क॒दा। क्ष॒त्र॒ऽश्रिय॑म्। नर॑म्। आ। वरु॑णम्। क॒रा॒म॒हे॒। मृ॒ळी॒काय॑। उ॒रु॒ऽचक्ष॑सम्॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:25» मन्त्र:5 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:16» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:5
देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
तदित्स॑मा॒नमा॑शाते॒ वेन॑न्ता॒ न प्र यु॑च्छतः।
धृ॒तव्र॑ताय दा॒शुषे॑॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
tad it samānam āśāte venantā na pra yucchataḥ | dhṛtavratāya dāśuṣe ||
पद पाठ
तत्। इत्। स॒मा॒नम्। आ॒शा॒ते॒ इति॑। वेन॑न्ता। न। प्र। यु॒च्छ॒तः॒। धृ॒तऽव्र॑ताय। दा॒शुषे॑॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:25» मन्त्र:6 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:17» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:6
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब अगले मन्त्र में सूर्य्य और वायु का प्रकाश किया है॥
पदार्थान्वयभाषाः -ये (प्रयुच्छतः) आनन्द करते हुए (वेनन्ता) बाजा बजानेवालों के (न) समान सूर्य और वायु (धृतव्रताय) जिसने सत्यभाषण आदि नियम वा क्रियामय यज्ञ धारण किया है, उस (दाशुषे) उत्तम दान आदि धर्म करनेवाले पुरुष के लिये (तत्) जो उसका होम में चढ़ाया हुआ पदार्थ वा विमान आदि रथों की रचना (इत्) उसी को (समानम्) बराबर (आशाते) व्याप्त होते हैं॥६॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अति हर्ष करनेवाले बाजे बजाने में अति कुशल दो पुरुष बाजों को लेकर चलाकर बजाते हैं, वैसे ही सिद्ध किये विद्या के धारण करनेवाले मनुष्य से होम हुए पदार्थों को सूर्य और वायु चालन करके धारण करते हैं॥६॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
समान , धृतव्रत , दाश्वान्
पदार्थान्वयभाषाः -१. एक घर में पति - पत्नी (इत्) - निश्चय से (तत्) - उस सर्वव्यापक (समानम्) - [सम् , आनयति] सम्यक् सोत्साहित व प्राणित करनेवाले प्रभु को ही (आशाते) - व्याप्त करते हैं अर्थात् सदा प्रत्येक कार्य को करते हुए प्रभु का स्मरण करते हैं उस प्रभु को भूलते नहीं । २. (वेनन्ता) - ये दोनों उस प्रभु की ही कामनावाले होते हैं (न प्रयुच्छतः) - ये प्रमाद कभी नहीं करते । ३. प्रमादरहित होकर ये उस प्रभु की प्राप्ति के लिए ही मार्ग पर निरन्तर बढ़ते हैं जो प्रभु (धृतव्रताय) - सब व्रतों का धारण करनेवाले हैं तथा (दाशुषे) - दाश्वान् - सब - कुछ देनेवाले हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - वह 'वरुण' नामक प्रभु 'समान, धृतव्रत व दाश्वान्' हैं । हमें प्रमादरहित होकर उस प्रभु की प्राप्ति की प्रबल कामना से मार्ग पर बढ़ते चलना चाहिए ।
ऋग्वेद के इस मंत्र में वरुण देव और मित्र देव के अटूट सामंजस्य और उनके नियमबद्ध स्वरूप का वर्णन किया गया है। यह मंत्र मानवीय कर्तव्यों और प्राकृतिक नियमों की निरंतरता को दर्शाता है।
मूल मंत्र
तदित्स॑मा॒नमा॑शाते॒ वेन॑न्ता॒ न प्र यु॑च्छतः।
धृ॒तव्र॑ताय दा॒शुषे॑॥ ऋग्वेद १.२५.६
शब्द-दर-शब्द व्याख्या (Shabd-by-Shabd Analysis)
संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | English Meaning
तत्-इत् | उसी (हवि या फल) को ही | That very (offering/result) |
समानम् | समान रूप से / मिलकर | Equally / Together |
आशाते | उपभोग करते हैं / स्वीकार करते हैं | Consume / Accept |
वेनन्ता | प्रेम करने वाले / परस्पर चाहने वाले | Loving / Desirous of each other |
न प्र युच्छतः | प्रमाद नहीं करते / कभी नहीं चूकते | Never negligent / Never failing |
धृत-व्रताय| व्रत (नियमों) को धारण करने वाले के लिए | For one who upholds the vows |
दाशुषे| दानशील / अर्पण करने वाले के लिए | For the giver / the sacrificer |
व्याख्या और भावार्थ हिंदी:
वे दोनों (मित्र और वरुण) जो परस्पर प्रेम भाव रखते हैं, उस भक्त के लिए जो नियमों का पालन करता है (धृतव्रत) और श्रद्धापूर्वक अर्पण करता है, उसके यज्ञीय फल या हवि को मिलकर स्वीकार करते हैं। वे अपने कार्यों और शासन में कभी आलस्य या प्रमाद नहीं करते, अपितु निरंतर जागृत रहते हैं।
English:
Those two (Mitra and Varuna), being of one mind and loving towards each other, equally accept the offerings of the diligent giver who upholds the sacred laws. They are never negligent in their duties and remain ever-watchful for the one who remains steadfast in his vows.
