दीना दीनमुखैः सदैव शिशुकैराकृष्टजीर्णाम्बरा
क्रोशद्भिः क्षुधितैर्निरन्नविधुरा दृश्या न चेद्गेहिनी।
याञ्चाभङ्गभयेन गद्गदगलत्त्रुट्यद्विलीनाक्षरं
को देहीति वदेत्स्वदग्धजठरस्यार्थे मनस्वी पुमान्॥ २१॥
पद-विच्छेद (Word Breakdown):
क्रोशद्भिः क्षुधितैर्निरन्नविधुरा दृश्या न चेद्गेहिनी।
याञ्चाभङ्गभयेन गद्गदगलत्त्रुट्यद्विलीनाक्षरं
को देहीति वदेत्स्वदग्धजठरस्यार्थे मनस्वी पुमान्॥ २१॥
| दीना/गेहिनी | दीन अवस्था वाली पत्नी |
| शिशुकैराकृष्टजीर्णाम्बरा | बच्चों द्वारा खींचे गए फटे वस्त्रों वाली |
| याञ्चाभङ्गभयेन | याचना (माँगने) के अस्वीकार होने के भय से |
| गद्गदगलत्त्रुट्यत् | गले में अटकते और टूटते हुए स्वर |
| स्वदग्धजठरस्यार्थे | अपने जलते हुए (भूखे) पेट के लिए |
यदि एक स्वाभिमानी पुरुष अपनी पत्नी को बच्चों की भूख और फटे वस्त्रों के कारण अत्यंत दीन अवस्था में न देखे, तो वह कभी भी अपने स्वयं के पेट की भूख शांत करने के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएगा। माँगने का विचार आते ही स्वाभिमानी व्यक्ति की वाणी कांपने लगती है।
English Translation & Analysis:
"What self-respecting man would ever say 'Give me' in a faltering, broken voice just for his own stomach, if he didn't see his wife miserable, without food, and in tattered clothes being pulled by hungry, crying children?"
Analysis: This shloka depicts the conflict between Atma-Samman (Self-Respect) and Kartavya (Duty). It highlights that begging is a state of utter helplessness, not a choice for a dignified soul.
अभिमतमहामानग्रन्थिप्रभेदपटीयसी
गुरुतरगुणग्रामाम्भोजस्फुटोज्ज्वलचन्द्रिका।
विपुलविलसल्लज्जावल्लीवितानकुठारिका
जठरपिठरी दुष्पूरेयं करोति विडम्बनम्॥ २२॥
गुरुतरगुणग्रामाम्भोजस्फुटोज्ज्वलचन्द्रिका।
विपुलविलसल्लज्जावल्लीवितानकुठारिका
जठरपिठरी दुष्पूरेयं करोति विडम्बनम्॥ २२॥
१. पद-विच्छेद (Word Breakdown)
अभिमत-महा-मान: प्रिय महान स्वाभिमान की गांठ।
कुठारिका: कुल्हाड़ी (जो लज्जा को काट देती है)।
जठर-पिठरी: पेट रूपी हंडिया (बर्तन)।
दुष्पूरेयं: जिसे भरना कठिन हो।
कुठारिका: कुल्हाड़ी (जो लज्जा को काट देती है)।
जठर-पिठरी: पेट रूपी हंडिया (बर्तन)।
दुष्पूरेयं: जिसे भरना कठिन हो।
२. हिंदी व्याख्या (Hindi Meaning)
यह पेट रूपी बर्तन जिसे भरना अत्यंत कठिन है, मनुष्य की बड़ी विडम्बना (मजाक) करता है। यह हमारे प्रिय आत्म-सम्मान की गांठ को खोल देता है, श्रेष्ठ गुणों रूपी कमलों को नष्ट कर देता है और लज्जा रूपी बेल को कुल्हाड़ी बनकर काट देता है। अर्थात् भूख मनुष्य से वह सब करवा लेती है जो वह सामान्यतः लज्जावश नहीं करता।
३. वैज्ञानिक विश्लेषण (Scientific Perspective)
जीव विज्ञान के अनुसार, भूख एक 'Primary Drive' है। जब शरीर में ग्लूकोज का स्तर गिरता है, तब मस्तिष्क का 'अमिग्डाला' और 'हाइपोथैलेमस' सक्रिय हो जाते हैं, जो सामाजिक नैतिकता (Social Ethics) पर अस्तित्व रक्षा (Survival) को प्राथमिकता देते हैं। भर्तृहरि का 'कुठारिका' (Axe) शब्द इसी Biological Override को दर्शाता है।
४. English Translation
"This stomach, a vessel so difficult to fill, mocks our existence. It expertly unties the knots of self-respect, destroys the lotus of high virtues like a chilling moonlight, and acts as an axe to the creeping vine of modesty."
