नीचे मंत्र 4 —
“अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद्
द्रविणस्युर्विपन्यया।
समिद्धः शुक्र आहुतः॥ (4)”
की सार-गर्भित, दार्शनिक, आध्यात्मिक तथा आधुनिक जीवन के परिप्रेक्ष्य में गहन व्याख्या प्रस्तुत है। यह मंत्र अग्नि की संघर्ष-नाशक, बाधा-विध्वंसक और समृद्धि-दायिनी शक्ति को प्रकट करता है।
अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद्
द्रविणस्युर्विपन्यया।
समिद्धः शुक्र आहुतः॥
अग्नि सभी बाधाओं और दुष्ट शक्तियों को नष्ट करती है।
वह धन और समृद्धि देने वाली है।
स्तुति और आहुतियों से प्रज्वलित होकर
वह शुद्ध और तेजस्वी बनती है।
यह मंत्र बताता है कि—
अग्नि केवल शांत प्रकाश नहीं,
वह संघर्ष करने वाली, बाधाएँ तोड़ने वाली शक्ति है।
यहाँ अग्नि योद्धा भी है और पालक भी।
वृत्र को केवल पौराणिक राक्षस समझना अधूरा है।
वैदिक दर्शन में—
👉 जो चेतना के प्रवाह को रोक दे, वही वृत्र है।
अग्नि इन सबका संहार करती है।
यह शब्द अत्यंत शक्तिशाली है।
यह केवल नाश नहीं, बल्कि—
पूर्ण परास्ति और निर्णायक विजय का सूचक है।
इसका अर्थ है—
जब अग्नि जाग्रत होती है,
तो अज्ञान टिक नहीं पाता।
अग्नि को धनदायिनी कहा गया है।
यह धन केवल—
आधुनिक भाषा में— 👉 अग्नि = Prosperity Generator
क्योंकि जहाँ—
वहाँ समृद्धि स्वयं आती है।
यह मंत्र स्पष्ट करता है—
अग्नि अंधभक्ति से नहीं,
बुद्धिपूर्ण स्तुति से प्रज्वलित होती है।
अर्थात्—
ही फलदायी होता है।
जब अग्नि—
प्रज्वलित होती है,
तो वह शुक्र (निर्मल, तेजस्वी) बनती है।
यह मंत्र साधक को सिखाता है—
यदि तुम्हें जीवन की बाधाएँ हटानी हैं,
तो भीतर की अग्नि को जगाना होगा।
यह मंत्र वीर-भाव का मंत्र है।
ब्रह्मज्ञान में—
जब यह मंत्र जपा जाता है—
ब्रह्मचेतना साधक के भीतर
विघ्नों का संहार करती है।
जहाँ अग्नि जाग्रत है,
वहाँ बाधाएँ टिक नहीं सकतीं।
मंत्र 4—
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