कादंबरी कथामुखम्: राजा तारापीड और शुकनास के शुभ स्वप्नों का रहस्य

कादंबरी, बाणभट्ट, संस्कृत साहित्य, राजा तारापीड, शुकनास, शुभ स्वप्न, चन्द्रापीड, भारतीय दर्शन
कादंबरी - पृष्ठ 61
कादंबरी: पृष्ठ 61 - विलासवती शोक वृत्तांत
म्येन वा केनचिदस्मदुपजीविना परिजनेन। अतिनिपुणमपि चिन्तयन् न पश्यामि खलु स्खलितमल्पमप्यात्मनस्त्वद्विषये। त्वदायत्तं हि मे जीवितं च राज्यं च। कथ्यतां सुन्दरि शुचः कारणम्। इत्येवमभिधीयमाना विलासवती यदा न किंचित्प्रतिवचः प्रतिपेदे तदा विवृद्धबाष्पहेतुमस्याः परिजनमपृच्छत्।

अथ तस्यास्ताम्बूलकरङ्कवाहिनी सततप्रत्यासन्ना मकरिका नाम गजानमुवाच। देव कुतो देवादल्पमपि परिस्खलितम्। अभिमुखे च देवे का शक्तिः परिजनस्यान्यस्य वा कस्यचिदपराधुम्। किं तु महाग्रहग्रस्तेव विफलनेन्द्रसमागमास्मीत्ययमस्या देव्याः संतापः। सुमहांश्च कालः संतप्यमानायाः। प्रथममपि स्वामिनी दानश्रीरिव सततनिन्दितसुरता शयनस्नानभोजनभूषणपरिग्रहादिषु समुचितेष्वपि दिवसव्यापारेषु कथं कथमपि परिजनप्रयत्नात्प्रवर्त्यमाना सशोकेवासीत्।
पद (Word) विग्रह / विवरण विशेष
त्वद्विषयेतव विषयः (षष्ठी तत्पुरुष)तुम्हारे विषय में
विवृद्धबाष्पहेतुम्विवृद्धः बाष्पस्य हेतुः यस्य तम्आंसुओं के बढ़ने का कारण
ताम्बूलकरङ्कवाहिनीताम्बूलस्य करङ्कं वहति इतिपान का डिब्बा उठाने वाली (दासी)
महाग्रहग्रस्तेवमहाग्रहेण ग्रस्ता इव (तृतीया तत्पुरुष)जैसे किसी बड़े ग्रह (राहू आदि) से ग्रस्त हो
विफलनेन्द्रसमागमाविफलः नेन्द्रसमागमो यस्याः साजिसका राजा से समागम निष्फल हो (संतानहीनता)
हिन्दी अनुवाद: "मेरे किसी सेवक या परिजन द्वारा भी कोई अपराध नहीं हुआ है। मैं बहुत गहराई से सोचने पर भी तुम्हारे प्रति अपनी कोई छोटी सी गलती भी नहीं देख पा रहा हूँ। मेरा जीवन और राज्य सब तुम्हारे ही अधीन है। हे सुन्दरी! अपने शोक का कारण बताओ।" इस प्रकार कहे जाने पर भी जब विलासवती ने कोई उत्तर नहीं दिया, तब राजा ने आंसुओं के बढ़ने का कारण दासी से पूछा।

तब उसकी निरंतर पास रहने वाली 'मकरिका' नाम की तांबूल-वाहिनी (पान की डिब्बी रखने वाली) ने राजा से कहा—"हे देव! आपसे कोई गलती कैसे हो सकती है? और आपके सामने किसी सेवक की क्या मजाल कि कोई अपराध करे। किन्तु रानी का संताप यह है कि वे मानती हैं कि वे किसी 'महाग्रह' से ग्रस्त हैं और उनका राजा के साथ समागम निष्फल (संतानहीन) है। वे लंबे समय से इस दुःख में जल रही हैं।"
English Translation: "Not even by any of my dependents or attendants has any wrong been done. Even upon thinking very minutely, I truly do not see even the slightest slip of mine in regard to you. Indeed, my life and my kingdom are dependent on you. O beautiful one, tell me the cause of your grief." When Vilasavati, thus addressed, did not give any reply, the King asked her attendants the reason for her increased tears.

