इक्कीसवीं सदी का विज्ञान अभूतपूर्व तकनीकी उपलब्धियाँ प्राप्त कर चुका है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, न्यूरोसाइंस और क्वांटम फिज़िक्स ने मानव ज्ञान की सीमाओं को विस्तृत किया है। फिर भी, इन सभी उपलब्धियों के मध्य एक प्रश्न आज भी अनुत्तरित है — चेतना (Consciousness) क्या है?
मस्तिष्क की संरचना, न्यूरॉन्स की गतिविधि, विद्युत संकेतों और रासायनिक प्रक्रियाओं का अध्ययन विस्तार से किया जा चुका है, परंतु इन भौतिक प्रक्रियाओं से अनुभव (experience) कैसे उत्पन्न होता है, यह अभी भी रहस्य बना हुआ है। यह समस्या आधुनिक दर्शन में “Hard Problem of Consciousness” के नाम से जानी जाती है।
आधुनिक भौतिकवादी दृष्टिकोण यह मानता है कि चेतना मस्तिष्क की एक उपज (by-product) है। इस मत के अनुसार, जैसे यकृत से पित्त उत्पन्न होता है, वैसे ही मस्तिष्क से चेतना उत्पन्न होती है।
परंतु यह तुलना गहन परीक्षण में असफल हो जाती है।
यदि चेतना केवल मस्तिष्क की क्रिया होती, तो कोई भी वैज्ञानिक प्रयोग यह स्पष्ट कर पाता कि किस क्षण पदार्थ अनुभव में परिवर्तित हो जाता है। आज तक ऐसा कोई प्रयोग उपलब्ध नहीं है।
यह प्रश्न उठता है:
अवलोकन करने वाला कौन है?
यहाँ विज्ञान स्वयं एक ऐसी सत्ता को स्वीकार करता है जो गणनाओं से परे है — चेतन पर्यवेक्षक।
वैदिक दर्शन इस प्रश्न को सहस्रों वर्ष पूर्व संबोधित कर चुका है।
“न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः”— केन उपनिषद
उपनिषद चेतना को:
बताते हैं।
पतंजलि योगसूत्र में कहा गया है:
“द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः”(योगसूत्र 2.20)
अर्थात — द्रष्टा (चेतना) शुद्ध है और बुद्धि के माध्यम से अनुभव करता है।
परंतु अनुभव इसके विपरीत है।
इस अध्याय का निष्कर्ष स्पष्ट है:
“Chapter 2 Ontology of Traita-vāda: Understanding the Threefold Reality of God, Self, and Nature”
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