वैज्ञानिक एवं वैचारिक व्याख्या (Scientific & Conceptual Perspective)
इस मंत्र के निहितार्थ आधुनिक विज्ञान और व्यवस्था सिद्धांत (Systems Theory) के अत्यंत निकट हैं:
परस्पर क्रिया और संतुलन (Interactivity & Equilibrium):
मंत्र में 'वेनन्ता' (परस्पर चाहने वाले) और 'समानम्' (समान रूप से) शब्द दो मूलभूत शक्तियों के संतुलन को दर्शाते हैं। विज्ञान में इसे Symmetry या Coupled Systems कह सकते हैं। जैसे विद्युत और चुंबकत्व (Electromagnetism) मिलकर काम करते हैं, वैसे ही ब्रह्मांडीय व्यवस्था में दो पूरक शक्तियाँ मिलकर कार्य करती हैं।
निरंतरता का सिद्धांत (Law of Continuity):
'न प्र युच्छतः' (प्रमाद न करना) यह दर्शाता है कि प्रकृति के नियम कभी "ब्रेक" नहीं लेते। गुरुत्वाकर्षण या ऊष्मागतिकी के नियम निरंतर सक्रिय रहते हैं। यदि ये शक्तियाँ एक क्षण के लिए भी प्रमाद (Error/Negligence) करें, तो ब्रह्मांड नष्ट हो जाएगा। यह **Universal Constants** की अडिगता का प्रतीक है।
अनुशासन और परिणाम (Feedback Loop): 'धृतव्रताय' (नियमों को धारण करने वाला) का वैज्ञानिक अर्थ है कि जो व्यक्ति प्रकृति के भौतिक या नैतिक नियमों (Physical/Ethical Laws) के अनुरूप कार्य करता है, उसे 'समान' और सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं। यह क्रिया और प्रतिक्रिया (Action and Reaction) के सटीक और न्यायसंगत होने को सिद्ध करता है।
निष्कर्ष
यह मंत्र यह संदेश देता है कि ब्रह्मांड का संचालन करने वाली शक्तियाँ पूर्णतः अनुशासित और निरंतर सक्रिय हैं। सफलता और कल्याण उन्हें ही प्राप्त होता है जो अपने जीवन में 'व्रत' (नियमबद्धता) और 'दान' (अर्पण/योगदान) के गुण विकसित करते हैं। यह पूर्णतः एक Law-Governed Universe का चित्रण है।
देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः छन्द: निचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
वेदा॒ यो वी॒नां प॒दम॒न्तरि॑क्षेण॒ पत॑ताम्।
वेद॑ ना॒वः स॑मु॒द्रियः॑॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
vedā yo vīnām padam antarikṣeṇa patatām | veda nāvaḥ samudriyaḥ ||
पद पाठ
वेद॑। यः। वी॒नाम्। प॒दम्। अ॒न्तरि॑क्षेण। पत॑ताम्। वेद॑। ना॒वः। स॒मु॒द्रियः॑॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:25» मन्त्र:7 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:17» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:7
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
उक्त विद्या को यथावत् कौन जानता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदार्थान्वयभाषाः -(यः) जो (समुद्रियः) समुद्र अर्थात् अन्तरिक्ष वा जलमय प्रसिद्ध समुद्र में अपने पुरुषार्थ से युक्त विद्वान् मनुष्य (अन्तरिक्षेण) आकाश मार्ग से (पतताम्) जाने-आनेवाले (वीनाम्) विमान सब लोक वा पक्षियों के और समुद्र में जानेवाली (नावः) नौकाओं के (पदम्) रचन, चालन, ज्ञान और मार्ग को (वेद) जानता है, वह शिल्पविद्या की सिद्धि के करने को समर्थ हो सकता है, अन्य नहीं॥७॥
