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जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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यजुर्वेद प्रथम अध्याय प्रथम मंत्र



ओ3म् इशे त्वोरज्जे त्वा वैव स्थ देवो वः शिव प्रापयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणाऽआप्ययध्वमघ्यइन्द्राय भागं प्रजावतिर्नमिवाऽअयक्षमा मा वस्तेनेऽईषत् माघशांसो ध्रुवाऽअस्मिन् गोपतौ स्यात् वह्वीर्यजमानस्य पशुन्पाहि।।


🕉️ यजुर्वेद का प्रथम मंत्र

वेद, उपनिषद, गीता और रामायण के आलोक में संपूर्ण ईश्वरीय विवेचन


🔷 भूमिका : यजुर्वेद का प्रथम मंत्र क्यों महत्वपूर्ण है?

भारतीय वैदिक परंपरा में यजुर्वेद का स्थान कर्मकांड, यज्ञ और जीवन-कर्म को वेद के रूप में माना जाता है।
यजुर्वेद विधि का प्रथम मंत्र केवल यज्ञ की व्याख्या नहीं करता, बल्कि यह मानव जीवन के लक्ष्य, कर्म की दिशा और ईश्वर-स्मृति का मूल सूत्र प्रस्तुत करता है।

यह मंत्र बताता है कि—

कर्म जाति के लिए किया जाए,
किस भावना से किया जाए,
और उसका परम उद्देश्य क्या है।


🕉️ मूल संस्कृत मंत्र (यजुर्वेद - प्रथम मंत्र)

ॐ इशे त्वोरजे त्वा
वायवः स्थ देवो वः सविता प्रापयतु
श्रेष्ठतमाय कर्मणे।
आप्यायध्वमघ्न्यं
इन्द्राय भगं प्रजावतिरनमिवा।
अयक्ष्मा मा वोस्तेन ईष्ट
माघंसो ध्रुवा अस्मिन्
गोपतौ स्यात्।
वहवीर्यजमानस्य पशुन् पाहि ॥


🔶 मंत्र का पद-पद अर्थ (शब्दार्थ सहित)

1️⃣

ॐ पूर्ण ब्रह्म का प्रतीक है -
सृष्टि, स्थिति और लय का एकत्व।

👉 उपनिषद कहते हैं:
"ॐ इत्येतदक्षरं ब्रह्म"


2️⃣ इशे त्वा

हे देवता! मैं भूखा अन्न और पोषण के लिए ग्रहण करता हूँ।

👉यह जीवन की भौतिक आवश्यकता का प्रतीक है।


3️⃣ ऊर्जा त्वा

हे देवता! मैं हथियार ऊर्जा, बल और प्राणशक्ति के लिए ग्रहण करता हूँ।

👉सिर्फ अन्न नहीं, जीवन-शक्ति भी जरूरी है।


4️⃣ वायवः स्त

तुम वायु के समान गतिशीलता हो।

👉 वायु = प्राण
👉 प्राण = जीवन


5️⃣ देवो वः सविता प्रापयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे

दिव्य देव शस्त्र श्रेष्ठ कर्म की ओर प्रेरित करें।

👉यह मंत्र का बिंदु है।

श्रेष्ठतम कर्म =

  • निष्काम कर्म
  • लोककल्याण
  • धर्म आचरण

🔷 दार्शनिक भावार्थ (सरल भाषा में)

यह मंत्र है:

"हे ईश्वर!
हमें अन्न दो,
ऊर्जा दो,
प्राण दो,
और हमें ऐसे कर्म की प्रेरणा दो
जो सबसे श्रेष्ठ हो।"


🔶 उपनिषदों का सहसंबंध

उपनिषदों का मूल सिद्धांत:

अविद्या से विद्या की ओर।

यजुर्वेद का यह मंत्र:

  • बाहरी कर्म से
  • आन्त्रिक शुद्धि की ओर
    ले जाता है।

👉ईशावास्य उपनिषद में कहा गया है:

“कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः”

यानी —

कर्म करते ही सौ वर्ष जीवन की इच्छा करनी चाहिए।


🔷 गीता के प्रकाश में मंत्र का अर्थ

भगवद्गीता कहती है:

"निष्काम कर्मयोग"

यजुर्वेद का यह प्रथम मंत्र वही गीता-तत्त्व का बीज मंत्र है।

गीता 2.47:

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन"

👉 श्रेष्ठतम कर्म =
फल की इच्छा से अयोग्य कर्म।


🔶रामायण के सन्दर्भ में

श्रीराम का जीवन:

  • कर्मयोग का आदर्श
  • त्याग, प्रतिबंध और धर्म

श्रीराम ने कहा:

  • वनवास को स्वीकार किया गया
  • राजसिंहासन विदा
  • लोक कल्याण सर्वोपरि रखा

👉 यही श्रेष्ठतम कर्म है।


🔷 इंद्राय भागं - सिद्धांत सिद्धांत अर्थ

इंद्र केवल देवता नहीं,
👉 इंद्रिय-नियंत्रण का प्रतीक है।

इस मंत्र में:

“इंद्राय भागं”

यानी —

इंद्रियों को संयमित करो,
उन्हें धर्म के प्रकट करो।


🔶 आप्याध्वम् - आत्मिक पोषण

यह शब्द बताता है:

  • केवल शरीर नहीं
  • मन और आत्मा को भी पोषण की आवश्यकता है।

👉 उपनिषद कहते हैं:

“आत्मा वा अरे दृष्टव्यः”


🔷 अयक्ष्मा - रोग से मुक्ति

प्रार्थना मंत्र करता है:

हमें रोग, दुःख और पाप से मुक्त दिखाओ।

👉यह केवल शारीरिक रोग नहीं, 👉आध्यात्मिक अज्ञान का रोग भी है।


🔶 यजमान और पशु — इतिहास का अर्थ

  • यजमान = साधक
  • पशु = इन्द्रियाँ

अर्थ:

हे ईश्वर!
साधक की इंद्रियों की रक्षा करो
ताकि वे विषयों में न भटकें।


🔷 सम्पूर्ण दर्शन का सार

पाठ मुख्य शिक्षा
वेद श्रेष्ठ कर्म
उपषद आत्मज्ञान
गीता निष्काम कर्म
रामायण धर्ममय जीवन

👉यजुर्वेद का यह प्रथम मंत्र
इन चारों का बीज है।


🔷आधुनिक जीवन में इस मंत्र की उत्पत्ति

आज का मानव:

  • तनावग्रस्त
  • अन्तुलित
  • लक्ष्य

यह मंत्र सिखाया जाता है:

  • भोजन शुद्ध हो
  • कर्म शुद्ध हो
  • उद्देश्य शुद्ध हो

🔷 निष्कर्ष : प्रथम मंत्र का अंतिम संदेश

यजुर्वेद का यह प्रथम मंत्र हमें सिखाया जाता है कि—

जीवन केवल भोग नहीं है,
जीवन कर्म है,
और कर्म का उद्देश्य
आत्मिक विकास है।

यही वेदांत है,
यही गीता है,
यही रामायण है।


🕉️अंतिम भाव

श्रेष्ठतम कर्म ही
मनुष्य को
ब्रह्मज्ञान की ओर
ले जाता है।

👉 यजुर्वेद के प्रथम मंत्र का वेदान्तार्थ और ब्रह्मज्ञान से सम्बन्ध

पदार्थवान्व्यभाषाः- हे मनुष्य ! जो (सविता) सब जगत् की उत्पत्ति करने वाला संपूर्ण ऐश्वर्य (देवः) सब सुखों के देने वाला और सब विद्याओं को प्रसिद्ध करने वाला भगवान है। तो (वः) हम और आपके मित्रों के जो (वायवः) सभी मित्रों को सिद्ध करने वाले स्पर्शगुणवाले प्राण अन्तःकरण और इन्द्रियों (स्थिर) को (श्रेष्ठतमाय) अत्य्युत्तम (कर्ममाने) करने योग्य सर्वोपकारक यज्ञादि कर्मों के लिए (प्रायतु) अच्छा संयुक्त करें। हम लोग (ईशे) अन्न आदि उत्तम-उत्तम पदार्थ और विज्ञान की इच्छा और (उर्जे) लक्षण अर्थात उत्तम रस की प्राप्ति के लिए (भागम्) सेवा करने योग्य धन और ज्ञान के मूल (त्वा) उक्त गुण वाले और (त्वा) श्रेष्ठ गुण आदि गुणों को देने वाले आपका मतलब है भगवान के सभी खोजों से ग्रहण करते हैं। हे मित्र लोग ! तुम भ ऐसे बोले (आप्याध्वम्) अक्षर को प्राप्त हूं और हम भी हैं। भगवान जगदीश्वर हम लोगों के (इंद्राय) परम ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए (प्रजावतीः) बहुत संत हैं और जो (अनमिवाः) व्याधि और (अयक्षमाः) जिसमें राजयक्ष्मा आदि रोग नहीं हैं वे (अध्यायः) जो गौ आदि पशु या उत्पत्ति के योग्य हैं, जो हिंसा केन कर्म योग्य नहीं हैं, जो इंद्रियां या पृथ्वी आदि लोक हैं वे प्राचीन (प्रापयतु) स्थापित हैं। हे जगदीश्वर ! आपकी कृपा से हम लोगों को दुःख देने के लिए कोई (अघंसः) पापी या (स्तेनः) चोर मालगु (मा इशत्) मत उत्पन्न हो तथा आप (यजमानस्य) भगवान और सर्वोपकार धर्म का सेवन करने वाले मनुष्य के (पशुन्) गौ-घोड़े और हाथी आदि लक्ष्मी तथा प्रजा की (पाहि) विद्या रक्षा किजिये इन संतों को हरने वाला कोई दुष्ट मनुष्य समर्थ ना हो (अस्मिन) यह धार्मिक (गोपतौ) पृथ्वी आदि की रक्षा करने वाले तीसरे व्यक्ति मनुष्य के। समिप (विवहः) बहुत उक्त सुंदर पदार्थ (ध्रुव) निश्चल सुख के लाभ (स्यात्) होये। महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती

          भावार्थः--यजुर्वेद के प्रथम अध्याय के प्रथम मंत्र का भाष्य हर हुए महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने कहा है कि भगवान जो कहते हैं कि सभी प्रकार की विद्याओं का दान करने वाले सभी जगत के शिष्य हैं, हम सभी उनकी आराधना करते हैं और प्रकार का ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान प्राप्त करते हैं और ईश्वर स्वामी स्वामी से दिव्य दर्शन प्राप्त करते हैं। यहां सामुहिक रूप से सभी को कहा जा रहा है कि भगवान से हर प्रकार की रक्षा की कामना की जाती है।

          सर्व प्रथम ओ३म् का अर्थ यह है कि ओ3म् का आगे क्या मंत्र है , विस्तार। मेरी यह समझ है और जहां तक ​​मैं जानता हूं वहां के लोगों में बहुत प्रकार का अज्ञान अंधकार है, लगभग हर क्षेत्र में ज्यादातर वेदों से दूर है यह सब दूर हो सकता है यह विज्ञान कार्य बहुत बड़ा है फिर भी मेरी यह इच्छा है कि मैं वेद के हर मंत्र पर विस्तार से चर्चा करूं और वेद मंत्र के वास्तविक रूप से दिव्य आधार भूतसिद्धि को लेकर विचार करूं , जो कर रहा है वह पवित्र श्रृखला की यह पहली छाप है जिसे आप अपने लिए समर्पित कर सकते हैं।

इस ओ३म् नाम में हिन्दू , मुस्लिम , या इसाई जैसी कोई बात नहीं है। बल्कि ओ3म् तो किसी ना किसी रूप में सभी मुख्य कलाकारों का प्रमुख भाग है। यह तो अच्छाई , शक्ति , भक्ति और आदर का प्रतीक है। उदाहरण के लिए यदि हिंदू अपने सभी मंत्रों और भजनों को शामिल करता है तो ईसाई और यहूदी भी इसके लिए एक शब्द " आमीन " का प्रयोग धार्मिक सहमति के लिए करते हैं। हमारे मुस्लिम दोस्त " आमीन " कह कर याद करते हैं। बौद्ध इसका अर्थ " ॐ मणिपद्मे हूं " कहते हैं। शिक्षण मत भी " एक ओंकार " अर्थात " एक ॐ " का गुण गाता है।

अंग्रेजी का शब्द (ओमनी) अर्थ के साथ अनंत और कभी खाली न होने वाले तत्त्वों पर लागू होता है (जैसे ओमनीपोटेंट ओमनीसाइंट) , वास्तव में यह ओ3म् शब्द से ही बना है। इससे यह सिद्ध होता है कि ओ3म् किसी मत , मजहब या सम्प्रदाय से कोई भी पूरी तरह से इंसानियत का नहीं है। ठीक उसी प्रकार जैसे वायु , जल , सूर्य , ईश्वर , वेद आदि सभी मनुष्यत्व के लिए हैं, न कि केवल किसी एक सम्प्रदाय के लिए।

प्रश्न: ओ३म् वेद कहाँ है ?

उत्तर: यजुर्वेद [2/30 , 40/15 , 17] , ऋग्वेद [/13/7] आदि स्थान पर। इसके अलावा गीता और उपनिषदों में ओ3म् का बहुत गुणगान हुआ है। मांडूक्य उपनिषद तो इसकी महिमा को ही समर्पित है।

प्रश्न: ओ३म् का अर्थ क्या है ?

