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जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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Gyan Vigyan Brhamgyan (GVB the university of veda)

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All time best 20 Hindi short stories

🔵 बात उन दिनों की है जब रूस में जार अलेक्जेंडर का शासन था। उसके व्यक्तिगत निवास में बहुत थोडे और विश्वसनीय लोग ही पहुँच सकते थे, इसलिए कितने ही रहस्य ऐसे थे, जो औरो तक कभी प्रकट नहीं हो सके।

🔴 एक दिन प्रशा के राजदूत बिस्मार्क जार से भेंट करने उनके महल पर गये। बिस्मार्क जहाँ बैठे थे, उसके ठीक सामने खिड़की पडती थी। बहुत पीछे तक का बाहरी दृश्य भी वहाँ से अच्छी तरह दिखाई दे रहा था। बिस्मार्क ने देखा कि बहुत देर से एक रायफलधारी संतरी मैदान मे खडा है जबकि रक्षा करने जैसी कोई वस्तु वहाँ पर नहीं है। शांतिकाल था- इसलिए सैनिक गश्त जैसी कोई बात भी नहीं थी।

🔵 बडी़ देर हो गई तब बिस्मार्क ने जार से पूछा- यह संतरी क्यों खड़ा है? जार को स्वयं भी पता नहीं था कि संतरी वहाँ किस बात का पहरा दे रहा है।

🔴 जार ने अपने अंगरक्षक सेनाधिकारी को बुलाया और पूछा- यह संतरी इस पीछे के मैदान में किसलिए नियुक्त किया जाता है? सेनाधिकारी ने बताया- "सरकार! यह बहुत दिनों से ही यही खड़ा होता चला आ रहा है।" जार ने थोड़े कड़े स्वर में कहा- "यह तो मैं भी देख रहा हूँ। मेरा प्रश्न यह है कि संतरी यहाँ किसलिए खड़ा होता है। जाओ और पता लगाकर पूरी बात मालूम करो।"

🔵 सेनाधिकारी को कई दिन तो यह पता लगाने में ही लग गए। चौथे दिन सारी स्थिति का पता कर वह जार के सम्मुख उपस्थित हुआ और बताया- "पुराने सरकारी कागजात देखने से पता चला कि ८० वर्ष पहले महारानी कैथरीन के आदेश से एक संतरी वहां खड़ा किया गया था। बात यह थी कि एक दिन जब वे घूमने के लिए निकलीं, तब इरा मैदान में बर्फ जमा थी। सारे मैदान में एक ही फूल का पौधा था और उसमें एक बहुत सुंदर फूल खिला हुआ। कैथरीन को वह फूल बेहद सुंदर लगा, सो उसकी सुरक्षा के लिए तत्काल वहाँ एक संतरी खड़ा करने का आदेश दिया और इस तरह वहाँ संतरी खड़ा करने की परंपरा चल पड़ी। ८० वर्ष हो गए न किसी ने आदेश को बदला, न किसी ने उसकी आवश्यकता अनुभव की, सो उस स्थान पर व्यर्थ ही पहरेदारी बराबर चलती आ रही है।"

🔴 जार को गुस्सा भी आया और हँसी भी। गुस्सा इसलिए कि परंपराओं का निरीक्षण न होने से यह खर्च व्यर्थ ही होता रहा, और हँसी इसलिए कि पहले तो एक ही फूल था पर ८० वर्ष से तो उस मैदान में अच्छी घास भी नहीं है, न जाने संतरी किसकी रखवाली कर रहा है।

🔵 कहानी यहाँ समाप्त नहीं हुई, वरन् सही कहानी अब प्रारंभ होती है और वह यह है कि समाज में स्वयं आज दहेज, पर्दा प्रथा, जाति-पाँति, ऊँच-नीच, मृतक भोज स्वस्थ परंपरा के रूप में प्रचलित किए गए थे। अब अंध परंपरा बन चुके हैं। वर्तमान परिस्थितियों में न तो उनकी आवश्यकता है और न उपयोगिता। फिर भी न तो कोई यह देख रहा कि यह परंपराएँ आखिर किस उद्देश्य से बनी थीं और न ही कोई उन्हें मिटाने का साहस कर रहा है। हम व्यर्थ ही उपहास और अपव्यय के पात्र बने उन्हें अपने छाती से वैसे ही चिपकाए हैं जैसे रूस का यह बिना कारण-पहरा।

Sanskrit Sloka with Hindi:

अनुभवो हि परंपरायाः मूल्यं विज्ञातव्यम्।
"जो परंपरा अपने उद्देश्य और उपयोगिता से विहीन हो जाए, उसे विवेकपूर्वक त्याग देना ही शास्त्रसम्मत है।"

English Summary (100 words)

This story illustrates the danger of blind traditions. In Tsar Alexander’s Russia, a sentinel stood in a field for 80 years simply because a queen’s order once required it. Over decades, no one questioned the need, causing unnecessary effort and expense. Similarly, in society, customs like dowry, caste distinctions, or rigid rituals continue without purpose, simply because they always existed. The story urges reflection on the origin and utility of traditions, advising to honor meaningful ones and discard obsolete practices. Wisdom lies in evaluation, not blind adherence, ensuring actions are purposeful and beneficial.

संस्कृत श्लोक:
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥

अर्थ: केवल कल्पना या भाग्य के भरोसे कार्य सिद्ध नहीं होते। जैसे सोए हुए सिंह के मुख में स्वयं हिरण प्रवेश नहीं करते, वैसे ही बिना पुरुषार्थ के सफलता नहीं मिलती।

🔵 नेपोलियन बोनापार्ट की प्रेमिका जेसोफाइन ने एक बार उसे एक पत्र लिखा — “मैं देखती हूँ, जो फ्रांस एक दिन पुरुषार्थ के ढाँचे में पूरी तरह ढल चुका था, जिसे आपने पराक्रम का पाठ पढ़ाया था, आज उसी फ्रांस की नसें आपके देववाद के आश्रय के कारण शिथिल पड़ती जा रही हैं। मनुष्य अपनी भुजाओं, अपने शस्त्र पर भरोसा न करे और यह सोचे कि घड़ी, शकुन, देवता उसकी सहायता कर जायेंगे — इससे बढ़कर मानवीय शक्ति का और कोई अपमान नहीं हो सकता।”

🔴 ऐसा पत्र लिखने का खास कारण था। एक समय था जब नेपोलियन ज्योतिष पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं करता था। उसके सेनापति चाहते थे कि वह ज्योतिषियों से पूछकर कदम बढ़ाए, किंतु नेपोलियन ने उन्हें डाँटते हुए कहा — “ईश्वर यदि सहायक है तो वह पराक्रमी और पुरुषार्थी के लिए है। भाग्यवाद का आश्रय लेने वालों को असफलता के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलता।”