भावार्थभाषाः -जो ईश्वर ने वेदों में अन्तरिक्ष भू और समुद्र में जाने आनेवाले यानों की विद्या का उपदेश किया है, उन को सिद्ध करने को जो पूर्ण विद्या शिक्षा और हस्त क्रियाओं के कलाकौशल में कुशल मनुष्य होता है, वही बनाने में समर्थ हो सकता है॥७॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
अन्तरिक्ष व समुद्र में भी
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र के अनुसार हम उस प्रभु की ओर चलते हैं (यः) - जो कि (अन्तरिक्षेण पतताम्) - आकाशमार्ग से जाते हुए (वीनाम्) - पक्षियों के (पदम्) - गन्तव्य मार्ग को (वेद) - जानता है और २. (समुद्रियः) - समुद्र में गति करनेवाली (नावः) - नौकाओं को भी (वेद) - जानता है , स्थल की बातों का तो कहना ही क्या! ३. वे वरुण 'स्थल , जल व नभ' सबमें व्याप्त है । वस्तुतः सर्वव्यापक होने के कारण उनसे कुछ भी छिपा नहीं है । स्थान के दृष्टिकोण से वे प्रभु अनवच्छिन्न हैं , दिशाएँ उन्हें अविच्छिन्न नहीं कर सकती ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - जल, स्थल व अन्तरिक्ष में सर्वत्र व्याप्त वे प्रभु सभी को जानते हैं । उस प्रभु से हम कुछ छिपा नहीं सकते । मन, वाणी और कर्म से पाप होने पर वह वरुण हमें जकड़ता ही है । आकाश में उड़कर या नाव में भागकर हम उस बन्धन से बच नहीं पाते ।
ऋग्वेद का यह मंत्र वरुण देव की सर्वज्ञता (Omniscience) का अद्भुत वर्णन करता है। यहाँ ईश्वर को केवल एक आध्यात्मिक सत्ता के रूप में नहीं, बल्कि अंतरिक्ष और समुद्र के मार्गों के ज्ञाता के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
मूल मंत्र
शब्द-दर-शब्द व्याख्या (Shabd-by-Shabd Analysis)
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | English Meaning
वेद | जानता है / ज्ञान रखता है | Knows / Has knowledge |
यः | जो (वरुण देव) | Who (Varuna) |
वीनाम् | पक्षियों के | Of the birds |
पदम् | मार्ग / स्थान / पदचिह्न | Path / Footprint / Position |
अन्तरिक्षेण | अंतरिक्ष (आकाश) के माध्यम से | Through the atmosphere / sky |
पतताम्| उड़ते हुए | Flying |
नावः| नौकाओं / जहाजों को | Ships / Vessels |
समुद्रियः | समुद्र में रहने वाली / समुद्र संबंधी | Belonging to the ocean |
व्याख्या और भावार्थ हिंदी:
वह वरुण देव, जो अंतरिक्ष में उड़ते हुए पक्षियों के (अदृश्य) मार्गों को जानता है, वही समुद्र में चलने वाली नौकाओं के मार्गों का भी पूर्ण ज्ञान रखता है।
English:
He (Varuna), who knows the hidden paths of the birds flying through the sky, also knows the paths of the ships that sail upon the vast ocean.
