Atharvaveda kand 5 Sukta 13 hindi english explanation
byGVB-
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भूमिका
इस मंत्र में ऋषि **वरुण की कृपा, वाणी की शक्ति और विष के पूर्ण नाश** का वर्णन करते हैं।
यह दर्शाता है कि दिव्य ज्ञान और प्रबल वाणी के माध्यम से विष (हानिकारक तत्व) को समाप्त किया जा सकता है।
- “ददिः हि मह्यं वरुणः” – वरुण देव ने मुझे यह शक्ति प्रदान की है
- “दिवः कविः” – दिव्य ज्ञान से युक्त
- “वचोभिः उग्रैः” – प्रबल वाणी द्वारा
- “नि रिणामि ते विषम्” – मैं तेरे विष का नाश करता हूँ
- “खातम् अखातम् उत सक्तम्” – चाहे वह छिपा हो, खुला हो या चिपका हुआ हो
- “अग्रभम्” – मैं उसे पकड़ लेता हूँ
- “नि जजास ते विषम्” – और उसे पूरी तरह नष्ट कर देता हूँ
यह मंत्र **दिव्य ज्ञान, वाणी और शक्ति से नकारात्मकता के पूर्ण नाश** का संदेश देता है।
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शब्दार्थ
- **ददिः** – दिया है
- **मह्यम्** – मुझे
- **वरुणः** – न्याय और नियम के देवता
- **दिवः कविः** – दिव्य ज्ञान वाला
- **वचोभिः उग्रैः** – प्रबल वाणी से
- **नि रिणामि** – नष्ट करता हूँ
- **ते विषम्** – तेरा विष
- **खातम्** – गड़ा हुआ, छिपा
- **अखातम्** – खुला हुआ
- **सक्तम्** – चिपका हुआ
- **अग्रभम्** – पकड़ता हूँ
- **नि जजास** – पूर्णतः नष्ट करता हूँ
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सरल अर्थ
वरुण देव ने मुझे यह शक्ति दी है कि मैं
प्रबल वाणी और ज्ञान के द्वारा तेरे विष को नष्ट कर सकूँ।
चाहे वह विष छिपा हुआ हो, खुला हो या कहीं चिपका हुआ हो,
मैं उसे पकड़कर पूरी तरह समाप्त कर देता हूँ।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ **वरुण** – सत्य और न्याय का प्रतीक
✔ **वाणी** – शक्ति और साधन
✔ **विष** – नकारात्मकता और अज्ञान
✔ **नाश** – शुद्धि और मुक्ति
यह मंत्र सिखाता है कि **दिव्य ज्ञान और सत्य वाणी से सभी नकारात्मकता समाप्त हो जाती है।**
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दार्शनिक संकेत
- ज्ञान सबसे बड़ी शक्ति है।
- समस्या चाहे छिपी हो या स्पष्ट, उसका समाधान संभव है।
- सत्य और न्याय जीवन को शुद्ध करते हैं।
- पूर्ण जागरूकता से ही वास्तविक मुक्ति मिलती है।
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योगिक व्याख्या
- **विष** = मानसिक विकार
- **वाणी** = मंत्र और जप
- **वरुण** = आंतरिक संतुलन
- **नाश** = चित्त शुद्धि
जब साधक मंत्र और ध्यान का अभ्यास करता है,
तो वह **अपने भीतर के सभी विकारों को पहचानकर समाप्त कर देता है।**
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वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टि
- **विष** = विभिन्न रूपों में (छिपा, खुला, चिपका)
- **नियंत्रण** = पहचान और उपचार
- **ज्ञान** = सुरक्षा और समाधान
यह मंत्र संकेत करता है कि **हर प्रकार के खतरे को पहचानकर ही उसे समाप्त किया जा सकता है।**
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समग्र निष्कर्ष
✔ ज्ञान और वाणी में शक्ति होती है।
✔ हर प्रकार का विष (नकारात्मकता) समाप्त किया जा सकता है।
✔ जागरूकता और सत्य जीवन को शुद्ध बनाते हैं।
✔ संतुलन और ज्ञान से मुक्ति संभव है।
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English Insight
Empowered by Varuna, the wise divine,
I destroy your poison with mighty words.
Hidden, exposed, or clinging—
I seize and neutralize it completely.
