🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🕉️🙏नमस्ते जी🙏
दिनांक - - २४ जनवरी २०२५ ईस्वी
दिन - - शुक्रवार
🌘 तिथि -- दशमी ( १९:२५ तक तत्पश्चात एकादशी )
🪐 नक्षत्र - - अनुराधा ( ३१:०७ तक तत्पश्चात ज्येष्ठा )
पक्ष - - कृष्ण
मास - - माघ
ऋतु - - शिशिर
सूर्य - - उत्तरायण
🌞 सूर्योदय - - प्रातः ७:१३ पर दिल्ली में
🌞 सूर्यास्त - - सायं १७:५४ पर
🌘 चन्द्रोदय -- २७:३३ पर
🌘 चन्द्रास्त - - १३:०० पर
सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२५
कलयुगाब्द - - ५१२५
विक्रम संवत् - -२०८१
शक संवत् - - १९४६
दयानंदाब्द - - २००
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🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🔥सत् शिक्षण की आवश्यकता।
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मनुष्य की यह कमजोरी है कि वह दूसरों से ही सब कुछ सीखता है, जो कि उसके उच्च विकास में बाधक होती है। कारण कि साधारण वातावरण में भले तत्त्वों की अपेक्षा बुरे तत्त्व अधिक होते हैं। उन बुरे तत्त्वों में ऐसा आकर्षण होता है कि कच्चे दिमाग उनकी ओर बड़ी आासनी से खिंच जाते हैं। फलस्वरूप वे बुराइयाँ अधिक सीख लेने के कारण आगे चलकर बुरे मनुष्य साबित होते हैं। छोटी आयु में यह पता नहीं चलता कि बालक किन संस्कारों को अपनी मनोभूमि में जमा रहा है। बड़ा होने पर जब वे संस्कार एवं स्वभाव प्रकट होते हैं, तब उन्हें हटाना कठिन हो जाता है; क्योंकि दीर्घकाल तक वे संस्कार बालक के मन में जमे रहने एवं पकते रहने के कारण ऐसे सुदृढ़ हो जाते हैं कि उनका हटाना कठिन होता है।
ऋषियों ने इस भारी कठिनाई को देखकर एक अत्यन्त ही सुन्दर और महत्त्वपूर्ण उपाय यह निश्चित किया कि प्रत्येक बालक पर माँ-बाप के अतिरिक्त किसी ऐसे व्यक्ति का भी नियन्त्रण रहना चाहिए जो मनोविज्ञान की सूक्ष्मताओं को समझता हो ।दूरदर्शी तत्त्वज्ञानी और पारदर्शी होने के कारण बालक के मन में रहने वाले संस्कार-बीजों को अपनी पैनी दृष्टि से तत्काल देख लेने और उनमें आवश्यक सुधार करने की योग्यता रखता हो। ऐसे मानसिक नियन्त्रणकर्ता की उनने प्रत्येक बालक को अनिवार्य आवश्यकता घोषित की।
शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य के तीन प्रत्यक्ष देव हैं-(१) माता, (२) पिता, (३) गुरु। इन्हें ब्रह्मा, विष्णु, महेश की उपाधि दी है। माता जन्म देती है इसलिए ब्रह्मा है, पिता पालन करता है इसलिए विष्णु है और गुरु कुसंस्कारों का संहार करता है इसलिए शंकर है। गुरु का स्थान माता-पिता के समकक्ष है। कोई यह कहे कि मैं बिना माता के पैदा हुआ, तो उसे ‘झूठा’ कहा जायेगा, क्योंकि माता के गर्भ में रहे बिना कोई किस प्रकार जन्म ले सकता है? इसी प्रकार कोई यह कहे कि मैं बिना बाप का हूँ, तो वह ‘वर्णसंकर’ कहा जायेगा, क्योंकि जिसके बाप का पता न हो, ऐसे बच्चे तो वेश्याओं के यहाँ पैदा होते हैं। उसी प्रकार कोई कहे कि मेरा कोई गुरु नहीं है, तो समझा जायेगा कि यह असभ्य एवं असंस्कारित है, क्योंकि जिसके मस्तिष्क पर विचार, स्वभाव, ज्ञान, गुण, कर्म पर किसी दूरदर्शी का नियन्त्रण नहीं रहा, उसके मानसिक स्वास्थ्य का क्या भरोसा किया जा सकता है? ऐसे असंस्कृत व्यक्तियों को ‘निगुरा’ कहा जाता है। ‘निगुरा’ का अर्थ है बिना गुरु का। किसी समय में ‘निगुरा’ कहना भी वर्णसंकर या मिथ्याचारी कहलाने के समान गाली समझी जाती थी।
