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जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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Gyan Vigyan Brhamgyan (GVB the university of veda)

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Great 20 Hindi short stories

 

🔴 एक बार संत राबिया एक धार्मिक पुस्तक पढ़ रही थीं। पुस्तक में लिखा था – “शैतान से घृणा करो।” राबिया ने वह पंक्ति काट दी।

🔵 कुछ दिन बाद एक संत ने वह पुस्तक देखी और बोले – “जिसने यह पंक्ति काटी है वह नास्तिक होगा।”

🔴 राबिया ने शांत स्वर में कहा – “उसे मैंने ही काटा है।”

🔵 संत ने कहा – “शैतान इंसान का दुश्मन है, उससे घृणा क्यों न करें?”

🔴 राबिया बोलीं – “जब से मैंने प्रेम को समझा है, तब से मुझे समझ नहीं आता कि घृणा किससे करूं। प्रेम होने पर मन में द्वेष की जगह नहीं रहती।”

🔵 उन्होंने आगे कहा – “प्रेम लिया नहीं जाता, दिया जाता है। प्रेम तो भीतर अपने आप अंकुरित होता है।”

🔴 संत को अपनी भूल का अहसास हुआ। उन्होंने कहा – “हम प्रेम का अहंकार करते हैं, इसलिए प्रेम नहीं कर पाते।”

🔵 वास्तव में प्रेम ही ईश्वर है। जो बिना कुछ लिये देता है वही सच्चा प्रेम है। पेड़-पौधे भी बिना शिकायत के देते रहते हैं।”

✨ शिक्षा: सच्चा प्रेम निष्काम होता है। जहाँ प्रेम है, वहाँ घृणा का स्थान नहीं।

🔵 एक बार एक महात्मा ने अपने शिष्यों से कहा कि वे अगले दिन प्रवचन में आते समय एक थैली में बड़े आलू लेकर आयें। हर आलू पर उस व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिए जिससे वे ईर्ष्या या नफ़रत करते हैं।

🔴 अगले दिन कोई चार आलू लाया, कोई छह, कोई आठ। हर आलू पर एक नाम लिखा था।

🔵 महात्मा जी ने कहा – “अब सात दिनों तक इन आलुओं को हर समय अपने साथ रखो — खाते-पीते, सोते-जागते, हर जगह।”

🔴 दो-तीन दिन में ही आलू सड़ने लगे। बदबू आने लगी। जिनके पास ज्यादा आलू थे वे अधिक परेशान थे।

🔵 सात दिन बाद सभी शिष्य थककर महात्मा के पास पहुँचे। उन्होंने कहा – “अब इन थैलियों को नीचे रख दो।” सभी ने राहत की साँस ली।

🔴 महात्मा ने पूछा – “कैसा अनुभव रहा?” शिष्यों ने कहा – “बहुत कष्टदायक। बदबू, बोझ और परेशानी से हम थक गये।”

🔵 महात्मा बोले – “जब मात्र सात दिन में ये आलू बोझ बन गये, तो सोचो जिनसे तुम नफ़रत करते हो, उनका बोझ तुम जीवन भर मन में ढोते रहते हो। ईर्ष्या मन को भी उसी तरह सड़ा देती है जैसे आलू सड़ते हैं।”

🔴 “यदि किसी से प्रेम नहीं कर सकते, तो कम से कम नफ़रत मत करो। तभी मन हल्का और निर्मल रहेगा।”

✨ शिक्षा: ईर्ष्या और द्वेष मन का बोझ हैं। इन्हें त्यागने से ही मन शांत और स्वच्छ रहता है।

# आपसी मतभेद से विनाश :-

🔵 एक बहेलिए ने एक ही तरह के पक्षियों के एक छोटे से झुंड़ को खूब मौज-मस्ती करते देखा तो उन्हें फंसाने की सोची। उसने पास के घने पेड़ के नीचे अपना जाल बिछा दिया। बहेलिया अनुभवी था, उसका अनुमान ठीक निकला। पक्षी पेड़ पर आए और फिर दाना चुगने पेड़ के नीचे उतरे। वे सब आपस में मित्र थे, सो भोजन देख समूचा झुंड़ ही एक साथ उतरा। जितने भी थे, सब के सब बहेलिये के बिछाए जाल में फंस गए।

🔴 जाल में फंसे पक्षी आपस में विचार करने लगे कि अब क्या किया जाए। उधर बहेलिया खुश था कि पहली बार में ही सफलता मिल गई। तभी पक्षियों ने एकमत होकर निर्णय लिया और सब मिलकर जाल सहित आकाश में उड़ गए।

🔵 बहेलिया हैरान रह गया। वह जाल समेत उड़ते पक्षियों के पीछे भागने लगा। रास्ते में एक ऋषि ने उसे रोका और कहा कि यह दौड़ व्यर्थ है।

🔴 बहेलिया बोला – “ऋषिवर, अभी इनमें एकता है। जब इनमें आपस में झगड़ा होगा, तब ये स्वयं नीचे गिरेंगे।”

🔵 कुछ दूर उड़ने के बाद पक्षियों में मतभेद शुरू हो गया। कोई पास उतरना चाहता था, कोई और दूर जाना चाहता था। बहस बढ़ी, एकता टूटी, और जाल संतुलित न रह सका। अंततः वे नीचे गिर पड़े।

🔴 बहेलिया पहुंचा और सभी पक्षियों को पकड़कर बाजार ले गया।

📘 Educational Explanation (English)

This story highlights the power of unity and the destructive impact of internal conflicts. The birds escaped danger because they cooperated and acted together. However, when disagreements and ego took control, their unity broke apart. Division weakened their strength and made them vulnerable again. The hunter understood that unity cannot survive when selfishness and arguments arise. The lesson teaches that teamwork, patience, and mutual understanding are essential for lasting success. In families, organizations, and societies, internal disputes destroy progress. Unity brings protection and growth, while conflict leads to downfall and failure.