उत्तर: वैदिक साहित्य इस बात पर एकमत है कि ओ3म् ईश्वर का मुख्य नाम है। योग दर्शन [1/27 , 28] में यह स्पष्ट है। यह ओ3म् शब्द तीन अक्षर से मिलकर बना है- अ , , म। प्रत्येक अक्षर ईश्वर के अलग-अलग द्वीपों को अपने में सम्मिलित किया गया है। जैसे " " से व्यापक , सर्वदेशीय , और पूजा करने योग्य है। " " से बुद्धि , सूक्ष्म , सबाईयों का मूल , नियम बनाने वाला है।से अनंत , अमर , ज्ञानवान और पालन करने वाला है। ये तो बहुत ही सरल से उदाहरण हैं जो ओ3म् के प्रत्येक अक्षर से समझे जा सकते हैं। वास्तव में अनंत ईश्वर के अनगिनत नाम केवल इस ओ3म् शब्द में ही आ सकते हैं , और किसी में नहीं।

          उत्तर: जो आप " शब्द-अर्थ " संबंध पर विचार करते हैं तो ऐसा कभी न कहें। असल में हरेक ध्वनि हमारे मन में कुछ भाव उत्पन्न करती है। सृष्टि की शुरुआत में जब ईश्वर ने ऋषियों के हृदय वेदों में प्रकाशित किया तो हरेक शब्दों से संबंधित उनका निश्चित अर्थ ऋषियों ने ध्यान की स्थिति में प्राप्त किया। ऋषियों के अनुसार ओ3म् शब्दों के तीन अक्षर अलग-अलग अर्थ अलग-अलग हैं , जिनमें से कुछ ऊपर दिए गए हैं।

ऊपर दिए गए शब्द-अर्थ संबंध का ज्ञान वास्तव में वेद मंत्रों के अर्थ में सहायक होता है और इस ज्ञान के लिए मनुष्य को योगी अर्थात ईश्वर का दर्शन और अनुभव करना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से वेद पर ज्यादातर लोगों ने कलम चलायी है जो योग तो दूर , यम सुगंध की परिभाषा भी नहीं जानते। सभी पश्चिमी वेद भाष्यकार इसी श्रेणी में आते हैं। तो अब प्रश्न यह है कि जब तक साक्षात ईश्वर का प्रत्यक्ष न हो तब तक वेद को कैसे माना जाए ? तो इसका उत्तर यह है कि ऋषियों के लेख और अपनी बुद्धि से सत्य निर्णय लेना सभी बुद्धिओं के लिए अत्यंत आवश्यक है। ऋषियों के ग्रंथ जैसे उपनिषद , दर्शन , ब्राह्मण ग्रंथ , निरुक्त , निघंटु , सत्यार्थ प्रकाश , भाष्य भूमिका , अन्य सहायता वेद मंत्रों पर विचार करके अपने सिद्धांत। और इसमें यह भी बताया गया है कि यमराजन का मूल्यांकन करने के साथ-साथ उनका पालन-पोषण करना भी बहुत जरूरी है। वास्तव में वेदों का सच्चा स्वरूप तो समाधि अवस्था में ही स्पष्ट होता है , जो कि यम सिद्धांतों के अभ्यास से होता है।

व्याकरण शास्त्र से वेदों का अर्थ कोई भी नहीं पढ़ सकता। वेद बोध के लिए आत्मा की ध्वनि की सबसे अधिक आवश्यकता है। उदाहरण के लिए संस्कृत में " गो " शब्द का वास्तविक अर्थ " गतिमान " है । इस शब्द के बहुत से अर्थ हैं जैसे पृथ्वी , नक्षत्र आदि देखने में आते हैं। लेकिन मूर्ख और हाथी लोग हर स्थान पर इसका अर्थ गाय ही तोड़ देते हैं और मंत्र के वास्तविक अर्थ से दूर हो जाते हैं। वास्तव में किसी भी शब्द के वास्तविक अर्थ के लिए उसका मूल ज्ञान आवश्यक है , और मूल विना समाधि के बारे में नहीं जाना जा सकता है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि हम वेद का अभ्यास ही नहीं करते। अपने सर्वांगीण मूल्य से कर्मों में गहना से आत्मा में स्वर्ण धारण करके वेद का अभ्यास करना सर्वोपरि है।

प्रश्न: ओ3म् के प्रत्येक अक्षर से भिन्न भिन्न अर्थ की कल्पना हमें ठीक नहीं जान पड़ती। किसी भी तरह से उदाहरण से और स्पष्ट बातचीत।