भूमिका
इस मंत्र में ऋषि **विष (नकारात्मकता), शुद्धि और संतुलन** का गूढ़ वर्णन करते हैं।
यह मंत्र दर्शाता है कि जीवन में उपस्थित विष (हानिकारक तत्व) को पहचानकर
उसे नियंत्रित और निष्क्रिय करना आवश्यक है।
- “यत् ते अपोदकं विषम्” – जो जलरहित या सूक्ष्म रूप में उपस्थित विष है।
- “तत् ते एतासु अग्रभम्” – उसे मैं इन माध्यमों से पकड़ता/नियंत्रित करता हूँ।
- “गृह्णामि ते मध्यमम् उत्तमम् रसम्” – मैं उसके मध्य और श्रेष्ठ तत्व को ग्रहण करता हूँ।
- “उत अवमम्” – और निम्न तत्व को भी नियंत्रित करता हूँ।
- “भियसा नेशत् आदु ते” – भय या नियंत्रण से वह हानि नहीं पहुँचाता।
यह मंत्र **विष को पहचानने, उसे नियंत्रित करने और सकारात्मक तत्व को ग्रहण करने** का संदेश देता है।
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शब्दार्थ
- **यत् ते** – जो तुम्हारा
- **अपोदकम्** – जलरहित, सूक्ष्म
- **विषम्** – विष, हानिकारक तत्व
- **तत् एतासु अग्रभम्** – उसे यहाँ पकड़ता हूँ
- **गृह्णामि** – ग्रहण करता हूँ
- **ते मध्यमम्** – उसका मध्य भाग
- **उत्तमम् रसम्** – श्रेष्ठ सार
- **उत अवमम्** – और निम्न भाग
- **भियसा** – भय या नियंत्रण से
- **नेशत्** – नष्ट या निष्क्रिय होता है
- **आदु ते** – तुम्हें हानि नहीं पहुँचाता
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सरल अर्थ
जो भी विष तुम्हारे भीतर या आसपास है,
मैं उसे नियंत्रित करता हूँ।
उसके अच्छे और उपयोगी तत्व को ग्रहण करता हूँ
और हानिकारक भाग को निष्क्रिय कर देता हूँ,
ताकि वह तुम्हें नुकसान न पहुँचा सके।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ **विष** – नकारात्मक विचार, भावनाएँ
✔ **रस** – जीवन का सार, सकारात्मक ऊर्जा
✔ **नियंत्रण** – आत्मसंयम
✔ **शुद्धि** – आंतरिक और बाहरी शुद्धिकरण
यह मंत्र सिखाता है कि **नकारात्मकता को हटाकर केवल सकारात्मक तत्व को ग्रहण करना ही बुद्धिमत्ता है।**
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दार्शनिक संकेत
- हर चीज में अच्छा और बुरा दोनों होते हैं।
- बुद्धिमान व्यक्ति अच्छे को ग्रहण करता है और बुरे को त्याग देता है।
- आत्मसंयम और विवेक जीवन को सुरक्षित और सफल बनाते हैं।
- नकारात्मकता को नियंत्रित करना ही विकास का मार्ग है।
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योगिक व्याख्या
- **विष** = मानसिक विकार (क्रोध, भय, ईर्ष्या)
- **रस** = प्राण ऊर्जा
- **नियंत्रण** = ध्यान और साधना
- **शुद्धि** = चित्त की शुद्धि
जब साधक ध्यान के माध्यम से अपने मन को नियंत्रित करता है,
तो वह **नकारात्मक ऊर्जा को हटाकर सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है।**
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वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टि
- **विष** = शरीर में विषैले तत्व (toxins)
- **शुद्धि** = शरीर की detox प्रक्रिया
- **संतुलन** = स्वास्थ्य का आधार
यह मंत्र संकेत करता है कि **शरीर और मन की शुद्धि से ही स्वास्थ्य और संतुलन संभव है।**
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समग्र निष्कर्ष
✔ विष (नकारात्मकता) को पहचानना और नियंत्रित करना आवश्यक है।
✔ अच्छे तत्व को ग्रहण करना और बुरे को त्यागना बुद्धिमत्ता है।
✔ आत्मसंयम और शुद्धि जीवन को सुरक्षित और उन्नत बनाते हैं।
✔ संतुलन और विवेक से ही सफलता प्राप्त होती है।
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English Insight
I seize the poison within you,
extracting its essence—high, middle, and low.
The harmful is subdued and rendered powerless,
so it may not cause any harm.
भूमिका
इस मंत्र में ऋषि **वाणी की शक्ति, अज्ञान (तमस) से मुक्ति और प्रकाश (ज्ञान)** की ओर उन्नति का वर्णन करते हैं।
यह मंत्र अत्यंत प्रेरणादायक है, जो बताता है कि सत्य और प्रबल वाणी से अंधकार का नाश होता है।
- “वृषा मे रवः” – मेरी वाणी शक्तिशाली और प्रभावशाली हो।
- “नभसा न तन्यतु” – आकाश में गूँजती हुई गर्जना के समान।
- “उग्रेण ते वचसा बाध” – तेरी उग्र वाणी से बाधाओं का नाश हो।
- “अहं तमस्य नृभिः अग्रभं रसम्” – मैं अंधकार के सार को पकड़ता हूँ।
- “तमस इव ज्योतिः उदेतु सूर्यः” – जैसे अंधकार से सूर्य का प्रकाश उदित होता है।
यह मंत्र **अज्ञान से ज्ञान की ओर, और अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने** का संदेश देता है।
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शब्दार्थ
- **वृषा** – शक्तिशाली, बलवान
- **मे रवः** – मेरी ध्वनि/वाणी
- **नभसा** – आकाश में
- **न तन्यतु** – गूँजे, गर्जे
- **उग्रेण वचसा** – प्रबल वाणी से
- **बाध** – बाधाओं का नाश
- **आदु ते** – दूर हो जाए
- **अहम्** – मैं
- **तमस्य** – अंधकार का
- **नृभिः** – पुरुषों/साधकों द्वारा
- **अग्रभम् रसम्** – सार को ग्रहण करता हूँ
- **तमस इव** – अंधकार के समान
- **ज्योतिः उदेतु** – प्रकाश उदित हो
- **सूर्यः** – सूर्य, ज्ञान का प्रतीक
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सरल अर्थ
मेरी वाणी आकाश में गूँजने वाली गर्जना के समान शक्तिशाली हो,
जो बाधाओं को दूर कर दे।
मैं अंधकार के सार को पकड़कर उसे समाप्त करता हूँ,
