बड़ा हुआ तो क्या हुआ: पद और विनम्रता का संतुलन

बड़ा हुआ तो क्या हुआ: पद और विनम्रता का संतुलन

बड़ा हुआ तो क्या हुआ? सार्थकता का प्रश्न

अक्सर हम समाज में ऐसे लोगों को देखते हैं जिनके पास अपार धन, ऊँचे पद और बड़ी डिग्रियाँ हैं, लेकिन उनके स्वभाव में दूसरों के प्रति कोई संवेदना नहीं होती। कबीरदास जी ने सदियों पहले इस 'खोखले बड़प्पन' पर एक अत्यंत सटीक प्रहार किया था।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।।
भावार्थ: खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा और बड़ा होता है, लेकिन उसकी ऊँचाई किसी थके हुए राहगीर (पंथी) को छाया नहीं दे पाती। उसके फल भी इतनी दूर लगते हैं कि हर किसी की पहुँच में नहीं होते। इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति धन या पद में बहुत बड़ा हो जाए, लेकिन वह किसी की मदद न कर सके, तो उसका बड़ा होना व्यर्थ है।

1. वास्तविक बड़प्पन क्या है?

भारतीय दर्शन और वैदिक संस्कृति में 'महत्व' व्यक्ति के त्याग और सेवा से आंका जाता है, न कि उसकी संपत्ति से। एक संन्यासी या शोधकर्ता, जिसके पास भौतिक संपत्ति शून्य है, वह अपने ज्ञान से समाज को दिशा देता है, इसलिए वह वास्तव में 'बड़ा' है।

2. वैदिक संदर्भ: परोपकार ही जीवन

ऋग्वेद में कहा गया है कि वह व्यक्ति व्यर्थ भोजन करता है जो केवल अपने पेट भरने की चिंता करता है और दूसरों (अतिथियों या असमर्थों) की सहायता नहीं करता। बड़प्पन का पैमाना "परोपकाराय सतां विभूतयः" (सज्जनों की विभूति परोपकार के लिए होती है) में छिपा है।

3. व्यावहारिक सीख

  • विनम्रता (Humility): जैसे फलों से लदा पेड़ झुक जाता है, वैसे ही सच्चा बड़ा व्यक्ति सदैव विनम्र होता है।
  • उपयोगिता: आपकी क्षमताएं समाज के किस काम आ रही हैं? यदि आपके पास 'Vedic AI' या 'Blogging' का ज्ञान है, तो वह ज्ञान दूसरों को शिक्षित करने में लगना चाहिए।

निष्कर्षतः, ऊँचाई केवल वह नहीं जो आकाश छू ले, बल्कि ऊँचाई वह है जो नीचे खड़े व्यक्ति का हाथ पकड़कर उसे ऊपर उठा ले।

 

👉 बड़ा  हुआ तो क्या हुआ……

🔶 एक शेर अपनी शेरनी और दो शावकों के साथ वन में रहता था। शिकार मारकर घर लेकर आता और सभी मिलकर उस शिकार को खाते। एक बार शेर को पूरा दिन कोई शिकार नहीं मिला, वह वापस अपनी गुफा के लिए शाम को लौट रहा था तो उसे रास्ते में एक गीदड़ का छोटा सा बच्चा दिखा। इतने छोटे बच्चे को देखकर शेर को दया आ गई। उसे मारने के बजाए वह अपने दांतो से हल्के पकड़ कर गुफा में ले आया। गुफा में पहुँचा तो शेरनी को बहुत तेज भूख लग रही थी, किन्तु उसे भी इस छोटे से बच्चे पर दया आ गई, और शेरनी ने उसे अपने ही पास रख लिया। अपने दोनों बच्चों के साथ उसे भी पालने लगी। तीनों बच्चे साथ - साथ खेलते कूदते बड़े होने लगे। शेर के बच्चों को ये नहीं पता था की हमारे साथ यह बच्चा गीदड़ है। वे उसे भी अपने जैसा शेर ही समझने लगे। गीदड़ का बच्चा शेर के बच्चों से उम्र में बड़ा था, वह भी स्वयं को शेर के दोनों बच्चों का बड़ा भाई समझने लगा। दोनों बच्चे उसका बहुत आदर किया करते थे।