# आखिर यह भी तो नही रहेगा

🔵 एक फकीर अरब में हज के लिए पैदल निकला। रात होने पर वह शाकिर नामक व्यक्ति के घर रुका। शाकिर ने उसकी खूब सेवा की। विदा करते समय फकीर ने दुआ दी — “खुदा करे तू दिनोदिन बढ़ता ही रहे।”

🔴 शाकिर हंस पड़ा और बोला — “अरे फकीर! जो है यह भी नहीं रहने वाला है।”

🔵 दो वर्ष बाद फकीर लौटा तो देखा कि शाकिर निर्धन हो चुका है और नौकरी कर रहा है। अभाव में भी उसने फकीर का स्वागत किया। जाते समय फकीर दुखी था।

🔴 शाकिर बोला — “समय बदलता रहता है। यह भी नहीं रहने वाला है।”

🔵 कुछ वर्षों बाद वही शाकिर जमींदार बन गया। फकीर ने कहा — “अब तो सब अच्छा है।”

🔴 शाकिर फिर हंसा — “या तो यह चला जाएगा या इसे अपना मानने वाला। कुछ भी सदा नहीं रहता। शाश्वत केवल परमात्मा और आत्मा है।”

🔵 समय बीता। शाकिर का महल रह गया, पर वह स्वयं कब्रिस्तान में सो रहा था।

“अरे इंसान! तू किस बात का अभिमान करता है? यहाँ सुख-दुख कुछ भी स्थायी नहीं।”

🔴 फकीर कब्र पर गया तो लिखा था —

🌹 "आखिर यह भी तो नही रहेगा"

📘 Educational Explanation (English)

This story teaches the profound truth of impermanence. Wealth, poverty, success, and failure are temporary phases of life. Shakir remained calm and grateful in every situation because he understood that nothing lasts forever. His wisdom reflects spiritual maturity and detachment from material possessions. The message reminds us not to be arrogant in prosperity nor hopeless in hardship. True peace comes from accepting change and trusting the divine order. Everything in this world is temporary, including our own existence. Only the soul and the Divine are eternal. Therefore, humility, gratitude, and inner balance are the keys to a meaningful life.

# जीवन के लिए

🔵 पत्नी ने कहा – आज धोने के लिए ज्यादा कपड़े मत निकालना…

🔴 पति – क्यों?

🔵 पत्नी – कामवाली बाई दो दिन नहीं आएगी… गणपति पर बेटी-नाती से मिलने जा रही है…

🔴 पति – ठीक है…

🔵 पत्नी – और हाँ, त्यौहार का बोनस पाँच सौ रुपए दे दूँ उसे?

🔴 पति – अभी दिवाली आने वाली है, तब दे देंगे…

🔵 पत्नी – गरीब है बेचारी… बेटी-नाती के पास जा रही है, अच्छा लगेगा उसे…

🔴 पति – तुम जरूरत से ज्यादा भावुक हो जाती हो…

🔵 पत्नी – ठीक है, आज का पिज्जा कैंसल कर देते हैं… वही पाँच सौ रुपए दे देंगे…

🔴 तीन दिन बाद पति ने बाई से पूछा – कैसी रही छुट्टी?

🔵 बाई – बहुत बढ़िया साब… 500 रुपए में नाती के लिए शर्ट, गुड़िया, बेटी के लिए पेढ़े, मंदिर में प्रसाद, किराया, चूड़ियाँ, जमाई के लिए बेल्ट और बाकी पैसे कॉपी-पेन्सिल के लिए दे दिए…

🔴 पति सोच में पड़ गया… एक पिज्जा के आठ टुकड़ों में उसे जीवन का अर्थ दिख गया…

“जीवन के लिए खर्च” और “खर्च के लिए जीवन” का अंतर उसे समझ आ गया।

📘 Educational Explanation (English)

This story teaches the true meaning of spending and values in life. While one person sees money as a means of temporary pleasure, another uses it to create happiness and meaningful memories. The maid carefully used a small amount of money to bring joy to her family, proving that real wealth lies in thoughtful spending. The husband realized that luxury expenses often bring momentary satisfaction, but meaningful spending creates lasting impact. The lesson reminds us to prioritize relationships, compassion, and purpose over material indulgence. Life should not revolve around spending money; rather, money should serve the purpose of living meaningfully.

# दिखावा ना करे!

🔵 मैनेजमेंट की शिक्षा प्राप्त एक युवा नौजवान की नौकरी लग जाती है। उसे कंपनी की ओर से एक अलग केबिन दे दिया जाता है। पहले दिन वह अपने शानदार केबिन को निहार रहा होता है कि तभी दरवाज़े पर दस्तक होती है। एक साधारण व्यक्ति बाहर खड़ा होता है। युवक उसे आधा घंटा इंतज़ार करने को कह देता है।

🔴 आधा घंटा बाद जब वह व्यक्ति अंदर आता है, तो युवक फोन पर बड़ी-बड़ी बातें करने लगता है। वह पैसों, ऐशो-आराम और अपनी उपलब्धियों की डींगें हाँकता रहता है। सामने खड़ा व्यक्ति सब सुनता रहता है।

🔵 बात समाप्त होने पर युवक पूछता है – “तुम यहाँ किसलिए आए हो?”

