ऋग्वेद (मण्डल १, सूक्त ३४): चित्तवृत्ति रूपांतरण, आण्विक यांत्रिकी और सौर-जैविक विज्ञान का महाभाष्य
"जहाँ आधुनिक मनीषी उलझे हैं, वहाँ मन्त्रद्रष्टा ऋषि ऋत के साथ साक्षात् सुलझे हैं।"
ओ३म्। कल के सत्र में हमने ऋग्वेद मण्डल १ के सूक्त ३३ का वैज्ञानिक विश्लेषण देखा था। आज हम उससे आगे बढ़ते हुए सूक्त ३४ (मन्त्र १ से ५) के अत्यंत जटिल, सूक्ष्म और क्रांतिकारी धरातल का अन्वेषण करेंगे। यह सूक्त 'अश्विनौ देवाः' को समर्पित है, जिन्हें सामान्यतः केवल वैद्य माना जाता है, किन्तु ऋत-विज्ञान के धरातल पर वे ब्रह्माण्ड की गतिशीलता, ऊर्जा संचरण और आकर्षण-प्रतिकर्षण के पूरक नियम हैं।
आज का यह विश्लेषण न केवल आधुनिक भौतिकी (Physics) को चुनौती देता है, बल्कि महर्षि पतंजलि के योगदर्शन में वर्णित 'चित्तवृत्ति निरोध' (वृत्तियों को जबरन रोकना) के सिद्धांत की सीमाओं का पर्दाफाश करते हुए वेदों के 'रूपांतरण और रासायनिक यज्ञ विज्ञान' (Transmutation Science) को अकाट्य रूप से सिद्ध करता है।
१. मन्त्र १: चित्त वृत्तियों का प्रोटोटाइप और आण्विक अभिक्रिया
त्रिश्चिन्नो अद्या भवतं नवेदसा विभुर्वां याम उत रातिरश्विना ।युवोर्हि यन्त्रं हिम्येव वाससोऽभ्यायंसेन्या भवतं मनीषिभिः ॥१॥
ऋषीय वैज्ञानिक दृष्टिकोण:
- त्रिश्चि (त्रि + इ + स + चित्): 'त्र' में 'इ' त्रयी विद्या (पदार्थ, ऊर्जा, गति) का सूचक है। इसमें 'स' और 'चित्' मिलकर चित्त की वृत्तियों का विज्ञान बनाते हैं।
- नः (नो): यह चित्त की वृत्तियों का एक सचित्र प्रतिबिंब (Prototype/Matrix) है, जिसमें कर्ता, क्रिया और कर्म का पूरा अल्गोरिदम है। ऋषि कहते हैं कि इसे परलोक में नहीं, बल्कि 'अद्या' (आज, अभी, वर्तमान क्षण) में रन (Run) करके देखना होगा।
- नवेदसा (न + वेद + सा): यह निश्चित रूप से ज्ञान (इन्फॉर्मेशन) से तो संपन्न है, परन्तु 'सा' के कारण शुद्ध आत्म-चेतना से अलग प्रकृति का जड़ यन्त्र है।
- हिम्येव वाससः और भूगर्भ विज्ञान: 'वाससः' अर्थात् जीवों का सबसे बड़ा आश्रय स्थल—समुद्र। यह यन्त्र 'हिम्य इव' (हिमालय की तरह) समुद्र के ही गर्भ से उत्पन्न होकर उसी के मार्ग की रुकावट बन जाता है, जो आधुनिक टेक्टोनिक प्लेट्स (Tectonic Plates) के सिद्धांत को पुष्ट करता है।
- अभ्यायंसेन्या: 'अभि' (आण्विक अभिक्रियाएं) और 'आयं' (भूगर्भ संपदा का दोहन) से मिलकर बना यह तंत्र 'सेन्या' (रक्षा तंत्र) के लिए उपयोगी है, जिसमें आज के मनीषी वैज्ञानिक उलझे हुए हैं।
२. मन्त्र २: त्रिविध दुःख का त्रिशूल और बुद्धि का भ्रम
त्रयः पवयो मधुवाहने रथे सोमस्य वेनामनु विश्व इद्विदुः ।त्रय स्कम्भास स्कभितास आरभे त्रिर्नक्तं याथस्त्रिर्वश्विना दिवा ॥२॥
ऋषीय वैज्ञानिक दृष्टिकोण:
- त्रयः पवयः: खाद्य पदार्थ के पाचन के बाद जो परिष्कृत रूप (सप्तधातु, वीर्य) बनता है, वही सूक्ष्म स्तर पर चित्त की वृत्तियाँ (सत्, रज, तम्) बनती हैं। ये 'मधु-वाहने रथे' (आत्मा के मधुर जीवन का वाहन) हैं।
- सोमस्य वेनामनु: यह अन्न-जनित ऊर्जा मानव चित्त के मुख्य सार 'सोम' (सोचने-समझने की क्षमता) को प्रभावित करती है। जो साधारण मनुष्य (बिना नाम के) हैं, वे विशेष विज्ञान (विदुः) से केवल प्रकृति का दोहन करते हैं।
- स्कम्भास और हताशा (स्कभि-तासः): त्रिगुणात्मक वृत्तियाँ चेतना को भौतिक संसार में जकड़ लेती हैं, जिससे कर्म के वास्तविक परिणाम का भास (आभास) नहीं होता और अंततः 'तासः' (हताशा/निराशा) का जन्म होता है।
- नक्तम्-दिवा: 'त्रिः' (त्रिविध दुःख) अज्ञान के अंधकार (नक्तम्) के कारण श्रेष्ठ कर्मों की थाह नहीं मिलने देता, और 'दिवा' (आत्मा का प्रकाश होने के बावजूद) मन-बुद्धि को भ्रष्ट करने में समर्थ होता है।
