शृंगार शतक भाग 4 (श्लोक 21–25) | मोह, विवेक और मन की परीक्षा | Bhartrihari Shringar Shatak

🌸 शृंगार शतक – भाग 4 (श्लोक 21–25)

मोह, विवेक और मन की परीक्षा

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सम्मोहयन्ति मदयन्ति विडम्बयन्ति
निर्भर्त्सयन्ति रमयन्ति विषादयन्ति ॥
एताः प्रविश्य सदयं हृदयं नराणां
किं नाम वामनयना न समाचरन्ति ॥ २१॥

ये सुंदर नेत्रों वाली स्त्रियाँ पुरुषों के हृदय में प्रवेश कर उन्हें मोहित, मदमस्त, उपहास, क्रोधित, प्रसन्न और दुखी—सब कुछ कर देती हैं।

These charming-eyed women enter the hearts of men and enchant, intoxicate, mock, scold, delight, and sadden them—what do they not do?

तावदेव कृतिनां हृदि स्फुरत्येष निर्मलविवेकदीपकः ।
यावदेव न कुरङ्गचक्षुषां ताड्यते चटुललोचनाञ्चलैः ॥ २२॥

जब तक मृगनयनी स्त्रियों की चंचल दृष्टि मन को नहीं छूती, तब तक ही विवेक का दीपक हृदय में प्रज्वलित रहता है।

The lamp of pure wisdom shines in the heart only until it is struck by the restless glances of doe-eyed women.

वचसि भवति सङ्गत्यागमुद्दिश्य वार्ता
श्रुतिमुखमुखराणां केवलं पण्डितानाम् ॥
जघनमरुणरत्नग्रन्थिकाञ्चीकलापं
कुवलयनयनानां को विहातुं समर्थः ? ॥ २३॥

पंडित लोग वैराग्य की बातें तो करते हैं, लेकिन कमलनयनी स्त्री के सौंदर्य को त्यागने में कौन सक्षम है?

Scholars speak of renunciation, yet who can truly abandon the beauty of lotus-eyed women?

स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्डितो युवतिम् ।
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तस्यापि फलं तथाप्सरसः ॥ २४॥

जो स्त्री की निंदा करता है, वह स्वयं को और दूसरों को धोखा देता है; क्योंकि तपस्या का फल भी अप्सराएँ ही हैं।

One who criticizes women deceives himself; even the reward of austerity is celestial maidens.

अजितात्मसु सम्बद्धः समाधिकृतचापलः ।
भुजङ्गकुटिलः स्तब्धो भ्रूविक्षेपः खलायते ॥ २५॥

असंयमी व्यक्ति की चंचल दृष्टि और भौंहों का उठना सर्प की भांति टेढ़ा और खतरनाक प्रतीत होता है।

In the undisciplined, even a glance or brow movement appears crooked and dangerous like a serpent.

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