरिक और पर्यावरणीय संतुलन लाता है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
दिव्य सुपर्ण और पृथ्वी आरोहण साधक को ऊर्जावान चेतना और दिव्यता प्रदान करते हैं।
दोनों मिलकर कहते हैं —
ऊर्जावान और मुक्त चेतना जीवन, ऊर्जा और ब्रह्मांडीय अनुभव का सर्वोच्च विकास है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.20.3 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ चेतना दिव्य और ऊर्जावान हो
✔ ऊर्जा का विस्तार पृथ्वी और जीवन में हो
✔ बाहरी बाधाओं से स्वतंत्र और शक्तिशाली बनी रहे
✔ दिव्यता और चेतना का सर्वोच्च अनुभव प्राप्त हो
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English Insight
May your consciousness be like a divine bird with spreading wings,
rising and expanding over the earth.
Let it remain energetic, free from exhaustion,
and move with the strength and vitality of a young, powerful force.
भूमिका
अथर्ववेद 4.20.4 मंत्र में **सहस्राक्ष देव और सर्वदृष्टि** का वर्णन है।
साधक प्रार्थना करता है कि उसकी चेतना **सहस्राक्ष (हजारों आंखों वाली दिव्य दृष्टि) जैसी व्यापक** बने,
जिससे वह सभी दिशाओं और सभी जीवों को देख सके।
- “सहस्राक्षो देवो” – हजारों नेत्रों वाला देव, दिव्य सर्वदृष्टि का प्रतीक।
- “दक्षिणे हस्त आ दधत्” – दक्षिण दिशा में उसकी दिव्यता और शक्ति स्थित हो।
- “तयाहं सर्वं पश्यामि” – उसकी दृष्टि से सभी प्राणी, घटनाएँ और वस्तुएँ स्पष्ट दिखाई दें।
- “यश्च शूद्र उतार्यः” – सभी नीच और उच्च स्तर के प्राणी और तत्व उसकी दृष्टि में स्पष्ट हों।
यह मंत्र **सर्वव्यापी जागरूकता और दिव्य दृष्टि** का प्रतीक है।
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शब्दार्थ
- तां = उसे
- मे = मेरे लिए
- सहस्राक्षो = हजारों नेत्रों वाला
- देवो = देवता, दिव्य चेतना
- दक्षिणे = दक्षिण दिशा में
- हस्त = हाथ, शक्ति और नियंत्रण
- आ दधत् = रखता है, स्थित करता है
- तयाः = उसकी (सहस्राक्ष देव की)
- अहं = मैं
- सर्वं = सभी, सम्पूर्ण
- पश्यामि = देखता हूँ
- यः = जो
- शूद्र = नीच स्तर, कमजोर या सामान्य प्राणी
- उतार्यः = उच्च और नीच सभी
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सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- उसकी चेतना **सहस्राक्ष देव** जैसी व्यापक और सर्वदृष्टि वाली हो।
- सभी दिशाओं और सभी जीवों पर उसकी दृष्टि फैली रहे।
- सभी नीच और उच्च स्तर के प्राणी, तत्व और घटनाएँ स्पष्ट रूप से दिखाई दें।
- दिव्य जागरूकता और सर्वव्यापी दृष्टि प्राप्त हो।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ सहस्राक्ष = चेतना का विस्तार और सर्वदृष्टि
✔ दक्षिण दिशा = ऊर्जा केंद्र और शक्ति का प्रतीक
✔ उच्च और नीच प्राणी = जीवन और चेतना के विभिन्न स्तर
✔ सर्वव्यापी दृष्टि = व्यापक जागरूकता
यह दर्शाता है कि **सच्ची चेतना सभी दिशाओं, सभी प्राणियों और सभी घटनाओं में फैली हुई होती है।**
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ दिव्य सहस्राक्ष दृष्टि के माध्यम से चेतना का विस्तार
✔ सभी जीवों, प्राणियों और तत्वों का अनुभव
