कादम्बरी - कथामुखम्
मकरिका का वृत्तांत: 'पुन्नाम्नो नरकात् त्रायते इति पुत्र:' (पृष्ठ ६१)
१. मूल संस्कृत पाठ (Full Original Sanskrit Text)
म्येन वा केनचिदस्मदुपजीविना परिजनेन । अतिनिपुणमपि चिन्तयन्न पश्यामि खलु स्खलितमल्पमप्यात्मनस्त्वद्विषये । त्वदायत्तं हि मे जीवितं च राज्यं च । कथ्यतां सुन्दरि शुच: कारणम् । इत्येवमभिधीयमाना विलासवती यदा न किंचित्प्रतिवच: प्रतिपेदे तदा विवृद्धबाष्पहेतुमस्या: परिजनमपृच्छत् ।
अथ तस्यास्ताम्बूलकरङ्कवाहिनी सततप्रत्यासन्ना मकरिका नाम गजानमुवाच । देव कुतो देवादल्पमपि परिस्खलितम् । अभिमुखे च देवे का शक्ति: परिजनस्यान्यस्य वा कस्यचिदपराद्धुम् । किं तु महाग्रहग्रस्तेव विफलमरेन्द्रसमागमास्मीत्ययमस्या देव्या: संताप: । सुमहांश्च काल: संतप्यमानाया: । प्रथममपि स्वामिनी दानवश्रीरिव सततनिन्दितसुरता शयनस्नानभोजनभूषणपरिग्रहादिषु समुचितेष्वपि दिवसव्यापारेषु कथं कथमपि परिजनप्रयत्नात्प्रवर्त्यमाना सशोरकेवासीत् । देवहृदयपीडापरिजिहीर्षया न दर्शितवती विकारम् । अद्य तु चतुर्दशीति भगवन्तं महाकालमर्चितुमितो गतया तत्र महाभारते वाच्यमाने श्रुतमपुत्राणां किल न सन्ति लोका: शुभा: पुन्नाम्नो नरकात् त्रायते इति पुत्र इति । एतच्छ्रुत्वा भवनमागत्य परिजनेन संशिर:प्रणाममभ्यर्थ्यमानापि आहारमभिनन्दति न भूषणपरिग्रहाचरति नोत्तरं प्रतिपद्यते केवलमविगलबाष्पबिन्दुदुर्दिनान्धकारितमुखी रोदिति । एतदाकर्ण्य देव: प्रमाणम् । इत्यभिधाय विरराम ।
विरतवचनायां तस्यां भूमिपालस्तूष्णीं मुहूर्तमिब स्थित्वा दीर्घमुष्णं च निश्वस्य निजगाद । देवि किमत्र क्रियतां दैवयत्ते वस्तुनि । अतिमात्रमलं रुदितेन । न वयमनुग्राह्या: प्रायो देवतानाम् । आत्मजपरिव्वङ्गामृतास्वादसुखस्य नूनमभाजनमस्माकं हृदयम् ।
अथ तस्यास्ताम्बूलकरङ्कवाहिनी सततप्रत्यासन्ना मकरिका नाम गजानमुवाच । देव कुतो देवादल्पमपि परिस्खलितम् । अभिमुखे च देवे का शक्ति: परिजनस्यान्यस्य वा कस्यचिदपराद्धुम् । किं तु महाग्रहग्रस्तेव विफलमरेन्द्रसमागमास्मीत्ययमस्या देव्या: संताप: । सुमहांश्च काल: संतप्यमानाया: । प्रथममपि स्वामिनी दानवश्रीरिव सततनिन्दितसुरता शयनस्नानभोजनभूषणपरिग्रहादिषु समुचितेष्वपि दिवसव्यापारेषु कथं कथमपि परिजनप्रयत्नात्प्रवर्त्यमाना सशोरकेवासीत् । देवहृदयपीडापरिजिहीर्षया न दर्शितवती विकारम् । अद्य तु चतुर्दशीति भगवन्तं महाकालमर्चितुमितो गतया तत्र महाभारते वाच्यमाने श्रुतमपुत्राणां किल न सन्ति लोका: शुभा: पुन्नाम्नो नरकात् त्रायते इति पुत्र इति । एतच्छ्रुत्वा भवनमागत्य परिजनेन संशिर:प्रणाममभ्यर्थ्यमानापि आहारमभिनन्दति न भूषणपरिग्रहाचरति नोत्तरं प्रतिपद्यते केवलमविगलबाष्पबिन्दुदुर्दिनान्धकारितमुखी रोदिति । एतदाकर्ण्य देव: प्रमाणम् । इत्यभिधाय विरराम ।
