जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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आर्य

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सिन्धु-सभ्यता को जन्म देने वाली और लालन-पालन करने वाली जाति या जातियों के बारे में हमें कोई निश्चित जानकारी नहीं है। यही वजह है कि उसका नामकरण उस क्षेत्र के आधार पर किया गया है जहाँ वह फूली और फली।


सिन्धु-सभ्यता के निर्माता: मुहेंजो-दड़ो में मिले अस्थि-पिंजरों और कपालों की वैज्ञानिक परीक्षा से ज्ञात होता है कि वहाँ के लोग चार जातियों, तथा—प्रोटो-आस्ट्रोलॉयड, भूमध्यसागरीय, अल्पीनॉयड और मंगोलॉयड वर्ग के थे। किन्तु परीक्षण के लिये मिले अस्थि-पिंजरों की संख्या इनी-गिनी है इसीलिये उपर्युक्त सभ्यता और संस्कृति के निर्माता लोगों के जाति-समूहों के सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। इस सम्बन्ध में विद्वानों में बड़ा मतभेद है और हम उनमें से कुछ की संक्षेप में चर्चा भर कर सकते हैं।


वैदिक सभ्यता से भिन्नता: बहुमत यह है कि सिन्धु घाटी की सभ्यता द्रविड़, अथवा जैसा ऊपर कहा जा चुका है। निःसंदेह  सिन्धु घाटी सभ्यता का विकास भारत में आर्यों के आने से बहुत पूर्व हुआ था। सर जॉन मार्शल एवं कुछ अन्य लोग भी इस सभ्यता का ऋग्वेद में वर्णित सभ्यता से तुलनात्मक अध्ययन कर इसी परिणाम पर पहुँचे हैं। उन लोगों का मत है कि घोड़ों के अभाव एवं मूर्ति-पूजा से जान पड़ता है कि सिन्धु घाटी की सभ्यता ऋग्वेद में वर्णित आर्य सभ्यता से एकदम भिन्न और पूर्व की है। आर्यों की लौकिक एंव धार्मिक जीवन में घोड़ों का अत्याधिक महत्त्व था और वे देवी-देवताओं की मूर्तियों से वे अपरिचित थे। सिन्धु सभ्यता में मातृकाओं का महत्त्व भी इस भिन्नता को उजागर करता है। स्त्रीदेवताओं का ऋग्वैदिक देवकुल में कोई मुख्य स्थान नहीं था ।


दोनों सभ्यताओं की प्राचीनता: इन बातों से इन सभ्यताओं के काल का प्रश्न उठता है। सिन्धु घाटी   की मुहरों के समान मुहरें पश्चिमी एशिया में ज्ञात तिथि के जिस स्तर पर मिली हैं उनके अनुसार वे २५०० ई० पू० की ठहरती हैं। अन्य प्रमाणों के आधार पर भी मुहेंजो-दड़ो की पिछली बस्तियाँ उसी काल की समझी जाती हैं। अब तक मुहेंजो-दड़ो में भवनों की सात तहें प्रकाश में आयी हैं और सम्भवत: इससे भी पहले की कुछ और तहें अभी पृथ्वी के गर्भ में जल में दबी हैं। अत: हमें इस सभ्यता के जन्म और विकास के लिये काफ़ी लम्बी अवधि देनी होगी। अतएव सामन्य धारणा के अनुसार इस सभ्यता को ३०००-२५०० ई० पू० का माना जा सकता है। आधुनिक विद्वानों की एक प्रवृत्ति इसे और भी ५०० वर्ष पीछे ले जाने की है।


दूसरी ओर अधिकांश योग्य विद्वानों के मतानुसार ऋग्वेद १८०० वर्ष ई० पू० से अधिक पुराना नहीं हो सकता।


यद्यपि आर्यों के भारत में आने के बाद, सम्भवतः बहुत बाद, इस साहित्य की रचना हुई होगी। उस घटना को भी हम २००० ई० पू० से अधिक पहले नहीं रख सकते। इस तरह भी सिन्धु-घाटी की सभ्यता आर्यों के भारत-प्रवेश से पूर्व विकसित हो चुकी रही होगी।