✔ उच्चतम जागरूकता और ब्रह्मांडीय दृष्टि
✔ साधक का दिव्य और सर्वव्यापी स्वरूप
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योगिक दृष्टि
✔ ध्यान, साधना और प्राणायाम से सर्वदृष्टि का विकास
✔ ऊर्जा केंद्रों और दिशाओं में चेतना का विस्तार
✔ जीवन और प्रकृति के समेकित अनुभव का विकास
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ व्यापक दृष्टि और चेतना मानसिक शक्ति बढ़ाती है
✔ जीवन और अनुभव के विभिन्न पहलुओं को समझने में सहायता
✔ साधक का ध्यान जीवन में सतर्कता, विवेक और सामंजस्य लाता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
सर्वदृष्टि और जागरूकता चेतना, अनुभव और पर्यवेक्षण को बढ़ाती है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
सहस्राक्ष देव की दृष्टि साधक को ब्रह्मांडीय चेतना और दिव्यता प्रदान करती है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
सर्वदृष्टि चेतना जीवन, ऊर्जा और अनुभव का सर्वोच्च विकास है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.20.4 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ चेतना सहस्राक्ष जैसी सर्वव्यापी और व्यापक हो
✔ सभी दिशाओं और सभी प्राणियों पर दृष्टि फैली हो
✔ साधक की जागरूकता जीवन और ब्रह्मांड में सर्वोच्च हो
✔ दिव्यता और सर्वव्यापक चेतना प्राप्त हो
---
English Insight
May the thousand-eyed divine vision be placed in the south,
so that through it, all beings, events, and elements become visible.
May your consciousness perceive everything,
from the lowest to the highest, with omnipresent awareness.
भूमिका
अथर्ववेद 4.20.5 मंत्र में **सहस्रचक्षु (हजारों नेत्रों) द्वारा अपने रूपों का प्रदर्शन** वर्णित है।
साधक प्रार्थना करता है कि उसकी चेतना अपने सभी रूपों, शक्तियों और संभावनाओं को प्रकट करे,
तथा बाहरी जगत की घटनाओं और जीवों को व्यापक दृष्टि से देख सके।
- “आविष्कृणुष्व रूपानि” – अपने सभी रूप और शक्तियाँ प्रकट करो।
- “मात्मानम् अप गूहथाः” – अपने भीतर छिपी दिव्यता और शक्ति को जगाओ।
- “अथो सहस्रचक्षुः” – हजारों नेत्रों वाली दृष्टि से।
- “त्वं प्रति पश्याः किमीदिनः” – यह देखो कि आज क्या घटित हो रहा है, वर्तमान और भविष्य की घटनाएँ।
यह मंत्र **आत्मज्ञान, व्यापक चेतना और दिव्यता के अनुभव** का प्रतीक है।
---
शब्दार्थ
- आविष्कृणुष्व = प्रकट करो, दिखाई दो
- रूपानि = रूप, स्वरूप और शक्तियाँ
- मात्मानम् = अपने आप, आत्मा
- अप = और
- गूहथाः = छिपी हुई, गुप्त
- अथः = फिर, इसके बाद
- सहस्रचक्षुः = हजारों नेत्रों वाली दृष्टि
- त्वं = तुम
- प्रति = की ओर, अपने प्रति
- पश्याः = देखो
- किम् = क्या
- ईदिनः = आज, वर्तमान समय
---
सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- उसकी चेतना अपने सभी **रूप और शक्तियों को प्रकट** करे।
- आंतरिक दिव्यता और ऊर्जा को बाहर लाए।
- हजारों नेत्रों जैसी **सर्वव्यापी दृष्टि** प्राप्त हो।
- वर्तमान समय और सभी घटनाओं का **सटीक अवलोकन** कर सके।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ रूपों का प्रदर्शन = चेतना की संभावनाएँ और विविधताएँ
✔ गुप्त शक्ति = आंतरिक ऊर्जा और दिव्यता
