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🌸 शृंगार शतक – भाग 6 (श्लोक 31–35)

काम, मोह और मन का संघर्ष

कामिनीकायकान्तारे स्तनपर्वतदुर्गमे ।
मा सञ्चर मनःपान्थ ! तत्रास्ते स्मरतस्करः ॥ ३१॥

हे मन रूपी यात्री! स्त्री के शरीर रूपी वन में मत भटक, वहाँ कामदेव रूपी चोर छिपा है।

O mind-traveler, do not wander in the forest of sensual beauty—Cupid, the thief, resides there.

न गम्यो मन्त्राणां न च भवति भैषज्यविषयो
न चापि प्रध्वंसं व्रजति विविधैः शान्तिकशतैः ॥
भ्रमावेशादङ्गे कमपि विदधद्भङ्गमसकृत्
स्मरापस्मारोऽयं भ्रमयति दृशं धूर्णयति च ॥ ३२॥

कामरोग न तो मंत्र से ठीक होता है, न औषधि से—यह मन को बार-बार विचलित करता है।

The disease of desire cannot be cured by mantras or medicine—it repeatedly disturbs the mind.

तावन्महत्त्वं पाण्डित्यं कुलीनत्वं विवेकिता ।
यावज्ज्वलति नाङ्गेषु हन्त पञ्चेषुपावकः ॥ ३३॥

जब तक कामाग्नि नहीं जलती, तब तक ही ज्ञान, कुलीनता और विवेक टिकते हैं।

Wisdom and dignity remain only until the fire of desire is not ignited within.

स्त्रीमुद्रां झषकेतनस्य परमां सर्वार्थसम्पत्करीं
ये मूढाः प्रविहाय यान्ति कुधियो मिथ्याफलान्वेषिणः ॥
ते तेनैव निहत्य निर्दयतरं नग्नीकृता मुण्डिताः
केचित्पञ्चशिखीकृताश्च जटिलाः कापालिकाश्चापरे ॥ ३४॥

जो लोग स्त्री आकर्षण को त्यागकर झूठे मार्ग पर जाते हैं, वे अंततः भ्रमित होकर भटक जाते हैं।

Those who abandon natural attraction and chase false paths often lose themselves in confusion.

कृशः काणः खञ्जः श्रवणरहितः पुच्छविकलो
व्रणी पूयक्लिन्नः कृमिकुलशतैरावृततनुः ॥
क्षुधाक्षामो जीर्णः पिठरककपालार्पितगलः
शुनीमन्वेति श्वा ! हतमपि च हन्त्येव मदनः ॥ ३५॥

दुर्बल और विकलांग प्राणी भी काम के प्रभाव से बच नहीं पाते—काम सबको प्रभावित करता है।

Even the weakest beings are not free from desire—its force affects all equally.

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