मौत का सौदागर बनाम परमात्मा का विधान
विनाश और सृजन के बीच का शाश्वत सत्य
संसार में जिसे हम 'मृत्यु' कहते हैं, वह परमात्मा की दृष्टि में केवल एक परिवर्तन है। 'मौत का सौदागर' वह है जो स्वार्थ और अज्ञानवश जीवन की चेतना को संकुचित करता है, जबकि परमात्मा का कार्य अनंत विस्तार है।
(अर्थ: मैं सब कुछ हर लेने वाली मृत्यु हूँ और भविष्य में होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ। - गीता 10.34)
मौत का सौदागर: अज्ञान की पराकाष्ठा
जब मनुष्य अपने 'आत्म खजाने' को भूलकर केवल भौतिक विनाश में लिप्त हो जाता है, तो वह काल के क्रूर चक्र का हिस्सा बन जाता है। ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान (GVB) के अनुसार, अशुद्ध विचार और नकारात्मक संस्कार ही वे 'सौदागर' हैं जो हमारे जीवन की शांति को छीन लेते हैं।
परमात्मा का कार्य: शाश्वत संतुलन
परमात्मा का कार्य न्यायपूर्ण और मंगलकारी है। वह पुराने को मिटाता है ताकि नया और बेहतर उत्पन्न हो सके।
- परिमार्जन: दोषों को मिटाकर आत्मा को पुनः शुद्ध करना।
- कर्मफल का विधान: हर जीव को उसके संस्कारों के अनुसार नया अवसर प्रदान करना।
- ऊर्जा का संरक्षण: विज्ञान के अनुसार ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती, वैसे ही परमात्मा चेतना की ऊर्जा को सहेजकर रखता है।
अंततः, मृत्यु अंत नहीं है, बल्कि परमात्मा के उस महान कार्य का हिस्सा है जो हमें पूर्णता की ओर ले जाता है।
👉 मौत का सौदागर
1888 की बात है, एक व्यक्ति सुबह-सुबह उठ कर अखबार पढ़ रहा था, तभी अचानक उसकी नज़र एक “शोक – सन्देश ” पर पड़ी। वह उसे देख दंग रह गया , क्योंकि वहां मरने वाले की जगह उसी का नाम लिखा हुआ था। खुद का नाम पढ़कर वह आश्चर्यचकित तथा भयभीत हो गया। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अखबार ने उसके भाई लुडविग की मरने की खबर देने की जगह खुद उसके मरने की खबर प्रकाशित कर दी थी। खैर, उसने किसी तरह खुद को सँभाला, और सोचा, चलो देखते हैं की लोगों ने उसकी मौत पर क्या प्रतिक्रियाएं दी हैं।
उसने पढ़ना शुरू किया, वहां फ्रेंच में लिखा था, “”Le marchand de la mort est mort” यानि, “मौत का सौदागर” मर चुका है”
यह उसके लिए और बड़ा आघात था, उसने मन ही मन सोचा , ” क्या उसके मरने के बाद लोग उसे इसी तरह याद करेंगे?”
यह दिन उसकी ज़िन्दगी का टर्निंग पॉइंट बन गया, और उसी दिन से डायनामाइट का यह आविष्कारक विश्व शांति और समाज कल्याण के लिए काम करने लगा। और मरने से पहले उसने अपनी अकूत संपत्ति उन लोगों को पुरस्कार देने के लिए दान दे दी जो विज्ञान और समाज कलायन के क्षत्र में उत्कृष्ट काम करते हैं।
मित्रों, उस महान व्यक्ति का नाम था, ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल, और आज उन्हीं के नाम पर हर वर्ष “नोबेल प्राइज ” दिए जाते हैं। आज कोई उन्हें “मौत के सौदागर के रूप” में नहीं याद करता बल्कि हम उन्हें एक महान वैज्ञानिक और समाज सेवी के रूप में याद किया जाता है।
जीवन एक क्षण भी हमारे मूल्यों और जीवन की दिशा को बदल सकता है, ये हमें सोचना है की हम यहाँ क्या करना चाहते हैं? हम किस तरह याद किये जाना चाहते हैं? और हम आज क्या करते हैं यही निश्चित करेगा की कल हमें लोग कैसे याद करेंगे! इसलिए, हम जो भी करें सोच-समझ कर करें, कहीं अनजाने में हम “मौत के सौदागर” जैसी यादें ना छोड़ जाएं!!!