३. मन्त्र ३: पतंजलि के 'निरोध' का पर्दाफाश और यज्ञीय रूपांतरण
समाने अहन्त्रिरवद्यगोहना त्रिरद्य यज्ञं मधुना मिमिक्षतम् ।त्रिर्वाजवतीरिषो अश्विना युवं दोषा अस्मभ्यमुषसश्च पिन्वतम् ॥३॥
ऋषीय वैज्ञानिक दृष्टिकोण:
जहाँ योगदर्शन चित्तवृत्ति निरोध की बात करता है, वहाँ मानवता असफल रही है; क्योंकि यह 'अहन्' है—इसका हनन या दमन नहीं किया जा सकता। यह वृत्ति 'अवद्य-गोहना' है, यह 'गोह' या कोबरा सांप से भी खतरनाक 'साइनाइड' जैसे महाविष के समान है। इसे रोकने का प्रयास आत्मघाती है।
ऋषि इसका समाधान 'यज्ञम्' (भट्टी) में देते हैं। जैसे आण्विक जहर (Nuclear Waste) को दबाने के बजाय उसे सबमरीन या स्पेसक्राफ्ट चलाने वाले ईंधन में डाइवर्ट (Divert) कर दिया जाता है, वैसे ही इस विष को जीवन-यज्ञ की भट्टी में झोंकना होगा।
- मिमिक्षतम् (मीमांसा + क्षतम्): इस वृत्ति-ऊर्जा का उपयोग मन की सीमा से पार जाने (मीमांसा) और उसके विकृत आवरण को छतहीन (क्षतम्) करने में करना होगा।
- जब इसे 'पिन्वतम्' (पानी की तरह पीकर पचा) लिया जाता है, तब 'दोषा' (दोष) समाप्त होते हैं और 'उषसः' (चेतना के सूर्य) का उदय होता है।
४. मन्त्र ४: एयरोडायनामिक्स और टर्बाइन यन्त्र का सिद्धांत
त्रिर्वर्तिर्यातं त्रिरनुव्रते जने त्रिः सुप्राव्ये त्रेधेव शिक्षतम् ।त्रिर्नान्द्यं वहतमश्विना युवं त्रिः पृक्षो अस्मे अक्षरेव पिन्वतम् ॥४॥
ऋषीय वैज्ञानिक दृष्टिकोण:
यदि वृत्तियाँ यन्त्र हैं, तो वे यज्ञ की भट्टी में जलेंगी नहीं। वे तो उस भट्टी को प्रचंड वेग देने वाले टर्बाइन फैन (Turbine Fan) या हवाई जहाज़ के पंखे की तरह कार्य करती हैं, जो हवा को खींचकर डाइवर्ट करता है और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से मुक्त करके आसमान में उड़ा देता है।
- शिक्षतम् (डिजिटल प्रोग्रामिंग): ऋषि कहते हैं कि वृत्तियों को रोकना नहीं, उन्हें 'शिक्षित' (प्रोग्राम) करना है। जैसे परमाणु भट्टी को मन्त्र (कंट्रोल रॉड्स) से नियंत्रित करने पर वह पावर ग्रिड बन जाती है।
- इड़ा, सरस्वती, महि (त्रिः नान्द्याम्): चेतना को तीन नदियों को पार करना होगा—इड़ा (भौतिक ज्ञान), सरस्वती (प्रायोगिक विज्ञान) और महि (सर्वोच्च उपलब्धि)।
- अक्षरेव पिन्वतम्: इस परीक्षा (पृक्षो) से गुजरने के बाद चेतना 'अक्षर' (अविनाशी शिवत्व) के रस को पीकर स्वयं स्वामी बन जाती है।
५. मन्त्र ५: शल्य-चिकित्सा (Surgery) और जैव-यांत्रिकी (Bio-Mechanics)
त्रिर्नो रयिं वहतमश्विना युवं त्रिर्देवताता त्रिरुतावतं धियः ।त्रिः सौभगत्वं त्रिरुत श्रवांसि नस्त्रिष्ठं वां सूरे दुहिता रुहद्रथम् ॥५॥
ऋषीय वैज्ञानिक दृष्टिकोण:
- अश्विना (ईश्वर और ऋषि): इन तीन नदियों को पार करने वाली चेतना 'रयिम्' (परम धन का स्रोत) बनती है। 'अश्विना' का अर्थ यहाँ स्वयं ईश्वर और उसे जानने वाला ऋषि है, जो संसार के लिए प्राणवायु हैं।
- दुःखों का ऑपरेशन: मन्त्रद्रष्टा ऋषि त्रिशूल (दुःखों) से भागते नहीं हैं। वे इस त्रिशूल को ही सर्जिकल ब्लेड (औजार) बनाकर उस ग्रंथि का ऑपरेशन कर देते हैं जहाँ से दुःख रीस रहा था। यही रूपांतरण 'सौभगत्वम्' (सौभाग्य) बनता है और चेतना 'श्रवांसि' (ज्ञान-विज्ञान-ब्रह्मज्ञान की श्रुति) में स्थापित होती है।
- जैव-यांत्रिकी (Embryology): 'सूरे दुहिता रुहद्रथम्'—जब स्त्री और पुरुष (वाम्) समान रूप से ऊर्जा का दोहन (संभोग) करते हैं, तो दो अलग अस्तित्व मिलकर एक नई रुह (आत्मा) को जाग्रत करते हैं और उसके लिए एक नए 'रथम्' (मानव शरीर/जीन स्ट्रक्चर) का निर्माण करते हैं। यह सृष्टि का शाश्वत नियम है।
