दर्शन का मूल प्रश्न ज्ञान (epistemology) नहीं, बल्कि अस्तित्व (ontology) है।
अर्थात — वास्तव में क्या है?
आधुनिक भौतिकवाद (Materialism) केवल एक सत्ता को स्वीकार करता है — पदार्थ।
आदर्शवाद (Idealism) इसके विपरीत केवल चेतना को मूल मानता है।
दोनों दृष्टिकोण अपूर्ण हैं, क्योंकि:
Traita-vāda इन दोनों सीमाओं को पार करता है।
Traita-vāda के अनुसार अस्तित्व तीन मूल और स्वतंत्र सत्यों से बना है:
ये तीनों:
परंतु परस्पर सम्बद्ध भी हैं।
Traita-vāda में ईश्वर को:
ईश्वर:
वेदों में ईश्वर को:
“एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति”
अर्थात — सत्ता एक है,
परंतु उसका अनुभव अनेक रूपों में होता है।
ईश्वर कोई मानवाकृति नहीं,
बल्कि नैतिक और प्राकृतिक नियमों की परम सत्ता है।
जीव:
जीव न तो सर्वज्ञ है,
न सर्वशक्तिमान।
उसकी चेतना:
यही कारण है कि:
गीता कहती है:
“न जायते म्रियते वा कदाचित्”
प्रकृति:
विज्ञान जिस संसार का अध्ययन करता है,
वह प्रकृति का क्षेत्र है।
Traita-vāda विज्ञान को अस्वीकार नहीं करता,
बल्कि उसे उसकी सीमा में रखता है।
प्रकृति:
Traita-vāda का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि:
फिर भी:
यही त्रैतीय संरचना (Triadic Structure)
जगत को संभव बनाती है।
| दर्शन | मूल तत्व | समस्या |
|---|---|---|
| द्वैत | ईश्वर–जीव | प्रकृति गौण |
| अद्वैत | ब्रह्म एक | अनुभव की समस्या |
| Traita-vāda | तीन वास्तविकताएँ | संतुलित |
Traita-vāda:
Traita-vāda न तो:
यह एक यथार्थवादी दर्शन है जो:
अगला प्रश्न स्वाभाविक है —
क्या आधुनिक विज्ञान इस त्रैतीय संरचना से संवाद कर सकता है?
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