🌸 शृंगार शतक – भाग 5 (श्लोक 26–30)
इन्द्रिय संयम, मोह और आकर्षण का रहस्य
सन्मार्गे तावदास्ते प्रभवति च नरस्तावदेवीन्द्रियाणां
लज्जां तावद्विधत्ते विनयमपि समालम्बते तावदेव ॥
भ्रूचापाकृष्टमुक्ताः श्रवणपथगता नीलपक्ष्माण एते
यावल्लीलावतीनां हृदि न धृतिमुषो दृष्टिबाणाः पतन्ति ॥ २६॥
मनुष्य तब तक संयमित रहता है जब तक सुंदर स्त्रियों की चंचल दृष्टि उस पर नहीं पड़ती। एक दृष्टि ही मन को विचलित कर देती है।
A man remains disciplined until struck by the arrows of charming glances, which steal his inner stability.
विश्वामित्रपराशरप्रभृतयो वाताम्बुपर्णाशनाः
तेऽपि स्त्रीमुखपङ्कजं सुललितं दृष्ट्वैव मोहं गताः ॥
शाल्यन्नं सघृतं पयोदधियुतं ये भुञ्जते मानवाः
तेषामिन्द्रियनिग्रहो यदि भवेद्विन्ध्यस्तरेत्सागरम् ॥ २७॥
विश्वामित्र जैसे महर्षि भी स्त्री सौंदर्य से विचलित हो गए—तो सामान्य मनुष्य का संयम रखना अत्यंत कठिन है।
Even great sages like Vishwamitra were enchanted—so controlling senses for ordinary humans is extremely difficult.
सुधामयोऽपि क्षयरोगशान्त्यै नासाग्रमुक्ताफलकच्छलेन ॥
अनङ्गसंजीवनदृष्टशक्तिर्मुखामृतं ते पिबतीव चन्द्रः ॥ २८॥
चन्द्रमा भी मानो स्त्री के मुखरूप अमृत को पीता हुआ प्रतीत होता है—उसकी दृष्टि जीवनदायी है।
Even the moon seems to drink the nectar of her face—her glance has life-giving power.
असाराः सन्त्वेते विरसविरसाश्चैव विषया
जुगुप्सन्तां यद्वा ननु सकलदोषास्पदमिति ॥
तथाप्यन्तस्तत्त्वे प्रणिहितधियामप्यनबलः
तदीयो नाख्येयः स्फुरति हृदये कोऽपि महिमा ॥ २९॥
विषय चाहे निरर्थक हों, फिर भी मन के भीतर उनका आकर्षण बना रहता है—यह एक अद्भुत शक्ति है।
Even knowing worldly pleasures are hollow, their subtle charm still arises mysteriously in the heart.
विस्तारितं मकरकेतनधीवरेण
स्त्रीसंज्ञितं बडिशमत्र भवाम्बुराशौ ॥
येनाचिरात्तदधरामिषलोलमर्त्य-
मत्स्याद्विकृष्य स पचत्यनुरागवह्नौ ॥३०॥
कामदेव ने इस संसार रूपी सागर में स्त्री रूपी काँटा डाला है, जिससे आकर्षित होकर मनुष्य प्रेमाग्नि में फँस जाता है।
Cupid casts the hook of desire into the ocean of life—humans, like fish, are drawn and consumed in the fire of passion.