🔵 जब तक नेपोलियन अपने सिद्धांत पर दृढ़ रहा, वह दुश्मनों के छक्के छुड़ाता रहा। पर दुर्भाग्य से एक दिन वह स्वयं भी देववाद और ज्योतिष पर विश्वास करने लगा। वही ढील उसकी पराजय का कारण बनी।

🔴 भारतीय तत्वदर्शन में ज्योतिष का स्थान है, पर वह विशुद्ध गणित के रूप में है। व्यक्तिगत जीवन में भाग्यवाद का अंधानुकरण पतन का कारण बन सकता है। नेपोलियन की भाँति भारतवर्ष ने भी इसका दुष्परिणाम देखा। सोमनाथ मंदिर लुटा, तब मुहूर्त की प्रतीक्षा की गई। यदि सैनिक पाखंड न मानते, तो इतिहास कुछ और होता। आज भी हम सफलता के लिए भाग्य का मुख ताकते रहते हैं।

🔵 आज देश को अब्राहम लिंकन जैसे पुरुषार्थी नेतृत्व की आवश्यकता है। जब अमेरिका में गृहयुद्ध प्रारंभ हुआ, तब राष्ट्र विभाजन के कगार पर था। लिंकन ने दृढ़ निश्चय किया कि एकता को सैनिक शक्ति से बनाए रखा जाएगा।

🔴 उनके एक मित्र ने कहा — “निर्णय से पहले ज्योतिषियों से राय ले लें।” लिंकन ने उत्तर में सैनिकों को बुलाकर कहा — “इस कमरे में राष्ट्र के तीन शत्रु बैठे हैं। दरवाज़ा बंद कर दो, जब तक हम विजयी होकर न लौटें, ताला न खोलना।”

🔵 यदि लिंकन भी ज्योतिषवाद में फँस जाते, तो अमेरिका की एकता संभव न होती। हमारे जीवन की असफलताओं का बड़ा कारण भाग्यवाद है। यदि हम हीन भावना त्याग दें और पुरुषार्थ को अपनाएँ, तो जीवन संग्राम में हम भी सफलता अर्जित कर सकते हैं।

English Summary (100 words)

This story emphasizes that excessive dependence on astrology weakens human effort and courage. Napoleon once believed only in bravery and action, but when he began relying on fate and divine signs, his decline started. The narrative compares this mindset to historical failures where people waited for “auspicious moments” instead of acting decisively. In contrast, Abraham Lincoln demonstrated strong determination during America’s Civil War, rejecting astrological advice and relying on strategic action. The central message is clear: destiny favors the courageous. Success is achieved through determination, discipline, and bold effort—not by waiting for luck, omens, or predictions to shape outcomes.

संस्कृत श्लोक:
मातृत्वं हि न केवलं रक्ते निहितं, स्नेहं हृदये सञ्चरति।
क्रोधस्य विषेण हृदयं बंजरं भवति॥

अर्थ: मातृत्व और स्नेह हृदय में जीवन का संचार करते हैं। किन्तु क्रोध और ईर्ष्या से मन बंजर और शून्य हो जाता है।

🔴 चौधरी साहब की हवेली में आज बड़ी रौनक थी। ढोलक की थाप पूरे घर में गूँज रही थी। आज उनकी छोटी बहू की मुहं दिखाई थी। सुनीता बहुत व्यस्त थी। सभी मेहमानों के आवभगत की ज़िम्मेदारी उसी पर थी। सभी सुनीता की तारीफ कर रहे थे। वही थी जो अपनी छोटी चचेरी बहन प्रभा को अपनी देवरानी बना कर लाई थी। प्रभा के रूप और व्यवहार ने आते ही सब पर अपना जादू चला दिया।

🔵 चाचा-चाची के निधन के बाद प्रभा सुनीता के घर रहकर पली थी। सुनीता ने उसे सदैव अपनी छोटी बहन सा स्नेह दिया। इसी कारण उसने प्रभा को अपनी देवरानी बनाने की पूरी कोशिश की और सफल भी हुई।

🔴 दो वर्ष पूर्व सुनीता इस घर की बड़ी बहू बनकर आई थी। अपने सेवाभाव और हंसमुख स्वभाव से वह सभी की लाडली बन गई थी। घर पर उसका ही राज था। कमी बस यह थी कि वह अब तक माँ नहीं बन पाई थी। आस-पड़ोस की कानाफ़ूसी से उसकी यह स्थिति ज्ञात रहती थी।

🔵 कुछ महीनों बाद प्रभा को पुत्र हुआ। खुशियाँ घर में फैल गईं। सुनीता ने मोहन को अपनी गोद में लिया। मोहन चार वर्ष का हो गया। धीरे-धीरे सुनीता को महसूस हुआ कि घर में अब उसका स्थान कम होता जा रहा है, और प्रभा ने वह स्थान ले लिया। ईर्ष्या ने उसका हृदय विष से भर दिया।

🔴 उसकी ईर्ष्या क्रोध में बदल गई। केंद्र मोहन था। उसने रात को आँगन में खड़ा होकर किसी का इंतज़ार किया। एक व्यक्ति ने टोकरी भेजी। टोकरी में से एक जहरीला नाग निकला और मोहन की तरफ बढ़ा। उसकी चीख ने घर और पड़ोस को हिला दिया। मोहन का जाने से पूरा घर दहल गया। प्रभा को भी पछतावा हुआ।

🔵 जब सुनीता के हृदय में ईर्ष्या और क्रोध की ज्वाला शांत हुई, तब उसे एहसास हुआ कि उसने क्या किया। उसने अपने ही हाथों खुद को बंजर बना दिया। अब वह गुमसुम रहती थी, किसी से कुछ नहीं बोलती थी। उसके भीतर के सारे भाव सूख गए थे।

English Summary (100 words)

This story portrays the destructive power of jealousy and anger. Sunita, once loved and respected by all, becomes envious of her sister Prabha when the latter has a child, Mohan. Her maternal love turns into resentment, leading her to commit an act that endangers the child. The narrative highlights how unchecked negative emotions can destroy one’s inner peace, love, and vitality. Sunita’s heart becomes barren—“barren” representing the loss of joy, compassion, and emotional connection. The story emphasizes that nurturing love and controlling jealousy are essential for happiness, while envy and rage can lead to spiritual and emotional desolation.