🔷 एक दिन जब तीनों जंगल में घूम रहे तो अचानक उन के सामने एक हाथी आया। शेर के बच्चे हाथी को देखकर गरज कर उस पर कूदने को ही थे कि एकाएक गीदड़ बोला, “यह हाथी है हम शेरों का कट्टर दुश्मन इससे उलझना ठीक नहीं है, चलो यहाँ से भाग चलते है” यह कहते हुए गीदड़ अपनी दुम दबाकर भागा। शेर के बच्चे भी उसके आदेश के कारण एक दूसरे का मुंह देखते हुए उसके पीछे चल दिए। घर पहुँचकर दोनों ने हँसते हुए अपने बड़े भाई की कायरता की कहानी माँ और पिता को बताई, की हाथी को देखकर बड़े भैया तो ऐसे भागे जैसे आसमान सर पर गिरा हो और ठहाका मारने लगे। दूसरे ने हँसी में शामिल होते हुए कहा यह तमाशा तो हमने पहली बार देखा है शेर और शेरनी मुस्कराने लगे गीदड़ को बहुत बुरा लगा की सभी उसकी हँसी उड़ा रहे है। क्रोध से उसकी आँखें लाल हो गई और वह उफनते हुए दोनों शेर के बच्चों को कहा, “तुम दोनों अपने बड़े भाई की हँसी उड़ा रहे हो तुम अपने आप को समझते क्या हो?”

🔶 शेरनी ने जब देखा की बात लड़ाई पर आ गई है तो गीदड़ को एक और ले जाकर समझाने लगी बेटे ये तुम्हारे छोटे भाई है। इनपर इस तरह क्रोध करना ठीक नहीं है। गीदड़ बोला, “वीरता और समझदारी में मैं इनसे क्या कम हूँ जो ये मेरी हँसी उड़ा रहे है” गीदड़ अपने को शेर समझकर बोले जा रहा था। आखिर में शेरनी ने सोचा की इसे असली बात बतानी ही पड़ेगी, वरना ये बेचारा फालतू में ही मारा जाएगा। उसने गीदड़ को बोला, “मैं जानती हूँ बेटा तुम वीर हो, सुंदर हो, समझदार भी हो लेकिन तुम जिस कुल में जन्मे हो, उससे हाथी नहीं मारे जाते है। तुम गीदड़ हो। हमने तुम पर दया कर अपने बच्चे की तरह पाला। इसके पहले की तुम्हारी हकीकत उन्हें पता चले यहाँ से भाग जाओ नहीं तो ये तुम्हें दो मिनट भी जिंदा नहीं छोड़ेंगे।” यह सुनकर गीदड़ बहुत डर गया और उसी समय शेरनी से विदा लेकर वहाँ से भाग गया ॥

🔷 स्वभाव का अपना महत्व है। विचारधारा अपना प्रभाव दिखाती ही है। स्वभाव की अपनी नियति नियत है।

 

1. वास्तविक बड़प्पन और विनम्रता संस्कृत साहित्य में बड़प्पन की पहचान धन या ऊँचाई से नहीं, बल्कि स्वभाव की कोमलता से की गई है: 

नमन्ति फलिनो वृक्षा नमन्ति गुणिनो जनाः। शुष्ककाष्ठश्च मूर्खश्च न नमन्ति कदाचन॥ 

अर्थ: फलों से लदे हुए वृक्ष झुक जाते हैं और गुणी जन (वास्तविक बड़े लोग) सदैव विनम्र रहते हैं। इसके विपरीत, सूखा पेड़ और मूर्ख व्यक्ति कभी नहीं झुकते, चाहे वे कितने ही बड़े क्यों न हो जाएं। 

2. परोपकार की सार्थकता (खजूर के पेड़ के संदर्भ में) कबीर जी ने जिस प्रकार खजूर के पेड़ की निष्फलता बताई है, उसी भाव को संस्कृत में 'परोपकार' के महत्व से समझाया गया है:

 परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः। परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥ 

अर्थ: वृक्ष दूसरों के लिए फल देते हैं, नदियाँ दूसरों के लिए बहती हैं और गायें दूसरों के लिए दूध देती हैं। इसी प्रकार यह मानव शरीर (और उसका बड़प्पन) भी केवल परोपकार के लिए ही होना चाहिए। 

3. वैदिक प्रमाण: दान और सामूहिकता ऋग्वेद के अनुसार, वह व्यक्ति जो समृद्ध होकर भी दूसरों की सहायता नहीं करता, उसका जीवन व्यर्थ है: 

मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य। नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी॥ (ऋग्वेद 10.117.6) 

अर्थ: वह व्यक्ति जो न देवताओं को अर्पण करता है और न ही मित्रों या जरूरतमंदों की सहायता करता है, उसका अन्न प्राप्त करना व्यर्थ है। वह वास्तव में 'केवल पापी' है क्योंकि वह केवल अपने स्वार्थ के लिए जीता है। संन्यास और बड़प्पन का संबंध 'अहंकार' के त्याग से है: 

न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः। (कैवल्योपनिषद्) 

अर्थ: न कर्म से, न संतान से और न ही धन की विशालता से, बल्कि केवल त्याग के द्वारा ही अमरत्व या वास्तविक महानता प्राप्त होती है।

संस्कृत प्रमाण:

"परोपकाराय सतां विभूतयः"

अर्थ: सज्जनों की विभूति (बड़प्पन और संपत्ति) केवल दूसरों के उपकार के लिए होती है।

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