और जैसे सूर्य अंधकार को हटाकर प्रकाश लाता है,
वैसे ही ज्ञान का प्रकाश प्रकट हो।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ **वाणी (वच)** – सत्य और शक्ति का माध्यम
✔ **तमस** – अज्ञान, भ्रम
✔ **ज्योति** – ज्ञान, जागृति
✔ **सूर्य** – आत्मज्ञान का प्रतीक
यह मंत्र सिखाता है कि **सत्य वाणी और ज्ञान से अज्ञान का अंधकार समाप्त होता है।**
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दार्शनिक संकेत
- वाणी में अपार शक्ति होती है।
- अज्ञान को समझकर ही उसे दूर किया जा सकता है।
- प्रकाश (ज्ञान) हमेशा अंधकार (अज्ञान) पर विजय प्राप्त करता है।
- आत्मविश्वास और सत्य जीवन को उन्नत बनाते हैं।
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योगिक व्याख्या
- **वाणी** = विशुद्धि चक्र की शक्ति
- **तमस** = मानसिक अंधकार
- **ज्योति** = ध्यान से प्राप्त ज्ञान
- **सूर्य** = सहस्रार की चेतना
जब साधक ध्यान और सत्य वाणी का अभ्यास करता है,
तो वह **अज्ञान से मुक्त होकर प्रकाशमय चेतना** को प्राप्त करता है।
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वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टि
- **ध्वनि (वाणी)** = ऊर्जा और कंपन
- **अंधकार से प्रकाश** = ज्ञान और समझ का विकास
- **सूर्य** = जीवन और ऊर्जा का स्रोत
यह मंत्र संकेत करता है कि **ज्ञान और सकारात्मक ऊर्जा से ही जीवन में प्रगति संभव है।**
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समग्र निष्कर्ष
✔ वाणी में शक्ति होती है जो बाधाओं को दूर कर सकती है।
✔ अज्ञान को समझकर उसे समाप्त करना आवश्यक है।
✔ ज्ञान का प्रकाश जीवन को उन्नत बनाता है।
✔ सत्य और आत्मविश्वास सफलता की कुंजी हैं।
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English Insight
Let my voice thunder like the sky,
driving away all obstacles with power.
I seize the essence of darkness,
and like the rising sun,
let light emerge and conquer all ignorance.
भूमिका
इस मंत्र में ऋषि **विष (हानिकारक शक्ति) के नाश, रक्षा और प्रतिकार** का वर्णन करते हैं।
यह मंत्र विशेष रूप से **सुरक्षा और नकारात्मक शक्तियों के विनाश** के लिए प्रयोग किया जाता है।
- “चक्षुषा ते चक्षुः हन्मि” – मैं तेरी दृष्टि (हानिकारक प्रभाव) को नष्ट करता हूँ।
- “विषेण हन्मि ते विषम्” – विष को उसी विष से नष्ट करता हूँ।
- “अहे म्रियस्व मा जीवीः” – हे विषैले तत्व! तू नष्ट हो, जीवित न रहे।
- “प्रत्यग् अभ्येतु त्वा विषम्” – तेरा विष तुझ पर ही लौट आए।
यह मंत्र **नकारात्मकता को उसी की शक्ति से समाप्त करने** का सिद्धांत दर्शाता है।
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शब्दार्थ
- **चक्षुषा** – दृष्टि से
- **ते चक्षुः** – तेरी दृष्टि
- **हन्मि** – नष्ट करता हूँ
- **विषेण** – विष द्वारा
- **ते विषम्** – तेरा विष
- **अहे** – हे (सर्प/विष का संबोधन)
- **म्रियस्व** – मर जा
- **मा जीवीः** – जीवित न रह
- **प्रत्यग् अभ्येतु** – वापस लौट आए
- **त्वा विषम्** – तेरा विष तुझ पर
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सरल अर्थ
मैं तेरी हानिकारक दृष्टि को नष्ट करता हूँ
और तेरे विष को उसी विष से समाप्त करता हूँ।
हे विषैले तत्व! तू नष्ट हो जाए
और तेरा विष तुझ पर ही लौट आए।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ **विष** – नकारात्मक विचार, बुरी ऊर्जा
✔ **दृष्टि** – मानसिक प्रभाव
✔ **प्रतिकार** – आत्मरक्षा
✔ **वापसी (प्रत्यग्)** – कर्म का सिद्धांत
यह मंत्र सिखाता है कि **नकारात्मकता को उसी की शक्ति से समाप्त किया जा सकता है।**
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दार्शनिक संकेत
- हर नकारात्मकता का समाधान उसके भीतर ही छिपा होता है।
- आत्मरक्षा और संतुलन जीवन के लिए आवश्यक हैं।
- कर्म का नियम — जो भेजा जाता है, वही लौटता है।
- शक्ति का सही उपयोग सुरक्षा प्रदान करता है।
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योगिक व्याख्या
- **विष** = मानसिक विकार
- **चक्षु** = ध्यान और जागरूकता
- **प्रतिकार** = आत्मसंयम
- **वापसी** = ऊर्जा का संतुलन
जब साधक जागरूकता और ध्यान का उपयोग करता है,
तो वह **नकारात्मक ऊर्जा को वापस कर देता है और स्वयं सुरक्षित रहता है।**
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वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टि
- **विष से विष का नाश** = चिकित्सा सिद्धांत (Antidote)
- **ऊर्जा संतुलन** = शरीर की रक्षा प्रणाली
- **प्रतिकार** = सुरक्षा और प्रतिरोध
यह मंत्र संकेत करता है कि **प्राकृतिक और वैज्ञानिक रूप से भी हर विष का एक प्रतिकार होता है।**
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समग्र निष्कर्ष
✔ विष (नकारात्मकता) को समाप्त करना आवश्यक है।
✔ हर समस्या का समाधान उसके भीतर होता है।
✔ आत्मरक्षा और जागरूकता जीवन के लिए जरूरी हैं।
✔ कर्म और ऊर्जा का संतुलन जीवन को सुरक्षित बनाता है।
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English Insight
With sight, I destroy your sight;
with poison, I neutralize your poison.