Then, her constant companion and betel-box bearer named Makarika said to the King—"My Lord, how could there be even a slight lapse from your side? When the King is favorable, who among the attendants or anyone else would dare to offend? But the Queen's agony is this: she feels as if possessed by a great evil planet, thinking her union with the King has been fruitless (childless). She has been suffering this grief for a very long time."
कादंबरी - पृष्ठ ६२ (भाष्य)
कादंबरी: पृष्ठ ६२ - राजा तारापीड का विलासवती को आश्वासन
"न कृतमवदातं कर्म। जन्मान्तरकृतं हीदं कर्म फलमुपनयति पुरुषस्येह जन्मनि। न ही शक्यं दैवमन्यथा कर्तुमभियुक्तेनापि। यावन्मानुष्यके शक्यमुपपादयितुं तावत्सर्वमुपपाद्यताम्। अधिकां कुरु देवि गुरुषु भक्तिम्। द्विगुणमुपपादय देवतासु पूजाम्। ऋषिजनसपर्यासु दर्शितादरा भव। परं हि दैवतमुषयः। यैः आराधिता यथासमीहितफलानामविदुर्लभानामपि वराणां दातारो भवन्ति। श्रूयते हि—पुरा चण्डकौशिकप्रभावान्मगधेषु बृहद्रथो नाम राजा जनार्दनस्य जेतारमतुलभुजबलमप्रतिरथं जरासंधं नाम तनयं लेभे। दशरथश्च राजा परिणतवया विभाण्डकमहामुनिसुतस्यर्षीशृङ्गस्य प्रसादादजरामरयुवानमप्रतिहतानुदधीनिवाक्षोभ्यानवाप चतुरः पुत्रान्। अन्ये च राजर्षयस्तपोधनानाराध्य पुत्रदर्शनामृतास्वादसुखभाजो बभूवुः। अमोघफला हि महामुनिसेवा भवति। अहमपि खलु देवि कदा समुपारूढगर्भभारालसामापाण्डुमुखीमासन्नपूर्णचन्द्रोदयामिव पौर्णमासी निशां देवीं द्रक्ष्यामि।"
पद (Word) विग्रह / विवरण विशेष / अर्थ
जन्मान्तरकृतम्अन्यत् जन्म इति जन्मान्तरम्, तस्मिन् कृतम् (सप्तमी तत्पुरुष)पिछले जन्म में किया हुआ
उपपाद्यताम्उप + पद् + णिच् + लोट् (आत्मनेपद)प्रयत्न किया जाना चाहिए
अप्रतिरथम्नास्ति प्रतिरथः यस्य तम् (बहुव्रीहि समास)अद्वितीय योद्धा / जिसका कोई मुकाबला न हो
ऋषिजनसपर्यासुऋषीणां जनाः, तेषां सपर्या (षष्ठी तत्पुरुष)ऋषि-मुनियों की सेवा में
समुपारूढगर्भभारालसाम्समुपारूढः गर्भस्य भारः, तेन अलसाम् (तृतीया तत्पुरुष)गर्भ के भार से आलस्य युक्त (गर्भवती)
आपाण्डुमुखीम्ईषत् पाण्डु मुखं यस्याः सा (बहुव्रीहि)हल्के पीले मुख वाली
हिन्दी अनुवाद: राजा तारापीड रानी विलासवती से कहते हैं— "निश्चित ही हमने पूर्व में कोई शुभ कर्म नहीं किया होगा। वास्तव में, मनुष्य द्वारा पिछले जन्मों में किए गए कर्म ही इस जन्म में फल प्रदान करते हैं। बहुत प्रयास करने पर भी भाग्य को बदलना संभव नहीं है। हे देवी! मानवीय पुरुषार्थ से जितना संभव हो सके, वह सब किया जाना चाहिए। तुम गुरुओं के प्रति अपनी भक्ति को बढ़ाओ। देवताओं की पूजा को दोगुना करो। ऋषियों की सेवा और सत्कार में आदर दिखाओ। ऋषि ही परम देवता हैं; यदि वे प्रसन्न हो जाएं, तो मनचाहे और दुर्लभ वरदान देने वाले बन जाते हैं।

सुना जाता है कि प्राचीन काल में मगध देश के राजा बृहद्रथ ने चण्डकौशिक मुनि के प्रभाव से ही 'जरासंध' नामक पुत्र प्राप्त किया था, जो शत्रुओं का विजेता और अतुलनीय बल वाला था। राजा दशरथ ने भी अपनी वृद्धावस्था में विभाण्डक मुनि के पुत्र ऋष्यशृंग की कृपा से चार पुत्र (राम आदि) प्राप्त किए, जो समुद्र के समान अक्षोभ्य थे। अन्य अनेक राजर्षियों ने भी तपस्वियों की आराधना करके पुत्र-दर्शन रूपी अमृत का सुख प्राप्त किया। महामुनियों की सेवा कभी निष्फल नहीं होती। हे देवी! मैं कब वह दिन देखूँगा जब तुम गर्भ के भार से अलसायी हुई और पीले मुख वाली, पूर्णिमा की रात के समान सुशोभित होगी।"
Full English Translation: The King said— "Surely, we must not have performed any pure deeds in the past. Indeed, the actions performed by a man in previous births bring forth their fruits in this present life. Destiny cannot be altered even by a most diligent person. O Queen! whatever is possible through human endeavor must be done. Increase your devotion toward the Gurus. Redouble the worship of the deities. Show great reverence in serving the sages. Sages are indeed the supreme divinities; when propitiated, they grant desired and even the rarest boons.