पुण्ये ग्रामे वने वा महति सितपटच्छन्नपालिं कपालिं
ह्यादाय न्यायगर्भद्विजहुतहुतभुग्धूमधूम्रोपकण्ठे।
द्वारं द्वारं प्रविष्टो वरमुदरदरीपूरणाय क्षुधार्तो
मानी प्राणैः सनाथो न पुनरनुदिनं तुल्यकुल्येषु दीनः॥ २३॥
ह्यादाय न्यायगर्भद्विजहुतहुतभुग्धूमधूम्रोपकण्ठे।
द्वारं द्वारं प्रविष्टो वरमुदरदरीपूरणाय क्षुधार्तो
मानी प्राणैः सनाथो न पुनरनुदिनं तुल्यकुल्येषु दीनः॥ २३॥
१. पद-विच्छेद (Word Breakdown)
सितपटच्छन्नपालिं: सफेद वस्त्र से ढका हुआ किनारा।
कपालिं: भिक्षापात्र या खप्पर।
हुतभुग्धूम: यज्ञ की अग्नि का धुआं।
तुल्यकुल्येषु: अपने समान कुल या स्तर वाले लोगों में।
उदरदरी: पेट रूपी गुफा।
कपालिं: भिक्षापात्र या खप्पर।
हुतभुग्धूम: यज्ञ की अग्नि का धुआं।
तुल्यकुल्येषु: अपने समान कुल या स्तर वाले लोगों में।
उदरदरी: पेट रूपी गुफा।
२. हिंदी व्याख्या (Hindi Meaning)
भर्तृहरि कहते हैं कि भूख से व्याकुल स्वाभिमानी पुरुष के लिए यह श्रेष्ठ है कि वह किसी पवित्र स्थान पर जाकर, जहाँ यज्ञ का धुआं छाया हो, वहाँ द्वार-द्वार भिक्षा मांगकर अपना पेट भर ले। लेकिन, अपने ही समान स्तर वाले मित्रों या संबंधियों के सामने हाथ फैलाकर प्रतिदिन दीन (असहाय) बनकर जीना कतई उचित नहीं है। भिक्षा में व्यक्ति स्वतंत्र है, पर अपनों के सामने याचना में वह मानसिक दास बन जाता है।
३. वैज्ञानिक विश्लेषण (Scientific Perspective)
Psychological Freedom: मनोविज्ञान के अनुसार, परिचितों से सहायता मांगना व्यक्ति के 'Self-Esteem' को स्थायी चोट पहुँचाता है, जिससे 'Chronic Stress' पैदा होता है। इसके विपरीत, भिक्षावृत्ति (Bhikhsha) को प्राचीन भारत में 'अहंकार विसर्जन' की एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया माना गया है। यज्ञ के धुएं का उल्लेख वातावरण के Purification और Microbial control के वैज्ञानिक पक्ष को भी दर्शाता है।
४. English Translation
"For a man of dignity, it is superior to sustain his life by wandering door-to-door with a begging bowl in sacred precincts purified by sacrificial smoke, rather than living a miserable life of constant dependency and pleading before his own equals or relatives."