O harmful force, perish and do not live—
let your own poison return upon you.
भूमिका
इस मंत्र में ऋषि **विषैले जीवों (सर्प आदि) को शांत करने और उनसे सुरक्षा की प्रार्थना** करते हैं।
यह मंत्र प्रकृति की शक्तियों को संबोधित करते हुए उनसे अनुरोध करता है कि वे हानि न पहुँचाएँ।
- “कैरात पृश्न … बभ्र” – विभिन्न प्रकार के विषैले प्राणी (सर्प आदि)
- “आ मे शृणुत” – मेरी बात सुनो
- “असिता अलीकाः” – काले और अन्य प्रकार के जीव
- “मा मे सख्युः स्तामानम्” – मेरे मित्रों या प्रियजनों को हानि न पहुँचाओ
- “नि विषे रमध्वम्” – अपने विष को शांत करो, उसे निष्क्रिय कर दो
यह मंत्र **प्रकृति के साथ संतुलन और अहिंसक सह-अस्तित्व** का संदेश देता है।
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शब्दार्थ
- **कैरात, पृश्न, बभ्र** – विभिन्न प्रकार के सर्प/विषैले जीव
- **उपतृण्य** – समीप रहने वाले
- **आ मे शृणुत** – मेरी बात सुनो
- **असिता** – काले रंग के
- **अलीकाः** – अन्य प्रकार के जीव
- **मा** – मत
- **मे सख्युः** – मेरे मित्रों को
- **स्तामानम्** – हानि, आघात
- **अपि ष्ठात** – बिल्कुल भी नहीं
- **आश्रावयन्तः** – सुनते हुए
- **नि विषे रमध्वम्** – अपने विष को शांत करो
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सरल अर्थ
हे विभिन्न प्रकार के विषैले जीवों!
मेरी बात सुनो और हमारे पास शांत रहो।
मेरे मित्रों या प्रियजनों को कोई हानि न पहुँचाओ,
और अपने विष को निष्क्रिय कर दो।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ **सर्प/विषैले जीव** – नकारात्मक शक्तियाँ या भय
✔ **शांति का आह्वान** – संतुलन और नियंत्रण
✔ **सख्य (मित्र)** – अपने प्रियजन और समाज
✔ **विष का शांत होना** – नकारात्मकता का समाप्त होना
यह मंत्र सिखाता है कि **प्रार्थना, शांति और संतुलन से ही भय और नकारात्मकता पर विजय पाई जा सकती है।**
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दार्शनिक संकेत
- प्रकृति के साथ सामंजस्य आवश्यक है।
- हिंसा के बजाय शांति और संवाद अधिक प्रभावी हैं।
- नकारात्मक शक्तियों को नियंत्रित किया जा सकता है।
- सामूहिक सुरक्षा और कल्याण महत्वपूर्ण है।
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योगिक व्याख्या
- **विषैले जीव** = मन के विकार
- **शांति का आह्वान** = ध्यान और संतुलन
- **विष का शांत होना** = मानसिक शुद्धि
जब साधक अपने मन को शांत करता है,
तो उसके भीतर की नकारात्मकता भी शांत हो जाती है।
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वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टि
- **सह-अस्तित्व** = प्रकृति के साथ संतुलन
- **विष नियंत्रण** = सुरक्षा और सावधानी
- **शांति** = मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य
यह मंत्र संकेत करता है कि **प्रकृति के साथ संतुलित संबंध ही सुरक्षा और शांति का आधार है।**
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समग्र निष्कर्ष
✔ प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
✔ शांति और प्रार्थना से भय कम होता है।
✔ नकारात्मक शक्तियों को नियंत्रित किया जा सकता है।
✔ सामूहिक सुरक्षा और कल्याण सर्वोपरि है।
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English Insight
O serpents and hidden creatures, hear my call.
Do not harm my companions or प्रिय ones.
Remain calm and withdraw your poison,
dwelling in peace without causing harm.