उत्तर: यह शब्द अर्थ संबंध योगाभ्यास से स्पष्ट होता है। लेकिन कुछ उदाहरण तो प्रत्यक्ष ही हैं। जैसे " " से ईश्वर के पालन आदि गुण प्रकाशित होते हैं। पालन-पोषण आदि गुण मुख्य रूप से माता से ही पहचाने जाते हैं। अब विचार करना चाहिए कि सभी पात्रों में माता के लिए क्या शब्द प्रयोग होते हैं। संस्कृत में माता , हिंदी में मां , अरबी में अम्मीअंग्रेजी में मां , मां , मां आदि , फारसी में मादर , चीनी भाषा में माकुन आदि। इतना ही स्पष्ट है कि " " का पालन करने वाले मूल गुण से वेद का कितना अधिक संबंध है। एक छोटा बच्चा भी सबसे पहले यही " " सीखता है और इसी से अपना भाव व्यक्त करता है। इसी से पता चलता है कि ईश्वर की रचना और उनके वेदों में गहरा संबंध है।

प्रश्न: अच्छा! माना कि ओ3म् का अर्थ बहुत अच्छा है , दूसरे मत का उच्चारण क्यों करना ?

उत्तर: इसके कई शारीरिक , मानसिक और आत्मिक लाभ हैं। यहाँ तक कि यदि आपका अर्थ भी भिन्न नहीं है तो इसके उच्चारण से शारीरिक लाभ भी होगा। इसमें यह बताया गया है कि ओ3म् किसी एक धर्म की पहचान है , ठीक बात नहीं। दुर्भाग्य से इस टैब से पता चलता है कि कोई अलग धर्म नहीं बनाया गया! ओ3म् को झुठलाना और इसका प्रयोग न करना तो ऐसा ही है जैसे किसी ने यह हवा , पानी , खाना आदि लेना छोड़ दिया कि ये तो उसके मजहब के आने से पहले भी हो गए थे! तो ये ठीक बात है नहीं. ओ3म् के ऐसे कोई नहीं है कि किसी के भगवान/अल्लाह का अनादर हो जाये। इसके उच्चारण में कोई परेशानी नहीं है।

ओ3म् यह ब्रह्माण्ड में आकाश की तरह भरा हुआ है। ओ3म् के उच्चारण से जो आनंद और शांति का अनुभव होता है , ओ3म् के उच्चारण से जो आनंद और शांति का अनुभव होता है, वह नहीं होता। यही कारण है कि सभी जगह बहुत लोकप्रिय होने वाला आसन प्राणायाम की कक्षा में ॐ का उच्चारण बहुत महत्वपूर्ण है। बहुत मानसिक तनाव और अवसाद से पीड़ित लोगों पर कुछ ही दिनों में जादू-टोने का प्रभाव होता है। यही कारण है कि डॉक्टर आदि भी अपने शिष्यों को आसन प्राणायाम की शिक्षा देते हैं।

प्रश्न: ओ3म् के उच्चारण के शारीरिक लाभ क्या हैं ?

उत्तर: कुछ लाभ नीचे दिये गये हैं

1. कई बार ओ3म् का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनाव मुक्त हो जाता है।

2. यदि आप चिंता या अधीरता है तो ओ3म् के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं!

3. यह शरीर के विभिन्न तत्त्वों को दूर करता है , यानी तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों को नियंत्रित करता है।

4. यह हृदय और रक्त का प्रवाह स्थिर रहता है।

5. इससे पाचन शक्ति तेज होती है।

6. इस शरीर में फिर से युवा अवस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है।

7. थकान से बचने के लिए ये बेहतरीन उपाय और कुछ नहीं।

8. नींद न आने की समस्या कुछ ही समय में दूर हो जाती है। रात को सोते समय नींद आना मन में निश्चित करने से निश्चित नींद आएगी।

9 कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से दरवाजे में आराम मिलता है।

और भी अन्य!

प्रश्न: ओ3म् के उच्चारण से मानसिक लाभ क्या हैं ?

उत्तर: ओ3म् के उच्चारण का अभ्यास जीवन बदलता है

1. जीवन की शक्ति और दुनिया की झलक का सामना करना पूर्व साहसिक कार्य है।

2. इसे करने वाले खंडन और खंडन के बारे में नहीं पता!