संस्कृत श्लोक:
सांस्कृतिकं आत्मसम्मानं, न केवलं वस्त्रेषु स्थितम्।
सत्साहसः न्यायः च, व्यक्तित्वं ज्योतिवत् दीप्यमानम्॥

अर्थ: सांस्कृतिक स्वाभिमान वस्त्रों में नहीं, बल्कि साहस, न्याय और विचारों में प्रकट होता है। व्यक्तित्व वही है जो दीप की तरह उज्ज्वलता फैलाए।

🔴 एक बड़े विद्यालय में, जहां अधिकांश छात्र अप-टू-डेट फैशन में दिखाई पड़ते थे, एक नया छात्र प्रवेश लिया। उसकी पोशाक धोती, कुर्ता, टोपी, जाकेट और साधारण चप्पल थी।

🔵 छात्रों ने हँसकर और व्यंग्य करके कहा कि वह विद्यार्थी कैसे है और फैशन के अनुसार क्यों नहीं रहता। छात्र ने उत्तर दिया कि पहनावा व्यक्तित्व नहीं बनाता। संस्कृति का परित्याग करना उसके लिए मरण तुल्य है।

🔴 उसका साहस और विचारधारा विद्यालय को प्रभावित करने लगी। छात्रों ने उसे नेता बना लिया, और छात्र-यूनियन का अध्यक्ष निर्वाचित किया। वह लौहनिष्ठा और तेजस्वी विचारों का प्रतीक था।

🔵 गणेश शंकर विद्यार्थी न्यायप्रिय और संस्कृति के भक्त थे। उन्होंने धर्म और जाति भेदभाव से किसी को प्रभावित नहीं होने दिया। १९३१ में हिंदू-मुसलमान दंगों में उन्होंने हजारों को बचाया।

🔴 दुर्भाग्यवश, धर्मांध मुसलमान के हाथों शहीद हुए। लेकिन उनके साहस, न्यायप्रियता और संस्कृतिनिष्ठा का योगदान अमर रहा। उनके आदर्श भारतीय संस्कृति को उज्ज्वल बनाए रखेंगे।

English Summary (100 words)

This story highlights the unwavering cultural pride and moral courage of Ganesh Shankar Vidyarthi. Despite wearing traditional attire in a modern, fashion-conscious school, he demonstrated that true respect comes from character, justice, and intellect rather than appearance. His leadership, dedication to fairness, and protection of the vulnerable earned him admiration. Vidyarthi stood against communal violence, risking his life to save thousands during riots in 1931. His life teaches that cultural self-respect, bravery, and ethical commitment define greatness. Even in adversity, individuals like him illuminate society with values of unity, justice, and devotion to one’s heritage.

संस्कृत श्लोक:
सत्यं, नीतिः, विचारः च दृढाः स्थैर्यमानाः।
यथार्थस्य मार्गे साहसं, प्रयासं च लभते॥

अर्थ: सत्य, न्याय और दृढ़ विचारों के साथ, साहस और प्रयास से ही वास्तविक कार्य सफल होता है।

🔵 बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर फ्रेड्रिक हैडिले अपनी बैठक में उद्विग्न थे। उन्होंने श्री ईश्वरचंद्र विद्यासागर को बुलाया। विद्यासागर जी की शिक्षण संबंधी सूझ-बूझ पूरे देश में प्रसिद्ध थी। उन्होंने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दिया था, पर गवर्नर उनकी योग्यता से प्रभावित थे।

🔴 विद्यासागर जी ने समझौते का नम्रतापूर्वक इनकार किया। उनका कहना था- कार्य-पद्धति में बदलाव हो सकता है, सिद्धांतों में नहीं। उन्होंने अपनी आंतरिक प्रेरणा को महत्व दिया।

🔵 गवर्नर ने उन्हें बंगाल में शिक्षा प्रसार हेतु योजना बनाने का आग्रह किया। विद्यासागर जी ने योजना तैयार कर दी। योजना की व्यवहारिकता देखकर गवर्नर प्रसन्न हुए और इसे वायसराय के पास भेजा।

🔴 वायसराय ने नकारात्मक आदेश दिया। विद्यासागर जी ने सांत्वना दी और कहा कि यदि योजना समाज के हित की होगी, तो स्वयं अपने बल पर चल जाएगी। वास्तव में योजना का जनता ने भारी स्वागत किया। शिक्षा प्रेमियों ने सहयोग दिया और बंगाल में शिक्षा का व्यापक प्रसार हुआ।

English Summary (100 words)

This story illustrates the unwavering principles and practical wisdom of Ishwar Chandra Vidyasagar. Despite facing bureaucratic obstacles and opposition from the Viceroy, he remained steadfast in his ideals. He accepted challenges with humility and focused on societal welfare rather than personal gain. Vidyasagar’s meticulously crafted educational plan for Bengal, initially rejected by authorities, succeeded due to its intrinsic merit and public support. His approach teaches that true leadership combines integrity, perseverance, and dedication to the common good. By remaining firm on principles while collaborating effectively, one can achieve lasting impact and inspire societal progress.

संस्कृत श्लोक:
सदाचारः, धैर्यं, विवेकश्च महत्त्वं ददाति।
चरित्रबलमेनं जनं महामानवम् करोति॥

अर्थ: सदाचार, धैर्य और विवेक का संयोग चरित्रबल उत्पन्न करता है, जो किसी व्यक्ति को महामानव बनाता है।

🔵 मेसिडोन के राजा फिलिप अपने पुत्र सिकंदर को महान पुरुष बनाना चाहते थे। उन्होंने दार्शनिक अरस्तु को सिकंदर का गुरु नियुक्त किया। अरस्तु ने सिकंदर की प्रतिभा, शक्ति और साहस को सन्मार्ग में विकसित करने पर विशेष ध्यान दिया।

🔴 अरस्तु ने सिकंदर की हर क्रिया पर निगरानी रखी। जब सिकंदर का किसी स्त्री के साथ अनुचित संबंध हुआ, तो अरस्तु ने उसे समझाया और सही मार्ग पर लाया। बाद में अरस्तु ने मनोवैज्ञानिक उपाय अपनाकर सिकंदर को चरित्रबल के महत्व का अनुभव कराया।

🔵 सिकंदर ने अपने गुरु की शिक्षा को अपनाया और चरित्र निर्माण में पूरी तरह ध्यान लगाया। इसी कारण वह इतिहास के महान् पुरुष 'सिकंदर महान' कहलाए।

English Summary (100 words)

This story highlights the crucial role of character strength in developing a great human being. King Philip entrusted Aristotle with educating Alexander, ensuring his natural talents, courage, and intelligence would be guided toward righteousness. Aristotle carefully monitored Alexander’s actions, correcting him whenever he strayed from virtue. Through psychological methods, Aristotle demonstrated the importance of moral discipline and self-control. Alexander internalized these lessons, focusing on character development rather than mere indulgence in desires. This guidance allowed him to harness his potential fully, transforming him into Alexander the Great. True greatness, therefore, arises not just from talent, but from disciplined character and ethical cultivation.