🔴 वह व्यक्ति विनम्रता से कहता है – “साहब, मैं टेलीफोन ठीक करने आया हूँ। खबर मिली थी कि यह फोन एक हफ्ते से बंद पड़ा है।”

🔵 यह सुनकर युवक शर्म से लाल हो जाता है और चुपचाप बाहर चला जाता है। उसे अपने दिखावे का परिणाम मिल चुका था।

अतः हमें चाहे कितनी भी सफलता मिले, अहंकार और झूठे दिखावे से दूर रहना चाहिए।

📘 Educational Explanation (English)

This story teaches the importance of humility and authenticity. Success often brings confidence, but when confidence turns into arrogance, it leads to embarrassment and downfall. The young man tried to impress others through false display and exaggeration, only to realize that his actions exposed his immaturity. True success does not require showmanship; it reflects naturally through behavior and character. Pretending to be greater than we are only damages our credibility. The lesson reminds us to remain grounded, respectful, and honest, regardless of our achievements. Humility strengthens personality, while arrogance weakens reputation and limits long-term growth.

# चांदी की छड़ी

🔵 एक आदमी सागर के किनारे टहल रहा था। अचानक उसकी नजर चांदी की एक छड़ी पर पड़ी, जो बहते-बहते किनारे आ लगी थी।

🔴 वह खुश हुआ और छड़ी उठा ली। अब वह छड़ी लेकर टहलने लगा।

🔵 धूप चढ़ी तो उसका मन सागर में नहाने का हुआ। उसने सोचा, अगर छड़ी को किनारे रखकर नहाऊंगा तो कोई ले जाएगा, इसलिए वह छड़ी हाथ में लेकर ही नहाने लगा।

🔴 तभी एक ऊंची लहर आई और छड़ी को बहाकर ले गई। वह दुखी होकर तट पर बैठ गया।

🔵 तभी एक संत वहां से गुजरे। उन्होंने पूछा – “इतने दुखी क्यों हो?”

🔴 उसने कहा – “नहाते समय मेरी चांदी की छड़ी बह गई।”

🔵 संत ने पूछा – “क्या वह तुम्हारी थी?”

🔴 उसने उत्तर दिया – “नहीं, यहीं पड़ी मिली थी।”

🔵 संत मुस्कराए और बोले – “जब वह तुम्हारी थी ही नहीं, तो फिर दुख कैसा?”

जीवन में जो अनायास मिलता है, उसे स्वीकार करो; जो चला जाए, उसे जाने दो।

📘 Educational Explanation (English)

This story teaches the importance of detachment and gratitude. The man became attached to something that was never truly his, and when he lost it, he felt unnecessary sorrow. Often in life, we claim temporary blessings as permanent possessions and suffer when they leave us. The saint reminds us that attachment to material things creates pain. True wisdom lies in accepting what comes and letting go of what goes. Happiness does not depend on owning everything but on understanding impermanence. Life is a journey where nothing remains forever, so gratitude and inner peace matter more than temporary possessions.

# साधु की संगति

🕉 संस्कृत श्लोक

सत्सङ्गत्वे निःसङ्गत्वं
निःसङ्गत्वे निर्मोहत्वम्।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं
निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः॥

अर्थ: सत्संग से वैराग्य, वैराग्य से मोह का नाश, मोह के नाश से चित्त की स्थिरता और अंत में मुक्ति की प्राप्ति होती है।

🔵 एक चोर कई दिनों से भूखा था। उसे चोरी का अवसर नहीं मिला, इसलिए आधी रात वह एक साधु की कुटिया में घुस गया।

🔴 उसने सोचा, साधु के पास भले धन न हो, पर खाने को कुछ मिल ही जाएगा।

🔵 संयोग से साधु बाहर निकले और चोर से सामना हो गया। उन्होंने प्रेम से पूछा — “बेटा, इतनी रात को क्यों आए हो?”

🔴 चोर बोला — “महाराज, मैं दिन भर का भूखा हूँ।”

🔵 साधु ने दीपक जलाया, पानी दिया और धूनी में भूने शकरकंद प्रेम से खिलाए।

🔴 साधु का स्नेह देखकर चोर का हृदय पिघल गया। वह सोचने लगा — “मैं चोरी करने आया और ये मुझे माँ की तरह खिला रहे हैं।”

🔵 संत संगति का प्रभाव हुआ और उसके मन के कुसंस्कार मिटने लगे।

“एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
तुलसी संगत साध की, हरे कोटि अपराध॥”

🔴 चोर रो पड़ा और बोला — “मैं चोरी करने आया था, पर आपके प्रेम ने मेरा जीवन बदल दिया। आज से कभी चोरी नहीं करूँगा। मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।”

🔵 साधु के प्रेम ने चोर को साधु बना दिया। उसने अपना जीवन सदमार्ग में लगा दिया।

शिक्षा: भटके हुए व्यक्ति को प्रेम से अपनाकर ही सही मार्ग पर लाया जा सकता है।

📘 Educational Explanation (English)

This story highlights the transformative power of kindness and good company. The thief entered the hut with bad intentions, but the saint’s unconditional love and compassion changed his heart. True spiritual influence does not come from punishment, but from empathy and understanding. When a person experiences genuine care, their inner goodness awakens. Good association, or “Satsang,” has the power to remove negative tendencies and inspire positive change. The lesson teaches that love is stronger than fear, and that even the most misguided individual can reform when treated with dignity and compassion. Kindness can truly transform lives.

