क्या यही सत्य है?
गाँव, श्मशान और सत्य की दो परतें
भूमिका
सत्य हमेशा सीधा नहीं होता।
कभी-कभी वह इतना गहरा होता है कि पहली नज़र में भ्रम, पागलपन या अन्याय जैसा लगता है।
यह कथा भी वैसी ही है — जहाँ एक साधु, एक गाँव और एक श्मशान हमें सत्य की दो परतों से परिचित कराते हैं।
कथा
एक बार कुछ यात्री यात्रा पर निकले।
दिन ढलने को था और वे एक अनजान, जंगली मार्ग पर पहुँच गए।
आस-पास कोई बस्ती दिखाई नहीं दे रही थी और न ही कोई ऐसा व्यक्ति जिससे वे रास्ता पूछ सकें।
थोड़ी दूर चलने पर उन्हें एक झोंपड़ी दिखाई दी।
उस झोंपड़ी में एक फकीर गहरी साधना में लीन बैठा था।
यात्रियों ने आदरपूर्वक उसे प्रणाम किया और कहा—
“महाराज, हम यहाँ नए हैं। कृपया बताइए, कौन-सा मार्ग गाँव की ओर जाता है?
रात होने वाली है, हमें कहीं ठहरना है।”
फकीर ने शांति से एक मार्ग की ओर संकेत किया।
यात्री उस मार्ग पर चले गए।
कुछ ही देर में वे श्मशान पहुँच गए।
वहाँ का दृश्य देखकर वे दुःखी और क्रोधित हो उठे।
वे वापस लौटे और फकीर पर भड़क पड़े—
“आपने हमें धोखा दिया! यह तो श्मशान है, गाँव नहीं।”
फकीर ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“मेरे लिए यही गाँव है।
तुम जिसे गाँव कहते हो, वहाँ रोज़ कोई न कोई मरता है।
जहाँ मैंने तुम्हें भेजा, वहाँ आज तक कोई नहीं मरा —
वहाँ सब जीवित हैं।”
यह सुनकर यात्री उसे पागल कहकर दूसरे मार्ग से गाँव चले गए।
प्रश्न: क्या फकीर ने झूठ बोला?
उत्तर इतना सरल नहीं है।
इस कथा में दो स्तरों का सत्य छिपा है।
1️⃣ व्यवहारिक सत्य (Practical Truth)
व्यवहार की दृष्टि से देखें तो:
- यात्रियों को रात बिताने के लिए गाँव चाहिए था
- भोजन, पानी और सुरक्षा की आवश्यकता थी
- श्मशान उनकी आवश्यकता का समाधान नहीं था
👉 इस स्तर पर यात्रियों की बात सही है।
👉 इस स्तर पर फकीर का उत्तर अनुचित लगता है।
2️⃣ पारमार्थिक सत्य (Spiritual Truth)
अब फकीर की दृष्टि से देखें—
उसके लिए:
- गाँव = जन्म-मरण का निरंतर चक्र
- श्मशान = जहाँ मृत्यु का बोध समाप्त हो जाता है
फकीर शरीर नहीं देख रहा था,
वह चेतना देख रहा था।
उसकी दृष्टि में:
जहाँ मृत्यु का भय समाप्त हो जाए,
वही वास्तविक निवास है।
👉 इस स्तर पर फकीर पूर्ण सत्य बोल रहा था।
क्या फकीर पागल था?
नहीं।
वह पागल नहीं था,
वह असमय और अपात्र के सामने सत्य बोल रहा था।
सत्य यदि समय, पात्र और परिस्थिति के बिना कहा जाए
तो वही सत्य पागलपन प्रतीत होता है।
न्याय-दर्शन की दृष्टि
न्याय दर्शन स्पष्ट करता है—
- व्यवहारिक सत्य और पारमार्थिक सत्य अलग-अलग स्तर हैं
- दोनों एक-दूसरे का खंडन नहीं करते
यात्री व्यवहारिक सत्य पर थे
फकीर पारमार्थिक सत्य पर
टकराव इसलिए हुआ क्योंकि स्तर अलग थे।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
🔹 1. हर सत्य हर व्यक्ति के लिए नहीं होता
🔹 2. सुविधा की दृष्टि से देखा गया सत्य अधूरा होता है
🔹 3. जो मृत्यु को समझ लेता है, वही जीवन को जानता है
🔹 4. संसार जिसे सुरक्षित गाँव मानता है, वही सबसे बड़ा श्मशान भी हो सकता है
निष्कर्ष
क्या यही सत्य है?
✔️ हाँ — यदि तुम चेतना से देखो
❌ नहीं — यदि तुम केवल सुविधा से देखो
और यही इस कथा की शक्ति है—
यह हमें उत्तर नहीं देती,
यह हमें दृष्टि बदलने के लिए विवश करती है।
✨ अंतिम विचार
जो सत्य को सह नहीं पाता,
वह सत्य को पागल कह देता है।
Q1. क्या साधु ने यात्रियों से झूठ कहा था?
उत्तर: व्यवहारिक दृष्टि से नहीं, पारमार्थिक दृष्टि से उसने गहरा सत्य बताया।
Q2. इस कथा का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: सत्य एक नहीं होता; वह दृष्टि और स्तर के अनुसार बदलता है।
Q3. गाँव और श्मशान का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?
उत्तर: गाँव जन्म-मरण का चक्र है, श्मशान उससे परे चेतना का प्रतीक है।
यह कथा भारतीय दर्शन में व्यवहारिक और पारमार्थिक सत्य की अवधारणा को समझाने हेतु प्रस्तुत है।
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