संस्कृत श्लोक:
कर्मणा धर्मस्य सारं जीवने प्रकटयेत्।
वाचाल्यं न तु सेवायाम् परिणामं जनयेत् ॥

अर्थ: धर्म को केवल वाणी से नहीं, कर्म और जीवन में उतारकर ही उसका सार प्रदर्शित किया जा सकता है।

🔵 भिक्षु विनायक को वाचालता की आदत थी। वह जोर-ज़ोर से चिल्लाकर जनपथ पर लोगों को इकट्ठा करता और धर्म की लंबी-चौड़ी बातें करता।

🔴 बुद्धजी ने उसे स्नेहपूर्वक समझाया कि धर्म को केवल शब्दों से नहीं, जीवन और सेवा के माध्यम से व्यक्त करना चाहिए। जैसे गायों की देखभाल करने वाला ग्वाला ही उनका सही स्वामी होता है, वैसे ही धर्म को कर्म और साधना में लगाकर ही जनता में उसका प्रभाव फैलता है। इस प्रकार सत्कर्म को पाठ तक ही सीमित न रखकर, कर्तव्य में उतारना जीवन में समग्रता और सार्थकता लाता है।

English Summary (100 words)

This story illustrates the essence of practicing Dharma through action rather than words. Monk Vinayak was excessively talkative, addressing crowds with lengthy religious discourses. Buddha, observing this, explained that just as a herder truly owns cows by caring for them, one cannot impart Dharma merely through speech. True spiritual influence comes from embodying teachings in service and daily life. The lesson emphasizes that wisdom must be applied practically, through duty and action, to achieve meaningful impact. Dharma expressed in lived experience rather than words alone leads to holistic growth and genuine moral effect on society.

संस्कृत श्लोक:
निष्ठया हि साध्यते परमात्मा ज्ञानम्।
कर्मयोगेन हि सिद्ध्यति जीवितम् ॥

अर्थ: केवल लगन और निष्ठा से ही परमात्मा का ज्ञान प्राप्त होता है; कर्मयोग और समर्पण से जीवन सिद्ध होता है।

🔵 भौतिक अथवा आध्यात्मिक क्षेत्र में उन्नति के लिए लगन और एकाग्र निष्ठा अनिवार्य है। गुरु नानक ने भक्ति का मार्ग चुना और अपनी निष्ठा के बल पर वे महान् संत बने। उनके जीवन की तमाम घटनाएँ इस निष्ठा की साक्षी हैं।

🔴 किशोरावस्था में नानक के खेल अन्य बच्चों से अलग थे। वे भगवान् की पूजा और उपासना का खेल करते तथा साथियों को प्रसाद बाँटते। जब भोजन का समय आया, उन्होंने खेल अधूरा छोड़ने से इनकार कर दिया। उनके पिता ने उन्हें जबरदस्ती उठाया, पर नानक ने गंभीर मौन अपनाया और भोजन नहीं किया। उनके पिता और वैद्य भी उनके दृढ़ निश्चय को देखकर प्रभावित हुए।

🔵 पाठशाला में भी नानक ने व्यावहारिक ज्ञान की बजाय वह शिक्षा प्राप्त की जो उन्हें परमात्मा के दर्शन और सच्ची शांति तक पहुँचा सके। उनके विचार और हृदय ने अध्यापक को प्रभावित किया और उन्हें सच्चा भक्त बना दिया। नानक दिन-रात भगवान् की भक्ति में तन्मय रहते और लोक-कल्याण हेतु उपदेश देते। उनके शिष्यों ने सिक्ख संप्रदाय की स्थापना की।

English Summary (100 words)

This story highlights Guru Nanak’s unwavering devotion and focus on spiritual knowledge. Even as a child, his play centered on worship and sharing, showing his early dedication. He refused to be distracted from spiritual pursuits, demonstrating discipline and inner strength. In school, he prioritized knowledge that would reveal the Divine, over mundane learning. His sincerity influenced his teacher, turning him toward true devotion. Guru Nanak devoted his life to God and societal welfare, inspiring thousands of disciples. His story shows that steadfast devotion and focused effort can lead not only to worldly excellence but ultimately to spiritual realization.

संस्कृत श्लोक:
दुष्प्रवृत्तिं न घृणयेत्, कर्म हि पापाय फलति।
सत्कर्मे च हृदय निर्मलं भवति, ज्ञानं च वर्धते ॥

अर्थ: किसी व्यक्ति की दुष्प्रवृत्ति के प्रति घृणा नहीं करनी चाहिए; पाप के दंड का अनुभव कर्मकर्ता को ही होता है। सत्कर्म से हृदय शुद्ध होता है और ज्ञान वर्धित होता है।

🔵 खेतड़ी नरेश ने स्वामी विवेकानंद को सभा में आमंत्रित किया। वे समाज सेवा और तत्त्वज्ञान का उपदेश दे रहे थे, बताते कि समाज में हर व्यक्ति का अस्तित्व महत्वपूर्ण है और सेवा भी उपासना के समान है।

🔴 सभा में नर्तकियों का आगमन हुआ। स्वामी जी ने देखा कि उनका मन घृणा और विरक्ति से भर गया। वे उठकर वहां से चले गए। इससे नर्तकी आहत हुई, पर स्वामी विवेकानंद ने तुरंत अपने विचार बदलकर करुणा और विवेक का उदय किया। उन्होंने महसूस किया कि घृणा व्यक्ति पर नहीं, उसकी दुष्प्रवृत्ति पर लगानी चाहिए।

🔵 स्वामी जी ने नृत्य को केवल अध्ययन दृष्टि से देखा, बिना मोह या आसक्ति के। उन्होंने सभी को यह शिक्षा दी कि व्यक्ति को घृणास्पद न मानो, केवल दुष्प्रवृत्ति का अवलोकन करो। नर्तकी ने इस शिक्षा से अपने जीवन में व्रतशीलता अपनाई और सभासदों ने भी दोष दृष्टि का परित्याग किया।

English Summary (100 words)

This story illustrates Swami Vivekananda’s wisdom and control over emotions. Invited to a congregation, he spoke on social service and devotion. When dancers arrived, his mind initially filled with aversion, but he realized that hatred should target only evil tendencies, not individuals. Observing with detachment, he studied their art without attachment or desire. His approach transformed the dancer’s perspective, leading her to adopt a disciplined, virtuous life. The assembly learned to distinguish between person and action, understanding that true wisdom lies in responding with discernment, compassion, and self-control rather than hatred, thus promoting moral and spiritual growth.