# जैसा बीज वैसा फल

🕉 संस्कृत श्लोक

यादृशं बीजं वपते तादृशं लभते फलम्।
सुकृतस्य शुभं फलम्, दुष्कृतस्य तु दारुणम्॥

अर्थ: जैसा बीज बोया जाता है, वैसा ही फल मिलता है। अच्छे कर्म का फल शुभ और बुरे कर्म का फल दुखद होता है।

🔵 अफ्रीका के दयार नोवा नगर में प्रसिद्ध हकीम लुकमान का जन्म हुआ। हब्शी परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें गुलामी का जीवन बिताना पड़ा। मिश्र देश के एक अमीर ने उन्हें खरीद लिया और खेती-बाड़ी का काम लेने लगा।

🔴 वह अमीर बड़ा क्रूर था। छोटी-सी बात पर गुलामों को सताता, पर बाहर से धार्मिक होने का आडम्बर करता था। उसे लगता था कि केवल कर्मकाण्ड करने से स्वर्ग मिल जाएगा।

🔵 एक दिन उसने लुकमान से कहा कि खेत में जाकर जौ बो आओ। लुकमान ने वहाँ चने बो दिए।

🔴 जब खेत में चने उगे तो अमीर क्रोधित होकर बोला — “मैंने जौ बोने को कहा था, तूने चने क्यों बोए?”

🔵 लुकमान ने विनम्रता से कहा — “मालिक, मैंने सोचा कि चने बोने पर जौ उग आएंगे।”

🔴 अमीर गरज उठा — “क्या कभी ऐसा हुआ है कि चने बोए जाएं और जौ उगें?”

🔵 लुकमान ने शांत स्वर में उत्तर दिया — “मालिक, आप दया के खेत में पाप के बीज बोते हैं और सोचते हैं कि ईश्वर आपको पुण्य फल देगा। जब पाप बोकर पुण्य की आशा की जा सकती है, तो चने बोकर जौ क्यों नहीं उग सकते?”

🔴 यह बात अमीर के हृदय में तीर की तरह लगी। उसने अपने आचरण को सुधारने का निश्चय किया और लुकमान को गुलामी से मुक्त कर दिया।

शिक्षा: जीवन में जैसा कर्म करेंगे, वैसा ही फल अवश्य मिलेगा।

📘 Educational Explanation (English)

This story teaches the universal law of cause and effect. Just as the seeds we plant determine the crop we harvest, our actions determine the results we receive in life. The master believed that religious rituals alone would bring him blessings, despite his cruel behavior. Luqman wisely demonstrated that good results cannot come from bad actions. True spirituality lies in righteous conduct, not external appearances. The lesson emphasizes personal responsibility, integrity, and moral accountability. If we desire happiness and success, we must first sow seeds of kindness, honesty, and virtue in our daily actions.

# दो अक्षर की गम्भीर समस्या और दो अक्षर से ही समाधान

🕉 संस्कृत श्लोक

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्॥

अर्थ: मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण मन ही है। विषयों में आसक्त मन बंधन का कारण है और ईश्वर में स्थित मन मुक्ति का कारण है।

🔵 एक नगर में अनेक लोग अपने दुःखों से परेशान थे। वे अपनी समस्याओं का समाधान खोजते हुए इधर-उधर भटकते रहते थे।

🔴 एक दिन उस नगर में एक संत आए और प्रतिदिन कथा-प्रवचन करने लगे। एक दिन कथा समाप्त होने के बाद एक व्यक्ति मिठाई बाँटते हुए खुशी से झूमता हुआ आया।

🔵 लोगों ने पूछा — “भाई! ऐसी कौन-सी खुशी मिली कि मिठाई बाँट रहे हो?”

🔴 उसने कहा — “मेरे जीवन की एक गम्भीर समस्या थी। इस कथा में आकर उसका समाधान हो गया। मेरा घोड़ा खो गया!”

🔵 लोग चकित रह गए — “घोड़ा खो गया और तुम खुश हो?”

🔴 वह संत के चरणों में प्रणाम कर आनंदित होकर चला गया। लोग संत के पास पहुँचे और बोले — “महाराज! यह व्यक्ति पागल है क्या?”

🔵 संत मुस्कराए और बोले — “नहीं, आज कथा सार्थक हुई है। मैं तो चाहता हूँ कि यहाँ आने वाले सबके घोड़े खो जाएँ।”

🔴 लोग बोले — “हमारे पास तो घोड़े हैं ही नहीं!”

🔵 तब संत ने उत्तर दिया — “वह घोड़ा ‘मन’ है। यह बड़ा चंचल है। यदि यह संसार में खो जाए तो दुःख ही दुःख है, और यदि ‘राम’ में खो जाए तो आनंद ही आनंद है।”

🔴 मन रूपी घोड़ा यदि विषयों में भटके तो बंधन है, और यदि ईष्ट में समर्पित हो जाए तो वही मुक्ति है।

शिक्षा: समस्या भी दो अक्षर की है — “मन” समाधान भी दो अक्षर का है — “राम”

📘 Educational Explanation (English)

This story conveys a profound spiritual truth in a simple symbolic way. The “horse” represents the restless human mind. When the mind runs after worldly desires, attachments, and distractions, it becomes the root cause of suffering. However, when the same mind is surrendered to divine remembrance, devotion, and higher purpose, it becomes the source of peace and bliss. The problem and the solution are both within us. The uncontrolled mind binds us, while a disciplined and God-centered mind liberates us. True happiness is not found outside, but in directing the mind toward spiritual awareness.