भूमिका
इस मंत्र में ऋषि **विभिन्न प्रकार के विष (सर्प) और क्रोध (मन्यु) को शांत करने** का वर्णन करते हैं।
यह मंत्र न केवल बाहरी विष, बल्कि आंतरिक क्रोध और तनाव को भी नियंत्रित करने का संकेत देता है।
- “असितस्य … बभ्रोर अपोदकस्य” – काले, तैमात (विशेष प्रकार) और अन्य विषैले जीव
- “सात्रासाहस्य” – जो भय उत्पन्न करते हैं
- “अहं मन्योः अव” – मैं क्रोध को दूर करता हूँ
- “ज्याम् इव धन्वनः वि मुञ्चामि” – जैसे धनुष की डोरी ढीली कर दी जाती है
- “रथामिव” – जैसे रथ को मुक्त कर दिया जाता है
यह मंत्र **विष और क्रोध से मुक्ति, शांति और संतुलन** का गहरा संदेश देता है।
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शब्दार्थ
- **असितस्य** – काले (सर्प/विष) का
- **तैमातस्य** – एक प्रकार का विषैला जीव
- **बभ्रोः** – भूरे रंग का
- **अपोदकस्य** – सूक्ष्म/जलरहित विष
- **सात्रासाहस्य** – भय उत्पन्न करने वाला
- **अहम्** – मैं
- **मन्योः** – क्रोध का
- **अव** – दूर करता हूँ
- **ज्याम् इव** – डोरी के समान
- **धन्वनः** – धनुष की
- **वि मुञ्चामि** – खोल देता हूँ, मुक्त करता हूँ
- **रथामिव** – रथ के समान
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सरल अर्थ
मैं विभिन्न प्रकार के विष और भय उत्पन्न करने वाली शक्तियों को शांत करता हूँ।
मैं क्रोध को इस प्रकार दूर करता हूँ
जैसे धनुष की डोरी को ढीला कर दिया जाता है
या रथ को मुक्त कर दिया जाता है।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ **विष** – नकारात्मकता और भय
✔ **मन्यु (क्रोध)** – आंतरिक अशांति
✔ **मुक्ति** – शांति और संतुलन
✔ **धनुष की डोरी** – तनाव और दबाव
यह मंत्र सिखाता है कि **क्रोध और तनाव को छोड़ना ही शांति का मार्ग है।**
---
दार्शनिक संकेत
- क्रोध और भय जीवन में बाधा उत्पन्न करते हैं।
- उन्हें नियंत्रित करना आवश्यक है।
- मुक्ति का अर्थ है तनाव और नकारात्मकता से छुटकारा।
- संतुलन और शांति ही सच्ची शक्ति है।
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योगिक व्याख्या
- **विष** = मानसिक विकार
- **मन्यु** = क्रोध ऊर्जा
- **डोरी ढीली करना** = तनाव मुक्त करना
- **मुक्ति** = ध्यान और विश्राम
जब साधक ध्यान करता है,
तो वह अपने भीतर के तनाव और क्रोध को **धीरे-धीरे मुक्त** करता है।
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वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टि
- **तनाव (Stress)** = शरीर और मन पर दबाव
- **रिलीज (Release)** = मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक
- **नियंत्रण** = संतुलित जीवन
यह मंत्र संकेत करता है कि **तनाव और क्रोध को नियंत्रित करके ही स्वास्थ्य और शांति प्राप्त होती है।**
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समग्र निष्कर्ष
✔ विष और भय को नियंत्रित करना आवश्यक है।
✔ क्रोध को छोड़ना शांति का मार्ग है।
✔ तनाव से मुक्ति जीवन को संतुलित बनाती है।
✔ शांति ही वास्तविक शक्ति है।
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English Insight
I release the venom and the fear it brings,
and let go of anger like loosening a bowstring.
As a chariot is freed to move forward,
so too is the mind released into peace.
भूमिका
इस मंत्र में ऋषि **विष (हानिकारक शक्तियों) की पूर्ण पहचान और उन पर नियंत्रण** का भाव व्यक्त करते हैं।
यह बताता है कि जब हम किसी नकारात्मक शक्ति को पूरी तरह समझ लेते हैं,
तो वह हमारे लिए हानिकारक नहीं रह जाती।
- “आलिगी च विलिगी च” – विष के विभिन्न रूप
- “पिता च माता च” – उनके मूल स्रोत
- “विद्म वः सर्वतः” – हम तुम्हें पूरी तरह जानते हैं
- “बन्ध्वरसाः” – तुम्हारे बंधन और प्रभाव
- “किं करिष्यथ” – तुम अब क्या कर सकते हो?
यह मंत्र **ज्ञान द्वारा भय और विष पर विजय** का संदेश देता है।
---
शब्दार्थ
- **आलिगी, विलिगी** – विष के भिन्न रूप
- **पिता** – मूल कारण
- **माता** – उत्पत्ति का स्रोत
- **विद्म** – हम जानते हैं
- **वः** – तुम्हें
- **सर्वतः** – हर ओर से, पूरी तरह
- **बन्धु-रसाः** – बंधन और प्रभाव
- **किं करिष्यथ** – क्या कर सकते हो
---
सरल अर्थ
हम तुम्हारे सभी रूपों और स्रोतों को जानते हैं।
तुम्हारे बंधन और प्रभाव को भी समझते हैं।
अब तुम हमारा क्या नुकसान कर सकते हो?