संस्कृत श्लोक:
जनस्नेहः साधयेत् सत्कृत्यैव हृदि तिष्ठति।
सर्वान् समानतया दृष्ट्वा व्यक्तित्वं महत्त्वं लभेत् ॥

अर्थ: व्यक्ति का वास्तविक व्यक्तित्व केवल उसके सत्कर्म और समाज के प्रति निष्ठा से उभरता है। सभी के प्रति समान दृष्टि और करुणा रखने से वह जनस्नेह और सम्मान अर्जित करता है।

🔴 महात्मा गांधी में यह अद्भुत गुण था कि वह समाज के हर वर्ग के व्यक्ति से आत्मीयता स्थापित कर लेते थे। उन्हें सभी का स्नेह और सम्मान समान रूप से प्राप्त होता था। उन्हें जन नेता कह सकते हैं।

🔵 घटना दिसंबर 1945 की है। स्वतंत्रता की राह पर भारत। बंगाल के गवर्नर श्री आर० जी० केसी ने गांधी जी को वार्ता हेतु राजभवन बुलाया। वार्ता में गांधी जी इतने तन्मय हो गए कि भोजन का समय भूल गए। वार्ता समाप्ति पर बाहर निकलते समय उन्होंने देखा कि लगभग 200 कर्मचारी—धोबी, रसोइए, चौकीदार, माली—अपने स्वेच्छा से गार्ड ऑफ आनर में खड़े थे। यह आदेश किसी ने नहीं दिया था; यह गांधी जी के प्रति सच्चे स्नेह और श्रद्धा का प्रदर्शन था।

🔴 इस घटना ने दिखाया कि गांधी जी ने बिना दिखावे और थोथी वाहवाही के जन-जन के हृदय में स्थान बनाया। उन्होंने सबके हित के लिए अपना सब कुछ समर्पित किया। यही कारण है कि उनका व्यक्तित्व सार्वजनिक स्नेह और आदर का स्रोत बना।

English Summary (100 words)

Mahatma Gandhi’s unique quality was his ability to connect intimately with people from all social strata. In December 1945, during a consultation at Raj Bhavan, employees spontaneously lined up to honor him, demonstrating genuine respect and affection, without any formal directive. Gandhi Ji’s influence stemmed from his sincere dedication to the welfare of all and his impartial treatment of individuals. This episode illustrates that authentic leadership arises from selfless service, moral integrity, and the capacity to earn trust and love. True authority and admiration are not granted by position, but cultivated through consistent, benevolent action and heartfelt engagement with society.

संस्कृत श्लोक:
सत्यसङ्ग्रहे धैर्यं वीर्यं च साधकं भवेत्।
भयभीतिः त्यज्येत् यत्र धर्ममार्गः प्रतिपद्यते ॥

अर्थ: सच्चाई की राह पर चलने के लिए वीरता, साहस और धैर्य की आवश्यकता होती है। भय को त्याग कर धर्म और सत्य की सेवा करनी चाहिए।

🔴 सन् 1922 में अमावस्या की रात गुजरात में वामक नदी के किनारे समाजसेवी रविशंकर महाराज बहारबटिया डाकुओं से मिलने गए। उनके साथ पुंजा नामक व्यक्ति था, जिसने महाराज को रोकने की कोशिश की क्योंकि आगे खतरा था।

🔵 महाराज ने साहस दिखाया और अकेले आगे बढ़ गए। उन्होंने देखा कि एक बंदूकधारी उनकी ओर बढ़ रहा है। महाराज ने डरने के बजाय हँसकर डाकुओं से संवाद किया और उन्हें समझाया कि असली वीरता अंग्रेजों के विरुद्ध दिखाने की है, गरीबों को लूटना नहीं।

🔴 महाराज के साहस और करुणा से डाकू प्रभावित हुए। उन्होंने अपने हथियार डाल दिए और कई डाकुओं ने कुकृत्य छोड़कर सत्याग्रह आंदोलन में सहयोग करना शुरू कर दिया। महाराज की यह वीरता और धर्मप्रियता समाज में सच्चाई की राह पर चलने का प्रेरक उदाहरण बनी।

English Summary (100 words)

In 1922, on a dark night by the Vamk River in Gujarat, social worker Ravishankar Maharaj courageously confronted a gang of dacoits to advocate truth and non-violence. Despite warnings, he proceeded alone, showing immense bravery. When faced by armed men, Maharaj engaged them in dialogue, urging them to direct their courage against British oppressors instead of harming innocent villagers. His fearlessness and moral guidance led the dacoits to abandon crime, and several joined the Satyagraha movement. This incident illustrates that true bravery combines courage, wisdom, and righteousness, inspiring people to follow the path of truth even in dangerous circumstances.

संस्कृत श्लोक:
मानवहिताय महत्त्वाकांक्षा त्याज्यते।
सत्यशीलः सहृदयः च सर्वेषां कर्तव्यपथिकः ॥

अर्थ: यदि किसी कार्य से मानवता का कल्याण होता है, तो अपने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को त्याग देना चाहिए। सत्यनिष्ठ और सहृदय व्यक्ति हमेशा सही मार्ग पर चलता है।

🔵 घटना उस समय की है, जब यमन के राष्ट्रपति अब्दुल्ला सलाल को अपदस्थ कर रिपब्लिकन नेता रहमान हरयानी को सत्ता मिली। यह क्रांति रक्तहीन थी। बाद में समाचारों से पता चला कि जन-जीवन को रक्तपात और लूट से बचाने का श्रेय अपदस्थ राष्ट्रपति सलाल को ही था।

🔴 इस युग में जब नेता स्वार्थ और महत्वाकांक्षा के लिए घृणित कार्य करते हैं, श्री सलाल ने सिद्धांत स्थापित किया कि मानवता के हित में अपनी महत्वाकांक्षा त्यागी जा सकती है। यही उनके सम्मान और श्रेय का कारण बना।