# मदद और दया सबसे बड़ा धर्म

🕉 संस्कृत श्लोक

परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्।
धर्मो रक्षति रक्षितः॥

अर्थ: परोपकार करना पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना पाप है। जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।

🔵 कहा जाता है कि दूसरों की मदद करना ही सबसे बड़ा धर्म है। जीवन में हर व्यक्ति को कभी न कभी सहायता की आवश्यकता पड़ती है।

🔴 हम अक्सर कहते हैं कि कोई हमारी मदद नहीं करता, लेकिन क्या हमने कभी किसी की सहायता की है? बिना दिए पाने की आशा करना उचित नहीं।

🔵 किशोर नाम का एक गरीब लड़का जंगल से लकड़ियाँ काटकर बेचता था। एक दिन उसने रास्ते में एक दुर्बल बूढ़े व्यक्ति को देखा जो कई दिनों से भूखा प्रतीत होता था।

🔴 आगे उसे एक औरत मिली जिसका बच्चा प्यास से रो रहा था। किशोर के पास न भोजन था न पानी, इसलिए वह दुखी मन से आगे बढ़ गया।

🔵 कुछ दूर जाकर उसने लकड़ियाँ बेच दीं और बदले में भोजन और पानी पाया। तभी उसके मन में विचार आया और वह तुरंत वापस लौटा।

🔴 उसने बूढ़े व्यक्ति को भोजन कराया और बच्चे को पानी पिलाया। ऐसा करके उसे अपार संतोष मिला।

🔵 कुछ दिनों बाद पहाड़ी से गिरकर किशोर घायल हो गया। वही बूढ़ा व्यक्ति उसकी सहायता के लिए आया और उसी औरत ने अपनी साड़ी फाड़कर पट्टी बाँधी।

🔴 किशोर ने अनुभव किया कि दूसरों की मदद करके हम वास्तव में अपनी ही सहायता करते हैं।

शिक्षा: दया और सेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं।

📘 Educational Explanation (English)

This story highlights the timeless principle that kindness and compassion are the greatest forms of religion. Helping others does not always require wealth; even small acts of care can make a significant difference. Kishor’s selfless act of sharing his food and water created a circle of goodness that later returned to him in his time of need. The lesson teaches that life operates on the law of reciprocity — what we give eventually comes back to us. By practicing empathy, generosity, and service, we build a supportive and compassionate society where people stand for one another.

# मैं क्या करूँ देव?

🕉 संस्कृत श्लोक

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

अर्थ: विषयों का चिंतन करने से आसक्ति उत्पन्न होती है, आसक्ति से कामना और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।

🔴 एक शिष्य ने अपने गुरुदेव से कहा — “हे देव! मुझे भय रहता है कि माया बड़ी ठगिनी है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी इससे बच न सके। मैं क्या करूँ?”

🔵 गुरुदेव मुस्कराए और बोले — “वत्स, मेरे साथ चलो।”

🔴 वे एक घर पहुँचे जहाँ एक माँ की गोद में छोटा बच्चा था। गुरुदेव ने उसके सामने स्वर्ण मुद्राएँ और खिलौने रखे, पर बच्चा माँ की गोद से न उतरा। जब उसे गोद से अलग किया गया तो वह रोने लगा और पुनः माँ से चिपक गया।

🔵 फिर वे दूसरे घर गए। वहाँ भी एक बालक था। उसने खिलौने उठाए, पर जैसे ही माँ उठकर जाने लगी, उसने सब छोड़ दिया और माँ की ओर भागा।

🔴 आश्रम लौटकर गुरुदेव बोले — “वत्स! जब तक बालक अबोध है, वह माँ से दूर नहीं जाना चाहता। पर जैसे-जैसे बड़ा होता है, खिलौनों, रिश्तों और धन के आकर्षण में फँसता जाता है।”

🔵 “इसलिए माँ और सद्गुरु के सामने अबोध बने रहो। त्यागी बनो, प्रेमी बनो। जब गुरु चरणों में सच्ची प्रीति बढ़ती है, तो अन्य आकर्षण टिक नहीं पाते।”

🔴 “आकर्षण क्षणिक है, पर प्रेम अजर-अमर है। जहाँ स्वार्थ है वहाँ प्रेम नहीं ठहरता। इष्ट के सिवा किसी और में आसक्ति मत आने देना।”

🔵 “प्रेम गली अति सांकरी है — एक म्यान में दो तलवारें नहीं आ सकतीं। चुनना तुम्हारे हाथ में है — नश्वर या ईश्वर।”

शिक्षा: सद्गुरु और ईश्वर के प्रति निष्काम प्रेम ही माया से रक्षा का उपाय है।

📘 Educational Explanation (English)

This story illustrates the difference between temporary attraction and eternal love. The restless human mind is easily drawn toward worldly pleasures, relationships, and material possessions. However, true spiritual security lies in childlike surrender to the Guru and devotion to God. Just as a child ultimately runs back to the mother despite distractions, a seeker must return to divine consciousness whenever worldly temptations arise. Attraction creates attachment, and attachment leads to suffering. Pure, selfless love for the divine frees the soul from illusion. The lesson emphasizes surrender, detachment, and unwavering devotion as the path to inner peace and protection from Maya.

