अथर्ववेद सूक्त ५.१७: ब्रह्मजाया सूक्त
वीडुहरास्तप उग्रं मयोभूरापो देवीः प्रथमजा ऋतस्य ॥१॥
ज्ञान की उपेक्षा (ब्रह्म-किल्बिष) होने पर सबसे पहले अपार समुद्र, वायु (मातरिश्वा), सूर्य, उग्र तप और ऋत (सत्य) से उत्पन्न दिव्य जलों ने इसके विरुद्ध साक्ष्य दिया और न्याय की घोषणा की। प्रकृति का कण-कण ज्ञान के अपमान का विरोधी है।
English Explanation:When knowledge is neglected or insulted, the boundless oceans, the wind (Matarishva), the sun, and the primordial waters of truth speak out. The very forces of nature stand as witnesses against the mistreatment of divine wisdom.
अन्वर्तिता वरुणो मित्र आसीदग्निर्होता हस्तगृह्या निनाय ॥२॥
राजा सोम ने सबसे पहले बिना किसी ईर्ष्या के 'ब्रह्मजाया' (ज्ञान की शक्ति) को वापस समर्पित किया। वरुण और मित्र उनके सहायक बने और अग्नि ने स्वयं पुरोहित बनकर हाथ पकड़कर उसे गरिमा के साथ प्रतिष्ठित किया।
English Explanation:King Soma was the first to return the 'Brahmajaya' (the power of knowledge) without resentment. Varuna and Mitra followed him, and Agni, as the divine priest, led her by the hand to restore her dignity.
न दूताय प्रहेया तस्थ एषा तथा राष्ट्रं गुपितं क्षत्रियस्य ॥३॥
यह ज्ञान-शक्ति स्वयं हाथ पकड़कर ग्रहण करने योग्य है। यदि कोई कहे कि "यह ब्रह्मजाया है," तो उसे केवल दूतों के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए। इसी आदर और प्रत्यक्ष संरक्षण से क्षत्रिय (शासक) का राष्ट्र सुरक्षित रहता है।
English Explanation:Knowledge should be embraced personally with respect. It should not be treated as a mere message for messengers. Only by direct protection of wisdom is the kingdom of a ruler kept secure.
सा ब्रह्मजाया वि दुनोति राष्ट्रं यत्र प्रापादि शश उल्कुषीमान् ॥४॥
जिसे लोग अनिष्टकारी धूमकेतु या विनाशक शक्ति कहते हैं, वही अपमानित 'ब्रह्मजाया' (ज्ञान) उस राष्ट्र को झकझोर देती है जहाँ अज्ञानी लोग शासन करते हैं। जहाँ ज्ञान का निरादर होता है, वहां राष्ट्र उल्कापात के समान दग्ध हो जाता है।
English Explanation:That which is called a destructive comet or ill-omen is actually the power of knowledge when insulted. It ruins the nation where it is mistreated, leading to chaos and destruction like falling meteors.
तेन जायामन्वविन्दद्बृहस्पतिः सोमेन नीतां जुह्वं न देवाः ॥५॥
ब्रह्मचारी समस्त प्रतिकूलताओं को भेदकर चलता है और देवताओं का अंग बन जाता है। उसी ज्ञान-शक्ति (ब्रह्मचर्य) के द्वारा बृहस्पति ने अपनी शक्ति प्राप्त की, जैसे देवताओं ने यज्ञ में आहुति (जुहूँ) प्राप्त की थी।
English Explanation:The seeker of knowledge (Brahmachari) moves through all difficulties and becomes part of the divine. Through this power, Brihaspati found his strength, just as the gods found their essence in the sacred offerings.
भीमा जाया ब्राह्मणस्यापनीता दुर्धां दधाति परमे व्योमन् ॥६॥
प्राचीन काल के देवताओं और तपस्या में लीन सप्तऋषियों ने भी यही कहा है—विद्वान से छीनी गई 'ब्रह्मजाया' (ज्ञान की गरिमा) अत्यंत भयंकर परिणाम देती है। वह उच्चतम आकाश (राष्ट्र की उन्नति) को भी अस्त-व्यस्त कर देती है।
English Explanation:The ancient gods and the Seven Sages (Saptarishis) sitting in meditation have declared: The stolen dignity of a wise man’s knowledge brings terrible consequences, disrupting even the highest stability of a nation.
वीरा ये तृह्यन्ते मिथो ब्रह्मजाया हिनस्ति तान् ॥७॥
जहाँ ज्ञान का अपमान होता है, वहाँ गर्भ नष्ट हो जाते हैं, जगत की व्यवस्था लुप्त होने लगती है और वीर पुरुष आपस में लड़कर नष्ट हो जाते हैं। अपमानित 'ब्रह्मजाया' (ज्ञान की शक्ति) उन सबका विनाश कर देती है।
English Explanation:Where knowledge is insulted, life is cut short in the womb, the world order vanishes, and brave men perish in mutual conflict. The scorned power of wisdom destroys them all.
तत्सूर्यः प्रब्रुवन्न् एति पञ्चभ्यो मानवेभ्यः ॥९॥
यदि किसी स्त्री (विद्या/बुद्धि) के दस अब्राह्मण पति भी हों, लेकिन यदि एक 'ब्रह्म' (ज्ञानी) उसका हाथ थाम ले, तो वही उसका वास्तविक स्वामी होता है। सूर्य भी पाँचों मानव जातियों को यही उपदेश देता है कि ज्ञान (ब्राह्मण) ही सर्वश्रेष्ठ रक्षक है, न कि केवल राजनैतिक या आर्थिक शक्ति।
English Explanation:Even if a woman (symbolizing intellect) had ten non-learned husbands, if a man of wisdom (Brahma) holds her hand, he alone is her true master. The sun proclaims to all humanity that wisdom stands above political or material power.