बिना माता का, बिना पिता का, बिना गुरु का भी कोई मनुष्य हो सकता है, यह बात प्राचीनकाल में अविश्वस्त समझी जाती थी। कारण कि भारतीय समाज के सुसम्बद्ध विकास के लिए ऋषियों की यह अनिवार्य व्यवस्था थी कि प्रत्येक कार्य का गुरु होना चाहिए, जिससे वह महान् पुरुष बन सके। उस समय प्रत्येक माता-पिता को अपने बालकों को महापुरुष बनाने की अभिलाषा रहती थी। इसके लिए यह आवश्यकता रहती थी कि उनके बालक किसी सुविज्ञ आचार्य के शिष्य हों।
गुरुकुल प्रणाली का उस समय आम रिवाज था। पढ़ने की आयु होते ही बालक ऋषियों के आश्रम में भेज दिये जाते थे। राजा महाराजाओं तक के बालक गुरुकुलों का कठोर जीवन बिताने जाते थे, ताकि वे कुशल नियन्त्रण में रहकर सुसंस्कृत बन सकें और आगे चलकर मनुष्यों के महान् गौरव की रक्षा करने वाले महापुरुष सिद्ध हो सकें। मैं अमुक आचार्य का शिष्य हूँ, यह बात बड़े गौरव के साथ कही जाती थी। प्राचीन परिपाटी के अनुसार जब कोई मनुष्य किसी दूसरे को परिचय देता था तो कहता था, ‘‘मैं अमुक आचार्य का शिष्य, अमुक पिता का पुत्र, अमुक गोत्र का, अमुक नाम का व्यक्ति हूँ।’’ संकल्पों में, प्रतिज्ञाओं में, साक्षी में, राजदरबार में अपना परिचय इसी आधार पर दिया जाता था।
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🕉🚩 अनन्तेश्वर स्तुति 🕉🚩
🌷ओ३म् त्वमेकं शरण्यं त्वमेकं वरेण्यम्, त्वमेकं जगत्पालकं स्वप्रकाशम् । त्वमेकं जगत्कर्त्तृ, त्वमेकं परंपरा निश्चलं निर्विकल्पम्।।
💐 अर्थ:- हे परमानन्देश्वर! संसार में तू ही एकमात्र शरण में जाने योग्य स्थान है।तू ही एकमात्र वरण करने योग्य हैं ।तुझ एकमात्र जगत् के पालक, स्वयं प्रकाशक, रक्षा तथा प्रलय करने वाले, अचल, अपरिवर्तनशील को मेरा नमस्ते ।
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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏
(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮
ओ३म् तत्सत् श्री ब्रह्मणो दिवसे द्वितीये प्रहरार्धे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वते मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- पञ्चर्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२५ ) सृष्ट्यब्दे】【 एकाशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८१) वैक्रमाब्दे 】 【 द्विशतीतमे ( २००) दयानन्दाब्दे, काल -संवत्सरे, रवि- उत्तरायणे , शिशिर -ऋतौ, माघ - मासे, कृष्ण पक्षे, दशम्यां
तिथौ,
अनुराधा नक्षत्रे, शुक्रवासरे
, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे भरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे
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