🌿 खुशी की वजह 🌿

🕉 प्रेरक श्लोक

परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्॥

अर्थ: परोपकार करना पुण्य है और दूसरों को कष्ट देना पाप है।

🔴 एक दिन मैं एक घर के पास से गुजर रहा था कि अचानक अंदर से एक बच्चे के रोने की आवाज़ आई। उसकी आवाज़ में इतना दर्द था कि मैं खुद को रोक न सका और भीतर चला गया।

🔵 अंदर देखा कि एक माँ अपने दस वर्ष के बेटे को मार रही थी और स्वयं भी रो रही थी। पूछने पर उसने बताया कि उसके पति का देहांत हो चुका है। वह घरों में काम करके जैसे-तैसे घर और बेटे की पढ़ाई का खर्च चलाती है, लेकिन यह बच्चा रोज स्कूल देर से जाता है।

🔴 कुछ दिनों बाद मैंने उसी बच्चे को सब्ज़ी मंडी में देखा। वह दुकानों से गिरी हुई सब्जियाँ इकट्ठी कर रहा था। फिर सड़क किनारे बैठकर उन्हें बेचने लगा। कई लोगों ने उसे डाँटा, धक्का दिया, पर वह चुपचाप सहता रहा।

🔵 जब थोड़ी सब्जी बिक गई तो वह एक कपड़े की दुकान पर गया और पैसे देकर अपना स्कूल बैग लिया। फिर मुंह धोकर स्कूल की ओर चल पड़ा।

🔴 सच्चाई जानकर मेरी आँखें नम हो गईं — वह बच्चा अपनी माँ के लिए नया सूट खरीद रहा था, क्योंकि उसकी माँ फटे कपड़ों में काम पर जाती थी।

🔵 अगले दिन जब माँ और टीचर ने यह सब अपनी आँखों से देखा तो दोनों रो पड़े। उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ।

🌺 शिक्षा: सच्ची खुशी लेने में नहीं, देने में है। किसी को समझने से पहले उसे परखना नहीं चाहिए।

📘 Educational Explanation (English)

This story highlights the silent sacrifice of a child who endured hardship to bring happiness to his widowed mother. Misunderstood and punished for being late to school, he was actually working in the vegetable market to buy her new clothes. The lesson teaches us not to judge people without knowing their struggles. True joy comes from giving and caring for others. Compassion, empathy, and understanding are essential human values that make society better. Before criticizing someone, we should try to understand their circumstances and hidden efforts.

🌸 लज्जा ही नारी का सच्चा आभूषण है 🌸

🕉 प्रेरक श्लोक

शीलं परम भूषणम्॥

अर्थ: शील (संयम और लज्जा) ही मनुष्य का सर्वोत्तम आभूषण है।

🔴 मगध की सुंदरी वासवदत्ता उपवन में विहार करने निकली। उसका साज-श्रृंगार अत्यंत आकर्षक था।

🔵 उपवन के सरोवर किनारे एक तरुण संन्यासी उपगुप्त ध्यान में लीन बैठे थे। वासवदत्ता उनके समीप गई और चंचल भाव से पूछा — “महाराज, नारी का सर्वश्रेष्ठ आभूषण क्या है?”

🔴 उपगुप्त ने शांत स्वर में कहा — “जो उसके सौंदर्य को सहज रूप से बढ़ा दे।”

🔵 वासवदत्ता ने आग्रह किया — “स्पष्ट बताइए।”

🔴 संन्यासी ने कहा — “देवि, कृत्रिम आभूषणों को त्याग दीजिए।”

🔵 वासवदत्ता ने एक-एक कर सारे आभूषण उतार दिए। फिर भी उपगुप्त शांत रहे। जब उसने वस्त्र भी त्याग दिए तो वह स्वयं लज्जा से सिर झुका न सकी।

🔴 तब उपगुप्त ने कहा — “देवि, यही लज्जा ही नारी का सच्चा आभूषण है।”

🔵 वासवदत्ता समझ गई कि बाहरी सौंदर्य नहीं, बल्कि आंतरिक शील और मर्यादा ही वास्तविक शोभा है।

🌺 शिक्षा: सच्चा सौंदर्य आंतरिक गुणों और लज्जा में है, बाहरी आभूषणों में नहीं।

📘 Educational Explanation (English)

This story teaches that true beauty lies not in external ornaments but in inner virtue and modesty. Vasavadatta believed that physical decoration enhances beauty, but Sage Upagupta revealed that modesty and character are the greatest adornments of a woman. External beauty fades with time, while inner dignity and moral strength remain eternal. The lesson reminds us that real grace comes from purity of heart and noble conduct. True charm is reflected through humility, self-respect, and inner values rather than material embellishments.