विरतवचनायां तस्यां भूमिपालस्तूष्णीं मुहूर्तमिब स्थित्वा दीर्घमुष्णं च निश्वस्य निजगाद । देवि किमत्र क्रियतां दैवयत्ते वस्तुनि । अतिमात्रमलं रुदितेन । न वयमनुग्राह्या: प्रायो देवतानाम् । आत्मजपरिव्वङ्गामृतास्वादसुखस्य नूनमभाजनमस्माकं हृदयम् ।
२. विस्तृत हिंदी व्याख्या (Complete Hindi Exposition)
राजा का अनुनय: राजा तारापीड रानी से कहते हैं कि वे बहुत सोचने पर भी अपनी ओर से कोई छोटी सी भी भूल नहीं देख पा रहे हैं। वे कहते हैं कि मेरा जीवन और राज्य सब तुम्हारे ही अधीन है, अतः अपने शोक का कारण बताओ। जब रानी मौन रही, तो राजा ने परिचारिकाओं से पूछा।
मकरिका का स्पष्टीकरण: रानी की ताम्बूल-करङ्कवाहिनी (पान का डिब्बा रखने वाली) मकरिका ने बताया कि न तो राजा से कोई भूल हुई है और न ही किसी सेवक ने अपराध किया है। रानी का संताप 'अपुत्रता' (संतान न होना) के कारण है। वे बहुत समय से भीतर ही भीतर दुखी थीं, लेकिन राजा को कष्ट न हो, इसलिए अपना विकार प्रकट नहीं कर रही थीं।
महाभारत का वह वचन: आज चतुर्दशी के अवसर पर रानी महाकाल के मंदिर गई थीं। वहाँ उन्होंने महाभारत के वाचन में सुना कि—"अपुत्र (जिसकी संतान न हो) को शुभ लोकों की प्राप्ति नहीं होती, और पुत्र वही है जो 'पुम्' नामक नरक से रक्षा करे।" यह सुनकर रानी अत्यंत व्यथित हो गई हैं। उन्होंने भोजन और श्रृंगार त्याग दिया है।
राजा का वैराग्य: मकरिका की बात सुनकर राजा तारापीड भी चुप हो गए। उन्होंने एक लंबी और गर्म सांस ली और कहा—"देवि! जो वस्तु भाग्य (दैव) के अधीन है, उसमें हम क्या कर सकते हैं? रोने से अब क्या लाभ? शायद हम देवताओं की कृपा के पात्र नहीं हैं। हमारा हृदय पुत्र के आलिंगन रूपी अमृत का सुख पाने के योग्य नहीं है।"
मकरिका का स्पष्टीकरण: रानी की ताम्बूल-करङ्कवाहिनी (पान का डिब्बा रखने वाली) मकरिका ने बताया कि न तो राजा से कोई भूल हुई है और न ही किसी सेवक ने अपराध किया है। रानी का संताप 'अपुत्रता' (संतान न होना) के कारण है। वे बहुत समय से भीतर ही भीतर दुखी थीं, लेकिन राजा को कष्ट न हो, इसलिए अपना विकार प्रकट नहीं कर रही थीं।
महाभारत का वह वचन: आज चतुर्दशी के अवसर पर रानी महाकाल के मंदिर गई थीं। वहाँ उन्होंने महाभारत के वाचन में सुना कि—"अपुत्र (जिसकी संतान न हो) को शुभ लोकों की प्राप्ति नहीं होती, और पुत्र वही है जो 'पुम्' नामक नरक से रक्षा करे।" यह सुनकर रानी अत्यंत व्यथित हो गई हैं। उन्होंने भोजन और श्रृंगार त्याग दिया है।
राजा का वैराग्य: मकरिका की बात सुनकर राजा तारापीड भी चुप हो गए। उन्होंने एक लंबी और गर्म सांस ली और कहा—"देवि! जो वस्तु भाग्य (दैव) के अधीन है, उसमें हम क्या कर सकते हैं? रोने से अब क्या लाभ? शायद हम देवताओं की कृपा के पात्र नहीं हैं। हमारा हृदय पुत्र के आलिंगन रूपी अमृत का सुख पाने के योग्य नहीं है।"