गङ्गातरङ्गकणशीकरशीतलानि
विद्याधराध्युषितचारुशिलातलानि।
स्थानानि किं हिमवतः प्रलयं गतानि
यत्सावमानपरपिण्डरता मनुष्याः॥ २४॥
विद्याधराध्युषितचारुशिलातलानि।
स्थानानि किं हिमवतः प्रलयं गतानि
यत्सावमानपरपिण्डरता मनुष्याः॥ २४॥
१. पद-विच्छेद (Word Breakdown)
शीकरशीतलानि: जल की बारीक बूंदों (फुआरे) से शीतल।
विद्याधराध्युषित: जहाँ देवगण या सिद्ध पुरुष रहते हों।
परपिण्डरता: दूसरों के दिए हुए टुकड़ों पर पलने वाले।
सावमान: अपमान के साथ (With humiliation)।
विद्याधराध्युषित: जहाँ देवगण या सिद्ध पुरुष रहते हों।
परपिण्डरता: दूसरों के दिए हुए टुकड़ों पर पलने वाले।
सावमान: अपमान के साथ (With humiliation)।
२. हिंदी व्याख्या (Hindi Meaning)
भर्तृहरि कहते हैं कि क्या हिमालय के वे स्थान नष्ट हो गए हैं जहाँ गंगा की लहरों की फुहारें शीतलता प्रदान करती हैं और जहाँ दिव्य सिद्ध पुरुष सुंदर शिलाओं पर निवास करते हैं? यदि वे स्थान अभी भी सुरक्षित हैं, तो फिर ये मनुष्य क्यों अपमानित होकर दूसरों की गुलामी कर रहे हैं और उनके दिए अन्न पर पल रहे हैं? हिमालय की गोद में स्वतंत्र होकर फल-फूल खाकर जीना, चाटुकारिता के राजभोज से कहीं श्रेष्ठ है।
३. वैज्ञानिक विश्लेषण (Scientific Perspective)
Negative Ion Therapy: गंगा की लहरों के पास का वातावरण उच्च ऋणात्मक आयनों (Negative Ions) से युक्त होता है, जो अवसाद (Depression) को दूर करने और आत्मबल बढ़ाने में सहायक है।
Territorial Psychology: यह श्लोक मनुष्य की 'Comfort Zone' की मानसिकता पर प्रहार करता है। मनुष्य अपमान सहता है क्योंकि वह प्रकृति की असीम संपदा पर भरोसा करने के बजाय किसी व्यक्ति की सत्ता पर निर्भर हो जाता है। प्रकृति (हिमालय) की ओर लौटना मानसिक 'Freedom' का वैज्ञानिक मार्ग है।
Territorial Psychology: यह श्लोक मनुष्य की 'Comfort Zone' की मानसिकता पर प्रहार करता है। मनुष्य अपमान सहता है क्योंकि वह प्रकृति की असीम संपदा पर भरोसा करने के बजाय किसी व्यक्ति की सत्ता पर निर्भर हो जाता है। प्रकृति (हिमालय) की ओर लौटना मानसिक 'Freedom' का वैज्ञानिक मार्ग है।
४. English Translation
"Why do people live a life of indignity, feeding on others' crumbs, when the Himalayas still offer cool, serene, and divine abodes? The verse questions why one chooses social slavery over the abundant and free freedom provided by Nature (The Himalayas)."