It is heard that in ancient times, through the power of Sage Chandakaushika, King Brihadratha of Magadha obtained a son named Jarasandha, who was the conqueror of enemies and possessed incomparable strength. King Dasharatha, too, in his advanced age, obtained four sons—as unshakeable as the oceans—by the grace of Sage Rishyashringa, son of the great Sage Vibhandaka. Other royal sages as well, by worshiping the ascetics, enjoyed the nectar-like happiness of seeing their sons. The service to great sages never goes in vain. O Queen! When will I see you burdened with the weight of the womb, with a pale face, like the night of the full moon approaching the moonrise?"
कादंबरी भाष्य - पृष्ठ ६३
कादंबरी: पृष्ठ ६३ - राजा तारापीड का मनोरथ और आश्वासन
किशोरीक इव संजातजानुचङ्क्रमणवस्थः संचरिष्यतीतस्ततः स्फटिकमणिभित्त्यन्तरितान्भवनमृगशावकाञ्जिघृक्षुः। कदान्तःपुरनूपुरनिनदसंतानगृहकलहंसकानुसरन्रक्षान्तरप्रधावितः कनकमेखलाघण्टिकारवानुसारीणामायासयिष्यति धात्रीम्। कदा कृष्णागुरुपङ्कलिखितमदलेखालंकृतगण्डस्थलो मुखडिण्डिमध्वनिजनितप्रीतिरुर्ध्वकरविप्रकीर्णचन्दनचूर्णधूलिधूसरः कुञ्चिताङ्गुलिशिखराङ्कुशाकर्षणविधूतशिराः करिष्यति मत्तगजराजलीलाक्रीडाः। कदा मातुश्चरणयुगलरागोपयुक्तशेषेण पिण्डालक्तकरसेन वृद्धकञ्चुकिनां विडम्बयिष्यति मुखानि। कदा कुतूहलचञ्चललोचनो मणिकुट्टिमेष्वधोदत्तदृष्टिरनुसरिष्यति स्खलद्गतिरात्मनः प्रतिबिम्बानि। कदा नरेन्द्रसहस्रप्रसारितभुजयुगलाभािनन्द्यमानागमनो भूषणमणिमयूखलेखाकुलीक्रियमाणलोलदृष्टिरास्थानस्थितस्य मे पुरः पर्यटिष्यति सभान्तरेषु। इत्येतानि च मनोरथशतानि चिन्तयतोऽन्तःसंतप्यमानस्य प्रयान्ति रजन्यः। मामपि दह्येवामहर्निशमनल इवानपत्यतासमुद्भवः शोकः। शून्यमिव मे प्रतिभाति जगत्। अफलमिव पश्यामि राज्यम्। अप्रतिविधेये तु विधातरि किं करोमि। तन्मुच्यतामयं देवि शोकानुबन्धः। आधीयतां धैर्ये धर्मे च धीः। धर्मपरायणानां हि सदा समीपसंचारिण्यः कल्याणसंपदो भवन्ति।
पद (Word) विग्रह / विवरण विशेष / अर्थ
संजातजानुचङ्क्रमणवस्थःसंजाता जानुभ्यां चङ्क्रमणस्य अवस्था यस्य सःघुटनों के बल चलने की अवस्था वाला
स्फटिकमणिभित्त्यन्तरितान्स्फटिकमणीनां भित्तिभिः अन्तरिताःस्फटिक की दीवारों के पीछे छिपे हुए
अनपत्यतासमुद्भवःन अपत्यम् इति अनपत्यता, तस्याः समुद्भवःसंतानहीनता से उत्पन्न
अप्रतिविधेयेन प्रतिविधेयः तस्मिन्जिसका कोई उपाय न हो (अटल)
शोकानुबन्धःशोकस्य अनुबन्धः (लगातार दुःख)शोक का सिलसिला