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ **विष** – नकारात्मकता और भय
✔ **ज्ञान (विद्म)** – जागरूकता और समझ
✔ **बंधन** – मानसिक सीमाएँ
✔ **विजय** – आत्मविश्वास और नियंत्रण
यह मंत्र सिखाता है कि **ज्ञान और जागरूकता से ही भय और नकारात्मकता पर विजय प्राप्त होती है।**
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दार्शनिक संकेत
- अज्ञान ही भय का कारण है।
- ज्ञान से भय समाप्त हो जाता है।
- समस्या को समझना ही समाधान का पहला कदम है।
- आत्मविश्वास से जीवन में सुरक्षा और स्थिरता आती है।
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योगिक व्याख्या
- **विष** = मन के विकार
- **ज्ञान** = ध्यान और जागरूकता
- **बंधन** = मानसिक अवरोध
- **मुक्ति** = आत्मबोध
जब साधक अपने मन को समझता है,
तो वह **नकारात्मकता से मुक्त होकर आत्मबल प्राप्त करता है।**
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वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टि
- **पहचान (Awareness)** = समस्या समाधान का आधार
- **ज्ञान** = सुरक्षा और नियंत्रण
- **मनोविज्ञान** = भय का नाश
यह मंत्र संकेत करता है कि **ज्ञान और समझ से ही किसी भी खतरे को नियंत्रित किया जा सकता है।**
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समग्र निष्कर्ष
✔ ज्ञान से भय समाप्त होता है।
✔ नकारात्मकता को समझना आवश्यक है।
✔ आत्मविश्वास जीवन को सुरक्षित बनाता है।
✔ जागरूकता ही सबसे बड़ी शक्ति है।
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English Insight
We know you in all your forms and origins—
your roots, your bonds, your effects.
Now that you are understood,
what harm can you truly do?
भूमिका
इस मंत्र में ऋषि **विष की उत्पत्ति, उसके स्वरूप और उसके प्रभाव को समाप्त करने** का वर्णन करते हैं।
यह दर्शाता है कि विष विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न होता है,
और उसका प्रभाव समझकर उसे निष्क्रिय किया जा सकता है।
- “उरुगूलाया दुहिता जाता” – विष का जन्म एक विशेष स्रोत (उरुगूला) से हुआ है
- “दास्यसिक्न्या” – यह अंधकारमय या दासवत् प्रकृति से संबंधित है
- “प्रतङ्कं दद्रुषीणाम्” – यह पीड़ा और रोग उत्पन्न करता है
- “सर्वासाम् अरसं विषम्” – सभी प्रकार के विष का सार (प्रभाव)
यह मंत्र **विष के स्रोत को समझकर उसके प्रभाव को समाप्त करने** का संदेश देता है।
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शब्दार्थ
- **उरुगूलाया** – एक विशेष स्रोत/स्थान
- **दुहिता** – पुत्री, उत्पत्ति
- **जाता** – जन्मी
- **दास्यसिक्न्या** – अंधकारमय प्रकृति से संबंधित
- **प्रतङ्कम्** – पीड़ा, कष्ट
- **दद्रुषीणाम्** – रोग उत्पन्न करने वाला
- **सर्वासाम्** – सभी का
- **अरसम्** – सार, प्रभाव
- **विषम्** – विष, हानिकारक तत्व
---
सरल अर्थ
विष एक विशेष स्रोत से उत्पन्न होता है
और यह पीड़ा तथा रोग उत्पन्न करता है।
मैं उसके प्रभाव और सार को समझकर
उसे निष्क्रिय करता हूँ।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ **विष** – नकारात्मक विचार और भावनाएँ
✔ **उत्पत्ति** – अज्ञान या अंधकार
✔ **पीड़ा** – मानसिक और शारीरिक कष्ट
✔ **नाश** – जागरूकता और शुद्धि
यह मंत्र सिखाता है कि **नकारात्मकता के स्रोत को समझकर ही उसे समाप्त किया जा सकता है।**
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दार्शनिक संकेत
- हर समस्या का एक मूल कारण होता है।
- कारण को समझे बिना समाधान संभव नहीं।
- नकारात्मकता पीड़ा उत्पन्न करती है।
- ज्ञान और विवेक से मुक्ति संभव है।
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योगिक व्याख्या
- **विष** = मानसिक विकार
- **उत्पत्ति** = अवचेतन मन
- **पीड़ा** = तनाव और अशांति
- **शुद्धि** = ध्यान और साधना
जब साधक अपने मन के मूल कारणों को समझता है,
तो वह **पीड़ा और नकारात्मकता से मुक्त हो जाता है।**
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वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टि
- **विष** = रोग उत्पन्न करने वाले तत्व
- **उत्पत्ति** = संक्रमण या विषैले स्रोत
- **नियंत्रण** = चिकित्सा और जागरूकता
यह मंत्र संकेत करता है कि **रोग और विष को समझकर ही उसका उपचार संभव है।**
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समग्र निष्कर्ष
✔ विष के स्रोत को समझना आवश्यक है।
✔ नकारात्मकता पीड़ा का कारण है।
✔ ज्ञान और जागरूकता से मुक्ति संभव है।
✔ संतुलन और शुद्धि जीवन को स्वस्थ बनाते हैं।
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English Insight
Born from hidden origins,
this poison spreads pain and affliction.