किं कन्दाः कन्दरेभ्यः प्रलयमुपगता निर्झरा वा गिरिभ्यः
प्रध्वस्ता वा तरुभ्यः सरसफलभृतो वल्कलिन्यश्च शाखाः।
वीक्ष्यन्ते यन्मुखानि प्रसभमपगतप्रश्रयाणां खलानां
दुःखाप्तस्वल्पवित्तस्मयपवनवशान्नर्तितभ्रूलतानि॥ २५॥
प्रध्वस्ता वा तरुभ्यः सरसफलभृतो वल्कलिन्यश्च शाखाः।
वीक्ष्यन्ते यन्मुखानि प्रसभमपगतप्रश्रयाणां खलानां
दुःखाप्तस्वल्पवित्तस्मयपवनवशान्नर्तितभ्रूलतानि॥ २५॥
१. पद-विच्छेद (Word Breakdown)
कन्दरेभ्यः: गुफाओं से।
प्रश्रय-रहित: विनम्रता से शून्य।
स्वल्प-वित्त: थोड़ा सा धन (Little wealth)।
नर्तित-भ्रूलतानि: नाचती हुई भौहें (Arrogant eyebrows)।
वल्कल: वृक्ष की छाल (जो वस्त्र का काम देती है)।
प्रश्रय-रहित: विनम्रता से शून्य।
स्वल्प-वित्त: थोड़ा सा धन (Little wealth)।
नर्तित-भ्रूलतानि: नाचती हुई भौहें (Arrogant eyebrows)।
वल्कल: वृक्ष की छाल (जो वस्त्र का काम देती है)।
२. हिंदी व्याख्या (Hindi Meaning)
क्या गुफाओं में कंद-मूल समाप्त हो गए हैं? क्या पहाड़ों से झरने बहना बंद हो गए हैं? या पेड़ों पर फल और वस्त्र के लिए छाल नहीं रही? जब प्रकृति में सब कुछ उपलब्ध है, तो फिर उन दुष्टों के चेहरे क्यों देखे जाते हैं जिनकी भौहें थोड़े से धन के घमंड में नाच रही हैं और जिनमें रत्ती भर भी विनम्रता नहीं है? अर्थात् नीच व्यक्ति की गुलामी से बेहतर प्रकृति की गोद में स्वाभिमान से जीना है।
३. वैज्ञानिक विश्लेषण (Scientific Perspective)
Psychology of Arrogance: अल्प-ज्ञानी या अल्प-धनी व्यक्ति में Dunning-Kruger Effect की तरह एक झूठा आत्मविश्वास (स्मय) पैदा होता है, जिससे वह दूसरों का अपमान करता है।
Natural Resource Management: यह श्लोक 'Minimalism' के सिद्धांत को पुष्ट करता है। यदि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं को प्रकृति के अनुकूल (फल, कंद) सीमित कर ले, तो वह सामाजिक और आर्थिक शोषण (Exploitation) से पूरी तरह मुक्त हो सकता है।
Natural Resource Management: यह श्लोक 'Minimalism' के सिद्धांत को पुष्ट करता है। यदि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं को प्रकृति के अनुकूल (फल, कंद) सीमित कर ले, तो वह सामाजिक और आर्थिक शोषण (Exploitation) से पूरी तरह मुक्त हो सकता है।
४. English Translation
"Why endure the contempt of arrogant men who are blinded by minor riches, when nature still provides food (roots and fruits), water (springs), and shelter? Bhartrihari advocates for 'Freedom through Simplicity' over 'Humiliation through Dependency'."
पुण्यैर्मूलफलैस्तथा प्रणयिनीं वृत्तिं कुरुष्वाधुना
भूशय्यां नवपल्लवैरकृपणैरुत्तिष्ठ यावो वनम्।
क्षुद्राणामविवेकमूढमनसां यत्रेश्वराणां सदा
वित्तव्याधिविकारविह्वलगिरां नामापि न श्रूयते॥ २६॥
भूशय्यां नवपल्लवैरकृपणैरुत्तिष्ठ यावो वनम्।
क्षुद्राणामविवेकमूढमनसां यत्रेश्वराणां सदा
वित्तव्याधिविकारविह्वलगिरां नामापि न श्रूयते॥ २६॥
१. पद-विच्छेद (Word Breakdown)
प्रणयिनीं वृत्तिं: संतोषजनक या प्रेमपूर्ण आजीविका।
अकृपणैः: उदारतापूर्वक या प्रचुर मात्रा में (Abundant)।
वित्तव्याधि: धन रूपी मानसिक रोग (The malady of wealth)।
विह्वलगिरां: विकारयुक्त या घमंडी वाणी।
उत्तिष्ठ: उठो / जागृत हो जाओ।
अकृपणैः: उदारतापूर्वक या प्रचुर मात्रा में (Abundant)।
