ईश्वर दयालु और न्यायप्रिय है

 🚩‼️ओ३म्‼️🚩



🕉️🙏नमस्ते जी🙏


दिनांक  - - १८ जनवरी  २०२५ ईस्वी 


दिन  - -  शनिवार 


  🌖 तिथि -- पञ्चमी ( पूरी रात्री )


🪐 नक्षत्र - - पूर्वाफाल्गुन ( १४:५१ तक तत्पश्चात  उत्तराफाल्गुन )

 

पक्ष  - -  कृष्ण 

मास  - -  माघ 

ऋतु - - शिशिर 

सूर्य  - - उत्तरायण 


🌞 सूर्योदय  - - प्रातः ७:१५ पर  दिल्ली में 

🌞 सूर्यास्त  - - सायं १७:४९ पर 

 🌖 चन्द्रोदय  --  २२:०३ पर 

  🌖 चन्द्रास्त  - - १०:०१ पर 


 सृष्टि संवत्  - - १,९६,०८,५३,१२५

कलयुगाब्द  - - ५१२५

विक्रम संवत्  - -२०८१

शक संवत्  - - १९४६

दयानंदाब्द  - - २००


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 🚩 ‼️ ओ३म् ‼️ 🚩


🔥ईश्वर दयालु और न्यायप्रिय है

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  ईश्वर को दयालु और न्यायप्रिय कहा गया है। ईश्वर निष्काम भाव से जीवात्माओं के कर्म और भोग के निमित सृष्टि का निर्माण करते है।  ताकि मनुष्य रूपी आत्मा उत्तम कर्म कर मुक्ति को प्राप्त कर सके। ईश्वर जीवात्माओं के शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार बिना पक्षपात के सुख-दुःख रूपी फल देते है।  यही उनकी न्याय प्रियता है।  


   कुछ लोग यह शंका करते है कि यदि ईश्वर पुण्य के समान पापों का भी फल उसी अनुपात में देता हैं।  तो फिर वह दयालु कैसे? क्योंकि अपराधी को क्षमा करना दया है। जब ईश्वर पापों को क्षमा ही नहीं करता तो फिर दयालु कैसे सिद्ध हुआ? अगर ईश्वर न्यायकारी है? उसी अनुपात में दंड देता है। तो फिर वह दयालु हो ही नहीं सकता। दयालु और न्याय प्रियता दोनों विपरीत गुण हैं। दोनों ही गुण ईश्वर के कैसे हो सकते है?


   इस शंका का मूल कारण दयालु का यथार्थ अर्थ को नहीं समझना है। एक अपराधी को क्षमा करके छोड़ देना , दया नहीं। उसके और सब जगत के साथ अन्याय करना है। पापी को पाप का दण्ड अवश्य मिलना चाहिए। दण्ड का उद्देश्य अपराधी सुधार, दूसरों को उससे और उस जैसे लोगों से बचाना और धर्म नीति तथा राज नियम के महत्व को समाज में स्थापित रखना है।  दण्ड मिलने में ही पापी का भला है। उसे दण्ड न देना उसके दोषों को बढ़ाना है। और वह उस पर अत्याचार करना है। 


  सत्य तो यह है कि परिणाम की दृष्टि से न्याय और दया का नाम मात्र भेद है। क्योंकि जो न्याय से प्रयोजन सिद्ध होता है, वही दया से। दण्ड देने का प्रयोजन है कि मनुष्य अपराध करने से बंद होकर दुखों को प्राप्त न हो। वही दया कहलाती है, जो पराये दुःखों का छुड़ाना है।  इन दोनों का इतना ही भेद है कि जो मन में सब की सुख देने और दुःख छुड़ाने की इच्छा एवं कृपा करना है। वह दया और उपकार की दृष्टि से न्याय कहलाता है। दोनों का प्रयोजन जीवात्माओं को  पाप और दुःखों से दूर करना हैं। 


  इसलिए तीर्थ यात्रा या गंगा स्नान से मुक्ति, पीर या कब्र पूजा से बरकत, गिरिजा घर में जाकर प्रार्थना से पाप क्षमा होना,  केवल इस्लाम और रसूल पर विश्वास से जन्नत का नसीब होना सब भ्रम हैं। मनुष्य जैसे कर्म करेगा उसे वैसा ही फल निश्चित रूप से मिलेगा।    


  दण्ड को न्याय और उसके प्रयोजन को दया कहते है।


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🕉️🚩आज का वेद मंत्र 🚩🕉️


🌷ओ३म् वाजस्य नु प्रसवे मातरं महीमदितिं नाम वचसा करामहे।यस्यामिदं विश्वं भुवनमाविवेश तस्यां नो देव: सविता धर्म साविषत्॥ यजुर्वेद १८-३०॥


💐 अर्थ  :-उस ईश्वर ने इस धरती मां की रचना की है। यह धरती ममां हम सबको धारण किए हुए है। हमें अपनी इस धरती मां  से प्यार करना चाहिए और इसकी उपासना करनी चाहिए । उस ईश्वर के आशीर्वाद के साथ इसकी राजनीतिक और आर्थिक स्वतंत्रता के लिए पवित्र कर्म करने चाहिए।


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 🔥विश्व के एकमात्र वैदिक  पञ्चाङ्ग के अनुसार👇

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 🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏


(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त)       🔮🚨💧🚨 🔮


ओ३म् तत्सत् श्री ब्रह्मणो दिवसे द्वितीये प्रहरार्धे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वते मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- पञ्चर्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२५ ) सृष्ट्यब्दे】【 एकाशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८१) वैक्रमाब्दे 】 【 द्विशतीतमे ( २००) दयानन्दाब्दे, काल -संवत्सरे,  रवि- उत्तरायणे , शिशिर -ऋतौ, माघ - मासे, कृष्ण पक्षे,पञ्चमयां

 तिथौ, 

  पूर्वाफाल्गुन नक्षत्रे, शनिवासरे

 , शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे भरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ,  आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे

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