नीचे सामवेद के मंत्र 3 —
“अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्।
अस्य यज्ञस्य सुकृतम्॥ (3)”
की सार-गर्भित, दार्शनिक, आध्यात्मिक तथा आधुनिक जीवन के परिप्रेक्ष्य में विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत है। यह व्याख्या मंत्र के आंतरिक रहस्य (Inner Meaning) को स्पष्ट करती है और यह बताती है कि यह मंत्र केवल यज्ञ-विधान नहीं, बल्कि जीवन-संचालन का वैदिक सूत्र है।
अग्निं दूतं वृणीमहे
होतारं विश्ववेदसम्।
अस्य यज्ञस्य सुकृतम्॥
हम अग्नि को दूत के रूप में स्वीकार करते हैं।
वे यज्ञ के होतृ हैं, सर्वज्ञ हैं,
और इस यज्ञ को सही प्रकार से संपन्न करने वाले हैं।
यह मंत्र एक अत्यंत महत्वपूर्ण घोषणा करता है—
मनुष्य अपने जीवन-यज्ञ का दूत, मार्गदर्शक और संचालक अग्नि (चेतना) को बनाता है।
यहाँ अग्नि को चुना जा रहा है — वृणीमहे।
अर्थात् चेतना को जीवन का केंद्र बनाने का संकल्प।
सामान्य अर्थ में दूत = संदेशवाहक।
पर वैदिक दर्शन में—
दूत वह शक्ति है
जो दो लोकों के बीच संवाद कराए।
यहाँ:
👉 अग्नि इन दोनों के बीच सेतु (Bridge) है।
आज की भाषा में— Agni = Interface between Human Mind and Universal Intelligence
यह शब्द अत्यंत गूढ़ है।
यह नहीं कहा गया— “अग्नि अपने आप दूत है”
बल्कि कहा गया— “हम अग्नि को दूत चुनते हैं”
अर्थात्—
जीवन में प्रकाश, विवेक और सत्य को
जानबूझकर अपनाना पड़ता है।
आधुनिक संदर्भ में— यह मंत्र Conscious Choice का प्रतीक है।
होता वह है जो आहुति देता है।
दार्शनिक अर्थ में—
👉 अग्नि कर्म को—
इसलिए अग्नि को कर्मयोग का अधिष्ठाता कहा गया।
यहाँ अग्नि को विश्ववेदस् कहा गया है—
जो सब जानती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि अग्नि कोई व्यक्त देवता है, बल्कि—
अग्नि = वह चेतना
जो समस्त नियमों (ऋत) को जानती है।
आज की भाषा में—
यह पंक्ति मंत्र का हृदय है।
यह बताती है—
जीवन स्वयं एक यज्ञ है,
और अग्नि ही उसे सुकृत (सफल, सार्थक) बनाती है।
यदि जीवन में—
यह मंत्र साधक को सिखाता है कि—
जब तुम अपने भीतर की अग्नि
(आत्मविवेक) को दूत बनाते हो,
तब ईश्वर दूर नहीं रहता।
यह मंत्र अंतर्यामी ईश्वर का सिद्धांत है।
👉 अग्नि = Inner Guide
👉 अग्नि = Ethical Intelligence
ब्रह्मज्ञान में—
जब साधक कहता है— “अग्निं दूतं वृणीमहे”
तो वह वास्तव में कह रहा है—
“मैं ब्रह्मचेतना को
अपने जीवन का मार्गदर्शक चुनता हूँ।”
यह मंत्र सिखाता है—
जो व्यक्ति अग्नि (विवेक) को
अपने जीवन का दूत बनाता है,
उसका जीवन स्वयं यज्ञ बन जाता है।
मंत्र 3—
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