वित्तव्याधि: धन रूपी मानसिक रोग (The malady of wealth)।
विह्वलगिरां: विकारयुक्त या घमंडी वाणी।
उत्तिष्ठ: उठो / जागृत हो जाओ।
२. हिंदी व्याख्या (Hindi Meaning)
भर्तृहरि अपने मन को संबोधित करते हुए कहते हैं—हे मन! अब उठो, हम वन चलते हैं। वहाँ पवित्र कंद-मूल और फलों से सुखपूर्वक जीवन बिताएंगे और कोमल पत्तों को बिछाकर पृथ्वी पर सोएंगे। वहाँ कम से कम उन क्षुद्र और विवेकहीन धनी लोगों का नाम तो सुनाई नहीं देगा, जिनकी वाणी धन के अहंकार रूपी रोग से दूषित हो चुकी है। यह श्लोक स्वाभिमान की रक्षा के लिए 'त्याग' का मार्ग प्रशस्त करता है।
३. वैज्ञानिक विश्लेषण (Scientific Perspective)
Psychological Detox: "नामापि न श्रूयते" (नाम भी न सुनाई दे) का अर्थ है—नकारात्मक वातावरण से पूर्ण अलगाव। आज के युग में इसे 'Digital/Social Detox' कहा जा सकता है।
Affluenza Syndrome: धन का विकार व्यक्ति के 'Empathy' (सहानुभूति) तंत्र को नष्ट कर देता है। भर्तृहरि इसे 'विह्वल वाणी' कहते हैं, जो वैज्ञानिक रूप से उच्च Social Status Insecurity का लक्षण है। वन की शरण लेना 'Nature-based Therapy' है जो मस्तिष्क को पुनः शांत (Calm) करती है।
Affluenza Syndrome: धन का विकार व्यक्ति के 'Empathy' (सहानुभूति) तंत्र को नष्ट कर देता है। भर्तृहरि इसे 'विह्वल वाणी' कहते हैं, जो वैज्ञानिक रूप से उच्च Social Status Insecurity का लक्षण है। वन की शरण लेना 'Nature-based Therapy' है जो मस्तिष्क को पुनः शांत (Calm) करती है।
४. English Translation
"Let's move to the forest, survive on pure fruits/roots, and sleep on the lap of mother earth. It is better to live in nature's silence than to hear the arrogant chatter of those whose minds are corrupted by the obsession with riches."
फलं स्वेच्छालभ्यं प्रतिवनमखेदं क्षितिरुहां
पयः स्थाने स्थाने शिशिरमधुरं पुण्यसरिताम्।
मृदुस्पर्शा शय्या सुललितलतापल्लवमयी
सहन्ते सन्तापं तदपि धनिनां द्वारि कृपणाः॥ २७॥
पयः स्थाने स्थाने शिशिरमधुरं पुण्यसरिताम्।
मृदुस्पर्शा शय्या सुललितलतापल्लवमयी
सहन्ते सन्तापं तदपि धनिनां द्वारि कृपणाः॥ २७॥
१. पद-विच्छेद (Word Breakdown)
अखेदम्: बिना परिश्रम या कष्ट के।
शिशिरमधुरं: शीतल और अत्यंत मीठा।
क्षितिरुहाम्: वृक्ष (पृथ्वी से उत्पन्न होने वाले)।
तदपि: इसके बावजूद (Even then)।
सन्तापम्: मानसिक पीड़ा या अपमान की आग।
शिशिरमधुरं: शीतल और अत्यंत मीठा।
क्षितिरुहाम्: वृक्ष (पृथ्वी से उत्पन्न होने वाले)।
तदपि: इसके बावजूद (Even then)।
सन्तापम्: मानसिक पीड़ा या अपमान की आग।
२. हिंदी व्याख्या (Hindi Meaning)
भर्तृहरि कहते हैं कि जब प्रत्येक वन में वृक्षों से इच्छानुसार फल बिना किसी विशेष परिश्रम के प्राप्त हो सकते हैं, नदियों में जगह-जगह शीतल और मधुर जल उपलब्ध है, और सोने के लिए कोमल पत्तों वाली शय्या मौजूद है; फिर भी न जाने क्यों ये बेचारे लोग धनियों के द्वार पर जाकर अपमान और तिरस्कार का दुःख सहते हैं? यह श्लोक मनुष्य की मानसिक दासता पर प्रहार करता है।
३. वैज्ञानिक विश्लेषण (Scientific Perspective)
Biological Needs vs. Social Constructs: हमारी जैविक आवश्यकताएं (भूख, प्यास, नींद) प्रकृति में Decentralized हैं, यानी वे कहीं भी पूरी हो सकती हैं। लेकिन मनुष्य ने अपनी खुशियों को Centralized (सत्ता और धन के अधीन) कर लिया है।
