“त्वमग्ने यज्ञानां घटित विश्वेषां हितः
देवेभिर्मनुशे जने॥ (2)”
की सार-गर्भित, दार्शनिक, आध्यात्मिक तथा आधुनिक परिप्रेक्ष्य में विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत है। यह व्याख्या इस मंत्र के भीतरी रहस्य (Inner Meaning) को स्पष्ट करती है—कि अग्नि केवल यज्ञाग्नि नहीं, बल्कि समस्त जीवन-व्यवस्था को जोड़ने वाली चेतना है।
त्वम् अग्ने यज्ञानाम् घटितः
विश्वेषां हितः।
देवेभिः मनुशे जने॥
हे अग्नि!
तुम समस्त यज्ञों को सुव्यवस्थित करने वाले हो।
तुम सभी के लिए कल्याणकारी हो।
देवताओं और मनुष्यों—दोनों के बीच
तुम ही सेतु हो।
यह मंत्र अग्नि को केवल यज्ञ की अग्नि नहीं, बल्कि—
देव और मनुष्य के बीच संबंध स्थापित करने वाली ब्रह्म-चेतना
के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
यहाँ अग्नि =
🔥 मध्यस्थ
🔥 संयोजक
🔥 संतुलक
🔥 हितकारी शक्ति
सामान्य अर्थ में यज्ञ = हवन।
लेकिन वैदिक दर्शन में—
यज्ञ = जीवन की समस्त क्रियाएँ
अग्नि “घटित” है, अर्थात्—
वह जीवन के बिखरे कर्मों को
एक सूत्र में पिरोती है।
आज की भाषा में— 👉 अग्नि = System Integrator of Life
वैदिक दर्शन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है—ऋत
(सार्वभौमिक नियम / Cosmic Order)
अग्नि उसी ऋत की क्रियाशील शक्ति है।
इसलिए कहा गया— “त्वमग्ने यज्ञानां घटित”
अर्थात्—
हे अग्नि!
तुम ही हो जो जीवन के यज्ञ को
अव्यवस्था से व्यवस्था की ओर ले जाते हो।
यह मंत्र अत्यंत महत्वपूर्ण घोषणा करता है—
अग्नि किसी एक जाति, वर्ग या समुदाय के लिए नहीं,
संपूर्ण विश्व के कल्याण के लिए है।
यह वैदिक सर्वहितवाद का उद्घोष है।
आज के संदर्भ में—
यह पंक्ति मंत्र का हृदय है।
देव कोई बाहरी सत्ता मात्र नहीं—
👉 देव = Cosmic Forces / Universal Principles
देव और मनुष्य के बीच
संवाद स्थापित करना।
अर्थात्—
सीमित चेतना को
असीम चेतना से जोड़ना।
जब साधक मंत्र बोलता है—
“त्वमग्ने…”
तो वह वास्तव में कह रहा है—
हे अंतरात्मा की अग्नि!
मेरे कर्म, भाव और विचारों को
दिव्यता से जोड़ दो।
यह मंत्र साधना का विज्ञान है।
👉 अग्नि = Mental Organizer
👉 अग्नि = Social Harmonizer
👉 अग्नि = Ethical Intelligence
ब्रह्मज्ञान में—
जब यह मंत्र बोला जाता है, तो साधक—
ब्रह्म को
जीवन में सक्रिय करने का आह्वान करता है।
यह मंत्र सिखाता है—
अग्नि वह शक्ति है
जो जीवन के यज्ञ को
अराजकता से अर्थ की ओर ले जाती है।
यह मंत्र—
0 टिप्पणियाँ