✔ सहस्रचक्षु = सर्वदृष्टि, व्यापक जागरूकता
✔ वर्तमान अवलोकन = ध्यान और जीवन जागरूकता
यह दर्शाता है कि **साधक की चेतना सभी रूपों, क्षमताओं और घटनाओं का अनुभव कर सकती है।**
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ आत्मा और चेतना के सभी रूपों का जागरूक अनुभव
✔ दिव्यता का उद्घाटन और ऊर्जा का प्रसार
✔ व्यापक दृष्टि और सार्वभौमिक जागरूकता
✔ अपने और बाहरी जगत के बीच सामंजस्य
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान, साधना और प्राणायाम द्वारा चेतना का विस्तार
✔ आंतरिक ऊर्जा और दिव्यता का अनुभव
✔ सहस्रचक्षु दृष्टि से जीवन और ब्रह्मांडीय घटनाओं का निरीक्षण
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ व्यापक दृष्टि जीवन में निर्णय और विवेक बढ़ाती है
✔ आंतरिक शक्तियों और संभावनाओं का अनुभव आत्मविश्वास बढ़ाता है
✔ साधक का ध्यान और जागरूकता मानसिक सामर्थ्य बढ़ाती है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
विभिन्न संभावनाओं और क्षमताओं को पहचानना मानसिक शक्ति और अनुभव को बढ़ाता है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
सहस्रचक्षु दृष्टि साधक को **सर्वदृष्टि और दिव्यता** प्रदान करती है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
सर्वव्यापक चेतना और आंतरिक शक्ति का अनुभव जीवन और ब्रह्मांड के सर्वोच्च ज्ञान का मार्ग है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.20.5 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ चेतना अपने सभी रूप और शक्तियों को प्रकट करे
✔ आंतरिक दिव्यता और ऊर्जा उजागर हो
✔ हजारों नेत्र जैसी सर्वदृष्टि प्राप्त हो
✔ वर्तमान और सभी घटनाओं का व्यापक अनुभव हो
---
English Insight
Reveal all your forms and hidden powers, O consciousness,
and let your thousand-eyed vision perceive the world clearly.
See today’s events, the present moment,
and manifest the divinity within you for omnipresent awareness.
भूमिका
अथर्ववेद 4.20.6 मंत्र में **अशुभ और विकारात्मा शक्तियों (यातुधान और पिशाच) का दर्शन** वर्णित है।
साधक प्रार्थना करता है कि वह **सभी नकारात्मक और हानिकारक शक्तियों** को देख सके,
तथा उन्हें नियंत्रित कर अपनी चेतना और ऊर्जा को सुरक्षित रख सके।
- “दर्शय मा यातुधानान्” – मुझे उन हानिकारक शक्तियों को दिखाओ।
- “दर्शय यातुधान्यः” – उन सभी विकृत और हानिकारक प्राणियों का प्रदर्शन करो।
- “पिशाचान्त्सर्वान्” – सभी असुर, भूत और पिशाच।
- “दर्शयेति त्वा रभ ओषधे” – हे औषधि और आहार शक्ति, इनका निराकरण कर मुझे सुरक्षित रखो।
यह मंत्र **सुरक्षा, चेतना की जागरूकता और नकारात्मक शक्तियों पर नियंत्रण** का प्रतीक है।
---
शब्दार्थ
- दर्शय = दिखाओ, अवलोकन कराओ
- मा = मुझे
- यातुधानान् = विकृत, हानिकारक, बाधक प्राणी
- यातुधान्यः = अन्य यातुधान, हानिकारक प्राणी
- पिशाचान् = भूत, असुर, शत्रु
- सर्वान् = सभी
- दर्शयेति = दिखाता है
- त्वा = तुम्हारे द्वारा
- रभ = शक्ति, औषधि
- ओषधे = औषधि, आहार या ऊर्जा
---
सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- उसे **सभी हानिकारक और विकृत शक्तियाँ** दिखाई दें।