🔵 राष्ट्रपति सलाल सत्तारूढ थे, पर उन्होंने गृह युद्ध या हिंसा की बजाय बुद्धिमानी से विद्रोहियों को समझाया और बगदाद तथा मास्को यात्रा के माध्यम से स्थिति नियंत्रित की। उन्होंने अपने विरोधियों को भी मानवता की ओर प्रेरित किया।

🔴 उन्होंने विद्रोही नेता श्री अनवर हरयानी को पत्र लिखकर देश को रक्तपात और शर्मिंदगी से बचाने के लिए अपनी सत्ता छोड़ने की सूचना दी। उन्होंने कहा कि वे अपनी प्रजा के अहित में संलिप्त नहीं होना चाहते।

🔵 इसके बाद राष्ट्रपति सलाल ने बगदाद में ईश्वर उपासना और आत्म-कल्याण में जीवन बिताने का निश्चय किया। यदि सभी नेता इस प्रकार उदार और मानवता के हितैषी हों, तो संसार में हिंसा और रक्तपात की परिस्थितियाँ पैदा नहीं होतीं।

English Summary (100 words)

During a bloodless revolution in Yemen, deposed President Abdullah Salal demonstrated extraordinary moral courage and selflessness. Despite being in power, he chose to relinquish his position to Republican leader Rahman Haryani to prevent bloodshed and protect civilians. Salal anticipated potential conflicts and strategically traveled to Baghdad and Moscow to maintain peace. He even wrote to Haryani, acknowledging preparations against him but prioritizing humanity over personal ambition. Later, Salal lived in Baghdad devoted to spiritual practice. His example highlights that true leadership involves sacrificing personal ambition for the welfare of humanity, promoting peace over power.

संस्कृत श्लोक:
सत्कर्मणां प्रेरणा मातृवचनस्मृति च।
धायोः नैतिकता च तालाबं जनमानसप्रभा॥

अर्थ: माता के वचन और धाय की नैतिकता से बनाया गया 'धाय का तालाब' आज भी मानवता और निष्काम सेवा का आदर्श प्रस्तुत करता है।

🔵 दरभंगा में एक तालाब है, जिसे 'दाई का तालाब' कहा जाता है। तालाब के निर्माण का इतिहास सज्जनता, ईमानदारी, कर्तव्यपरायणता और नैतिकता का आदर्श है। शंकर मिश्र के जन्म के समय उनकी माता को दूध नहीं आता था, अत: उन्हें किसी अन्य स्त्री से दूध पिलाना पड़ा। धाय ने शंकर को अपने बच्चे के समान स्नेह और ममता से पाला।

🔴 धाय ने शंकर मिश्र की सेवा और शिक्षा में कोई कमी नहीं छोड़ी। शंकर के बढ़ते यश और प्रतिभा ने दरभंगा नरेश को प्रभावित किया। एक बार नरेश ने शंकर की काव्य-रचना पर उन्हें हार भेंट किया। शंकर ने यह हार अपनी माता को सौंपा।

🔵 शंकर की माता ने धाय को अपनी प्रतिज्ञा याद दिलाई और हार उसे दे दिया। धाय ने इसे बेचकर पक्का तालाब बनवाया। यही तालाब आज भी 'धाय का तालाब' के नाम से जाना जाता है और नैतिकता व कर्तव्यपरायणता का प्रतीक है।

English Summary (100 words)

In Darbhanga, a pond known as "Daai ka Talab" commemorates the selfless love and integrity of Shankar Mishra's mother and his wet nurse. When Shankar was born, his mother could not nurse him, so a wet nurse lovingly fed him. Later, after Shankar received a valuable gift from the king for his literary talent, he gave it to his mother, who passed it to the wet nurse as per her promise. The wet nurse sold the valuable gift to construct a pond, symbolizing duty, moral integrity, and selfless service. This tale continues to inspire generations about virtue, honesty, and commitment to promises.

संस्कृत श्लोक:
साहसं दैवी सहायं।
धैर्यं वीर्यं च विजयं जनयति॥

अर्थ: साहस और दृढ़ संकल्प रखने वाले मनुष्य की मदद ईश्वर स्वयं करता है। संघर्ष और वीरता से ही असली विजय मिलती है।

🔵 सन् १९३९ में रूस के मुखिया स्टालिन थे। फिनलैंड के कुछ बंदरगाह रूस के लिए सामरिक महत्त्व रखते थे। रूस ने उन्हें हथियार के बल पर लेने की धमकी दी। फिनलैंड की सेना सिर्फ २ लाख थी, जबकि रूस की ४० लाख।

🔴 फिनलैंड के लेफ्टिनेंट हीन सारेला के नेतृत्व में केवल ४९ सैनिकों ने रूसी टैंकों और सेना के सामने डटकर मुकाबला किया। सारेला ने सैनिकों को समझाया कि साहस और संघर्ष ही जीवित राष्ट्र का मार्ग है। सैनिकों ने प्रतिज्ञा की और युद्ध में वीरता दिखाई।

🔵 दिनभर संघर्ष के बाद ४९ सैनिकों ने रूसी सेना की अग्रिम पंक्ति के २०,००० सैनिकों को हराया और ५० गाड़ियाँ व १२० टैंकों को ध्वस्त कर दिया।

🔴 यह साबित करता है कि साहस और दृढ़ निश्चय से बुराइयों के सामने भी विजय प्राप्त की जा सकती है। हिम्मत करने वाले इंसान की मदद भगवान् करता है।

English Summary (100 words)

In 1939, during the Russo-Finnish conflict, Finland faced a formidable Russian force of 4 million troops with advanced weaponry. Despite having only 49 soldiers under Lieutenant Heini Sarela, the Finnish soldiers courageously confronted the overwhelming enemy. Sarela inspired his men with the belief that bravery and resistance define a nation’s strength. Through relentless fighting, they managed to defeat 20,000 Russian soldiers, destroy 50 vehicles, and 120 tanks. This event exemplifies that courage, determination, and unwavering spirit can overcome seemingly insurmountable challenges. God aids those who act with valor and steadfastness.

