11 Sanskrit Sukti hindi english explanation

 


1. या कुन्देन्दुतुशारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।

या ब्रह्माच्युतशन्करप्रभृतिभिः देवैः सदा वन्दिता

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥

यह अत्यंत सुंदर और सात्विक विचार है। भारतीय परंपरा में किसी भी ज्ञानपूर्ण कार्य या विधा का आरंभ माँ सरस्वती की वंदना से करना शुभ माना जाता है।

हिन्दी अनुवाद

जो कुंद के फूल, चंद्रमा और बर्फ के हार के समान श्वेत (सफेद) हैं, जिन्होंने शुभ्र वस्त्र धारण किए हैं, जिनके हाथ वीणा के वरदान देने वाले दंड से सुशोभित हैं और जो श्वेत कमल के आसन पर विराजमान हैं; ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि देवताओं द्वारा जिनकी सदा स्तुति की जाती है, वही अज्ञानता के अंधकार को दूर करने वाली भगवती सरस्वती मेरी रक्षा करें।

English Translation

Who is as white as the Kunda flower, the moon, and a garland of snow; who is adorned in pure white garments; whose hands are graced by the boon-giving staff of the Veena; and who is seated on a white lotus. To whom Brahma, Vishnu, and Shiva, along with other gods, always offer their prayers—may that Goddess Saraswati, the remover of all ignorance, protect me.

2. अविश्रामं वहेद्भारं शीतोष्णं च न विन्दति ।

ससन्तोषस्तथा नित्यं त्रीणि शिक्षेत गर्दभात् ॥

यह श्लोक 'चाणक्य नीति' से लिया गया है, जिसमें आचार्य चाणक्य ने बताया है कि हमें एक साधारण से दिखने वाले प्राणी गर्दभ (गधे) से भी जीवन की महत्वपूर्ण शिक्षा लेनी चाहिए।

​हिन्दी अनुुबाद

​बिना थके (बिना आराम किए) बोझ ढोना, सर्दी-गर्मी की चिंता न करना और सदा संतोष के साथ जीवन जीना—ये तीन गुण मनुष्य को गधे से सीखने चाहिए।


​English Translation


​To carry the burden without resting (tirelessly), to remain unbothered by cold or heat, and to always live with contentment—one should learn these three qualities from a donkey.

3. एतस्मिन् सुभाशितं भवति शङ्करस्तवनाय ।

सुष्ठु कृतः खलु शब्दप्रयोगः अस्मिन् । पठतु

यह श्लोक भगवान शिव की स्तुति में रचा गया है। इसमें 'प-वर्ग' (प, फ, ब, भ, म) के अक्षरों का उपयोग करके एक अद्भुत शब्द-क्रीड़ा की गई है, जिससे शिवजी के पांच अंगों का वर्णन होता है और अंत में 'अपवर्ग' (मोक्ष) की कामना की गई है।

संस्कृत श्लोक

4. पिनाक फणि बालेन्दु भस्म मन्दाकिनी युता ।
प-वर्ग रचिता मूर्तिः अपवर्ग प्रदास्तु नः ॥

हिन्दी अनुवाद

जो पिनाक (धनुष), फणि (सर्प), बालेन्दु (बाल-चंद्रमा), भस्म और मन्दाकिनी (गंगा) से युक्त हैं—ऐसे 'प-वर्ग' (प, फ, ब, भ, म) से निर्मित स्वरूप वाली भगवान शिव की मूर्ति हमें अपवर्ग (मोक्ष) प्रदान करे।


​English Translation

Adorned with the Pinaka (bow), the Phani (serpent), the Balendu (crescent moon), the Bhasama (sacred ash), and the Mandakini (river Ganges); may this form of Lord Shiva—composed of the five letters of the 'Pa-varga' (P, Ph, B, Bh, M)—grant us Apavarga (liberation/salvation).

यह श्लोक संस्कृत साहित्य में 'प्रहेलिका' (पहेली) या 'वक्रोक्ति' का एक अद्भुत उदाहरण है। ऊपर से देखने पर इसका अर्थ विरोधाभासी (अजीब) लगता है, लेकिन शब्दों के विच्छेद (संधि-विच्छेद) से इसका गहरा और सुंदर अर्थ निकलता है।

संस्कृत श्लोक

5. पानियं पातुमिच्छामि त्वत्तः कमललोचने ।
यदि दास्यसि नेच्छामि न दास्यसि पिबाम्यहम् ॥
दो अर्थों वाला अनुवाद

1. शाब्दिक अर्थ (जो विरोधाभासी लगता है):

