दृष्टिकोण: मंदिर की परिक्रमा और एकाग्रता

दृष्टिकोण: मंदिर की परिक्रमा और एकाग्रता

नजरिया बदलें, नजारा बदल जाएगा

एक महिला ने मंदिर के शोर-शराबे और पाखंड से तंग आकर मंदिर आना छोड़ने का निर्णय लिया। पुजारी जी ने उसे एक साधारण सा कार्य दिया— एक गिलास पानी लेकर बिना गिराए परिक्रमा करना।

जब महिला ने सफलतापूर्ण परिक्रमा की, तब पुजारी ने पूछा: "क्या आपको कोई गपशप सुनाई दी?"
महिला का उत्तर था: "नहीं, क्योंकि मेरा पूरा ध्यान गिलास के पानी पर था।"

यही जीवन का सत्य है। यदि हमारा ध्यान अपने इष्ट या अपने लक्ष्य पर है, तो दुनिया की बुराइयां हमें प्रभावित नहीं कर सकतीं।

वैदिक मंत्र एवं व्याख्या

ॐ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्।
(यजुर्वेद 36.24)

व्याख्या: यह मंत्र दिव्य दृष्टि (Divine Vision) की प्रार्थना करता है। जैसे उस महिला का ध्यान पानी के गिलास पर केंद्रित था, वैसे ही यह मंत्र हमें सिखाता है कि हमारी आँखें केवल उस 'शुद्ध प्रकाश' (परमात्मा) को देखें जो हमारे सामने है। जब दृष्टि देवत्व पर टिकी होती है, तो दोष दिखाई देना बंद हो जाते हैं।

'' जाकी रही भावना जैसी।
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी ।।

सीख: दोष मंदिर में नहीं, हमारे ध्यान के भटकाव में है। अपना ध्यान 'परम पिता' में लगाएँ, फिर सर्वत्र वही दिखाई देंगे।

 

दृष्टिकोण

 

🔶 एक महिला रोज मंदिर जाती थी ! एक दिन उस महिला ने पुजारी से कहा अब मैं मंदिर नहीं आया करूँगी! इस पर पुजारी ने पूछा क्यों?

 

🔷 तब महिला बोली - मैं देखती हूँ लोग मंदिर परिसर में अपने फोन से अपने व्यापार की बात करते हैं ! कुछ ने तो मंदिर को ही गपशप करने का स्थान चुन रखा है ! कुछ पूजा कम पाखंड,दिखावा ज्यादा करते हैं!

 

🔶 इस पर पुजारी कुछ देर तक चुप रहे फिर कहा- सही है! परंतु अपना अंतिम निर्णय लेने से पहले क्या आप मेरे कहने से कुछ कर सकती हैं! महिला बोली -आप बताइए क्या करना है?

 

🔷 पुजारी ने कहा -- एक गिलास पानी भर लीजिए और 2 बार मंदिर परिसर के अंदर परिक्रमा लगाइए। शर्त ये है कि गिलास का पानी गिरना नहीं चाहिये! महिला बोली -- मैं ऐसा कर सकती हूँ!

 

🔶 फिर थोड़ी ही देर में उस महिला ने ऐसा ही कर दिखाया! उसके बाद मंदिर के पुजारी ने महिला से 3 सवाल पूछे -

 

🔷 1- क्या आपने किसी को फोन पर बात करते देखा?

 

🔶 2- क्या आपने किसी को मंदिर में गपशप करते देखा?

 

🔷 3- क्या किसी को पाखंड करते देखा?

 

🔶 महिला बोली - नहीं मैंने कुछ भी नहीं देखा!

 

🔷 फिर पुजारी बोले - जब आप परिक्रमा लगा रही थीं तो आपका पूरा ध्यान गिलास पर था कि इसमें से पानी न गिर जाए, इसलिए आपको कुछ दिखाई नहीं दिया।

 

🔶 अब जब भी आप मंदिर आयें, तो अपना ध्यान सिर्फ परम पिता परमात्मा में ही लगाना फिर आपको कुछ दिखाई नहीं देगा| सिर्फ भगवान ही सर्वत्र दिखाई देगें।

 

'' जाकी रही भावना जैसी।।

प्रभु मूरत देखी तिन तैसी

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