हिन्दी अनुवाद: "कब वह घुटनों के बल चलने की अवस्था में होकर, स्फटिक की दीवारों के पीछे छिपे हुए हिरण के बच्चों को पकड़ने की इच्छा से यहाँ-वहाँ घूमेगा? कब वह अन्तःपुर के नूपुरों की आवाज़ सुनकर पीछे चलने वाले कलहंसों का पीछा करते हुए धात्रियों (धाय माँ) को थका देगा? कब वह अपने मुख से 'डिण्डिम' की ध्वनि निकाल कर प्रसन्न होगा और धूल से धूसरित होकर मतवाले हाथी के समान क्रीड़ा करेगा? कब वह अपनी माता के पैरों में लगे आलता (पिण्डालक्तक) के बचे हुए रस से वृद्ध कंचुकियों के मुखों को रंग देगा? कब वह चंचल नेत्रों से फर्श पर पड़ने वाले अपने ही प्रतिबिंब का पीछा करेगा? कब वह हज़ारों राजाओं के बीच मेरे सामने सभा में घूमेगा? ऐसे सैकड़ों मनोरथों को सोचते हुए मेरी रातें संताप में बीतती हैं। संतानहीनता का यह शोक मुझे अग्नि के समान जला रहा है। मुझे सारा संसार शून्य और राज्य फलहीन लगता है। पर विधाता के विधान के आगे मैं क्या करूँ? इसलिए हे देवी! इस शोक को त्याग दो और धैर्य एवं धर्म में अपनी बुद्धि लगाओ। धर्मपरायण लोगों के पास ही कल्याणकारी संपदाएं निवास करती हैं।"
Full English Translation: "When will he, having reached the stage of crawling on his knees, wander here and there, desiring to catch the fawns separated by crystal walls? When will he tire out his nurses while running through the courtyards following the domestic swans that follow the tinkling of anklets? When, with his cheeks decorated by the paste of black aloes and making sounds like a small drum (Dindima) from his mouth, will he play like a young elephant? When will he mockingly paint the faces of the old chamberlains (Kanchukis) with the remains of the red lac used on his mother's feet? When will he follow his own reflection on the jeweled floors with curious eyes? When will he roam in the assemblies before me while being welcomed by thousands of kings? Thinking of hundreds of such desires, my nights pass in inner agony. The sorrow arising from childlessness burns me day and night like fire. The world seems empty and the kingdom fruitless to me. But what can I do against the irremediable Creator? Therefore, O Queen, abandon this persistent grief. Fix your mind on courage and righteousness. Prosperity and welfare always reside close to those devoted to Dharma."