3. प्रकृति के साथ उत्कृष्ट मानक और नियंत्रण होता है। यूनिवर्स को पहले ही भांपने की शक्ति पैदा हो गई थी।

4. आपके उत्तम व्यवहार से निबंधों के साथ संबंध उत्तम होते हैं। शत्रु भी मित्र हो जाते हैं।

5. फिल्म का उद्देश्य बताया गया है कि जो अधिकाँश लोगों की जिंदगी ओझल में रहती है।

6. इसे करने वाला व्यक्ति जोश के साथ जीवन का चयन करता है और मृत्यु को भी ईश्वर की व्यवस्था समझ कर स्वीकार कर लेती है।

7. जिंदगी में फिर किसी बात का डर ही नहीं रहता।

8. आत्महत्या जैसा कायरता के विचार आस पास भी नहीं फटकते। बल्कि जो आत्महत्या करना चाहते हैं , वे एक बार O3M के उच्चारण का अभ्यास 4 दिन तक कर लें। उसके बाद खुद का निर्णय कर लें कि जीवन जीने के लिए छोड़ दें!

प्रश्न: ओ3म् के उच्चारण से आध्यात्मिक (रूहानी) लाभ क्या हैं ?

उत्तर: ओ3म् के स्वरूप में ध्यान लगाना सबसे बड़ा काम है। इससे ज्यादा मुनाफा कमाने वाला काम तो दुनिया में दूसरा है ही नहीं!

1. इसे करने से ईश्वर/अल्लाह से संबंध जुड़ता है और लंबे समय तक अभ्यास करने से ईश्वर/अल्लाह को अनुभव (महसूस) करने की शक्ति पैदा होती है।

2. इससे जीवन के उद्देश्य स्पष्ट होते हैं और यह पता चलता है कि कैसे ईश्वर सदा हमारे साथ हमें प्रेरित कर रहे हैं।

3. इस दुनिया की अंधी दौड़ में खोया खुद को फिर से बनाया जाता है। इसे पुनः प्राप्त करने के बाद इंसान दुनिया में दौड़ने के लिए नहीं, बल्कि अपने लक्ष्य को पाने के लिए दौड़ना है।

4. इस अभ्यास से दुनिया का कोई डर भी नहीं फटक सकता। मृत्यु का डर भी ऐसे व्यक्ति से डरता है क्योंकि काल का भी काल है जो ईश्वर है , वो सभी काल में मेरी रक्षा के लिए व्यवसाय कर रहा है , ऐसी सोच कर व्यक्ति का डर हमेशा के लिए दूर हो जाता है। जैसे महायोगी श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध के दौरान भी ईश्वर का ध्यान आकर्षित किया था। यह बल व निद्रता ईश्वर से उनके समकक्ष का ही प्रमाण है।

5. इसके अभ्यास से वह कर्म फल व्यवस्था स्पष्ट करता है कि ईश्वर ने हमारे कल्याण के लिए ही प्रतिज्ञा की है। जब पवित्र ओ3म् के उच्चारण से हृदय निर्मल होता है तब पता चलता है कि हमसे मिलने वाला सुख है यदि हमारे भोजन के समान सुख है तो दुख भी होता है और औषधि के समान सुख है जो आत्मा को नष्ट करके उसे स्वस्थ कर देता है। इस प्रकार ईश्वर के दंड में भी उसकी दया का जब बोध होता है तो वह परम मूल्यवान जगत माता के दर्शन और प्राप्ति की इच्छा हो जाती है और मनुष्य उसे बिना श्रृंखला के नहीं पा सकता है। इस प्रकार व्यक्तिगत मुक्ति का मूल पहला कदम है!

प्रश्न: अधिकतम लाभ पाने के लिए हमें क्या करना चाहिए ?

उत्तर:ओ३म एक्सपर्ट का अभ्यास इसका सबसे बड़ा साधन है। यम व नियम संक्षेप से नीचे दिये गये हैं

यम

1. अहिंसा (किसी सज्जन और बेगुनाह को मन , वचन या कर्म से दुःख न देना)

2. सत्य (जिस मन में सोचा हो वही वाणी से बोला और वही अपने कर्म में करना)

3. अस्तेय (किसी की कोई चीज़ नहीं चाहिए)

4. ब्रह्मचर्य (अपनी वैयक्तिक वैराग्य पर पूर्ण नियंत्रण)

5. अपरिग्रह (सांसारिक वस्तु भोग व धन आदि में स्थिरता न होना)

👉 यह भी  पढें यजुर्वेद प्रथम मंत्र सृष्टि सृजन संहार

सिद्धांत

1. शौच (मन , वाणी व शरीर की गुड़िया)

2. संतोष (पूरे प्रयास करते हुए सदा रुचि रखना , विपरीत विचारधारा से दुखी न होना)

3. तप (सुख , दुःख , हानि , लाभ , पलायन , गर्मी , भूख , प्यास , आदि की वजह से कभी भी धर्म नहीं रहता)

4. स्वाध्याय (अच्छे ज्ञान , विज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रयास करना)

5. ईश्वर प्रणिधान

प्रश्न: यम नियमों का पालन करने के अलावा सुबह शाम ध्यान देना चाहिए और उसकी क्या विधि है ?

