🕉️🙏ओ३म् सादर नमस्ते जी 🙏🕉️
🌷🍃 आपका दिन शुभ हो 🍃🌷
दिनांक - - ०८ दिसम्बर २०२४ ईस्वी
दिन - - रविवार
🌓 तिथि -- सप्तमी ( ०९:४४ तक तत्पश्चात अष्टमी )
🪐 नक्षत्र - - शतभिषा ( १६:०३ तक तत्पश्चात पूर्वाभाद्रपद )
पक्ष - - शुक्ल
मास - - मार्गशीर्ष
ऋतु - - हेमन्त
सूर्य - - दक्षिणायन
🌞 सूर्योदय - - प्रातः ७:०२ पर दिल्ली में
🌞 सूर्यास्त - - सायं १७:२४ पर
🌓चन्द्रोदय -- १२:२७ पर
🌓 चन्द्रास्त - - २४:१८ पर
सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२५
कलयुगाब्द - - ५१२५
विक्रम संवत् - -२०८१
शक संवत् - - १९४६
दयानंदाब्द - - २००
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🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🔥व्यक्ति के मन में दो प्रकार के भाव उठते हैं, एक को श्रद्धा कहते हैं, दुसरे को अश्रद्धा । ' श्रत् ' का अर्थ है सत्य और ' धा ' का अर्थ है धारण करना। असत्य धारणा से रस्सी को सांप समझकर व्यक्ति डरेगा मगर जब सत्य से परिचय होगा तो वह निर्भय हो जाएगा, इसलिए स्वाभाविक रूप से ही व्यक्ति सत्य में ही श्रद्धा करता है असत्य में नही। मगर अज्ञान-दोष के कारण व्यक्ति वास्तविक श्रद्धा से वंचित रह जाता है।
वैशेषिक दर्शन में कहा गया है कि ज्ञानेन्द्रियों व अन्त: करण के दोष से अविद्या उत्पन्न होती है। इस अविद्या के कारण ही हमारी सत्य के प्रति श्रद्धा नहीं हो पाती ....आंख में खराबी होगी तो व्यक्ति म को भ तथा अग्ने को अग्रे पढ़ लेगा ... वास्तव में साधारण व्यक्ति श्रद्धा, अश्रद्धा और अन्धश्रद्धा में भेद नहीं कर पाता है। इसके लिए मुख्यत: दो कसौटी दी गई हैं - दृष्टवा और व्याकरोत् । दृष्टवा से भाव है कि हम उसे ही सत्य मानें जो दर्शनों में विवेचित प्रमाणादि से सही सिद्ध होता है और व्याकरोत् के भाव है व्याकरण की कसौटी पर परखना। व्याकरण का अर्थ है सत्य को झूठ से अलग कर देना।
जो उपरोक्त कसौटियों पर खरा उतरता है वह सत्य है और उसके प्रति ही श्रद्धा होनी चाहिए।जो इन कसौटियों के विपरीत है वह असत्य है उसके प्रति अश्रद्धा होनी चाहिए। अब रही अन्ध- श्रद्धा । अन्ध-श्रद्धा क्या है? जिसे न ज्ञान है और न व्याकरण की कसौटी पर परखने की कला है , वह अन्ध- श्रद्धा का शिकार हो जाता है। इस प्रकार जितनी भी अवैदिक मान्यताएं वे सब अन्ध- श्रद्धा के अन्तर्गत ही आती है। और अभाग्य से आज अधिकांश व्यक्ति इसी में भटक रहे हैं।
अनेक प्रकार के मत, मजहब, सम्प्रदाय तथा गुरूडम प्रथा ये सब अन्ध- श्रद्धा के अन्तर्गत ही आते है। किये हुए पाप कर्मों का क्षमा हो जाना, किसी जड़ वस्तु के आगे सिर झुकाना, भूत- प्रेत , डाकिनी-शाकिनी, पीर- पैगम्बर आदि के भुलावे भी इसी के अन्तर्गत आ जाते है, क्योंकि ये सब उपरोक्त कसौटियों पर कहीं भी टीक नही पाते, मगर फिर भी अज्ञानी, अज्ञानियों को लूट रहे है तथा लोग अन्ध - श्रद्धा में भटक कर अपना अमूल्य समय बर्बाद कर रहें हैं।
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🚩‼️आज का वेद मंत्र ‼️🚩
🌷 ओ३म् देवानां भद्रा सुमितिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो निवर्त्तताम्। देवाना सख्यमुपसेदिमा वयं देवा न आयु: प्रतिरन्तु जीवसे ( यजुर्वेद २५|१५ )
💐अर्थ:- हे परमेश्वर ! सरलता से आचरण करने वाली, विद्वानों का मंगल करने वाली, श्रेष्ठ बुद्धि हमें प्राप्त हो और विद्वानों के विद्यादि गुण हमें उपलब्ध हो , विद्वानों का मित्रभाव हमें सदा मिलता रहे, जिससे वे श्रेष्ठ जन हमारी आयु को दीर्घकाल तक जीने के लिए बढ़ावें ।
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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏
(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮
ओ३म् तत्सत् श्रीब्रह्मणो द्वितीये प्रहरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- पञ्चर्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२५ ) सृष्ट्यब्दे】【 एकाशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८१) वैक्रमाब्दे 】 【 द्विशतीतमे ( २००) दयानन्दाब्दे, काल -संवत्सरे, रवि- दक्षिणायने , हेमन्त -ऋतौ, मार्गशीर्ष - मासे, शुक्ल पक्षे,सप्तम्यां
तिथौ,
शतभिषा नक्षत्रे, रविवासरे
, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे ढनभरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे
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