🐒 मुठ्ठी खोलो, बंधन मुक्त हो जाओ 🐒

🕉 प्रेरक श्लोक

त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः॥

अर्थ: केवल त्याग के द्वारा ही अमृतत्व (मुक्ति) की प्राप्ति होती है।

🔴 एक बार एक संत अपनी कुटिया में ध्यानमग्न बैठे थे। अचानक बाहर शोर सुनाई दिया।

🔵 बाहर जाकर देखा तो एक बंदर जोर-जोर से चिल्ला रहा था। उसका हाथ एक घड़े के अंदर फँसा हुआ था।

🔴 संत ने ध्यान से देखा तो समझ गए कि बंदर ने घड़े के अंदर रखा लड्डू पकड़ रखा है। हाथ अंदर तो आसानी से चला गया, लेकिन मुट्ठी बंद होने के कारण बाहर नहीं निकल पा रहा था।

🔵 संत ने कहा — “यदि तुम लड्डू छोड़ दो तो सहज ही मुक्त हो जाओगे।”

🔴 बंदर बोला — “महाराज, लड्डू तो नहीं छोड़ूँगा, आप कोई और उपाय बताइए।”

🔵 संत मुस्कुराए — “या तो लड्डू छोड़ो या फिर बंधन स्वीकार करो।”

🔴 बहुत प्रयास के बाद बंदर समझ गया कि मुक्ति त्याग के बिना संभव नहीं। अंततः उसने लड्डू छोड़ दिया और तुरंत हाथ बाहर निकल आया।

🔵 संत बोले — “वत्स! यही संसार का नियम है। जब तक मोह और लोभ की मुट्ठी बंद है, तब तक बंधन बना रहेगा।”

🌺 शिक्षा: त्याग ही सच्ची मुक्ति का मार्ग है। जब तक पकड़ छोड़ोगे नहीं, तब तक मुक्त नहीं हो पाओगे।

📘 Educational Explanation (English)

This story symbolizes human attachment and the illusion of possession. The monkey represents individuals who hold tightly to worldly desires, even when those desires cause suffering. Freedom is available at any moment, but it requires letting go. Just as the monkey could not free itself without releasing the sweet, humans cannot attain peace while clinging to greed and attachment. The lesson teaches that liberation comes through detachment and wise choices. True freedom begins when we open our fists and release what binds us.

⚔️ विश्वासघात से प्राण जाना अच्छा ⚔️

🕉 प्रेरक श्लोक

प्राण जाए पर वचन न जाए॥

अर्थ: प्राण भले ही चले जाएँ, पर दिया हुआ वचन नहीं टूटना चाहिए।

🔴 महाराणा प्रताप के वीर योद्धाओं में रघुपति सिंह अत्यंत पराक्रमी थे। वे छापामार युद्ध में निपुण थे और शत्रु उनसे भयभीत रहता था।

🔵 एक बार उनका पुत्र गंभीर रूप से बीमार पड़ा। वे वेश बदलकर उसे देखने चित्तौड़ पहुँचे। सभी द्वारों पर कड़ा पहरा था।

🔴 उन्होंने एक पहरेदार से कहा — “मैं रघुपति सिंह हूँ। अपने मरणासन्न पुत्र को देखने आया हूँ। मुझे जाने दो, मैं लौटकर स्वयं तुम्हारे पास आ जाऊँगा।”

🔵 पहरेदार उनकी सच्चाई से प्रभावित हुआ और उन्हें जाने दिया।

🔴 पुत्र को देखकर रघुपति सिंह ने अपने वचन का पालन किया और वापस उसी पहरेदार के पास आकर स्वयं को गिरफ्तार करवा दिया।

🔵 जब उन्हें दरबार में लाया गया तो शत्रु भी उनकी सत्यनिष्ठा से स्तब्ध रह गया।

🔴 उनसे पूछा गया — “तुम भाग सकते थे, फिर लौटकर क्यों आए?”

🔵 उन्होंने उत्तर दिया — “राजपूत वचन के पक्के होते हैं। विश्वासघात से प्राण देना बेहतर है।”

🌺 शिक्षा: सच्चा चरित्र वही है जो कठिन परिस्थिति में भी सत्य और वचन का पालन करे।

📘 Educational Explanation (English)

This story reflects the power of integrity and honor. Raghupati Singh chose to return and surrender himself rather than break his promise, even though he had the chance to escape. His action demonstrates that true character is revealed in moments of difficulty. Honor, loyalty, and commitment are greater than fear of death. The lesson teaches that betrayal destroys dignity, while keeping one’s word builds eternal respect. A person of true courage values principles above life itself.

🌳 उदारता और संकीर्णता 🌳

🕉 प्रेरक श्लोक

उदारः सर्वत्र रमते, संकीर्णः शीघ्रं नश्यति॥

अर्थ: उदार व्यक्ति हर जगह समृद्धि और आनंद में रहता है, जबकि संकीर्ण सोच वाला शीघ्र नष्ट हो जाता है।

🔴 राजा सत्यनारायण के राज्य में दो विशेष वृक्ष थे, जिन्हें वह स्वयं पानी देने और संजोने का कार्य करते थे। एक दिन उन्हें राज्य से दूर जाना पड़ा। राजा ने दोनों संतानाओं को कहा — “इन वृक्षों की देखभाल तुम दोनों करेंगे। इन्हें हराभरा रखना और जड़ को बर्बाद न होने देना।”

🔵 एक वर्ष बाद राजा लौटे। उन्होंने देखा — एक वृक्ष पूरी तरह हराभरा था और दूसरा सूखा हुआ।

🔴 उन्होंने दोनों संतानाओं को बुलाया और पूछा — “क्यों? तुमने ध्यान नहीं दिया क्या?”

