Chapter 2
Traita-vāda: The Ontology of Three Realities
(त्रैत-वाद: तीन मूल सत्यों की दार्शनिक संरचना)
2.1 Ontology का प्रश्न: “क्या वास्तव में अस्तित्व में है?”
दर्शन का मूल प्रश्न ज्ञान (epistemology) नहीं, बल्कि अस्तित्व (ontology) है।
अर्थात — वास्तव में क्या है?
आधुनिक भौतिकवाद (Materialism) केवल एक सत्ता को स्वीकार करता है — पदार्थ।
आदर्शवाद (Idealism) इसके विपरीत केवल चेतना को मूल मानता है।
दोनों दृष्टिकोण अपूर्ण हैं, क्योंकि:
- केवल पदार्थ मानने से चेतना का अनुभव समझ में नहीं आता
- केवल चेतना मानने से जगत की वस्तुनिष्ठता अस्वीकार करनी पड़ती है
Traita-vāda इन दोनों सीमाओं को पार करता है।
2.2 Traita-vāda की मूल परिकल्पना
Traita-vāda के अनुसार अस्तित्व तीन मूल और स्वतंत्र सत्यों से बना है:
- ईश्वर (Īśvara)
- जीव (Jīva / चेतन आत्मा)
- प्रकृति (Prakṛti / पदार्थ)
ये तीनों:
- वास्तविक हैं
- अनादि हैं
- परस्पर भिन्न हैं
परंतु परस्पर सम्बद्ध भी हैं।
2.3 ईश्वर (Īśvara): नियंता और आधार
Traita-vāda में ईश्वर को:
- जगत का कर्ता नहीं,
- बल्कि नियमों का नियंता माना गया है।
ईश्वर:
- चेतना का स्रोत नहीं,
- बल्कि चेतना का सार्वभौमिक आधार है।
वेदों में ईश्वर को:
“एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति”
अर्थात — सत्ता एक है,
परंतु उसका अनुभव अनेक रूपों में होता है।
ईश्वर कोई मानवाकृति नहीं,
बल्कि नैतिक और प्राकृतिक नियमों की परम सत्ता है।
2.4 जीव (Jīva): सीमित चेतना
जीव:
- चेतन है
- अनुभव करने वाला है
- किंतु सीमित है
जीव न तो सर्वज्ञ है,
न सर्वशक्तिमान।
उसकी चेतना:
- शरीर से जुड़ी हुई प्रतीत होती है
- परंतु शरीर से उत्पन्न नहीं होती
यही कारण है कि:
- शरीर बदलता है
- अनुभवकर्ता बना रहता है
गीता कहती है:
“न जायते म्रियते वा कदाचित्”
2.5 प्रकृति (Prakṛti): जड़ वास्तविकता
प्रकृति:
- जड़ है
- परिवर्तनशील है
- नियमबद्ध है
विज्ञान जिस संसार का अध्ययन करता है,
वह प्रकृति का क्षेत्र है।
Traita-vāda विज्ञान को अस्वीकार नहीं करता,
बल्कि उसे उसकी सीमा में रखता है।
प्रकृति:
- चेतना से स्वतंत्र है
- परंतु चेतना के बिना अर्थहीन है
2.6 तीनों के बीच संबंध
Traita-vāda का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि:
- ईश्वर ≠ जीव
- जीव ≠ प्रकृति
- ईश्वर ≠ प्रकृति
फिर भी:
- ईश्वर → नियम देता है
- जीव → अनुभव करता है
- प्रकृति → माध्यम बनती है
यही त्रैतीय संरचना (Triadic Structure)
जगत को संभव बनाती है।
2.7 द्वैत और अद्वैत से भिन्नता
| दर्शन | मूल तत्व | समस्या |
|---|---|---|
| द्वैत | ईश्वर–जीव | प्रकृति गौण |
| अद्वैत | ब्रह्म एक | अनुभव की समस्या |
| Traita-vāda | तीन वास्तविकताएँ | संतुलित |
Traita-vāda:
- अनुभव को भी मानता है
- जगत को भी
- और नैतिकता को भी
2.8 निष्कर्ष: संतुलित Ontology
Traita-vāda न तो:
- रहस्यवाद है
- न भौतिकवाद
यह एक यथार्थवादी दर्शन है जो:
- विज्ञान को स्थान देता है
- ध्यान को अर्थ देता है
- जीवन को दिशा देता है
अगला प्रश्न स्वाभाविक है —
क्या आधुनिक विज्ञान इस त्रैतीय संरचना से संवाद कर सकता है?


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