माँ की शिक्षा: व्यक्तित्व निर्माण की प्रथम पाठशाला
माँ की शिक्षा वह मूक भाषा है जो संतान के चरित्र में जीवनभर बोलती है। यह केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि संस्कारों का वह पुंज है जो समाज को दिशा देता है।
(अर्थ: माता इस भूमि से भी कहीं अधिक भारी अर्थात श्रेष्ठ है।)
1. संस्कार ही वास्तविक शिक्षा
माँ अपनी संतान को जो पहला पाठ पढ़ाती है, वह 'संस्कार' है। ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान (GVB) के अनुसार, ये संस्कार ही मनुष्य की चेतना को परिष्कृत करते हैं।
2. माँ: एक दिव्य मार्गदर्शक
जिस प्रकार एक कुम्हार मिट्टी को भीतर से सहारा देकर बाहर से थाप लगाता है, वैसे ही माँ प्रेम और अनुशासन के संगम से संतान को गढ़ती है।
- धैर्य और सहनशीलता का पाठ।
- बड़ों के प्रति आदर और छोटों के प्रति प्रेम।
- सत्य के मार्ग पर चलने का संकल्प।
निष्कर्ष
माँ की शिक्षा ही वह शक्ति है जो एक साधारण बालक को 'पुरुषोत्तम' बना सकती है। आज के तकनीकी युग में भी माँ का मार्गदर्शन ही मानवीय मूल्यों को जीवित रखने का एकमात्र विकल्प है।
👉 मां की शिक्षा
बात उन दिनों की है जब अमेरिका में दास प्रथा चरम पर थी। एक धनाढ्य ने बेंगर नामक दास को खरीदा। बेंगर न केवल परिश्रमी था बल्कि गुणवान भी था। वह धनी व्यक्ति बेंगर से पूर्ण रूपेण संतुष्ट था और उस पर विश्वास भी किया करता था।
एक दिन वह बेंगर को लेकर दासमंडी गया, जहां लोगों का जानवरों की भांति कारोबार होता था। उस धनी ने एक और दास खरीदने की इच्छा जाहिर की तो बेंगर ने एक बूढ़े की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘मालिक! उस बूढ़े को खरीद लीजिए।’
बेंगर के साथ उस बूढ़े को खरीदकर धनी घर चला गया। बूढ़े के साथ बेंगर बहुत खुश था। वह उसकी भलीभांति सेवा किया करता था।
एक दिन उस धनी ने बेंगर को उस बूढ़े की सेवा करते देखा तो इसका कारण पूछा। बेंगर ने बताया, ‘मालिक! बूढ़ा मेरा कुछ भी नहीं लगता बल्कि यह मेरा सबसे बड़ा शत्रु है। इसी ने मुझे बचपन में गुलाम के रूप में बेच डाला था। बाद में यह खुद भी पकड़ा गया और दास बन गया। उस दिन मैंने इस बूढ़े को दासमंडी में पहचान लिया था। मैं इसकी सेवा इसलिए करता हूं कि मेरी मां ने मुझे शिक्षा दी थी कि शत्रु यदि निर्वस्त्र हो तो उसे वस्त्र दो, भूखा हो तो रोटी हो, प्यासा हो तो पानी पिलाओ। इसलिए मैं इसकी सेवा करता हूं।’
इतना सुनकर वह धनाढ्य व्यक्ति बड़ा प्रसन्न हुआ और उसने उसी दिन से बेंगर को स्वतंत्र कर दिया।
👉 पीपल के पेड़ पर
पीपल के पेड़ पर एक बेताल रहता था। लालच देकर लोगों को अपने पास बुलाता और अनाचार के मार्ग पर लगाता और अन्ततः उन्हें मार डालता, यही उसकी नीति थी। अब कितने ही मर गये तो उसका नाम सात स्वर्ण मुद्रा वाला बेताल नाम पड़ गया। जिन्हें पता था, वे सावधान रहते और उस रास्ते न जाते।
एक अनजान नाई उस रास्ते निकला। बेताल ने पेड़ पर बैठे पूछा− सात घड़े सोना लोगे।’ नाई का पहले तो आने का मन नहीं हुआ, फिर सोचा मुफ्त में इतना धन मिल रहा है तो क्यों छोड़ा जाये? उसने कह दिया। आप कृपा पूर्वक दे ही रहे हैं तो ले लूँगा।
बेताल ने कहा− ‘घर चले जाइए। आँगन में स्वर्ण मुद्राओं से भरे सात घड़े मिल जायेंगे। नाई तेजी से चला और रास्ता जल्दी ही पार करके घर जा पहुँचा। आँगन में सात घड़े रखे मिले। छः भरे और सातवाँ आधा खाली।
नाई ने दरवाजा बन्द करके घर के लोगों को सारा वृतान्त सुनाया। सभी बहुत प्रसन्न थे। फूले नहीं समाये। विचार हुआ कि इस सोने का क्या किया जाये? तर्क−वितर्क क बाद सभी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि आधे घड़े को भरने के लिए अधिक प्रयत्न कर लिया जाये। सातों पूरे हो जाने पर आगे की बात सोचेंगे।
परिवार के सभी लोग दुर्बल, चिन्तित, व्यग्र और कुकर्मरत रहने लगे। चेहरे कुरूप हो गये और शरीर जर्जर। लगता था एक−एक करके मृत्यु के मुँह में चले जायेंगे। सातवाँ घड़ा भरने की फिक्र में सभी सूखकर काँटा हुए जा रहे थे।
जिस राजा के यहाँ नाई नौकरी करता था
उसके कान तक सूचना पहुंची। उसने नाई परिवार−को बुलाकर कहा। मूर्खों! उन सात घड़ों
को ले जाकर चुपचाप उस श्मशान में रख आओ। अन्यथा उन घड़ों के रहते तुममें से एक भी
जीवित न बचेगा। इस कुचक्र में कितने ही अपनी जान गँवा बैठे हैं। नाई परिवार ने सीख
मानी। घड़े पीपल के पेड़ के नीचे रखकर लौट आये। फिर पहले की तरह नीतिपूर्वक की गई
कमाई पर निश्चिन्तता से गुजारा करने लगे और उस प्राण घातक कुचक्र से छूटकर शान्ति
से दिन बिताने लगे।
