🕉️🙏ओ३म् सादर नमस्ते जी 🙏🕉️
🌷🍃 आपका दिन शुभ हो 🍃🌷
दिनांक - -२० नवम्बर २०२४ ईस्वी
दिन - - बुधवार
🌖 तिथि -- पञ्चमी ( १६:४९ तक तत्पश्चात षष्ठी )
🪐 नक्षत्र - - पुनर्वसु ( १४:५० तक तत्पश्चात पुष्य )
पक्ष - - कृष्ण
मास - - मार्गशीर्ष
ऋतु - - हेमन्त
सूर्य - - दक्षिणायन
🌞 सूर्योदय - - प्रातः ६:४८ पर दिल्ली में
🌞 सूर्यास्त - - सायं १७:२५ पर
🌖चन्द्रोदय -- २०:४२ पर
🌖 चन्द्रास्त - - ११:१७ पर
सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२५
कलयुगाब्द - - ५१२५
विक्रम संवत् - -२०८१
शक संवत् - - १९४६
दयानंदाब्द - - २००
🍁🍀🍁🍀🍁🍀🍁🍀
🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🔥वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है ।
==============
जैसे व्यक्ति सूर्यप्रकाश के बिना अंधकार में ठोकरें खाकर दुखी होता है। इसी प्रकार से जब वेद रूपी सूर्य का प्रकाश नहीं होता, तो व्यक्ति अविद्या रूपी अन्धकार में ठोकरें खाकर अनेक प्रकार के दुख भोगता है।"
सुख तो सभी लोग चाहते हैं। एक दो घंटा नहीं, २४ घंटे सुख चाहते हैं। सुख की प्राप्ति के लिए प्रयत्न भी बहुत करते हैं इतना सब करने पर भी सुख बहुत कम मिल पाता है और बहुत से दुख भी साथ साथ भोगने पड़ते हैं।
इसका कारण -- "सुख प्राप्ति की विधि का ज्ञान नहीं है, दुखों से निवृत्ति करने का ज्ञान नहीं है।" इस ज्ञान के अभाव से व्यक्ति सुखों को अधिक मात्रा में प्राप्त कर नहीं पाता, और दुखों से छूट नहीं पाता। जैसे दिन में सूर्य का प्रकाश होता है, उस प्रकाश में सब वस्तुएं ठीक-ठीक स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।_ _और सबका आना जाना चलना फिरना दुर्घटनाओं से बचना सुगम होता है। इसी प्रकार से यदि वेद रूपी सूर्य का ज्ञान रूपी प्रकाश व्यक्ति प्राप्त कर ले, तो उस के प्रकाश में व्यक्ति सब बातें ठीक-ठीक समझ सकता है। 'क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, क्या सही है, क्या गलत है,' इन सब बातों को व्यक्ति सरलता से समझ सकता है।
फिर बुद्धिमान व्यक्ति उस वेदज्ञान रूपी प्रकाश की सहायता से सब बातों को ठीक-ठीक समझकर, यदि पुरुषार्थी भी हो, तो सब अच्छे अच्छे कार्यों को करता है, तथा बुरे कार्यों से बचता रहता है। इस विधि से व्यक्ति बहुत से सुखों की प्राप्ति कर लेता है, और दुखों से छूट जाता है।" सारी बात का सार यह हुआ, कि व्यक्ति को ज्ञान चाहिए। सत्य ज्ञान चाहिए। शुद्ध ज्ञान चाहिए, जिससे वह दुखों की निवृत्ति और सुखों की प्राप्ति कर सके। और वह शुद्ध ज्ञान मिलता है वेदो से।
उदाहरण के लिए एक व्यक्ति अच्छा भोजन बनाना चाहता है। उसे भोजन बनाने की विधि का ज्ञान नहीं है। वह उल्टे-सीधे ढंग से भोजन बनाएगा। दाल सब्जी रोटी ठीक प्रकार से नहीं बना पाएगा। ऐसे खराब भोजन को खाकर वह दुखी होगा। सुख को प्राप्त नहीं कर पाएगा। यदि वह पाक विद्या के किसी विद्वान के पास जाकर उससे पाक विद्या सीख ले, और उसके ज्ञान से प्रकाशित होकर फिर भोजन बनाए, तो अब उसका भोजन ठीक बनेगा। अच्छा स्वादिष्ट पुष्टिकारक बुद्धि वर्धक आयु वर्धक भोजन बनेगा। और उसे खा कर वह भूख के दुख से निवृत हो जाएगा, तथा अच्छा स्वादिष्ट भोजन खाने से वह सुख की प्राप्ति भी करेगा। इस प्रकार से उसे सब लाभ हो जाएंगे।
तो जैसे इस उदाहरण में बताया, कि पाकविद्या सीखने से वह भोजन संबंधी दुखों से छूट जाएगा। इस उदाहरण के समान यदि व्यक्ति, आत्मा परमात्मा और संसार के विषय में भी ठीक ठीक ज्ञान प्राप्त करने के लिए, वेदों का अध्ययन करे, अच्छे योग्य वैदिक विद्वानों से वेदों को समझे, सीखे, तो वेद रूपी सूर्य के प्रकाश में उसका ज्ञान शुद्ध हो जाएगा। वेदों को पढ़ने से बुद्धि का विकास होगा, जीवन में आने वाली अनेक समस्याओं के दुखों से व्यक्ति छूट जाएगा, और उससे व्यक्ति के सब कार्य आसान हो जाने से, उसे सुख शांति आनंद की प्राप्ति होगी।
इसलिए अच्छे योग्य वैदिक विद्वानों से वेदों का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। उसके अनुसार आचरण करके अपने जीवन को सुखी एवं सफल बनाना चाहिए।
🍀🍁🍀🍁🍀🍁🍀🍁
🚩‼️आज का वेद मन्त्र,‼️🚩
🌷ओ३म् यदाकूतात् समसुस्रोद्धृदो वा मनसो वा सम्भृतं चक्षुषो वा।
तदनु प्रेत सुकृतामु लोकं यत्रऽऋषयो जग्मु: प्रथमजा: पुराणा:॥ यजुर्वेद १८-५८॥
💐हे विद्वान मनुष्य, तुम सत्य और असत्य के अंतर को अर्जित ज्ञान के द्वारा समझो। ज्ञान का प्रवाह आता है आत्मा के प्रकाश से, उत्तम इच्छाओं से, हृदय से, मन से, बुद्धि से, और इंद्रियों पर नियंत्रण से। तुम सत्य और उत्तम कर्म से प्रेम करने वाले बनो। तुम उस पथ पर जाओ जिस पर तुम्हारे पवित्र पूर्वज गए थे ।
🍀🍁🍀🍁🍀🍁🍀🍁
🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
==============
🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏
(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮
ओ३म् तत्सत् श्रीब्रह्मणो द्वितीये प्रहरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- पञ्चर्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२५ ) सृष्ट्यब्दे】【 एकाशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८१) वैक्रमाब्दे 】 【 द्विशतीतमे ( २००) दयानन्दाब्दे, काल -संवत्सरे, रवि- दक्षिणायने , हेमन्त -ऋतौ, मार्गशीर्ष - मासे, कृष्ण पक्षे, पञ्चम्यां
तिथौ, पुनर्वसु
नक्षत्रे, बुधवासरे
, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे भरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे
🍁🍀🍁🍀🍁🍀🍁


0 टिप्पणियाँ