Stress-Resource Conflict: यह श्लोक प्रमाणित करता है कि मानसिक तनाव 'अभाव' से नहीं, बल्कि 'गलत चुनाव' (अपमानजनक धन बनाम सम्मानजनक प्रकृति) से पैदा होता है। प्रकृति की गोद में Cortisol का स्तर न्यूनतम होता है, जबकि धनियों के द्वार पर यह चरम पर होता है।
Stress-Resource Conflict: यह श्लोक प्रमाणित करता है कि मानसिक तनाव 'अभाव' से नहीं, बल्कि 'गलत चुनाव' (अपमानजनक धन बनाम सम्मानजनक प्रकृति) से पैदा होता है। प्रकृति की गोद में Cortisol का स्तर न्यूनतम होता है, जबकि धनियों के द्वार पर यह चरम पर होता है।
४. English Translation
"When life's essentials like food, water, and rest are freely provided by nature in a superior quality, it is a psychological tragedy that humans still choose to serve arrogant masters and suffer the heat of humiliation."
ये वर्तन्ते धनपतिपुरः प्रार्थनादुःखभाजो
ये चाल्पत्वं दधति विषयाक्षेपपर्याप्तबुद्धेः।
तेषामन्तःस्फुरितहसितं वासराणि स्मरेयं
ध्यानच्छेदे शिखरिकुहरग्रावशय्यानिषण्णः॥ २८॥
ये चाल्पत्वं दधति विषयाक्षेपपर्याप्तबुद्धेः।
तेषामन्तःस्फुरितहसितं वासराणि स्मरेयं
ध्यानच्छेदे शिखरिकुहरग्रावशय्यानिषण्णः॥ २८॥
१. पद-विच्छेद (Word Breakdown)
धनपतिपुरः: धनवानों के सामने।
प्रार्थनादुःखभाजो: माँगने के दुःख को सहने वाले।
शिखरिकुहर: पर्वत की गुफा।
ग्रावशय्या: पत्थर का बिस्तर (शिला)।
ध्यानच्छेदे: ध्यान के अंतराल में।
प्रार्थनादुःखभाजो: माँगने के दुःख को सहने वाले।
शिखरिकुहर: पर्वत की गुफा।
ग्रावशय्या: पत्थर का बिस्तर (शिला)।
ध्यानच्छेदे: ध्यान के अंतराल में।
२. हिंदी व्याख्या (Hindi Meaning)
भर्तृहरि भविष्य की सुंदर कल्पना करते हुए कहते हैं—जब मैं पर्वत की किसी गुफा में पत्थर की शिला पर बैठा ध्यान लगा रहा हूँगा, और ध्यान के बीच के विश्राम के समय मैं उन लोगों के बारे में सोचूँगा जो धनवानों के आगे हाथ फैलाकर माँगने का दुःख सहते हैं और जिनकी बुद्धि केवल भोग-विलास के ओछेपन में फंसी है, तो मुझे उन पर और अपने बीते हुए उन दिनों पर भीतर ही भीतर एक हंसी आएगी। यह मुक्त पुरुष के संतोष की पराकाष्ठा है।
३. वैज्ञानिक विश्लेषण (Scientific Perspective)
Cognitive Reframing: यह श्लोक बताता है कि कैसे 'ध्यान' हमारे अतीत के कष्टों को 'कॉमेडी' में बदल देता है। जब चेतना उच्च स्तर पर पहुँचती है, तो पुराने सांसारिक संघर्ष तुच्छ लगने लगते हैं।
Sensory Deprivation: गुफा और एकांत का वातावरण Sensory Overload को कम करता है, जिससे मस्तिष्क को स्वयं के व्यवहार का विश्लेषण करने के लिए अधिक 'Bandwidth' मिलती है। इसे आधुनिक मनोविज्ञान में Deep Reflection की प्रक्रिया माना जाता है।
Sensory Deprivation: गुफा और एकांत का वातावरण Sensory Overload को कम करता है, जिससे मस्तिष्क को स्वयं के व्यवहार का विश्लेषण करने के लिए अधिक 'Bandwidth' मिलती है। इसे आधुनिक मनोविज्ञान में Deep Reflection की प्रक्रिया माना जाता है।
४. English Translation
"Resting on a rocky bed in a cave, I will look back at the days of worldly struggle. I will smile at the folly of those who begged before the rich and remained slaves to their senses. This reflects the state of 'Moksha' where past bondages become a matter of mild amusement."