- पिशाच, भूत और नकारात्मक तत्व उसके सामने स्पष्ट हों।
- औषधि और दिव्य शक्ति के माध्यम से उन सभी का **नियंत्रण और निवारण** हो।
- चेतना और ऊर्जा सुरक्षित रहे।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ यातुधान और पिशाच = नकारात्मक मानसिक और भौतिक प्रभाव
✔ दर्शन = चेतना का जागरूक अवलोकन
✔ ओषधि = ऊर्जा, शक्ति और संरक्षण
✔ सुरक्षा = जीवन और चेतना में सामंजस्य
यह दर्शाता है कि **साधक अपनी चेतना को जागरूक रखकर नकारात्मक शक्तियों का निरीक्षण और नियंत्रण करता है।**
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ नकारात्मक और विकृत शक्तियों का ज्ञान और अवलोकन
✔ चेतना की सुरक्षा और ऊर्जा का संरक्षण
✔ दिव्यता और शक्ति का विकास
✔ जीवन और चेतना में संतुलन और सामंजस्य
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और साधना के माध्यम से नकारात्मक मानसिक प्रभावों का अवलोकन
✔ प्राणायाम और ऊर्जा केंद्रों द्वारा चेतना का संरक्षण
✔ मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा सुनिश्चित करना
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ नकारात्मक शक्तियों का अवलोकन जीवन में सतर्कता और विवेक बढ़ाता है
✔ चेतना और ऊर्जा का संरक्षण मानसिक सामर्थ्य बढ़ाता है
✔ साधक का ध्यान और जागरूकता हानिकारक प्रभावों से सुरक्षा प्रदान करता है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
सक्रिय अवलोकन और चेतना सुरक्षा जीवन और स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
साधक को नकारात्मक शक्तियों का अनुभव और नियंत्रण ब्रह्मांडीय ऊर्जा और चेतना की सुरक्षा प्रदान करता है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
जागरूक चेतना और नकारात्मक शक्तियों का नियंत्रण जीवन और साधना में सर्वोच्च महत्व रखता है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.20.6 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ सभी हानिकारक और विकृत शक्तियों का अवलोकन जरूरी है
✔ चेतना और ऊर्जा का संरक्षण और सुरक्षा
✔ ओषधि और दिव्यता से नकारात्मक प्रभावों का निवारण
✔ साधक को सभी परिस्थितियों में जागरूक और सुरक्षित रखना
---
English Insight
Reveal unto me, O divine force, all harmful and negative beings—
the Yatudhans and Pisachas, visible to my awareness.
Let me perceive their presence, and through protective energy,
neutralize their influence, keeping consciousness and vitality secure.
भूमिका
अथर्ववेद 4.20.7 मंत्र में **साधक अपनी चेतना को नकारात्मक शक्तियों से मुक्त करने की प्रार्थना** करता है।
यह मंत्र विशेष रूप से पिशाचों और अन्य हानिकारक तत्वों के **परित्याग और निराकरण** का संकेत देता है।
- “कश्यपस्य चक्षुः” – कश्यप ऋषि की दृष्टि, दिव्य और व्यापक दृष्टि।
- “असि शुन्याः” – सभी अनावश्यक और शून्य प्रभाव वाले तत्व।
- “चतुरक्ष्याः” – चारों दिशाओं में निगरानी रखने वाली दृष्टि।
- “वीध्रे सूर्यमिव सर्पन्तं” – सूर्य के समान प्रकाश फैलाकर नकारात्मकता को दूर करें।
- “मा पिशाचं तिरस्करः” – पिशाच और अशुभ शक्तियों का परित्याग।
