दिनांक - - १० दिसम्बर २०२४ ईस्वी

 🕉️🙏ओ३म् सादर नमस्ते जी 🙏🕉️

🌷🍃 आपका दिन शुभ हो 🍃🌷




दिनांक  - - १० दिसम्बर  २०२४ ईस्वी


दिन  - - मंगलवार 


  🌓 तिथि -- दशमी ( २७:४२ तक तत्पश्चात  एकादशी )


🪐 नक्षत्र - - उत्तराभाद्रपद ( १३:३० तक तत्पश्चात रेवती )

 

पक्ष  - -  शुक्ल 

मास  - -  मार्गशीर्ष 

ऋतु  - - 


🌞 सूर्योदय  - - प्रातः ७:०३ पर  दिल्ली में 

🌞 सूर्यास्त  - - सायं १७:२५ पर 

 🌓चन्द्रोदय  --  १३:३१ पर

 🌓 चन्द्रास्त  - - २६:२६ पर 


 सृष्टि संवत्  - - १,९६,०८,५३,१२५

कलयुगाब्द  - - ५१२५

विक्रम संवत्  - -२०८१

शक संवत्  - - १९४६

दयानंदाब्द  - - २००


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🚩‼️ओ३म्‼️🚩


🔥वैराग्य―साधना

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  यह वैराग्य क्या है? महर्षि पतञ्जलि महाराज ने वैराग्य की परिभाषा करते हुए योगशास्त्र में लिखा है―


      दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ।

―(योग० १/१५)

अर्थात्― देखे और सुने हुए विषयों की तृष्णा का भी मन में न रहना वैराग्य कहलाता है।


   जब सांसारिक विषयों की मन में इच्छा भी नहीं रहती तो मनुष्य का ध्यान परमात्मा की ओर चलता है। यही वैराग्य मनुष्य के लिए निर्भयता का कारण बन जाता है। यह बहुत ऊँची अवस्था है। इस तक सभी व्यक्ति नहीं पहुंच सकते। हाँ, यह सोचकर कि संसार के सभी पदार्थ नाशवान् हैं और हमसे एक-न-एक दिन छूटने वाले हैं, यदि व्यक्ति कुछ वैराग्य-भाव मन में धारण करते हुए प्रात:-सायं ईश्वर का चिन्तन करता रहे तो वह निर्भयता की ओर अग्रसर होता रहता है।


   अध्यात्मवाद पर चलने वाला व्यक्ति ही वैराग्य धारण कर सकता है। जबकि भौतिकवाद के मार्ग पर चलने वाले लोगों ने केवल प्रकृति और उसके परिणाम को ही स्वीकार किया। आंखें जिसे देखती हैं, कान जिसे सुनते हैं, जिह्वा जिसका रस लेती है, त्वचा जिसका स्पर्श करती है, भौतिकवादी के लिए यही सत्य है। इसके विपरित जो कुछ आँखों से दिखाई नहीं देता, जो नासिका से सूंघा नहीं जाता, जिसका जिह्वा से रस नहीं लिया जाता―यह सब असत्य है, उसका कोई अस्तित्व नहीं है।


   इसी आधार पर इन्होंने आत्मतत्त्व को ठुकरा दिया। उनकी परिभाषा केवल सांसारिक पदार्थों पर ही ठीक उतरती है। वे संसार और सांसारिक पदार्थों को ही सत्य मानते हैं। भूमि, सम्पत्ति, धन, स्त्री, और सन्तान तक ही इनकी दृष्टि रहती है। केवल शरीर, केवल दृश्यमान जगत् और केवल वर्तमान जीवन ही उनके निकट परम सत्य होते हैं।


   प्रश्न यह है कि मनुष्य भौतिकवादी दृष्टिकोण अपनाता क्यों है? कठोपनिषद् के ऋषि ने इसका विवेचन करते हुए लिखा है―


   पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् ।

कश्चिद् धीर: प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ।।

―(कठो० ४/१)

भावार्थ― अपनी ही सत्ता में स्थित रहने वाले परमात्मा ने इन्द्रियों को वाह्य विषयों पर गिरने वाला बनाया है, इसलिए मनुष्य वाह्य विषयों को देखता है, अन्तरात्मा को नहीं। कोई ध्यानशील और विवेकी पुरुष ही मोक्ष की इच्छा करता हुआ ह्रदयाकाशस्थ आत्मा को देखता है।


  वाह्य विषयों के पीछे दौड़ने वाले व्यक्तियों के लिए उपनिषत्कार ने कहा है―


   पराच: कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् ।

अथ धीरा अमृतत्त्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ।।

―(कठो० ४/२)

भावार्थ― जो अज्ञानी पुरुष वाह्य विषयों के पीछे दौड़ते हैं वे मृत्यु के फैले हुए जाल में फँसते हैं और ज्ञानी पुरुष निश्चय ही मोक्ष को जानकर संसार के अनित्य पदार्थों में सुख को नहीं चाहते।


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 🚩‼️ आज का वेद मंत्र ‼️🚩


    🌷ओ३म् संम्भूति च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह । विनाशेन मृत्यु तीर्त्वा सम्भूत्यामृतमश्नुते।।( यजुर्वेद  ४०|१० )


💐 अर्थ  :- हे मनुष्यों  ! कार्य (सृष्टि) , कारण ( प्रकृति) नामक वस्तुएं निरर्थक नहीं है, किन्तु कार्य कारण इन दोनों के गुण कर्म स्वभाव को जानकर इनका धर्मादि मोक्ष के साधनों में उपयोग करके अपने-अपने स्वरूप से कार्य और कारण की नित्यता के विज्ञान से मृत्यु के भय को हटाकर मोक्ष की सिद्धि करो । इस प्रकार कार्य (सृष्टि) कारण ( प्रकृति) के द्वारा भिन्न-भिन्न धर्मादि और मोक्षसिद्धरूप फल प्राप्त करना चाहिए ।उपासना के प्रकरण में परमेश्वर के स्थान में इन कार्य (सृष्टि), कारण ( प्रकृति)  की उपासना करने का निषेध समझना चाहिए ।


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 🔥विश्व के एकमात्र वैदिक  पञ्चाङ्ग के अनुसार👇

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 🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏


(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त)       🔮🚨💧🚨 🔮


ओ३म् तत्सत् श्रीब्रह्मणो द्वितीये प्रहरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- पञ्चर्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२५ ) सृष्ट्यब्दे】【 एकाशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८१) वैक्रमाब्दे 】 【 द्विशतीतमे ( २००) दयानन्दाब्दे, काल -संवत्सरे,  रवि- दक्षिणायने , हेमन्त -ऋतौ, मार्गशीर्ष - मासे, शुक्ल पक्षे,दशम्यां 

 तिथौ, 

  उत्तराभाद्रपद नक्षत्रे, मंगलवासरे

 , शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे ढनभरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ,  आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे

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