शृंगार शतक भाग 7 (श्लोक 36–40) | वसंत, प्रेम और विरह का रहस्य | Bhartrihari Shringar Shatak part 7

 

🌸 शृंगार शतक – भाग 7 (श्लोक 36–40)

वसंत, प्रेम और विरह की अनुभूति

शृंगार शतक भाग 7 Bhartrihari Shringar Shatak Part 7 Shlok 36 to 40 meaning वसंत और विरह श्लोक Sanskrit love and separation भर्तृहरि शृंगार शतक श्लोक 36 अर्थ Sanskrit shlokas on spring and love viraha poetry Sanskrit meaning Indian philosophy of love and nature Shringar Shatak Hindi English explanation

मत्तेभकुम्भदलने भुवि सन्ति शूराः
केचित्प्रचण्डमृगराजवधेऽपि दक्षाः ॥
किन्तु ब्रवीमि बलिनां पुरतः प्रसह्य
कंदर्पदर्पदलने विरला मनुष्याः ॥ ३६॥

इस संसार में ऐसे अनेक वीर मिल जाते हैं जो मदमस्त हाथियों को पराजित कर सकते हैं या भयंकर सिंह का वध कर सकते हैं। वे बाहरी युद्धों में विजयी होते हैं और अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। किन्तु भर्तृहरि कहते हैं कि इन सबसे भी कठिन युद्ध है — अपने भीतर के काम (इच्छा) को जीतना। कामदेव का प्रभाव अत्यंत सूक्ष्म और शक्तिशाली है, जो मन को मोह, आकर्षण और आसक्ति में बाँध देता है। इसलिए जो मनुष्य कामदेव के अभिमान (दर्प) को जीत लेता है, वही वास्तव में सबसे बड़ा वीर और विजेता कहलाता है।

In this world, many brave warriors can defeat mighty elephants or even slay fierce lions. They demonstrate their strength in external battles. However, Bhartrihari emphasizes that conquering inner desire (Kama) is far more difficult. The power of Cupid is subtle yet deeply influential, binding the mind in attachment and illusion. Thus, the one who conquers desire is the true hero among all.

परिमलभृतो वाताः शाखा नवाङ्कुरकोटयो
मधुरविरुतोत्कण्ठा वाचः प्रियाः पिकपक्षिणाम् ॥
विरलसुरतस्वेदोद्गारा वधूवदनेन्दवः
प्रसरति मधौ रात्र्यां जातो न कस्य गुणोदयः ? ॥ ३७॥

वसंत ऋतु का आगमन प्रकृति में अद्भुत परिवर्तन लाता है। सुगंधित वायु बहती है, वृक्षों में नए अंकुर फूटते हैं, और कोयल की मधुर ध्वनि वातावरण को संगीत से भर देती है। ऐसे समय में प्रेम का भाव स्वतः जागृत होता है और मन में आकर्षण एवं उल्लास उत्पन्न होता है। भर्तृहरि संकेत करते हैं कि इस ऋतु में ऐसा कौन है जिसके भीतर प्रेम, सौंदर्य और आनंद का उदय न हो? यह प्रकृति और मनुष्य के बीच गहरे संबंध को दर्शाता है।

The arrival of spring transforms nature beautifully. Fragrant winds blow, fresh buds bloom, and the sweet songs of cuckoos fill the air. During this season, feelings of love and joy naturally arise within the heart. Bhartrihari suggests that no one remains untouched by this charm. It reflects the deep connection between nature and human emotions.

मधुरयं मधुरैरपि कोकिला
कलरवैर्मलयस्य च वायुभिः ॥
विरहिणः प्रहिणस्ति शरीरिणो
विपदि हन्त सुधाऽपि विषायते ॥ ३८॥

वसंत में कोयल की मधुर वाणी और शीतल पवन सामान्यतः आनंददायक होते हैं, किन्तु जो व्यक्ति अपने प्रिय से दूर है, उसके लिए यही मधुरता पीड़ा का कारण बन जाती है। विरह की अवस्था में मन अत्यंत संवेदनशील हो जाता है और जो वस्तुएँ पहले सुख देती थीं, वे अब दुख का अनुभव कराती हैं। भर्तृहरि यहाँ यह गहरी बात कहते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार अनुभव बदल जाता है— यहाँ तक कि अमृत भी विष के समान प्रतीत हो सकता है।

The sweetness of spring—the cuckoo’s song and gentle breeze—usually brings joy. However, for one separated from their beloved, these same pleasures become painful. In longing, the mind becomes highly sensitive, and what once brought happiness now causes sorrow. Bhartrihari highlights how perception changes with emotional states—even nectar can feel like poison.

आवासः किलकिञ्चितस्य दयिताः पार्श्वे विलासालसाः
कर्णे कोकिलकामिनीकलरवः स्मेरो लतामण्डपः ॥
गोष्ठी सत्कविभिः समं कतिपयैः सेव्याः सितांशो कराः
केषाञ्चित्सुखयन्ति धन्यहृदयं चैत्रे विचित्राः क्षपाः ॥ ३९॥

वसंत की रात्रियाँ उन लोगों के लिए अत्यंत आनंदमयी होती हैं जो प्रेम, सौंदर्य और कला का रस लेते हैं। प्रियतम का साथ, कोयल की मधुर ध्वनि, लताओं से सजा वातावरण और चाँदनी की शीतलता — ये सभी मिलकर जीवन को एक स्वर्गीय अनुभव प्रदान करते हैं। साथ ही, विद्वानों की संगति इस आनंद को और भी गहरा बना देती है। भर्तृहरि बताते हैं कि ऐसे सौभाग्यशाली लोग ही वास्तव में जीवन के इस रस का अनुभव कर पाते हैं।

Spring nights are deeply delightful for those who appreciate love, beauty, and art. The presence of a beloved, the melody of cuckoos, moonlight, and blooming creepers create a heavenly experience. The company of wise poets further enriches this joy. Bhartrihari suggests that only the fortunate truly experience this refined pleasure of life.

पान्थस्त्रीविरहाग्नितीव्रतरतामातन्वती मञ्जरी
माकन्देषु पिकाङ्गनाभिरधुना सोत्कण्ठमालोक्यते ॥
अप्येते नवपाटलीपरिमलप्राग्भारपाटच्चरा
वान्ति क्लान्तिवितानतानवकृतः श्रीखण्डशैलानिलाः ॥ ४०॥

वसंत ऋतु की सुगंध, फूलों की बहार और शीतल वायु सामान्यतः मन को प्रसन्न करती है, किन्तु जो व्यक्ति अपने प्रिय से दूर है, उसके लिए यह सब विरह की अग्नि को और तीव्र कर देता है। फूलों की महक, कोयल की पुकार और मंद पवन — ये सभी उसकी स्मृतियों को जागृत कर पीड़ा को बढ़ा देते हैं। भर्तृहरि यहाँ यह दर्शाते हैं कि बाहरी सौंदर्य का अनुभव मन की स्थिति पर निर्भर करता है— जहाँ मिलन में आनंद है, वहीं विरह में वही दृश्य दुःख का कारण बन जाता है।

The beauty of spring—fragrance, flowers, and gentle winds—usually brings joy. Yet for one in separation, it intensifies the fire of longing. Every scent, sound, and breeze awakens memories and deepens the pain. Bhartrihari shows that outer beauty depends on inner state—what brings joy in union brings sorrow in separation.

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