👉 भगवान का कार्य:-
उस दिन सबेरे 6 बजे मैं अपने शहर से दूसरे शहर जाने के लिए निकला, मैं रेलवे स्टेशन पहुँचा, पर देरी से पहुँचने कारण मेरी ट्रेन निकल चुकी थी, मेरे पास 9.30 की ट्रेन के अलावा कोई चारा नहीं था मैंने सोचा कही नाश्ता कर लिया जाए, बहुत जोर की भूख लगी थी। मैं होटल की ओर जा रहा था।
अचानक रास्ते में मेरी नजर फुटपाथ पर बैठे दो बच्चों पर पड़ी, दोनों लगभग 10 साल के रहे होंगे, बच्चों की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। कमजोरी के कारण अस्थि पिंजर साफ दिखाई दे रहे थे, वे भूखे लग रहे थे।
छोटा बच्चा बड़े को खाने के बारे में कह रहा था, बड़ा उसे चुप करा ने कोशिश कर रहा था, मैं अचानक रुक गया, दौड़ती भागती जिंदगी में यह ठहर से गये। जीवन को देख मेरा मन भर आया, सोचा इन्हें कुछ पैसे दे दिए जाए, मैंने उन्हें 10 रु दे कर आगे बढ़ गया। तुरंत मेरे मन में एक विचार आया कितना कंजूस हु मैं, 10 रु क्या मिलेगा, चाय तक ढंग से न मिलेगी, स्वयं पर शर्म आयी फिर वापस लौटा।
मैंने बच्चों से कहा: कुछ खाओगे? बच्चे थोड़े असमंजस में पड़े, मैंने कहा बेटा मैं नाश्ता करने जा रहा हु, तुम भी कर लो, वे दोनों भूख के कारण तैयार हो गए। उनके कपड़े गंदे होने से होटल वाले डाट दिया, भगाने लगा, मैंने कहा भाई साहब उन्हें जो खाना है, वो उन्हें दो पैसे मैं दूंगा।
होटल वाले ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा.. उसकी आँखों में उसके बर्ताव के लिए शर्म साफ दिखाई दी। बच्चों ने नाश्ता मिठाई व् लस्सी मांगी। सेल्फ सर्विस के कारण मैंने नाश्ता बच्चों को लेकर दिया, बच्चे जब खाने लगे, उनके चेहरे की ख़ुशी कुछ निराली ही थी।
मैंने बच्चों को कहा बेटा अब जो मैंने तुम्हें पैसे दिए है उसमें 1 रु का शैम्पू ले कर हैण्ड पम्प के पास नहा लेना। और फिर दोपहर शाम का खाना पास के मन्दिर में चलने वाले लंगर में खा लेना, और मैं नाश्ते के पैसे दे कर फिर अपनी दौड़ती दिनचर्या की ओर बढ़ निकला।
वहां आसपास के लोग बड़े सम्मान के साथ देख रहे थे, होटल वाले के शब्द आदर में परिवर्तित हो चुके थे। मैं स्टेशन की ओर निकला, थोड़ा मन भारी लग रहा था, मन थोडा उनके बारे में सोच कर दुखी हो रहा था।
रास्ते में मंदिर आया, मैंने मंदिर
की ओर देखा और कहा हे भगवान! आप कहा हो? इन बच्चों की ये हालत ये भूख,
आप कैसे चुप बैठ सकते है। दूसरे ही क्षण मेरे मन में विचार आया,
पुत्र अभी तक जिसने उन्हें नाश्ता दे रहा था वो कौन था?
