“एहि शु ब्रवाणि तेऽग्न
इत्थेतरा गिरः।
अभिवर्धस्व इन्दुभिः॥ (7)”
की अत्यन्त गहन, सार-गर्भित, दार्शनिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक तथा आधुनिक जीवन-संदर्भ से जुड़ी व्याख्या प्रस्तुत है। यह मंत्र वाणी-शक्ति, संवाद, और चेतना-विकास के रहस्य को उद्घाटित करता है।
🔥 मंत्र 7 की गहनतम व्याख्या
“एहि शु ब्रवाणि तेऽग्न…”
1. मंत्र का शुद्ध पाठ
एहि शु ब्रवाणि तेऽग्न
इत्थेतरा गिरः।
अभिवर्धस्व इन्दुभिः॥
2. शब्दार्थ (सूक्ष्म भाव सहित)
- एहि – आओ, समीप आओ
- शु – निश्चयपूर्वक, शीघ्र
- ब्रवाणि – मैं बोलूँ, उच्चारण करूँ
- ते – तुम्हारे लिए
- अग्न – हे अग्नि
- इत्थेतरा – ऐसी-ऐसी, विविध
- गिरः – वाणियाँ, स्तुतियाँ, मंत्र
- अभिवर्धस्व – भली-भाँति बढ़ो, विकसित होओ
- इन्दुभिः – सोमरस से, आनन्द-तत्व से
3. स्थूल (बाह्य) अर्थ
हे अग्नि!
आप पधारिए।
मैं आपके लिए विविध स्तुतियाँ और मंत्र उच्चारित कर रहा हूँ।
आप सोमरस से पोषित होकर
अधिकाधिक विकसित हों।
साम वेद रक्षक-शक्ति (Protective Intelligence)
4. मंत्र का केंद्रीय भाव (Core Idea)
यह मंत्र अग्नि को केवल यज्ञ की अग्नि नहीं,
बल्कि—
वाणी, संवाद और चेतना के माध्यम से बढ़ने वाली शक्ति
के रूप में प्रस्तुत करता है।
यहाँ अग्नि संवाद से पुष्ट होती है।
5. “ब्रवाणि” — वाणी का दार्शनिक रहस्य
वाणी केवल बोलना नहीं है।
वैदिक दर्शन में—
वाणी = चेतना का प्रकटीकरण
जो बोला जाता है—
- वही बनता है
- वही बढ़ता है
- वही रूप लेता है
इसलिए कहा गया—
“ब्रवाणि ते”
मैं तुम्हारे लिए बोलता हूँ।
👉 सामवेद आत्मीय और हृदयस्थ सत्ता
6. वाणी और अग्नि का संबंध
यह मंत्र बताता है—
जिस प्रकार ईंधन से अग्नि बढ़ती है,
उसी प्रकार सचेत वाणी से चेतना बढ़ती है।
अर्थात्—
- नकारात्मक शब्द → चेतना क्षीण
- सत्य, प्रेमपूर्ण शब्द → चेतना प्रबल
7. “इत्थेतरा गिरः” — विविध वाणी
यहाँ संकेत है कि—
अग्नि किसी एक शब्द से नहीं,
बल्कि निरंतर, विविध, जीवंत संवाद से बढ़ती है।
आज की भाषा में— 👉 निरंतर आत्म-संवाद (Self-Dialogue)
👉 सामवेद बाधा-विध्वंसक और समृद्धि-दायिनी
8. “इन्दुभिः” — सोम का गूढ़ अर्थ
सोम केवल पेय नहीं।
दार्शनिक रूप में—
- सोम = आनंद
- सोम = शीतलता
- सोम = प्रेम
- सोम = रस
अग्नि को—
कठोरता नहीं,
आनंदपूर्ण साधना चाहिए।
9. संतुलन का महान सिद्धांत
यह मंत्र अग्नि + सोम का संतुलन सिखाता है।
- केवल अग्नि → कठोरता
- केवल सोम → आलस्य
👉 दोनों का संतुलन = जीवन-सिद्धि
👉 त्वमग्ने यज्ञानां घटित विश्वेषां हितः…” सार-गर्भित समग्र व्याख्या
10. मनोवैज्ञानिक व्याख्या (Modern Psychology)
आज की भाषा में—
- अग्नि = Motivation
- वाणी = Self-Talk
- सोम = Positive Emotion
यह मंत्र—
- सकारात्मक आत्म-संवाद सिखाता है
- आंतरिक विकास कराता है
- Burnout से बचाता है
11. आध्यात्मिक स्तर पर अर्थ
यह मंत्र सिखाता है—
ईश्वर संवाद से दूर नहीं,
संवाद से समीप आता है।
भक्ति = संवाद
👉 सामवेद मंत्र 2 जीवन-संचालन का वैदिक सूत्र है।
12. साधनात्मक प्रयोग (आज के समय में)
- प्रातः या संध्या
- दीपक के सामने
- 11 बार जप
- भाव:
“मेरी वाणी शुद्ध हो, मेरी चेतना बढ़े”
13. आधुनिक जीवन में उपयोग
(क) मानसिक जीवन
- आत्मविश्वास में वृद्धि
- नकारात्मक सोच में कमी
- ध्यान में स्थिरता
(ख) सामाजिक जीवन
- संवाद में मधुरता
- विवाद में कमी
- नेतृत्व क्षमता
(ग) आध्यात्मिक जीवन
- मंत्र-जप में रस
- भक्ति में आनंद
- चेतना का विस्तार
14. ब्रह्मज्ञान की दृष्टि से
ब्रह्मज्ञान में—
ब्रह्म वाणी से नहीं बंधता,
पर वाणी से प्रकट होता है।
यह मंत्र उसी प्रकट होने की विधि है।
15. मंत्र का जीवन-सूत्र
जो बोलते हो, वही बनते हो।
जिस भाव से बोलते हो, वही शक्ति बनता है।
16. निष्कर्ष
मंत्र 7—
- वाणी-शुद्धि का मंत्र है
- चेतना-विकास का विज्ञान है
- आनंदमय साधना का रहस्य है
यह मंत्र सिखाता है—
वाणी को यज्ञ बना दो,
जीवन स्वयं प्रकाशित हो जाएगा।




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