🔵 एक संतान ने कहा — “राजा, हमने पानी दिया, पर वृक्ष की जड़ बर्बाद हो गई। हमने सब किया, पर जड़ बचाना भूल गए।”

🔴 राजा ने समझाया — “जड़ ही जीवन का मूल है। जड़ को संकीर्णता से बचाना आवश्यक है। जिसने जड़ की रक्षा की, उसका वृक्ष फलता-फूलता है।”

🌺 शिक्षा: जीवन का मूल तत्व “उदारता” है। संकीर्णता अपने जीवन का समूल विनाश लाती है, जबकि उदारता हमें हर जगह “राममय” दृष्टि देती है।

📘 Educational Explanation (English)

This story teaches that generosity (udarata) nourishes life like a well-rooted tree, while narrow-mindedness (sankirnata) leads to destruction. A person with a generous heart sees divinity and goodness everywhere, and his life blossoms with prosperity and harmony. Conversely, a narrow-minded approach chokes the roots of growth and leads to decay. Just as a tree’s health depends on its roots, life’s success and spiritual growth depend on a generous and broad outlook.

🏆 सफलता का रहस्य 🏆

🕉 प्रेरक श्लोक

यथाऽपि प्राणस्य स्पन्दनं आवश्यकं, तथा कार्यसिद्धि हेतु उत्कट इच्छा आवश्यकम्॥

अर्थ: जैसे जीवन में सांस लेने की तीव्र आवश्यकता है, उसी प्रकार सफलता पाने की तीव्र इच्छा होना चाहिए।

🔴 एक नौजवान ने सुकरात से पूछा — “सफलता का रहस्य क्या है?”

🔵 सुकरात ने कहा — “कल नदी के किनारे मिलो।”

🔴 अगले दिन जब दोनों नदी के किनारे पहुंचे और पानी गले तक पहुँच गया, सुकरात ने अचानक उस नौजवान का सिर पानी में डुबो दिया। नौजवान बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगा, लेकिन सुकरात ने तब तक डुबोये रखा जब तक वह नीला पड़ने नहीं लगा। फिर उसने सिर बाहर निकाला।

🔵 सुकरात ने पूछा — “जब तुम पानी में थे तो सबसे ज्यादा क्या चाहते थे?”

🔴 नौजवान ने उत्तर दिया — “सांस लेना।”

🔵 सुकरात ने कहा — “यही सफलता का रहस्य है। जब तुम सफलता को उतनी ही तीव्रता से चाहोगे जितना जीवन में सांस लेने की इच्छा है, तब सफलता निश्चित रूप से मिलेगी। इसके अलावा कोई रहस्य नहीं है।”

🌟 शिक्षा: सफलता केवल इच्छाशक्ति और दृढ़ प्रयास से प्राप्त होती है। जितनी तीव्र इच्छा, उतनी प्रबल सफलता।

📘 Educational Explanation (English)

This story demonstrates that success comes only with an intense desire, just like the necessity of breathing. The deeper and stronger your longing for achievement, the more inevitable success becomes. Mere planning or effort is not enough; your heart and willpower must crave success with the same intensity as life itself. The lesson is simple yet profound — want success as desperately as you want to breathe, and you will attain it.

🌿 रूपान्तरण कैसे हो 🌿

🕉 प्रेरक श्लोक

धर्मस्य अनुभवः न केवलं शब्देषु, किन्तु हृदयगत अनुभवेषु।

अर्थ: धर्म का अनुभव केवल पढ़ने या बोलने से नहीं, बल्कि हृदय में उतर जाने से होता है।

🔴 एक शिष्य ने गुरुदेव से पूछा — “गुरुदेव, आपने कहा था कि धर्म से जीवन का रूपान्तरण होता है। लेकिन इतने समय तक आपके चरणों में रहने के बावजूद भी मैं अपने रूपान्तरण को महसूस नहीं कर पा रहा हूँ, तो क्या धर्म से जीवन का रूपान्तरण नहीं होता?”

🔵 गुरुदेव मुस्कुराए और बोले — “एक काम करो, थोड़ी सी मदिरा लेकर आओ।”

🔴 शिष्य चौंक गया, फिर भी वह गया और लोटे में मदिरा लेकर लोटा। गुरुदेव ने कहा — “अब इससे कुल्ला करो।” शिष्य कुल्ला करने लगा। कुल्ला करते-करते लोटा खाली हो गया।

🔵 गुरुदेव ने पूछा — “बताओ, तुम्हें नशा चढ़ा या नहीं?”

🔴 शिष्य बोला — “गुरुदेव, नशा कैसे चढ़ेगा? मैंने सिर्फ कुल्ला किया, गले तक नहीं उतारा। नशा कैसे चढ़ सकता है।”

🔵 गुरुदेव ने समझाया — “इतने वर्षों से तुम धर्म का कुल्ला करते आ रहे हो। यदि तुम इसे गले तक उतारते तो धर्म का असर पड़ता। जो लोग केवल सतही स्तर पर धर्म का पालन करते हैं, उनके जीवन में दिखावा और वास्तविकता में अंतर रहता है। वे मंदिर में एक, व्यापार में दूसरा और जीवन में तीसरा व्यवहार करते हैं। धर्म अभिनय नहीं, बल्कि जीने की कला है।”

🌟 शिक्षा: धर्म को केवल सीखने या दिखावे के लिए नहीं, बल्कि हृदय में उतारकर जीना चाहिए। तभी जीवन में वास्तविक रूपान्तरण आता है।

📘 Educational Explanation (English)

This story illustrates that mere reading or hearing about dharma is not enough for transformation. True transformation occurs when the principles of dharma are internalized and lived through heartfelt practice. Superficial or performative actions may appear virtuous, but they do not change the character. Only when dharma is assimilated deeply into the heart does it shape life and behavior genuinely.

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