हे कमल के समान नेत्रों वाली! मैं तुम्हारे हाथ से पानी पीना चाहता हूँ। यदि तुम दोगी (दास्यसि), तो मेरी इच्छा नहीं (नेच्छामि) है; और यदि तुम नहीं दोगी (न दास्यसि), तो मैं पीऊँगा (पिबाम्यहम्)।

वास्तविक/गूढ़ अर्थ (संधि-विच्छेद के बाद):
यहाँ 'दास्यसि' शब्द में खेल है।

दास्यसि = दासी + असि (अर्थात्: तुम दासी हो)
नेच्छामि = न + इच्छामि (अर्थात्: नहीं चाहता)

अनुवाद: हे कमलनेत्री! मैं तुम्हारे हाथ से जल पीना चाहता हूँ। यदि तुम दासी हो (दास्यसि), तो मैं जल पीना नहीं चाहता (नेच्छामि); और यदि तुम दासी नहीं हो (न दास्यसि), तो मैं जल पीऊँगा (पिबाम्यहम्)।

(भाव यह है कि कुलीन व्यक्ति केवल सम्मानजनक स्थिति में ही जल ग्रहण करना चाहता है।)

English Translation

"O lotus-eyed one! I wish to drink water from you. If you are a maidservant (Dasi + Asi), I do not wish to drink. But if you are not a maidservant (Na + Dasyasi), then I shall drink it."


6. भवन्ति बहवः श्लोकाः सज्जनसङ्गतिप्रशंसिनः । 

तस्मिनेतत्तु मह्यम् सर्वेभ्योऽधिकं प्रियम् ॥

संस्कृत श्लोक

जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं,
मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति ।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं,
सत्सङ्गतिः कथय किं न करोति पुंसाम् ॥
(नीतिशतकम्)

हिन्दी अनुवाद

सज्जनों की संगति (सत्संगति) बुद्धि की जड़ता (मूर्खता) को दूर करती है, वाणी में सत्य का संचार करती है, मान और उन्नति को बढ़ाती है, पापों को नष्ट करती है, चित्त (मन) को प्रसन्न करती है और चारों दिशाओं में यश (कीर्ति) फैलाती है। सच कहो, सत्संगति मनुष्यों का कौन सा भला नहीं करती? (अर्थात् सब कुछ करती है)।

English Translation

Good company (Satsangati) removes the dullness of intellect, sprinkles truth in speech, directs one towards honour and progress, eliminates sins, pleases the heart, and spreads fame in all directions. Tell me, what good does the company of noble souls not do for a person? (It does everything).

7. यह श्लोक 'नीतिशतकम्' का एक और अनमोल रत्न है। इसमें उदाहरणों के माध्यम से बहुत ही प्रभावशाली ढंग से समझाया गया है कि व्यक्ति की संगति ही उसकी योग्यता और मूल्य का निर्धारण करती है।

संस्कृत श्लोक

सन्तप्तायसि संस्थितस्य पयसो नामापि न ज्ञायते
मुक्ताकारतया तदेव नलिनीपत्रस्थितं राजते ।
स्वात्यां सागरशुक्तिमध्यपतितं सन्मौक्तिकं जायते
प्रायेणोत्तममध्यमाधमदशा संसर्गतो जायते ॥

हिन्दी अनुवाद

तपे हुए लोहे पर पड़ी हुई पानी की बूंद का नाम-निशान भी नहीं बचता (वह तुरंत नष्ट हो जाती है), वही बूंद जब कमल के पत्ते पर गिरती है, तो मोती की तरह चमकने लगती है, और वही बूंद यदि स्वाति नक्षत्र में समुद्र की सीप के भीतर गिर जाए, तो स्वयं सच्चा मोती बन जाती है। वास्तव में, मनुष्य की अधम (बुरी), मध्यम या उत्तम (श्रेष्ठ) दशा संगति के कारण ही होती है।

English Translation

A drop of water falling on red-hot iron leaves no trace of its existence. The same drop, when it rests on a lotus leaf, shines like a pearl. And if it falls into an oyster in the sea during the Swati Nakshatra, it becomes an actual pearl. Generally, a person’s low, medium, or high status is determined by the company they keep.

विद्यां प्रशंसिनं एनं श्लोकं मन्ये बहवो जानन्ति ।

(I think many people know this verse that praises knowledge)

यह श्लोक 'विद्या' (ज्ञान) के महत्त्व को दुनिया के किसी भी अन्य धन से श्रेष्ठ सिद्ध करता है। यह हमारे शास्त्रों का एक बहुत ही व्यावहारिक और प्रेरक वचन है।

संस्कृत श्लोक

8. न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी । व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् ॥

हिन्दी अनुवाद

विद्या रूपी धन को न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है, न भाई इसे बाँट सकता है और न ही यह शरीर पर कोई भार (वजन) डालता है। यह एक ऐसा अद्भुत धन है जो खर्च करने पर सदा बढ़ता ही जाता है; इसीलिए 'विद्या-धन' सभी धनों में श्रेष्ठ और प्रधान है।

English Translation

Knowledge (Vidya) is a treasure that cannot be stolen by thieves, cannot be seized by kings, cannot be divided among brothers, and is not burdensome to carry. Unlike other wealth, it constantly increases as it is shared or spent. Truly, the wealth of knowledge is the supreme among all forms of wealth.