3. Comprehensive English & Literary Commentary
The Definition of 'Putra': This page highlights the traditional etymology of the word 'Putra'—derived from the belief that a son saves his ancestors from the hell named 'Pum'. Hearing this in the Mahabharata discourse acted as a catalyst for Queen Vilasavati's breakdown.
Silent Sacrifice: Makarika reveals that the Queen had been hiding her sorrow to avoid hurting the King's heart (Deva-hridaya-pida-parijihirshaya). This showcases the deep emotional maturity and mutual respect in their relationship.
Submission to Destiny: The King's reaction (Daivayatte vastuni) reflects the philosophical acceptance of fate (Daiva). He perceives their childlessness not as a personal failure but as a lack of divine grace (Anugrahya).
Silent Sacrifice: Makarika reveals that the Queen had been hiding her sorrow to avoid hurting the King's heart (Deva-hridaya-pida-parijihirshaya). This showcases the deep emotional maturity and mutual respect in their relationship.
Submission to Destiny: The King's reaction (Daivayatte vastuni) reflects the philosophical acceptance of fate (Daiva). He perceives their childlessness not as a personal failure but as a lack of divine grace (Anugrahya).
४. पाणिनीय व्याकरण एवं अष्टाध्यायी विश्लेषण (Grammar Focus)
| संस्कृत पद (Word) | व्याकरणिक विवरण एवं समास (Analysis) |
|---|---|
| ताम्बूलकरङ्कवाहिनी | ताम्बूलस्य करङ्कं (डिब्बा) वहतीति (उपपद तत्पुरुष समास) - ताम्बूल का डिब्बा ले जाने वाली। |
| विफलमरेन्द्रसमागमा | विफल: नरेन्द्रस्य समागम: यस्या: सा (बहुव्रीहि समास) - जिसका राजा के साथ समागम निष्फल हो गया हो (पुत्र प्राप्ति न होने के कारण)। |
| परिजिहीर्षया | परि + हृ + सन् (प्रत्यय) + टाप् (स्त्रीलिङ्ग), तृतीया एकवचन - त्यागने या दूर करने की इच्छा से। |
| पुन्नाम्नो नरकात् | 'पुम्' इति नाम यस्य स: (बहुव्रीहि), तस्मात् - पुम् नामक नरक से। 'भीत्रार्थानां भयहेतु:' सूत्र से पञ्चमी विभक्ति। |
| आत्मजपरिव्वङ्गामृतास्वाद | आत्मजस्य (पुत्र का) परिष्वङ्ग: (आलिंगन) एव अमृतम् (रूपक), तस्य आस्वाद: - पुत्र-आलिंगन रूपी अमृत का स्वाद। |
प्रस्तुति: मनोज पाण्डेय | माध्यम: डिजिटल अष्टाध्यायी
Kadamabari Page 61 - Complete Philological Repository



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