वैज्ञानिक एवं तकनीकी व्याख्या (Scientific & Technical Perspective)
यह मंत्र प्राचीन काल के सूक्ष्म प्रेक्षण (Observation) और आधुनिक विज्ञान के बीच एक सेतु की तरह है:
अदृश्य नेविगेशन (Invisible Navigation & Vector Physics): आकाश में पक्षियों का कोई बना-बनाया रास्ता नहीं होता। वैज्ञानिक दृष्टि से पक्षी Earth’s Magnetic Field (भू-चुंबकीय क्षेत्र) और वायु के दबाव का उपयोग करके अपना मार्ग निर्धारित करते हैं। मंत्र में 'पदम्' (मार्ग) शब्द का प्रयोग यह संकेत देता है कि जो हमें शून्य दिखता है, वहां भी निश्चित वैज्ञानिक पथ (Trajectories) होते हैं, जिन्हें ईश्वरीय नियम (Universal Intelligence) संचालित करते हैं।
समुद्र विज्ञान और जलगतिकी (Oceanography & Hydrodynamics):
समुद्र में नौकाओं के लिए धाराओं (Currents), वायु की दिशा और तारों की स्थिति का ज्ञान आवश्यक है। वरुण को 'समुद्रियः' कहकर यह स्पष्ट किया गया है कि वे जल के उन सूक्ष्म नियमों के ज्ञाता हैं जो नौवहन (Navigation) को संभव बनाते हैं।
सर्वव्यापक सूचना तंत्र (Universal Information Field):
आधुनिक भौतिकी में इसे Quantum Field Theory या Information Theory से जोड़कर देखा जा सकता है, जहाँ ब्रह्मांड के हर सूक्ष्म कण और उसकी गति की सूचना (Information) 'फील्ड' में मौजूद होती है। यह मंत्र उस 'कॉस्मिक डेटाबेस' की ओर संकेत करता है जिसमें हर गति अंकित है।
निष्कर्ष
यह मंत्र वरुण देव को "महा-नेविगेटर" के रूप में प्रतिष्ठित करता है। यह स्पष्ट करता है कि चाहे आकाश की अनंत ऊँचाई हो या समुद्र की अथाह गहराई, कुछ भी उस परम चेतना के नियमों से बाहर नहीं है। यह मनुष्य को प्रकृति के रहस्यों को समझने और उन पर चलने की प्रेरणा देता है।
देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः छन्द: निचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
वेद॑ मा॒सो धृ॒तव्र॑तो॒ द्वाद॑श प्र॒जाव॑तः।
वेदा॒ य उ॑प॒जाय॑ते॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
veda māso dhṛtavrato dvādaśa prajāvataḥ | vedā ya upajāyate ||
पद पाठ
वेद॑। मा॒सः। धृ॒तऽव्र॑तः। द्वाद॑श। प्र॒जाऽव॑तः। वेद॑। यः। उ॒प॒ऽजाय॑ते॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:25» मन्त्र:8 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:17» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:8
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह क्या जानता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदार्थान्वयभाषाः -(यः) जो (धृतव्रतः) सत्य नियम, विद्या और बल को धारण करनेवाला विद्वान् मनुष्य (प्रजावतः) जिनमें नाना प्रकार के संसारी पदार्थ उत्पन्न होते हैं (द्वादश) बारह (मासः) महीनों और जो कि (उपजायते) उनमें अधिक मास अर्थात् तेरहवाँ महीना उत्पन्न होता है, उस को (वेद) जानता है, वह काल के सब अवयवों को जानकर उपकार करनेवाला होता है॥८॥
भावार्थभाषाः -जैसे परमेश्वर सर्वज्ञ होने से सब लोक वा काल की व्यवस्था को जानता है, वैसे मनुष्यों को सब लोक तथा काल के महिमा की व्यवस्था को जानकर इस को एक क्षण भी व्यर्थ नहीं खोना चाहिये॥८॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सब समयों में
पदार्थान्वयभाषाः -१. (धृतव्रतः) - सब व्रतों का धारण करनेवाला यह वरुण (द्वादश) - बारह (प्रजावतः) - उत्तम - उत्तम पदार्थों की उत्पत्तिवाले (मासः) - महीनों को (वेद) - जानता है और २. वह तेरहवाँ मास (यः) - जो 'अंहस्पति' नामवाला (उपजायते) - गौणरूप से प्रति तृतीय व चतुर्थ वर्ष में इन बारह के समीप उत्पन्न हो जाता है उस मलमास को भी वह वरुण (वेद) - जानता है । ३. गत मन्त्र में उस प्रभु के स्थान से अनवच्छन्न होने का प्रतिपादन था । प्रस्तुत मन्त्र में उस प्रभु की समय से भी अनविच्छिन्नता का प्रतिपादन हुआ है । कोई भी मास प्रभु के ज्ञान से बाहर नहीं है । हम किसी भी स्थान पर किसी भी समय पर कुछ करेंगे तो वे प्रभु जानेंगे ही । प्रभु के ज्ञान से कोई भी वस्तु बाहर नहीं है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - वे प्रभु काल से भी अनवच्छिन्न हैं ।