बिना किसी पक्षघात के और इस बात को ध्यान में रखकर कि आज की अवस्था में हमारी जो जानकारी है उससे किसी प्रकार का निश्चित अथवा पक्का निष्कर्ष सम्भव नहीं है, हम अभी यह मान ले सकते हैं कि सिन्धु घाटी की सभ्यता द्रविड़ सभ्यता है और उसके निर्माता द्रविड़ कही जाने वाली जाति के थे। इस आधार पर इस काल का इतिहास बहुत-कुछ निम्नलिखित रूप में स्थिर किया जा सकता है।


द्रविड़ों और आर्यों के सम्बन्ध: लगभग ५००० वर्ष पूर्व अथवा उससे भी कुछ पहले नयी जातियाँ अपनी समान भाषा के नाम पर पीछे चल कर द्रविड़ कहलाये, उन्होंने एक उच्च कोटि की सभ्यता का विकास किया और अनेक महत्त्वपूर्ण नगर बसाए। २००० ई० पू० के आसपास अथवा उसके कुछ शताब्दियों पश्चात आर्य भाषा बोलनेवाली अन्य जातियाँ आने लगीं बलूचिस्तान से होकर, जो सामान्यतः भारतीय-आर्य कही जाती हैं, धीरे-धीरे उत्तर-पश्चिम से हिन्दुकुश पर्वत को पार करती हुई अफ़गानिस्तान के रास्ते भारत में प्रविष्ट हुईं । उसी समय द्रविड़ों की सभ्यता का पतन होने लगा था और ऋग्वेद की संहिताओं में खंडहरों और उजड़े हुए नगरों का उल्लेख है । आर्य जातियां खानाबदोश थीं लेकिन लगातार द्रविड़ों से मिलझुलकर आर्थिक अनुकलन  के आधार पर रहने लगे। 


आर्यों का उद्भव: भारत भूमि पर इस प्रकार पैर जमाने वाले आर्यों का अपना पूर्ववर्ती इतिहास था। वे मानवजाति के एक अति प्राचीन समूह के थे और बहुत दिनों तक वे उन लोगों के साथ रहते थे जो यूनान, रोम, जर्मनी, इंगलैंड, हालैंड, स्कैण्डिनेविया,स्पेन, फ़्रांस, रूस और बलगेरिया के लोगों के पूर्वज थे। यह इस बात से स्पष्ट प्रकट है कि मनुष्य अपने कतिपय मूल भावों की अभिव्यक्ति के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल करता है, वे शब्द उनके वंशज समान रूप से इस्तेमाल करते हैं, यद्यपि ये वंशज आज एक दूसरे से हज़ारों मील दूर हैं और कभी-कभी तो इनके बीच हज़ारों वर्षों के काल का अन्तराल भी है। यथा—-संस्कृत के शब्द पितृ और मातृ, लैटिन के ’पेटर’ और ’मेटर’, ग्रीक के ’पटेर’ और ’मटेर’, अंग्रेज़ी के ’फ़ॉदर’ और ’मदर’ और जर्मनी के ’वटेर’ और ’मुटेर’ निश्चय एक ही हैं। ये मानव की सबसे आदिम भावनाओं अर्थात माता और पिता को व्यक्त करते हैं। भाषाओं की समानता के कारण अनेक विद्वानों ने यह मान लिया है कि जिन आर्यों ने भारत को जीता, वे निश्चय ही उस जाति के थे जिसके वंशज आज उपर्युक्त भाषाएँ बोलते हैं और जिन्होंने प्राचीन और अर्वाचीन युगों में अमित ख्याति अर्जित की। किन्तु यह निष्कर्ष तर्कसंगत नहीं जान पड़ता। भाषा की एकता से रक्त की एकता सर्वदा सिद्ध होती हो, ऐसी बात नहीं है। निश्चित निष्कर्ष केवल यही हो सकता है कि इन देशवासियों के पूर्वज किसी प्रदेश में बहुत दिनों तक निकट-सम्पर्क में रहते थे। सामान्य मत है कि वे लोग मध्य एशिया अथवा दक्षिण रूस में कहीं रहते थे। 


जो भी हो, इन समूहों में से एक व अधिक औरों से अलग होकर भारत की ओर चला। यथासमय उनमें से कुछ ईरान कहे जाने वाले प्रदेश में बस गए और उन्होंने उस संस्कृति को जन्म दिया जिसके स्पष्ट चिन्ह उनके वंशजों—-आधुनिक ईरानियों—-में पाये जाते हैं। शेष जातियों ने हिन्दुकुश पार किया।


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