संस्कृत श्लोक:
सत्यं धर्मं च पालनं, अन्धविश्वासं त्यजेत्।
बलं प्रेमेण धर्मेण च सम्यक् प्राप्यते॥

अर्थ: धर्म और शक्ति का वास्तविक स्रोत अंधविश्वास नहीं, बल्कि सत्य, धर्म पालन और परहित है। बल और सामर्थ्य केवल प्रेम, त्याग और धर्म के मार्ग से बढ़ते हैं।

🔵 सिक्ख संप्रदाय के दसवें गुरु गोविंदसिंह धर्म और धर्म रक्षा के लिए जीवन समर्पित करने वाले महान् योद्धा थे। उनके पास अंधविश्वास के लिए कोई स्थान नहीं था। एक पंडित ने उनकी बुद्धिमत्ता का लाभ उठाने के लिए नरबलि की बात कर यज्ञ कराने का प्रस्ताव रखा।

🔴 गुरु गोविंदसिंह ने पंडित की धूर्तता तुरंत समझ ली और उसे चेताया। उन्होंने बलिदान के नाम पर किसी जीव का हनन न करने का संदेश दिया। असली शक्ति धर्मपालन, प्रेम, त्याग और निर्बल की सहायता में निहित है।

🔵 गुरुजी ने सिक्खों को बताया कि देवी या देवता के नाम पर प्राण लेने से पुण्य नहीं मिलता; बल और शक्ति केवल सत्य, धर्म और सामाजिक एकता के द्वारा प्राप्त होती है। इस मार्ग को अपनाकर सिक्खों ने ऐतिहासिक वीरता और यश प्राप्त किया।

English Summary (100 words)

Guru Gobind Singh, the tenth Sikh Guru, exemplified wisdom, courage, and devotion to Dharma. A cunning priest tried to exploit him by suggesting a human sacrifice to invoke divine blessings. Recognizing the deceit, the Guru exposed the priest and clarified that true power and blessings come not from superstitions, but from righteousness, sacrifice, and helping the weak. He taught the Sikh community that worship and strength are derived through dharma, unity, and love—not through cruelty or blind faith. The Sikhs internalized this lesson, acting courageously and ethically, thereby achieving lasting honor and upholding the true principles of their faith.

संस्कृत श्लोक:
सत्यं धर्मं सेवा च, मानवता परम लक्ष्यः।
मोहं त्यजित्वा ज्ञानी भवेत् शंकराचार्यः॥

अर्थ: वास्तविक महानता मोह और वैयक्तिक लालच को त्याग कर सेवा और मानवता के मार्ग पर चलने में है। संसारिक सुख और ममता के बावजूद जो व्यक्ति मानव कल्याण के लिए समर्पित होता है, वही सत्य में अमर होता है।

🔵 शंकराचार्य जी माता के एकमात्र पुत्र थे। माता ने संतान प्राप्ति के लिए शिव की कठोर तपस्या की। जन्म के बाद माता चाहती थीं कि शंकर घर-गृहस्थी में व्यस्त होकर विवाह करें और सुख-शांति से जीवन बिताएँ।

🔴 शंकर का ध्यान जप, तप, पूजा और मानवता की सेवा में अधिक था। समाज की दयनीय दशा देखकर उन्होंने महसूस किया कि समाज को सच्चे और निष्ठावान सेवक की आवश्यकता है। वे अपनी प्रतिभा को सांसारिक मोह में नष्ट नहीं करना चाहते थे।

🔵 माता की इच्छा के बावजूद शंकर ने अंतरात्मा की प्रेरणा को ईश्वर का निर्देश मानकर विश्व-सेवा करने का निर्णय लिया। उन्होंने ऐसा उपाय किया कि माता को भी कम कष्ट हो और वे अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर सकें। नदी में स्नान के दौरान उन्होंने माता से कहा कि यदि वह उन्हें भगवान शंकर को अर्पित करें, तो उनका जीवन सुरक्षित रहेगा। माता ने स्वीकृति दे दी।

🔴 इस प्रकार विश्व-सेवा और मानवता की सच्ची निष्ठा ने ममता और मोह पर विजय पाई। यही युवक बाद में शंकर-संन्यासी शंकराचार्य के रूप में धर्म और संस्कृति की महान सेवा में प्रवृत्त हुए।

English Summary (100 words)

Shankaracharya, the only child of his mother, demonstrated extraordinary spiritual focus from a young age. While his mother hoped for him to grow up, marry, and live a worldly life, Shankaracharya was devoted to prayer, study, and serving humanity. Recognizing the greater need for a dedicated servant for society, he chose the path of renunciation. To ease his mother’s concern, he enacted a clever plan symbolizing his surrender to God, showing that true greatness lies in selfless service. Guided by devotion and wisdom, Shankaracharya dedicated his life to dharma and culture, becoming a revered spiritual leader.

संस्कृत श्लोक:
श्रम एव स्वास्थ्यस्य मूलम्।
यंत्रेण अत्यधिकं विश्रान्तिः रोगस्य कारणम्॥

अर्थ: अत्यधिक यांत्रिक सुविधा और परिश्रम त्याग से शरीर और स्वास्थ्य प्रभावित होता है। संतुलित श्रम ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति और स्वास्थ्य को बनाए रखता है।

🔵 दार्शनिक कन्फ्यूशियस के शिष्य चाँग-होचाँग ताईवान में भ्रमण करते समय एक माली को कुएँ से जल निकालते हुए देखे। माली का बहुत श्रम हो रहा था, इसलिए चाँग ने उसे मदद करने के लिए सरल यांत्रिक उपाय सुझाए—लकड़ी की घिर्री और रस्सी प्रणाली।

🔴 माली ने इस उपाय को अपनाया। काम आसान हो गया, पर शरीर के अंगों की गतिविधि कम होने से धीरे-धीरे शिथिलता आने लगी। फिर चाँग ने भाप इंजन लगाने का सुझाव भी दिया।

🔵 कुछ समय बाद चाँग ने बगीचे का निरीक्षण किया और पाया कि माली बीमार हो गया है, हाथ सूख गए, पेट कमजोर और स्वास्थ्य गिर गया।

🔴 मालिन ने कहा कि मशीन और आसान उपायों ने उसकी बीमारी का कारण बना। मानव को अपने हाथ और परिश्रम से कार्य करना चाहिए। चाँग ने इस बात को समझा और माली की पूर्व जीवन पद्धति अपनाने की सीख दी। माली फिर से स्वस्थ हुआ।

🔵 संदेश: केवल मशीन और यंत्र से काम लेने के बजाय, संतुलित श्रम और मेहनत से ही शरीर स्वस्थ और जीवन सक्रिय रहता है। अत्यधिक सुविधा, आराम और यांत्रिक उपाय कभी-कभी नुकसानदायक हो सकते हैं।

English Summary (100 words)

Chang-Hochang, a disciple of Confucius, observed a gardener in Taiwan struggling to water plants. Out of compassion, he devised mechanical solutions—pulley systems and later a steam engine—to ease the gardener’s labor. Initially effective, these innovations caused the gardener’s body to weaken due to reduced physical activity. Chang realized that excessive reliance on machines can harm health and vitality. The lesson: balanced, hands-on effort is essential for physical well-being and productivity. True progress requires active engagement, not just convenience. The gardener resumed manual work and regained health, demonstrating the importance of maintaining effort and discipline in daily life.