ऋग्वेद का यह मंत्र काल-गणना (Chronology) और खगोल विज्ञान (Astronomy) की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें वरुण देव को समय के चक्र और ऋतुओं के ज्ञाता के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
मूल मंत्र
वेद॑ मा॒सो धृ॒तव्र॑तो॒ द्वाद॑श प्र॒जाव॑तः।
वेदा॒ य उ॑प॒जाय॑ते॥ ऋग्वेद १.२५.८
(नोट: आपके प्रश्न में १.३५.८ लिखा है, परंतु यह मंत्र ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के २५वें सूक्त की ८वीं ऋचा है।)
शब्द-दर-शब्द व्याख्या (Shabd-by-Shabd Analysis)
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | English Meaning
वेद| जानता है / ज्ञान रखता है | Knows / Has knowledge |
मासः | महीनों को | The months |
धृत-व्रतः | नियमों को धारण करने वाला | One who upholds the laws |
द्वादश | बारह (१२) | Twelve (12) |
प्रजावतः | प्रजा (उत्पत्ति/प्राणियों) से युक्त | Endowed with offspring/creatures |
वेदा| (वह) जानता है | Knows (He) |
यः| जो (अतिरिक्त) | That which (additional)
उप-जायते | उत्पन्न होता है | Is born / arises |
व्याख्या और भावार्थ हिंदी:
नियमों का पालन करने वाले वरुण देव उन बारह महीनों को जानते हैं जो प्रजा (विभिन्न ऋतुओं और जीवों) को उत्पन्न करने वाले हैं; और वे उस महीने को भी जानते हैं जो 'उप-उत्पन्न' (अधिकमास) होता है।
English:
The upholder of cosmic laws (Varuna) knows the twelve months which yield offspring (seasons/beings), and he also knows the additional month that is born subsequently (the intercalary month).
वैज्ञानिक एवं खगोलीय व्याख्या (Scientific & Astronomical Perspective) यह मंत्र वैदिक ऋषियों के उन्नत खगोलीय ज्ञान का प्रमाण है:
सौर और चंद्र वर्ष का समन्वय (Luni-Solar Calendar): विज्ञान जानता है कि एक चंद्र वर्ष (Lunar Year) लगभग 354 दिनों का होता है, जबकि सौर वर्ष (Solar Year) लगभग 365 दिनों का। इस 11 दिनों के अंतर को पाटने के लिए हर तीसरे वर्ष एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है। मंत्र में 'य उपजायते' (जो उत्पन्न होता है) इसी 'अधिकमास' (Leap Month) की ओर स्पष्ट संकेत करता है।
जैविक और पारिस्थितिक चक्र (Ecological Cycle): 'प्रजावतः' शब्द यह दर्शाता है कि महीने केवल समय की इकाइयाँ नहीं हैं, बल्कि वे जैव-विविधता से जुड़े हैं। हर महीना विशिष्ट वनस्पतियों, कीटों और जलवायु परिवर्तनों को जन्म देता है। यह Phenology (ऋतु-जैविकी) का प्राचीनतम उल्लेख है।
धृतव्रत - एन्ट्रोपी और व्यवस्था (Entropy vs Order): वरुण को 'धृतव्रत' कहना यह सिद्ध करता है कि समय का चक्र यादृच्छिक (Random) नहीं है, बल्कि एक निश्चित भौतिक नियम (Law of Physics) से बंधा है। ब्रह्मांडीय नियमों की अडिगता ही समय को मापने योग्य बनाती है।
निष्कर्ष—भविष्य
यह मंत्र सिद्ध करता है कि वेदों में न केवल आध्यात्मिक दर्शन है, बल्कि सूक्ष्म गणितीय और खगोलीय प्रेक्षण भी हैं। यह वरुण देव को ब्रह्मांड के "टाइम-कीपर" (Time-keeper) के रूप में स्थापित करता है, जो काल के हर सूक्ष्म अंश और विसंगति (अधिकमास) से भली-भांति परिचित हैं।
देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः छन्द: निचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
वेद॒ वात॑स्य वर्त॒निमु॒रोर्ऋ॒ष्वस्य॑ बृह॒तः।
वेदा॒ ये अ॒ध्यास॑ते॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
veda vātasya vartanim uror ṛṣvasya bṛhataḥ | vedā ye adhyāsate ||