उत्तर: अवश्य। यम नियम तो आत्मा रूपी प्लास्टर की सफाई के लिए है ताकि ईश्वर अपने प्रेम भोजन का दे सके। उसे भोजन सुबह शाम एकाग्र मन के साथ ईश्वर से मांगना चाहिए। ओ3म् का उच्चारण समान भोजन दोपहर की प्रक्रिया है। अब क्या करना चाहिए वह नीचे दिए गए हैं

1. जिस जगह शुद्ध हवा हो , वहां अच्छी जगह पर कमर सीधी करके बैठती है। आंख बंद करके गहरी गहरी सांसें धीरे-धीरे छोड़ें जिससे शरीर में कोई तनाव न रहे।

2. दिन में 4 बार ओ3म् का उच्चारण बहुत उपयोगी है। पहली सुबह सोकर रात को ही , दूसरी शौच व स्नान के बाद , तीसरी सूरज के समय शाम को और चौथी रात सोने से बिल्कुल पहले। इसके अलावा जब कभी खाली बैठे किसी की प्रतीक्षा या यात्रा कर रहे हों तो भी इसका उपयोग कर सकते हैं।

3. धीरे-धीरे उच्चारण की कहावत को पुष्ट किया जा सकता है , पर जितना संभव हो सके अपनी दृढ़ता में हो।

4. कम से कम एक बार में 5 बार अवश्य उच्चारण करें। मुंह से बोलने के बजाय मन में भी उच्चारण कर सकते हैं।

5. अपने हर बार के उच्चारण में ईश्वर को पाने की इच्छा और उसके लिए प्रयास करने का वादा मन ही मन ईश्वर से करना चाहिए।

6. हर बार शुरुआत से पहले यह प्रतिज्ञा करनी थी कि अगली बार बैठूंगा तो इस बार से श्रेष्ठ चरित्र का व्यक्ति बैठूंगा। अर्थात हर बार पुनः आरंभ के बाद अपने जीवन का हर काम अपनी इस प्रतिज्ञा को पूरा करते हुए। कभी ईश्वर को दी गई प्रतिज्ञा नहीं तोड़ना।

जरूरी बात: ईश्वर ही सभी पालक , माता और पिता हैं। इसलिए कोई भी व्यक्ति ईश्वर का ध्यान न करे, किसी गुरु , पीर , बाबा आदि का ध्यान न करे। क्योंकि सभी बाबा , गुरु , पीर आदि अपने भक्तों का ही दर्शन कराते हैं औरों का नहीं , और इसी से वे सभी पूर्वसिद्ध सिद्ध होते हैं। ईश्वर ईश्वर सभी पालकों से पूर्व निर्धारित आदि दोषों से दूर है और केवल इसलिए ध्यान देने योग्य है और भजने योग्य है , और कोई नहीं।

प्रश्न: मैं एक मुस्लिम हूं और आप तो अमेरिकी विरोध करते हैं। फिर मैं विवाह की बात क्यों सुनूँ ?

उत्तर: 1. जैसे हमने पहले लिखा है कि ओ3म् में हिंदू मुस्लिम जैसी कोई बात नहीं। क्या कोई मुस्लिम भाई/बहन सिर्फ इसीलिए मना कर सकता है/सकती है कि कुरान में इसका वर्णन नहीं है या यह अरब देश में नहीं है ? ओ3म् तो एक ईश्वर/अल्लाह के गुणों को अपने में समाहित कर लिया है तो फिर समस्या क्या है ?

2. हम कई बातें में अभिनेत्री से और वे कई बातें हमसे इक्तलाफ (विरोध) कर सकते हैं। लेकिन फलाफे पर अलग राय होना कोई गलत बात नहीं है। क्या आप अपनी अम्मी के हाथ की रोटी सिर्फ इसलिए खानी बंद कर देते हैं कि वो किसी भी मामले में आपसे जुदा राय लिखते हैं ? यदि नहीं तो अपने और चिकित्सकों के आहार या इक्लाफ से आप उन्हें शत्रु क्यों समझें ?