यह मंत्र **आध्यात्मिक सुरक्षा और चेतना की शुद्धि** का प्रतीक है।
---
शब्दार्थ
- कश्यपस्य = कश्यप ऋषि की
- चक्षुः = दृष्टि, नेत्र
- असि = हैं, हो
- शुन्याः = शून्य, नकारात्मक, हानिकारक
- चतुरक्ष्याः = चारों दिशाओं में निगरानी रखने वाले
- वीध्रे = फैलाओ, उजागर करो
- सूर्यमिव = सूर्य के समान प्रकाश में
- सर्पन्तं = फैलते हुए, फैलाकर
- मा = न
- पिशाचं = पिशाच, भूत, हानिकारक शक्ति
- तिरस्करः = त्याग दो, परित्याग करो
---
सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- उसकी चेतना **सभी नकारात्मक और हानिकारक शक्तियों से मुक्त** हो।
- सूर्य के समान प्रकाश फैलाकर नकारात्मक तत्वों को **दूर किया जाए**।
- पिशाच और अशुभ शक्तियों का **पूर्ण परित्याग** हो।
- चारों दिशाओं में जागरूक दृष्टि और सुरक्षा बनी रहे।
---
वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ नकारात्मक तत्व = मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक बाधाएँ
✔ चारों दिशाओं की जागरूक दृष्टि = जीवन में सतर्कता
✔ सूर्य के समान प्रकाश = ऊर्जा और चेतना का उजागर होना
✔ तिरस्कार = नकारात्मकता का परित्याग
यह दर्शाता है कि **साधक अपनी चेतना और ऊर्जा को नकारात्मक प्रभावों से संरक्षित करता है।**
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ नकारात्मक शक्तियों का त्याग
✔ चेतना और ऊर्जा का शुद्धिकरण
✔ दिव्यता और आंतरिक शक्ति का प्रसार
✔ जीवन में सामंजस्य और संतुलन
---
योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और साधना से मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा
✔ प्राणायाम और ऊर्जा केंद्रों का सक्रिय नियंत्रण
✔ चेतना का चारों दिशाओं में फैलाव और सुरक्षा
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ नकारात्मक और हानिकारक प्रभावों से सुरक्षा जीवन और मानसिक संतुलन के लिए आवश्यक है
✔ ध्यान और जागरूकता द्वारा चेतना को शुद्ध और सुरक्षित रखना
✔ साधक की चेतना शक्तिशाली और संतुलित होती है
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
सकारात्मक ऊर्जा का विस्तार और नकारात्मक तत्वों का परित्याग जीवन और स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
साधक की चेतना नकारात्मक शक्तियों का त्याग कर ब्रह्मांडीय संतुलन और दिव्यता में संलग्न होती है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
सतर्क चेतना और नकारात्मक शक्तियों का परित्याग सर्वोच्च आध्यात्मिक और मानसिक सुरक्षा प्रदान करता है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.20.7 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ चेतना में नकारात्मक शक्तियों का अवलोकन
✔ सूर्य के समान प्रकाश द्वारा ऊर्जा का प्रसार
✔ पिशाचों और हानिकारक तत्वों का पूर्ण परित्याग
✔ चारों दिशाओं में जागरूक दृष्टि और सुरक्षा
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English Insight
With the vision of sage Kashyap, perceive all that is empty and harmful.
Let your consciousness spread like the sun,
rejecting all Pisachas and malevolent forces.
Maintain awareness in all directions and keep your energy protected.