कादंबरी भाष्य - पृष्ठ ६४
कादंबरी: पृष्ठ ६४ - विलासवती के पुत्र-प्राप्ति हेतु अनुष्ठान
णपरिग्रहादिकमुचितं दिवसव्यापारमन्वतिष्ठत्। ततः प्रभृति सुतरां देवताराधनेषु ब्राह्मणपूजासु गुरुजनसपर्यासु चादत्तवती बभूव। यच्च किंचित्कुतश्चिच्छुश्राव गर्भतृष्णया तत्तत्सर्वं चकार। न महान्तमपि क्लेशमजीगणत्। अनवरतदह्यमानगुग्गुलुबहुलधूपान्धकारितेषु चण्डिकागृहेषु धवलाम्बरशुचिमूर्तिरुपोषिता हरितकुशोपच्छदेषु मुसलशयनेषु सुष्वाप। पुण्यसलिलपूर्णैर्विविधकुसुमफलोपेतैः क्षीरतरुपल्लवलाञ्छनैः सर्वरत्नगर्भैः शातकुम्भकुम्भैर्गोकुलेषु वृद्धगोपवनिताकृतमङ्गलानां लक्षणसंपन्नानां गवामधः सस्नौ। प्रतिदिवसमुत्थायोत्थाय सर्वरत्नोपेतानि हैमानि तिलपात्राणि ब्राह्मणेभ्यो ददौ। महानरेन्द्रलिखितमण्डलमध्यवर्तिनी विविधबलिदानानन्दितदिग्देवतानि बहुलपक्षचतुर्दशीनिशासु चतुष्पथे स्नपनमङ्गलानि भेजे। सिद्धायतनानि कृतविचित्रदेवतोपयाचितानि सिषेवे। संनिधानमातृभवनानि जगाम। प्रसिद्धेषु नागकुलह्रदेषु ममज्ज। अश्वत्थप्रभृतीनुपादितपूजान्महावनस्पतीन्कृतप्रदक्षिणा ववन्दे। दोलायमानमणिवलयेन पािणयुगलेन ज्ञाता स्वयमखण्डसिक्थसंपादितं रजतपात्रे परिगृहीतं वायसेभ्यो दध्योदनबलिददात्। अपरिमितकुसुमधूपविलेपनोपपलपायसबलिंलाजकलितामहरहरम्बादेवीसपर्यामाततान। स्वयमुपहृतपिण्डपात्रान्भक्तिप्रवणेन मनसा सिद्धादेशाश्रमक्षपणकान्पप्रच्छ। विप्रश्नादिशवचनानि बहु मेने। निमित्तज्ञानुपचचार शकुनज्ञानविदामादरमदर्शयत्। अनेकवृद्धपरंपरागमागतानि रहस्यान्यङ्गीचकार। दर्शनागतं द्विजजनमात्मजदर्शनोत्सुका वेदश्रुतीरकारयत्। अनवरतवाच्यमानाः पुण्यकथाः शुश्राव। गोरोचनालिखितभूर्जपत्रगर्भान्मन्त्रकरण्डकानुवाह।
पद (Word) विग्रह / विवरण विशेष / अर्थ
गर्वतृष्णयागर्भस्य तृष्णा (षष्ठी तत्पुरुष), तयासंतान की तीव्र इच्छा से
मुसलशयनेषुमुसलानि एव शयनानि (रूपक), तेषुमूसलों की शय्या पर (कठिन तप)
शातकुम्भकुम्भैःशातकुम्भस्य (स्वर्णस्य) कुम्भाः (षष्ठी तत्पुरुष), तैःसोने के घड़ों से
सिद्धादेशाश्रमक्षपणकान्सिद्धाः आदेशाः येषां ते (बहुव्रीहि), तान् क्षपणकान्जिनकी भविष्यवाणियाँ सिद्ध हों, उन जैन मुनियों से
दध्योदनबलिम्दध्ना सहितः ओदनः (मध्यमपदलोपी), तस्य बलिःदही-चावल की बलि (भोग)
मन्त्रकरण्डकान्मन्त्राणां करण्डकाः (षष्ठी तत्पुरुष)मंत्रों के ताबीज/डिब्बियाँ
हिन्दी अनुवाद: उसके बाद रानी विलासवती उचित दैनिक कार्यों को करने लगीं। तब से वे देवताओं की आराधना, ब्राह्मणों की पूजा और गुरुजनों की सेवा में अत्यंत संलग्न हो गईं। संतान की लालसा में उन्होंने जहाँ कहीं से जो कुछ भी सुना, वह सब किया और बड़े से बड़े कष्ट की भी परवाह नहीं की। वे चण्डिका के उन मंदिरों में, जो निरंतर जलने वाले गुग्गुल के धूप से अंधकारमय रहते थे, श्वेत वस्त्र धारण कर पवित्र मूर्ति के समान उपवास रखकर हरी कुश की घास बिछी हुई मूसलों की कठिन शय्या पर सोईं। उन्होंने गौशालाओं में वृद्ध गोपियों द्वारा मांगलिक कार्य किए जाने पर, शुभ लक्षणों वाली गायों के नीचे खड़े होकर, रत्नों और पवित्र जल से भरे सोने के घड़ों से स्नान किया। वे प्रतिदिन उठकर ब्राह्मणों को रत्नों से युक्त सोने के तिल-पात्र दान करने लगीं। कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की रात्रियों में चौराहों पर महान तांत्रिकों द्वारा बनाए गए मण्डलों के बीच बैठकर उन्होंने विविध बलियों से दिगपालों को प्रसन्न करते हुए मांगलिक स्नान किए। उन्होंने सिद्धों के स्थानों और देवी मंदिरों की सेवा की, प्रसिद्ध नाग-सरोवरों में स्नान किया और अश्वत्थ (पीपल) जैसे पूजनीय