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3. जिस तरह बैठ कर नमाज पढ़ी हो , उसने हमारे योग की विधि में वज्रासन नाम से लिखा है। तो क्या आप नमाज़ भी पढ़ना छोड़ देंगे ? नहीं , जब ऐसी बात नहीं तो फिर ओ3म् में विरोध क्यों ?

4. चलो अगर मैंने भी मान लिया है कि आप हमारे प्रति घृणा करते हैं तो भी हे भगवान से घृणा क्यों ? क्या आप हवाई जहाज , रेलगाड़ी , कार , कंप्यूटर , रेशम , फोन आदि का उपयोग नहीं करते हैं जो ईसाइयों , आदिवासियों , और व्यवसायों ने बनाए हैं ? यदि हाँ तो ओ3म् का विरोध क्यों ?

5. और इसी तरह , बातचीत और प्रश्न उत्तर तो अल्लाह/ईश्वर को और उस की इस कायनात को समझने का ज़रिया हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो हमारे शरीर में मौजूद इलेक्ट्रोलाइट्स ये कुव्वत (शक्ति) ही नहीं देते कि हम आपसे सवाल करें। तो इसलिए यह सुझाव देना चाहिए कि डॉक्टरों के सवालों का जवाब देना तो अल्लाह की इबादत करना है क्योंकि ऐसा करना हकपरस्ती (सत्य की खोज) की राहों पर कदम रखना है।

6. तो मेरे अज़ीज़ भाई , कुछ भी हो , गुस्सा भी करो , हम पर सवाल भी करो , लेकिन जो साधारण फायदे की चीज़ है , उस पर अमल ज़रूर करो। यही असली जिंदगी का राज है।

7. नमाज के बाद तीन बार ओ3म् का जाप उसका मतलब के साथ देखें और 4 दिन बाद खुद फैसला कर लें कि जिंदगी में कुछ बदलाव नहीं हुआ। इसे आप मन में भी इबादत करते हुए याद कर सकते हैं क्योंकि यह तो अल्लाह का ही नाम है।

प्रश्न: अभी भी एक प्रश्न है। इस भाग में जंगली जानवरों में केवल एक शब्द का उच्चारण करके क्या हो जाएगा ? बल्कि ऐसा लगता है कि ये तो जिंदगी की तस्वीरों से देखने का एक तरीका है!

उत्तर: नहीं। ऐसा तब होता है जब इसे करने के लिए जंगल जाने की शर्त होती है! पर ऐसा नहीं है. युद्ध के मैदान में तलवारों को निरंतर धार लगी हुई नहीं है तो उसका मार कम हो जाता है। ठीक इसी प्रकार, यदि एक घंटा धार लगा कर पूरे दिन की शत्रुता पर विजय पाई जाए तो यह कोई दुकानदारी का सौदा नहीं है! और यही तो समय होता है कि जब कोई ईश्वर दिए गए वादों पर विचार करता है और अपने वादों पर क्षमा याचना करके आगे से उन्हें ना तोड़ने का दृढ़ संकल्प करता है। पूरे दिन विपक्ष सेंट पीटर्सबर्ग से स्काउट हुआ, अगर लक्ष्य से थोड़ा भटक गया हो तो इसी समय फिर से वह खुद को लक्ष्य की ओर ले जाता है और अगले दिन अपनी ओर बढ़ने के लिए घमासन करता है। मूलतः भावना पूर्ण अपूर्ण से ईश्वर का ध्यान सभी चित्रों को पार करने वाला सिद्ध होता है।

प्रश्न: अभी भी कुछ संदेह नहीं मिट रहा , क्या करूँ ?

उत्तर: जिस तरह हवा को देखने के बजाय स्पर्श से उकसाया जाता है उसी तरह करने योग्य बात को बोलकर अधिक सुना नहीं जा सकता। तो स्वयं कुछ दिन अभ्यास करें और निर्णय कर लें!

श्वेतकेतु और उद्दालक , उपनिषद की कहानी , छान्दद्योपनिषद , जीवीबी वेद विश्वविद्यालय

यजुर्वेद मंत्र हिन्दी व्याख्या सहित , प्रथम अध्याय 1-10 , जीवीबी वेद विश्वविद्यालय

उषस्ति की कथा , उपनिषद की कहानी , आपदकालेमर्यादानास्ति , _4 - जीवीबी वेदों की विश्वविद्यालय

वैराग्यशतकम् , योगी भर्तृहरिकृत , संस्कृत काव्य , हिंदी व्याख्या , भाग-1 , जीवीबी वेद विश्वविद्यालय

जीवीबी (द यूनिवर्सिटी ऑफ वेद) यूट्यूब पर

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