भूमिका
अथर्ववेद 4.20.8 मंत्र में **साधक अपनी चेतना के माध्यम से हानिकारक शक्तियों (यातुधान) और अशुभ तत्वों का अवलोकन** करता है।
यह मंत्र दर्शाता है कि साधक अपने **ऊर्जा केंद्रों और दिव्य दृष्टि से सभी नकारात्मक तत्वों को पहचान** सकता है।
- “उदग्रभं परिपाणात्” – हाथ या शक्ति के माध्यम से ऊपर उठाकर देखने का संकेत।
- “यातुधानं किमीदिनम्” – हानिकारक और विकृत शक्तियों का दृश्य।
- “तेनाहं सर्वं पश्यामि” – मैं सभी को देख पाता हूँ।
- “उत शूद्रमुतार्यम्” – शूद्र, अशुभ या नकारात्मक तत्व भी स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
यह मंत्र **सतर्क चेतना और नकारात्मक प्रभावों की पहचान** का प्रतीक है।
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शब्दार्थ
- उदग्रभं = ऊपर उठाकर, उच्च दृष्टि से
- परिपाणात् = हाथ या शक्ति के माध्यम से
- यातुधानं = हानिकारक, विकृत प्राणी या शक्ति
- किमीदिनम् = क्या आज, वर्तमान में
- तेन = उसके द्वारा
- अहं = मैं
- सर्वं = सभी
- पश्यामि = देखता हूँ
- उत = भी
- शूद्रम् = अशुभ, हानिकारक या नकारात्मक तत्व
- उतार्यम् = स्पष्ट रूप से देखा जा सके
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सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- अपनी चेतना और शक्ति द्वारा सभी **हानिकारक शक्तियों और नकारात्मक तत्वों** को देख सके।
- न केवल यातुधान बल्कि **अन्य अशुभ तत्व भी स्पष्ट रूप से दिखाई दें।**
- हाथ और दिव्य दृष्टि के माध्यम से **सभी नकारात्मक प्रभावों का अवलोकन** संभव हो।
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वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ यातुधान = मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक बाधाएँ
✔ शूद्र = नकारात्मक या अशुभ तत्व
✔ परिपाण = साधक की सक्रिय शक्ति और चेतना
✔ अवलोकन = जागरूक चेतना और नियंत्रण
यह दर्शाता है कि **साधक नकारात्मक प्रभावों को पहचानकर उन्हें नियंत्रित और परित्याग कर सकता है।**
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ नकारात्मक शक्तियों का अवलोकन और पहचान
✔ चेतना और ऊर्जा की सुरक्षा
✔ जीवन में संतुलन और आंतरिक शक्ति का विकास
✔ दिव्यता और जागरूकता का प्रसार
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योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और साधना से नकारात्मक प्रभावों की पहचान
✔ प्राणायाम और ऊर्जा केंद्रों द्वारा चेतना का संरक्षण
✔ हाथ और दृष्टि के माध्यम से मानसिक और आध्यात्मिक नियंत्रण
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ नकारात्मक शक्तियों और अशुभ तत्वों की पहचान मानसिक सतर्कता बढ़ाती है
✔ चेतना का सक्रिय अवलोकन जीवन में सुरक्षा और संतुलन लाता है
✔ साधक का जागरूक ध्यान नकारात्मक प्रभावों को कम करता है
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
सक्रिय अवलोकन और ऊर्जा केंद्रों का नियंत्रण स्वास्थ्य और चेतना के लिए महत्वपूर्ण है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
साधक की चेतना नकारात्मक शक्तियों और अशुभ तत्वों का अवलोकन करके
आध्यात्मिक और ब्रह्मांडीय संतुलन बनाए रखती है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
सतर्क चेतना और सक्रिय अवलोकन जीवन और साधना में सर्वोच्च महत्व रखते हैं।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.20.8 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ हाथ और दिव्य दृष्टि से सभी नकारात्मक तत्वों का अवलोकन
✔ हानिकारक शक्तियों और अशुभ तत्वों की पहचान
✔ चेतना और ऊर्जा का संरक्षण
✔ जीवन में संतुलन, सुरक्षा और जागरूकता
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English Insight
Through elevated awareness and the power of the hands,
the practitioner perceives all harmful forces—Yatudhans and negative elements.
Even obscure or subtle adverse influences become visible,
allowing consciousness to remain alert and protected.