संस्कृत श्लोक:
सत्संगः पुण्यस्य मूलम्। उदारता धर्मस्य लक्षणम्॥

अर्थ: सत्संग और उदारता जीवन में पुण्य और श्रेष्ठता के मूल हैं। सच्चे ज्ञानी अपने कर्तव्य और सेवा से ही महात्मा बनते हैं।

🔵 सिक्ख संप्रदाय के आदि गुरु- गुरु नानक प्रारंभ से ही बड़े उदार और दयावान थे। संतों की सेवा और उनके सत्संग में उन्हें बड़ा आनंद आता था। उनके गुणों ने उन्हें महात्मा बना दिया।

🔴 गुरु नानक ने अपने पिता द्वारा दिए गए खेती के कार्य को खुशी-खुशी किया। जब कुछ गायें फसल खाने लगीं, उन्होंने उन्हें डांटने के बावजूद मारने से मना किया, क्योंकि भूखी गायों को नुकसान पहुँचाना पाप है। पिता ने उनकी बात में गहराई देखी और आगे कुछ नहीं कहा।

🔵 एक बार वे खेत में सो रहे थे, तभी सिर पर सर्प फन फैल गया। गाँव का एक परिचित व्यक्ति इसे देखकर नानक के भाग्य और भविष्य के बारे में पिता को बताया।

🔴 पिता ने नानक को रोजगार करने के लिए पैसे दिए। नानक ने रास्ते में भूखे-नंगे लोगों को खाना खिलाया, कपड़े मोल लिए और साधु-संतों के सत्संग में अपना पैसा खर्च कर दिया। घर लौटने पर उन्होंने पिता को बताया कि असली लाभ सत्संग और सेवा में ही मिला।

🔵 नानक के इन गुणों ने उन्हें एक विख्यात संत बनाकर संसार में अमर कर दिया।

English Summary (100 words)

Guru Nanak, the founder of Sikhism, exhibited extraordinary generosity and devotion from childhood. Entrusted with farm work by his father, he performed his duties diligently, yet treated hungry cows with compassion rather than punishment. Once, a serpent’s hood appeared above his head, signaling his future greatness. When given money for employment, Nanak spent it serving the poor and in the company of saints, gaining spiritual wealth rather than material profit. His actions and devotion to service exemplify that true greatness comes from selflessness, generosity, and dedication to higher principles, establishing him as a revered spiritual leader.

संस्कृत श्लोक:
कष्टसहनं परमं सुखम्। धैर्येणैव मानं लभ्यते॥

अर्थ: कष्टों को सहना सर्वोच्च सुख है। केवल धैर्य और संयम से सम्मान और मान्यता प्राप्त होती है।

🔵 बार-बार पैरों तले कुचले जाने के कारण मिट्टी अपने भाग्य पर रो पड़ी। वह सोचती है कि उसके भीतर से फूल खिलता है, जिसे लोग सम्मान देते हैं, तो क्यों न वह भी सम्मान पाए।

🔴 कुंभकार ने कहा- मिट्टी! यदि तुम सम्मान पाना चाहती हो, तो मैं तुम्हें बड़ा सम्मान दिला सकता हूँ, पर एक शर्त है।

🔵 मिट्टी ने कहा- जो भी शर्त होगी, मैं मानने को तैयार हूँ, बस मुझे पैरों तले से हटा दो।

🔴 कुंभकार ने मिट्टी को घर लाकर पानी में गीला किया, पैरों से रौंदा, चाक पर चढ़ाया और घड़े का रूप दिया। धूप में सुखाया और अंत में अग्नि-परीक्षा करवाई।

🔵 मिट्टी ने सभी कष्ट सहकर अग्नि-परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली। फिर सुंदरियां उसे सिर पर उठाकर घूमा रही थीं। मिट्टी अपने सम्मान पर प्रफुल्लित हो उठी।

English Summary (100 words)

The clay, desiring honor like the flowers that adorn devotees, underwent a long process of transformation. The potter brought it out of the ground, soaked, kneaded, and shaped it on the wheel, applying pressure and subjecting it to the sun and fire. Enduring all hardships patiently, the clay finally passed the final test and was molded into a beautiful pot. It was then held and displayed with pride. This story illustrates that true respect and recognition are achieved only through patience, perseverance, and the endurance of trials. Hardships are the path to honor and lasting greatness.

संस्कृत श्लोक:
योग्यः स्वात्मनः प्रभोर्भावः। निष्ठा च साधकस्य मार्गः॥

अर्थ: जो स्वयं भगवान् के योग्य बनता है और निष्ठा के साथ साधना करता है, वही शीघ्र परमात्मा की प्राप्ति करता है। सच्ची लगन और एकाग्रता मार्ग प्रशस्त करती है।

🔵 एक राजा महल की छत पर टहलते हुए बाजार में घूमते एक संत को देखते हैं। संत तो संत होते हैं, चाहे बाजार में हों या मंदिर में, वे अपनी धुन में होते हैं।

🔴 राजा संत की एकाग्रता और आनंद देखकर तुरंत उनसे मिलने को व्याकुल हो जाता है। सेवकों के जरिए उन्हें लाया जाता है। संत सहज भाव से क्षमा कर देते हैं।

🔵 राजा पूछते हैं कि भगवान् शीघ्र कैसे मिलते हैं। संत कहते हैं, जब तुम्हारे मन में मिलने की तीव्र इच्छा प्रबल हो और तुम एकाग्र होकर भगवान् की ओर लग जाओ, तो भगवान् का मन भी तुमसे मिलने का विचार कर लेता है।

🔴 राजा सीखते हैं कि एकाग्र निष्ठा और पूर्ण लगन ही परमात्मा के प्रति योग्य बनने का मार्ग है। अन्य किसी पर ध्यान न देकर केवल प्रभु में स्थिर रहने से ही उनका संपर्क संभव होता है।

English Summary (100 words)

Once, a king saw a saint in the market and was captivated by his singular focus and inner joy. Eager to meet him, he arranged for the saint to be brought to the palace. When asked how to quickly attain God, the saint explained that true union comes through unwavering focus and deep longing. When one wholeheartedly dedicates oneself to God with single-minded devotion, God’s attention naturally turns toward that seeker. The story illustrates that self-purification, persistent effort, and complete absorption in the divine are the keys to being worthy of God’s presence and experiencing spiritual realization.

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