By knowing its essence and source,
its power can be subdued and neutralized.
भूमिका
इस मंत्र में ऋषि **विष की विभिन्न उत्पत्तियों (प्राकृतिक, भूमिगत, पर्वतीय) और उसके प्रभाव को समझकर नष्ट करने** का वर्णन करते हैं।
यह बताता है कि विष केवल एक स्रोत से नहीं, बल्कि अनेक स्थानों से उत्पन्न हो सकता है।
- “कर्णा श्वावित् तद् अब्रवीत्” – ज्ञानी (या निरीक्षक) ने यह कहा
- “गिरेः अवचरन्तिका” – जो पर्वतों में विचरण करती हैं
- “याः काश्च इमाः खनित्रिमाः” – जो भूमिगत (खोदकर निकलने वाली) हैं
- “तासाम् अरसतमं विषम्” – उन सभी का विष सबसे प्रभावशाली है (जिसे समझना आवश्यक है)
यह मंत्र **विष के विभिन्न स्रोतों को पहचानकर उसके प्रभाव को समाप्त करने** का संदेश देता है।
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शब्दार्थ
- **कर्णा श्वावित्** – जानने वाला/ज्ञानी (प्रतीकात्मक)
- **अब्रवीत्** – कहा
- **गिरेः अवचरन्तिका** – पर्वतों में विचरण करने वाली
- **याः काश्च** – जो भी
- **इमाः** – ये
- **खनित्रिमाः** – भूमिगत, खुदाई से निकलने वाले
- **तासाम्** – उनका
- **अरसतमम्** – सार या प्रभाव
- **विषम्** – विष
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सरल अर्थ
ज्ञानी कहता है कि जो विषैले तत्व पर्वतों में या भूमिगत उत्पन्न होते हैं,
उन सभी के विष का प्रभाव समझना आवश्यक है,
ताकि उन्हें नियंत्रित और समाप्त किया जा सके।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ **विष के स्रोत** – बाहरी और आंतरिक नकारात्मकता
✔ **पर्वत/भूमिगत** – चेतन और अवचेतन मन
✔ **ज्ञान** – जागरूकता
✔ **नियंत्रण** – आत्मसंयम
यह मंत्र सिखाता है कि **नकारात्मकता कहीं भी छिपी हो सकती है, इसलिए पूर्ण जागरूकता आवश्यक है।**
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दार्शनिक संकेत
- समस्या के कई स्रोत हो सकते हैं।
- हर स्तर (ऊपरी और गहरे) पर समझ आवश्यक है।
- ज्ञान ही सुरक्षा का आधार है।
- छिपे हुए कारणों को पहचानना जरूरी है।
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योगिक व्याख्या
- **विष** = मन के विकार
- **पर्वत** = चेतन मन
- **भूमिगत** = अवचेतन मन
- **ज्ञान** = ध्यान और आत्मबोध
जब साधक अपने भीतर के गहरे स्तरों को समझता है,
तो वह **सभी प्रकार की नकारात्मकता से मुक्त हो सकता है।**
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वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टि
- **विष** = विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न (प्राकृतिक, रासायनिक)
- **भूमिगत तत्व** = खनिज या जीवाणु
- **समझ और नियंत्रण** = चिकित्सा और विज्ञान
यह मंत्र संकेत करता है कि **हर प्रकार के खतरे को समझना और उसका अध्ययन करना आवश्यक है।**
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समग्र निष्कर्ष
✔ विष के अनेक स्रोत हो सकते हैं।
✔ जागरूकता और ज्ञान आवश्यक हैं।
✔ छिपी हुई समस्याओं को पहचानना जरूरी है।
✔ संतुलन और समझ से ही सुरक्षा संभव है।
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English Insight
The wise declare that poisons arise
from mountains and hidden depths alike.
By understanding their source and essence,
their power can be restrained and overcome.