वृक्षों की प्रदक्षिणा कर उन्हें प्रणाम किया। अपने हाथों से चांदी के पात्र में दही-चावल लेकर उन्होंने कौओं को बलि दी। वे प्रतिदिन देवी की पूजा में फूल, धूप और खीर का अर्पण करती थीं। उन्होंने स्वयं भिक्षा-पात्र लेकर सिद्धों और भविष्यवक्ताओं से अपने भाग्य के बारे में पूछा। वे शकुन शास्त्र के ज्ञाताओं का आदर करती थीं और लोक-परंपरा से चले आ रहे गुप्त मंत्रों को मानती थीं। पुत्र दर्शन की इच्छुक रानी ने ब्राह्मणों से वेदों का पाठ कराया, पुण्य कथाएं सुनीं और गोरोचन से लिखे मंत्रों वाले ताबीजों को धारण किया।
Full English Translation: Thereafter, Queen Vilasavati attended to her appropriate daily duties. From that time on, she became intensely devoted to the worship of deities, the honoring of Brahmins, and the service of elders. Driven by the longing for a child, she did whatever she heard from any source, regardless of the great hardships involved. In the temples of Goddess Chandika, darkened by the constant smoke of burning Guggulu incense, she, clad in pure white garments, observed fasts and slept on harsh beds made of pestles covered with green Kusha grass. In cow-pens, she bathed under auspicious cows while elderly cowherd women performed rituals, using golden jars filled with gems and holy water. Rising early every day, she gave Brahmins golden vessels filled with sesame and precious gems. On the nights of the fourteenth day of the dark fortnight, she underwent auspicious ablutions at crossroads, seated in the center of mystical circles drawn by great sorcerers. She visited the abodes of perfected beings (Siddhas), bathed in the famous lakes of the Naga clans, and circumambulated sacred trees like the holy fig (Ashvattha). With her own hands, she offered oblations of curd and rice in silver vessels to the crows. Daily, she performed extensive worship of the Mother Goddess with flowers, incense, and milk-rice. With a heart full of devotion, she offered food to wandering monks and asked them about her destiny. She honored those skilled in reading omens and accepted ancient secret remedies. Eager to see her own son, she had Brahmins recite the Vedas, listened to holy stories, and wore amulets containing birch-leaves inscribed with mantras in yellow pigment (Gorochana).
कादंबरी भाष्य - पृष्ठ ६५
कादंबरी: पृष्ठ ६५ - राजा और शुकनास के शुभ स्वप्न
रक्षाप्रतिसरोपेतान्योषधिसूत्राणि बबन्ध। परिजनोपि चास्याः सततमुपश्रुत्यै निर्जगाम तन्निमित्तानि च जग्राह। शिवाभ्यो मांसबलिपिण्डमनुदिनं निशि समुत्ससर्ज। स्वप्नदर्शनाश्चर्याण्याचार्याणामाचचक्षे। चत्वरेषु शिवबलिमुपजहार।

एवं च गच्छति काले कदाचिद्राजा क्षीणभूयिष्ठायां रजन्यामल्पशेषपाण्डुतारके जरत्पारापतपक्षधूसरे नभािस स्वप्ने सितप्रासादशिखरस्थिताया विलासवत्याः करिण्या इव बिसवलयमानने सकलकलापरिपूर्णमण्डलं शशिनं प्रविशन्तमद्राक्षीत्। प्रबुद्धश्चोत्थाय हर्षविकासस्फीततरेण चक्षुषा धवलीकृतवासभवनस्तस्मिन्नेव क्षणे समाहूय शुकनासाय तं स्वप्नमकथयत्। स तं समुपजातहर्षः प्रत्युवाच। देव संपन्नाः सुचिरादस्माकं प्रजानां च मनोरथाः। कतिपयैरेवाहोिभिरसंदेहमनुभवति स्वामी सुतमुखकमलालोकनसुखम्। अद्य खलु मयापि निशि स्वप्ने धौतसकलवाससा शान्तमूर्तिना दिव्याकृतिना द्विजेन विकचं चन्द्रकलावदातदलशतमलोकेसरसहस्रजालं मकरन्दबिन्दुसीकरवर्षि पुण्डरीकमुत्सङ्गे देव्या मनोरमाया नििहतं दृष्टम्। आवेदयन्ति हि प्रत्यासन्नानन्दमग्रपातीनि शुभानि निमित्तानि।