यह श्लोक महाभारत के वन पर्व से प्रेरित है और एकता की शक्ति का एक अद्भुत उदाहरण है। यह शब्द युधिष्ठिर के कहे माने जाते हैं, जब गंधर्वों ने दुर्योधन को बंदी बना लिया था और भीम उसे बचाने के पक्ष में नहीं थे।

इसका सरल अर्थ और संदर्भ नीचे दिया गया है:

श्लोक का अर्थ

9. "परस्परविरोधे च वयं पञ्च च ते शतं ।

अन्यैः साकं विरोधे तु वयं पञ्चाधिकं शतम् ॥"

परस्परविरोधे च: जब आपस में विवाद या मतभेद हो।

 वयं पञ्च च ते शतं: तब हम (पांडव) पाँच हैं और वे (कौरव) सौ हैं।

अन्यैः साकं विरोधे तु: लेकिन जब किसी बाहरी शत्रु से मुकाबला हो।

 वयं पञ्चाधिकं शतम्: तब हम सब मिलकर एक सौ पांच (105) हैं।

प्रमुख संदेश

यह श्लोक हमें पारिवारिक और राष्ट्रीय एकता का पाठ पढ़ाता है:

आंतरिक मतभेद गौण हैं: परिवार या समूह के भीतर वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन बाहरी संकट के समय उन मतभेदों को भूल जाना चाहिए।

सामूहिक शक्ति: जब कोई बाहरी शक्ति हमला करती है, तो व्यक्तिगत कलह को त्यागकर एक होना ही बुद्धिमानी है।

 युधिष्ठिर की नैतिकता: यह श्लोक युधिष्ठिर की उस उदारता को दर्शाता है जहाँ उन्होंने शत्रुता के बावजूद दुर्योधन को अपने परिवार का हिस्सा माना और उसकी रक्षा को अपना धर्म समझा।

आज के संदर्भ में महत्व

आज भी यह सूक्ति राजनीति, खेल और टीम मैनेजमेंट में उतनी ही प्रासंगिक है। "घर की बात घर में", लेकिन दुनिया के सामने हम सब एक हैं।

When in combat against each other we are 5 and they are hundred. But when against others, we are a hundred and five. (obviously refers to Kauravas and Pandavas. I believe this is supposed to be said by Dharma.)


यह श्लोक जीवन के दो सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं—सांसारिक उन्नति (विद्या और धन) और आध्यात्मिक कर्तव्य (धर्म)—के बीच संतुलन बनाने का एक अद्भुत मार्गदर्शक है।

इसका विस्तार से अर्थ यहाँ दिया गया है:

श्लोक का अर्थ

10."अजरामरवत्प्राज्ञो विद्यामर्थं च साधयेत् ।

गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥"

अजरामरवत्प्राज्ञो: एक बुद्धिमान व्यक्ति को स्वयं को 'अजर' (जो कभी बूढ़ा न हो) और 'अमर' (जिसकी मृत्यु न हो) मानकर व्यवहार करना चाहिए।

विद्यामर्थं च साधयेत्: और इसी भाव के साथ उसे 'विद्या' (ज्ञान) और 'अर्थ' (धन) अर्जित करने का प्रयास करना चाहिए।

गृहीत इव केशेषु मृत्युना: लेकिन जब 'धर्म' के पालन की बात आए, तो यह समझना चाहिए कि 'मृत्यु' ने हमारे बाल पकड़ रखे हैं (अर्थात मृत्यु कभी भी आ सकती है)।

धर्ममाचरेत्: इसलिए बिना समय गंवाए तुरंत धर्म का आचरण करना चाहिए।

प्रमुख विश्लेषण (Insight)

 ज्ञान और धन के लिए दीर्घकालिक दृष्टि: अक्सर लोग यह सोचकर सीखना या कमाना छोड़ देते हैं कि "अब तो उम्र हो गई है" या "पता नहीं कल क्या होगा।" यह श्लोक कहता है कि ज्ञान और धन के मामले में अपनी ऊर्जा कभी कम न होने दें। हमेशा ऐसे सीखें जैसे आपके पास अनंत समय है।