ये सन्तोषनिरन्तरप्रमुदितास्तेषां न भिन्ना मुदो
ये त्वन्ये धनलुब्धसंकुलधियस्तेषां न तृष्णा हता।
इत्थं कस्य कृते कृतः स विधिना कीदृक्पदं सम्पदां
स्वात्मन्येव समाप्तहेममहिमा मेरुर्न मे रोचते॥ २९॥
ये त्वन्ये धनलुब्धसंकुलधियस्तेषां न तृष्णा हता।
इत्थं कस्य कृते कृतः स विधिना कीदृक्पदं सम्पदां
स्वात्मन्येव समाप्तहेममहिमा मेरुर्न मे रोचते॥ २९॥
१. पद-विच्छेद (Word Breakdown)
निरन्तरप्रमुदिताः: हमेशा प्रसन्न रहने वाले।
संकुलधियः: व्याकुल या भ्रमित बुद्धि वाले।
तृष्णा: लालसा या प्यास (Desire)।
हेममहिमा: सुवर्ण की महिमा (Glory of Gold)।
मेरुः: सुमेरु पर्वत (पौराणिक सोने का पर्वत)।
संकुलधियः: व्याकुल या भ्रमित बुद्धि वाले।
तृष्णा: लालसा या प्यास (Desire)।
हेममहिमा: सुवर्ण की महिमा (Glory of Gold)।
मेरुः: सुमेरु पर्वत (पौराणिक सोने का पर्वत)।
२. हिंदी व्याख्या (Hindi Meaning)
भर्तृहरि कहते हैं कि जो व्यक्ति संतोषी हैं, उनका आनंद कभी कम नहीं होता। लेकिन जो लोभी हैं, उनकी धन की प्यास कभी नहीं बुझती। ऐसे में विधाता ने यह सोने का सुमेरु पर्वत किसके लिए बनाया? इसकी सारी स्वर्णमयी महिमा तो इसी के भीतर दबी पड़ी है, यह न किसी की भूख मिटाता है, न किसी का दुःख हरता है। जो संपदा किसी के काम न आए, वह मेरे लिए व्यर्थ है।
३. वैज्ञानिक विश्लेषण (Scientific Perspective)
Psychology of Contentment: संतोष कोई 'समझौता' नहीं, बल्कि एक Neurological State है जहाँ व्यक्ति 'External Validation' से मुक्त हो जाता है।
Resource Deadlock: विज्ञान और अर्थशास्त्र में इसे 'Unproductive Asset' कहते हैं। यदि संपदा का संचार (Circulation) न हो, तो उसकी उपयोगिता शून्य हो जाती है। मेरु पर्वत इसी Stagnant Wealth का प्रतीक है, जो मानसिक शांति के सामने तुच्छ है।
Resource Deadlock: विज्ञान और अर्थशास्त्र में इसे 'Unproductive Asset' कहते हैं। यदि संपदा का संचार (Circulation) न हो, तो उसकी उपयोगिता शून्य हो जाती है। मेरु पर्वत इसी Stagnant Wealth का प्रतीक है, जो मानसिक शांति के सामने तुच्छ है।
४. English Translation
"The joy of the contented is everlasting, while the thirst of the greedy is eternal. What is the use of Mount Meru's gold if it is only meant for the mountain itself? I have no desire for wealth that doesn't bring peace or serve a higher purpose."