पद (Word) विग्रह / विवरण विशेष / अर्थ
रक्षाप्रतिसरोपेतानिरक्षायै प्रतिसराः (कङ्कणानि), तैः उपेतानि (तृतीया तत्पुरुष)रक्षा के धागों/कंकणों से युक्त
क्षीणभूयिष्ठायाम्क्षीणं भूयिष्ठं यथा स्यात् तथा (बहुव्रीहि)जब रात लगभग बीत चुकी हो
जरत्पारापतपक्षधूसरेजरतः पारापतस्य पक्षाः इव धूसरम् (उपमित समास)वृद्ध कबूतर के पंखों जैसा मटमैला/धूसर आकाश
बिसवलयमाननेबिसस्य वलयम् इव (उपमित), आनने (मुख में)कमल के नाल के समान मुख में
अवितयफलाश्चन वितथं फलं येषां ते (नञ् बहुव्रीहि)अचूक या सत्य फल देने वाले (स्वप्न)
पुण्डरीकमुत्सङ्गेपुण्डरीकम् (श्वेतकमलम्) + उत्सङ्गे (गोद में)गोद में श्वेत कमल
हिन्दी अनुवाद: रानी ने रक्षा के धागों और औषधियों से युक्त ताबीज बांधे। उनके सेवक भी शुभ संकेतों को जानने के लिए बाहर जाते और शकुन देखते थे। वे प्रतिदिन रात में सियारिनों के लिए मांस के बलि-पिण्ड फेंकते थे, विद्वानों को अपने आश्चर्यजनक स्वप्न बताते थे और चौराहों पर शिव-बलि अर्पित करते थे।

इस प्रकार समय बीतने पर, एक दिन राजा ने रात के अंतिम प्रहर में—जब तारे धुंधले पड़ गए थे और आकाश वृद्ध कबूतर के पंखों जैसा धूसर था—स्वप्न देखा। उन्होंने देखा कि सफेद महल के शिखर पर बैठी विलासवती के मुख में, वैसे ही चंद्रमा प्रवेश कर रहा है जैसे हथिनी के मुख में कमल का नाल। जागने पर राजा ने हर्षित होकर उसी क्षण शुकनास को बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया। शुकनास ने प्रसन्न होकर उत्तर दिया— "हे देव! हमारे और प्रजा के मनोरथ सिद्ध हो गए हैं। कुछ ही दिनों में स्वामी पुत्र के मुख-कमल को देखने का सुख प्राप्त करेंगे। आज रात मैंने भी स्वप्न में देखा कि श्वेत वस्त्र धारण किए एक दिव्य ब्राह्मण ने देवी मनोरमा की गोद में एक खिलता हुआ श्वेत कमल (पुण्डरीक) रखा है, जो अमृत की बूंदों की वर्षा कर रहा था। ये शुभ शकुन आने वाले आनंद की सूचना दे रहे हैं।"
Full English Translation: The Queen wore protective amulets combined with medicinal herbs. Her attendants also went out to listen for omens and gather auspicious signs. Every night, they offered meat-balls to the jackals, described wondrous dreams to teachers, and placed offerings at crossroads.

As time passed, one day, when the night was almost over and the sky was as grey as an old pigeon's wing, the King had a dream. He saw the full moon entering the mouth of Queen Vilasavati, who was sitting on the terrace of the white palace, just as a lotus stalk enters the mouth of a female elephant. Upon waking, his eyes wide with joy, he immediately summoned Shukanasa and told him the dream. Shukanasa, filled with joy, replied— "My Lord, our desires and those of our subjects are now fulfilled. In a few days, you will surely experience the happiness of seeing the lotus-like face of a son. Indeed, I too saw a dream tonight where a divine Brahmin in pure white garments placed a blooming white lotus (Pundarika), dripping with nectar, into the lap of Queen Manorama. These auspicious signs herald the approaching joy."
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