 धर्म के लिए तात्कालिकता (Urgency): अध्यात्म और अच्छे कर्मों के मामले में हम अक्सर 'कल' पर टाल देते हैं। यहाँ चेतावनी दी गई है कि मृत्यु का कोई भरोसा नहीं है। धर्म के मार्ग पर चलने के लिए कल का इंतज़ार न करें, बल्कि उसे अभी इसी क्षण जिएं।

निष्कर्ष

यह श्लोक हमें सिखाता है कि सीखने और कमाने के लिए भविष्य की बड़ी योजनाएं रखें (Long-term planning), लेकिन नेक काम और धर्म के लिए आज और अभी का भाव रखें (Immediate action)।

The wise man acquires knowladge and wealth as if he is never going to die. And he practices relegion as if he is tightly held in his hair by death.

अधिकमेकं मन्ये कालिदसेन रचितं

Here's another one I believe accredited to Kalidas

यह श्लोक संस्कृत साहित्य के श्रृंगार रस का एक अत्यंत सुंदर और प्रसिद्ध उदाहरण है। इसमें कवि ने नायिका के सौंदर्य का वर्णन करने के लिए बहुत ही चतुर और तार्किक उपमा का प्रयोग किया है।

इसे अक्सर 'कालिदास' के नाम से भी जोड़ा जाता है (भोजप्रबंध की कथाओं में), जहाँ राजा भोज विद्वानों की परीक्षा लेते थे।

श्लोक का अर्थ

11."कमले कमलोत्पत्तिः श्रूयते न तु दृश्यते ।

बाले तव मुखाम्भोजे कथमिन्दीवरद्वयम् ॥"

कमले कमलोत्पत्तिः श्रूयते न तु दृश्यते: (आज तक) केवल सुना गया है कि कमल से कमल की उत्पत्ति होती है, लेकिन कभी देखा नहीं गया (प्रकृति में एक कमल के ऊपर दूसरा कमल नहीं खिलता)।

 बाले तव मुखाम्भोजे: हे सुंदरी! तुम्हारे इस मुख-रूपी कमल (मुखाम्भोज) पर...

 कथमिन्दीवरद्वयम्: ...ये दो नील-कमल (इन्दीवरद्वयम् अर्थात् तुम्हारी दो आँखें) कैसे खिल रहे हैं?

The birth of one lotus on another has neither been seen nor heard of.  Little girl, how is it that on your lotus face there are these two    lotuses ? (here yes)

One more subhashitam that starts with kamale''


यह श्लोक संस्कृत के हास्य रस (Humor) का एक बहुत ही मजेदार और चतुर उदाहरण है। इसमें देवी-देवताओं के निवास स्थानों के पीछे एक बहुत ही मानवीय और मजाकिया तर्क दिया गया है।

श्लोक का अर्थ

"कमले कमला शेते हरषेते हिमालये ।

क्षीराब्धौ च हरिषेते मन्ये मत्कुण शन्कय। ॥"

 कमले कमला शेते: (देवी) लक्ष्मी कमल के फूल पर सोती हैं।

हरषेते हिमालये: और हर (भगवान शिव) ठंडे हिमालय पर्वत पर सोते हैं।

 क्षीराब्धौ च हरिषेते: और हरि (भगवान विष्णु) क्षीर-सागर (दूध के समुद्र) में सोते हैं।

 मन्ये मत्कुण शन्कय: मुझे ऐसा लगता है कि ये सब 'मत्कुण' (खटमल) के डर से वहां जाकर सोते हैं!

प्रमुख विश्लेषण (Insight)

 हास्य का पुट: प्राचीन समय में खटमल एक बड़ी समस्या हुआ करते थे, जो बिस्तर में छिपकर चैन से सोने नहीं देते थे। कवि यहाँ मज़क कर रहा है कि भगवानों ने भी अपने रहने के लिए ऐसी जगहें चुनीं जहाँ खटमल न पहुँच सकें:

 कमल: पानी में होने के कारण वहां खटमल नहीं जा सकते।

 हिमालय: बहुत अधिक ठंड में खटमल जीवित नहीं रह सकते।

 क्षीर-सागर: समुद्र के बीचों-बीच पानी/दूध में खटमल का होना असंभव है।

 मानवीय दृष्टिकोण: यह श्लोक देवताओं को हमारे करीब लाता है, जैसे कि उन्हें भी साधारण मनुष्यों की तरह रोजमर्रा की छोटी-छोटी समस्याओं (जैसे खटमल) का सामना करना पड़ता हो।

On the lotus sits Goddess KamalA (LakShmi), Hara (Lord Shiva) resides in the Himalayas. In the vortex of the churning ocean resides Hari (Lord VishNu), I know this precisely.

 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