भूमिका
अथर्ववेद 4.20.9 मंत्र में **साधक अपनी चेतना और दिव्य दृष्टि से सभी नकारात्मक शक्तियों (पिशाच) और अशुभ प्रभावों को देखता है।**
यह मंत्र चेतना की व्यापकता और अंतरिक्ष में फैलती जागरूक शक्ति का प्रतीक है।
- “यो अन्तरिक्षेण पतति” – वह जो अंतरिक्ष में फैला है, व्यापक चेतना।
- “दिवं यश्च अतिसर्पति” – वह जो दिव्य और तेजस्वी है, सभी सीमाओं से ऊपर।
- “भूमिं यो मन्यते नाथं” – जो पृथ्वी को अपना अधिपति मानता है, उसकी शक्ति।
- “तं पिशाचं प्र दर्शय” – उस शक्ति द्वारा पिशाचों और अशुभ तत्वों का परदर्शन।
यह मंत्र **साधक की जागरूक चेतना और नकारात्मक शक्तियों का सामना करने की क्षमता** दर्शाता है।
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शब्दार्थ
- यो = जो
- अन्तरिक्षेण = अंतरिक्ष में, व्यापक दृष्टि से
- पतति = फैलता है, विस्तार करता है
- दिवं = आकाश, आकाशीय चेतना
- यः = जो
- अतिसर्पति = बहुत तेज गति से फैलता है
- भूमिं = पृथ्वी
- मन्यते = मानता है, अधिपति समझता है
- नाथं = स्वामी, अधिपति
- तं = वह
- पिशाचं = नकारात्मक शक्ति, पिशाच
- प्रदर्शय = दिखा, अवलोकन कर
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सरल अर्थ
साधक प्रार्थना करता है कि:
- उसकी चेतना **अंतरिक्ष के समान व्यापक और तेजस्वी** हो।
- वह दिव्य दृष्टि से **सभी नकारात्मक शक्तियों (पिशाच) और अशुभ प्रभावों** को देख सके।
- पृथ्वी और आकाश में फैली शक्तियों को पहचानकर **संतुलित और सुरक्षित निर्णय** ले सके।
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वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ अन्तरिक्ष = चेतना का व्यापक विस्तार
✔ दिवं अतिसर्पति = तेजस्वी और ऊर्जावान मानसिक शक्ति
✔ पिशाच = नकारात्मक प्रभाव और बाधाएँ
✔ प्रदर्शय = जागरूक अवलोकन और नियंत्रण
यह दर्शाता है कि **साधक अपनी चेतना और जागरूक शक्ति से नकारात्मक प्रभावों को पहचानता और नियंत्रित करता है।**
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ व्यापक चेतना का विकास
✔ नकारात्मक और अशुभ तत्वों का परदर्शन
✔ मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन
✔ जीवन में सुरक्षा और जागरूकता
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योगिक दृष्टि
✔ ध्यान और साधना से चेतना का विस्तार
✔ प्राणायाम और ऊर्जा केंद्रों के माध्यम से जागरूक शक्ति
✔ नकारात्मक तत्वों का अवलोकन और नियंत्रण
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ व्यापक और सतर्क चेतना मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा देती है
✔ नकारात्मक प्रभावों की पहचान जीवन में सामंजस्य लाती है
✔ साधक की जागरूक चेतना शक्ति और संतुलन प्रदान करती है
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
जागरूक चेतना और मानसिक विस्तार जीवन में नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
साधक की चेतना अंतरिक्षीय दृष्टि और परदर्शन क्षमता से
नकारात्मक तत्वों का सामना करके आध्यात्मिक और ब्रह्मांडीय संतुलन बनाती है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
व्यापक जागरूक चेतना और नकारात्मक प्रभावों का अवलोकन सर्वोच्च सुरक्षा और आध्यात्मिक ऊँचाई लाता है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.20.9 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ चेतना का अंतरिक्षीय विस्तार और तेजस्विता
✔ पिशाच और नकारात्मक शक्तियों का परदर्शन
✔ मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा
✔ जीवन में संतुलन, जागरूकता और ऊर्जा का संरक्षण
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English Insight
The practitioner’s consciousness spreads through the cosmos,
swift and radiant like the divine.
Through this expanded awareness,
all Pisachas and negative forces become visible,
allowing for protection, balance, and spiritual vigilance.
दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
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