ऊर्जं पृथिव्या भक्त्वोरुगायमुपासते ॥११॥
जब राजा सत्य को स्वीकार करते हुए ज्ञान (ब्रह्मजाया) को उसका उचित स्थान वापस दे देते हैं, तो वे पापों से मुक्त हो जाते हैं। तब वे पृथ्वी की ऊर्जा और अन्न का सुख भोगते हुए उस महान परमेश्वर (उरुगाय) की उपासना के योग्य बनते हैं।
English Explanation:When rulers embrace truth and restore knowledge to its rightful place, they become free from sin. They then enjoy the earth's abundance and become worthy of worshipping the Great Omnipresent Divine.
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या ॥१२॥
जिस राष्ट्र में अज्ञानता के कारण 'ब्रह्मजाया' (ज्ञान की गरिमा) को रोका या प्रताड़ित किया जाता है, वहाँ न तो पारिवारिक सुख रहता है और न ही कल्याणकारी लक्ष्मी का वास होता है।
English Explanation:In a nation where wisdom is obstructed due to ignorance, neither domestic bliss nor auspicious prosperity can ever reside.
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या ॥१३॥
जिस राष्ट्र में अज्ञानता के कारण ज्ञान (ब्रह्मजाया) को अवरुद्ध किया जाता है, उस राष्ट्र के घरों में श्रेष्ठ शारीरिक सौष्ठव और तीक्ष्ण बुद्धि (पृथुशिरा) वाली सन्तानों का जन्म होना बंद हो जाता है। अज्ञानता का प्रभाव अगली पीढ़ियों के स्वास्थ्य और प्रतिभा पर पड़ता है।
English Explanation:In a nation where wisdom is obstructed due to ignorance, the birth of children with superior physical form and sharp intellect ceases. The lack of respect for knowledge adversely affects the health and brilliance of future generations.
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या ॥१४॥
ज्ञान-विरोधी राष्ट्र में न तो आभूषणों से सुसज्जित कुशल अधिकारी (क्षत्ता) रहते हैं और न ही श्रेष्ठ अश्व या वाहन (धुरि युक्त) उस राष्ट्र की शोभा बढ़ाते हैं। संसाधनों का अभाव और अव्यवस्था उस राज्य की पहचान बन जाती है।
English Explanation:In a nation against wisdom, neither adorned and skilled administrators remain, nor do superior steeds or vehicles grace the state. Scarcity of resources and disorder become the identity of such a kingdom.
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या ॥१६॥
जहाँ विद्वत्ता का अपमान होता है, वहाँ की भूमि अपनी उर्वरता खो देती है। खेतों में कमलिनी (पुष्करिणी) और औषधियाँ उत्पन्न नहीं होतीं, और दुधारू पशु भी पोषण देना बंद कर देते हैं। प्रकृति भी अज्ञानियों का पोषण नहीं करती।
English Explanation:Where wisdom is insulted, the land loses its fertility. Sacred lotuses and medicinal herbs do not grow in the fields, and milch animals cease to provide nourishment. Nature refuses to sustain the ignorant.
विजानिर्यत्र ब्रह्मणो रात्रिं वसति पापया ॥१८॥
जिस राष्ट्र में विद्वान की पत्नी (अर्थात् ज्ञान की गरिमा) को कष्टकारी रात्रियों में निवास करना पड़ता है, वहाँ की गायें कल्याणकारी नहीं रहतीं और बैल भी भार ढोने की शक्ति खो देते हैं। समाज का पूर्ण आर्थिक और आत्मिक ढांचा ढह जाता है।
English Explanation:In a nation where the dignity of a wise man’s wisdom is forced to live in distress, the cows are no longer auspicious and the oxen lose their strength. The entire economic and spiritual fabric of society collapses.
अथर्ववेद सूक्त ५.१७ (ब्रह्मजाया सूक्त)
वीडुहरास्तप उग्रं मयोभूरापो देवीः प्रथमजा ऋतस्य ॥१॥
अन्वर्तिता वरुणो मित्र आसीदग्निर्होता हस्तगृह्या निनाय ॥२॥
न दूताय प्रहेया तस्थ एषा तथा राष्ट्रं गुपितं क्षत्रियस्य ॥३॥
सा ब्रह्मजाया वि दुनोति राष्ट्रं यत्र प्रापादि शश उल्कुषीमान् ॥४॥
तेन जायामन्वविन्दद्बृहस्पतिः सोमेन नीतां जुह्वं न देवाः ॥५॥
भीमा जाया ब्राह्मणस्यापनीता दुर्धां दधाति परमे व्योमन् ॥६॥
वीरा ये तृह्यन्ते मिथो ब्रह्मजाया हिनस्ति तान् ॥७॥
ब्रह्मा चेद्धस्तमग्रहीत्स एव पतिरेकधा ॥८॥
तत्सूर्यः प्रब्रुवन्न् एति पञ्चभ्यो मानवेभ्यः ॥९॥
राजानः सत्यं गृह्णाना ब्रह्मजायां पुनर्ददुः ॥१०॥
ऊर्जं पृथिव्या भक्त्वोरुगायमुपासते ॥११॥
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या ॥१२॥
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या ॥१३॥
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या ॥१४॥
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या ॥१५॥
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या ॥१६॥
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या ॥१७॥
विजानिर्यत्र ब्रह्मणो रात्रिं वसति पापया ॥१८॥