भूमिका
इस मंत्र में ऋषि **विष के पूर्ण निष्क्रियकरण (neutralization) और उसके प्रभाव को समाप्त करने** का अंतिम और निर्णायक विधान करते हैं।
यह सूक्त का समापन मंत्र है, जो यह घोषित करता है कि विष अब प्रभावहीन हो चुका है।
- “ताबुवं न ताबुवं” – तू अब वैसा नहीं रहा (तुझमें शक्ति नहीं रही)
- “घेत्त्वम् असि ताबुवम्” – तेरा प्रभाव समाप्त हो चुका है
- “ताबुवेन अरसं विषम्” – इस प्रक्रिया द्वारा विष का सार (शक्ति) नष्ट हो गया है
यह मंत्र **विष पर अंतिम विजय और पूर्ण शांति** का प्रतीक है।
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शब्दार्थ
- **ताबुवम्** – विष का प्रभाव/शक्ति
- **न ताबुवम्** – अब वह शक्ति नहीं रही
- **घेत्त्वम् असि** – तू नष्ट हो गया है
- **अरसम्** – सारहीन, प्रभावहीन
- **विषम्** – विष
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सरल अर्थ
हे विष! अब तू वैसा नहीं रहा,
तेरी शक्ति समाप्त हो चुकी है।
तू अब प्रभावहीन और निष्क्रिय हो गया है।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ **विष** – नकारात्मकता, भय, अज्ञान
✔ **निष्क्रियता** – उसका पूर्ण अंत
✔ **शांति** – अंतिम अवस्था
✔ **विजय** – आत्मबल और ज्ञान
यह मंत्र सिखाता है कि **ज्ञान, जागरूकता और नियंत्रण के बाद नकारात्मकता पूरी तरह समाप्त हो जाती है।**
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दार्शनिक संकेत
- हर समस्या का अंत संभव है।
- निरंतर प्रयास से नकारात्मकता समाप्त होती है।
- अंतिम विजय शांति में बदल जाती है।
- आत्मविश्वास और ज्ञान सफलता का आधार हैं।
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योगिक व्याख्या
- **विष** = मानसिक विकार
- **निष्क्रियता** = चित्त की शुद्धि
- **शांति** = समाधि अवस्था
जब साधक निरंतर साधना करता है,
तो वह **अंततः सभी विकारों से मुक्त होकर शांति प्राप्त करता है।**
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वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टि
- **विष का निष्क्रियकरण** = उपचार और संतुलन
- **शरीर की प्रतिक्रिया** = रोग प्रतिरोध
- **अंतिम अवस्था** = स्वास्थ्य और स्थिरता
यह मंत्र संकेत करता है कि **हर विष का अंत संभव है और संतुलन पुनः स्थापित किया जा सकता है।**
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समग्र निष्कर्ष
✔ विष (नकारात्मकता) का पूर्ण अंत संभव है।
✔ ज्ञान और प्रयास से विजय प्राप्त होती है।
✔ शांति ही अंतिम लक्ष्य है।
✔ संतुलन और शुद्धि जीवन को पूर्ण बनाते हैं।
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English Insight
O poison, you are no longer what you were—
your power has faded away.
Now rendered essence-less and harmless,
you dissolve into nothingness.
भूमिका
यह मंत्र **विषनाश सूक्त** का एक और अंतिम चरण है,
जहाँ ऋषि विष के प्रभाव को पूरी तरह नकारते और समाप्त करते हैं।
- “तस्तुवं न तस्तुवं” – तू अब वैसा नहीं रहा
- “घेत्त्वम् असि तस्तुवम्” – तेरा प्रभाव समाप्त हो गया है
- “तस्तुवेन अरसं विषम्” – इस प्रक्रिया से विष का सार नष्ट हो गया है
यह मंत्र एक प्रकार का **दृढ़ संकल्प (affirmation)** है
जो यह घोषित करता है कि विष अब पूर्णतः निष्क्रिय हो चुका है।
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शब्दार्थ
- **तस्तुवम्** – विष का प्रभाव/शक्ति
- **न तस्तुवम्** – अब वह शक्ति नहीं रही
- **घेत्त्वम् असि** – तू नष्ट हो गया है
- **अरसम्** – सारहीन, प्रभावहीन
- **विषम्** – विष
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सरल अर्थ
हे विष! अब तू वैसा नहीं रहा,
तेरी शक्ति समाप्त हो चुकी है।
तू अब प्रभावहीन और निष्क्रिय हो गया है।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ **विष** – अज्ञान, भय, नकारात्मकता
✔ **निषेध** – उसका पूर्ण त्याग
✔ **शमन** – आंतरिक शांति
✔ **विजय** – आत्मबल
यह मंत्र सिखाता है कि **जब हम दृढ़ विश्वास से नकारात्मकता को नकारते हैं,
तो वह वास्तव में प्रभावहीन हो जाती है।**
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दार्शनिक संकेत
- नकारात्मकता का अंत संभव है।
- दृढ़ संकल्प (affirmation) एक शक्तिशाली साधन है।
- मन की शक्ति वास्तविकता को प्रभावित कर सकती है।
- अंतिम अवस्था शांति और संतुलन है।
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योगिक व्याख्या
- **विष** = मानसिक विकार
- **निषेध (नेति-नेति)** = असत्य का त्याग
- **शमन** = ध्यान और समाधि
जब साधक “यह नहीं है” (नेति-नेति) का अभ्यास करता है,
तो वह **असत्य और नकारात्मकता को पूरी तरह समाप्त कर देता है।**
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वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टि
- **मानसिक पुष्टि (affirmation)** = मनोवैज्ञानिक प्रभाव
- **निष्क्रियता** = रोग या विष का समाप्त होना
- **संतुलन** = स्वास्थ्य
यह मंत्र संकेत करता है कि **मानसिक शक्ति और विश्वास से भी उपचार संभव है।**
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समग्र निष्कर्ष
✔ विष (नकारात्मकता) का पूर्ण निषेध संभव है।
✔ दृढ़ संकल्प से परिवर्तन आता है।
✔ शांति और संतुलन अंतिम लक्ष्य हैं।
✔ आत्मविश्वास और ज्ञान से मुक्ति मिलती है।
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English Insight
O poison, you are no longer what you were—
your force has faded away.
By this resolve, your essence is gone,
and you stand powerless and undone.