भिक्षाहारमदैन्यमप्रतिसुखं भीतिच्छिदं सर्वतो
दुर्मात्सर्यमदाभिमानमथनं दुःखौघविध्वंसनम्।
सर्वत्रान्वहमप्रयत्नसुलभं साधुप्रियं पावनं
शम्भोः सत्रमवार्यमक्षयनिधिं शंसन्ति योगीश्वराः॥ ३०॥
दुर्मात्सर्यमदाभिमानमथनं दुःखौघविध्वंसनम्।
सर्वत्रान्वहमप्रयत्नसुलभं साधुप्रियं पावनं
शम्भोः सत्रमवार्यमक्षयनिधिं शंसन्ति योगीश्वराः॥ ३०॥
१. पद-विच्छेद (Word Breakdown)
अदैन्यम्: हीनता या दीनता से मुक्त।
भीतिच्छिदं: भय को काटने वाला।
मदाभिमानमथनं: अहंकार और घमंड को कुचलने वाला।
शम्भोः सत्रम्: शिव जी का सदावर्त (अन्नक्षेत्र)।
अक्षयनिधिं: कभी न खत्म होने वाला खजाना।
भीतिच्छिदं: भय को काटने वाला।
मदाभिमानमथनं: अहंकार और घमंड को कुचलने वाला।
शम्भोः सत्रम्: शिव जी का सदावर्त (अन्नक्षेत्र)।
अक्षयनिधिं: कभी न खत्म होने वाला खजाना।
२. हिंदी व्याख्या (Hindi Meaning)
योगीश्वर कहते हैं कि भिक्षा में मिला भोजन वास्तव में भगवान शिव का कभी न समाप्त होने वाला भंडारा है। यह भोजन दीनता से रहित है और परम सुख देने वाला है। यह हृदय से ईर्ष्या, घमंड और भय को निकाल देता है। इसके लिए न तो किसी धनवान की गुलामी करनी पड़ती है और न ही कठोर परिश्रम; यह हर जगह सुलभ है। यह पवित्र आहार दुखों के जाल को काट देता है।
३. वैज्ञानिक विश्लेषण (Scientific Perspective)
Psychological Autonomy: यह श्लोक Minimalism की पराकाष्ठा है। जब जीवन की उत्तरजीविता (Survival) 'प्रयत्न-रहित' हो जाती है, तो मस्तिष्क अपनी पूरी ऊर्जा रचनात्मकता और आध्यात्मिक खोज में लगा सकता है।
Ego-Management: भिक्षा मांगना सामाजिक प्रतिष्ठा (Social Image) के मोह को तोड़ता है। आधुनिक चिकित्सा में 'अहंकार का विसर्जन' गहरे मानसिक रोगों का उपचार माना गया है। यह भोजन 'अक्षयनिधि' है क्योंकि यह मानसिक शांति के खजाने को खोल देता है।
Ego-Management: भिक्षा मांगना सामाजिक प्रतिष्ठा (Social Image) के मोह को तोड़ता है। आधुनिक चिकित्सा में 'अहंकार का विसर्जन' गहरे मानसिक रोगों का उपचार माना गया है। यह भोजन 'अक्षयनिधि' है क्योंकि यह मानसिक शांति के खजाने को खोल देता है।
४. English Translation
"Yogis describe the life of alms as the 'Inexhaustible Treasure of Shiva'. It frees the mind from the anxiety of acquisition and the pride of possession. It is the most sacred way to nourish the body while keeping the soul free from the bondages of social status and greed."