पद पाठ
वेद॑। वात॑स्य। व॒र्त॒निम्। उ॒रोः। ऋ॒ष्वस्य॑। बृ॒ह॒तः। वेद॑। ये। अ॒धि॒ऽआस॑ते॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:25» मन्त्र:9 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:17» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:9
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह क्या-क्या जानता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदार्थान्वयभाषाः -जो मनुष्य (ऋष्वस्य) सब जगह जाने-आने (उरोः) अत्यन्त गुणवान् (बृहतः) बड़े अत्यन्त बलयुक्त (वातस्य) वायु के (वर्त्तनिम्) मार्ग को (वेद) जानता है (ये) और जो पदार्थ इस में (अध्यासते) इस वायु के आधार से स्थित हैं, उनके भी (वर्त्तनिम्) मार्ग को (वेद) जाने, वह भूगोल वा खगोल के गुणों का जाननेवाला होता है॥९॥
भावार्थभाषाः -जो मनुष्य अग्नि आदि पदार्थों में परिमाण वा गुणों से बड़ा सब मूर्त्तिवाले पदार्थों का धारण करनेवाला वायु है, उसका कारण अर्थात् उत्पत्ति और जाने-आने के मार्ग और जो उसमें स्थूल वा सूक्ष्म पदार्थ ठहरे हैं, उनको भी यथार्थता से जान इनसे अनेक कार्य सिद्ध कर करा के सब प्रयोजनों को सिद्ध कर लेता है, वह विद्वानों में गणनीय विद्वान् होता है॥९॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
अलंघनीय
पदार्थान्वयभाषाः -१. वह वरुण (उरोः) - अत्यन्त विस्तीर्ण (ऋष्वस्य) - महान् (बृहतः) - सब वृद्धियों के कारणभूत व गुणों के दृष्टिकोण से उत्कृष्ट (वातस्य) - वायु के (वर्तनिम्) - मार्ग को भी (वेद) - जानता है । वायु अपनी तीव्र - से - तीव्र गति से चलता हुआ उस प्रभु से दूर नहीं भाग सकता । २. (ये) - जो (अधि आसते) - वेगादि गुणों के कारण वायु से भी अधिष्ठित हैं , अर्थात् वायु को भी अतिक्रान्त कर गये हैं , उन्हें भी वे प्रभु (वेद) - जानते हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - तीव्र-से-तीव्र गति से - वायुवेग से अथवा वायु से भी अधिक वेग से जाते हुए पदार्थ प्रभु को लाँघ नहीं सकते ।
ऋग्वेद के इस मंत्र में वरुण देव की व्याप्ति को वायुमंडल और उन दिव्य शक्तियों तक विस्तारित किया गया है जो ब्रह्मांड के उच्च लोकों में स्थित हैं। यहाँ वरुण देव को 'ब्रह्मांडीय वायुगतिकी' के ज्ञाता के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
मूल मंत्र
वेद॒ वात॑स्य वर्त॒निमु॒रोर्ऋ॒ष्वस्य॑ बृह॒तः।
वेदा॒ ये अ॒ध्यास॑ते॥ ऋग्वेद १.२५.९
शब्द-दर-शब्द व्याख्या (Shabd-by-Shabd Analysis)
संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | English Meaning
वेद | जानता है | Knows |
वातस्य | वायु के | Of the wind |वर्तनिम्| मार्ग को / गति को | The path / course
उरोः | विस्तृत / विशाल | Wide / Extensive |
ऋष्वस्य | शक्तिशाली / महान | Mighty / Noble |
बृहतः | बहुत बड़े / उच्च | Great / Vast |
वेदा | जानता है (पुनः बल देने के लिए) | Knows (indeed) |
ये | जो (देवगण/शक्तियाँ) | Those who (Divine entities) |
अध्यासते | ऊपर स्थित हैं / निवास करते हैं | Dwell above / Sit on high |
व्याख्या और भावार्थ हिंदी:
वह वरुण देव, उस विशाल, शक्तिशाली और अत्यंत विस्तृत वायु के मार्ग (प्रवाह) को जानते हैं; और वे उन (दिव्य शक्तियों या देवों) को भी जानते हैं जो उच्च लोकों (ऊपर के स्थानों) में निवास करते हैं।
English:
He (Varuna) knows the path of the vast, mighty, and wide-spreading wind; and He knows those (divine beings) who dwell in the heights above.
वैज्ञानिक एवं दार्शनिक व्याख्या (Scientific & Philosophical Perspective) इस मंत्र में 'वायु' और 'उच्च स्थान' के संदर्भ में गहरे वैज्ञानिक संकेत मिलते हैं:
वायुमंडलीय गतिकी (Atmospheric Dynamics): विज्ञान के अनुसार, वायु का कोई एक स्थिर मार्ग नहीं होता, लेकिन यह उच्च और निम्न दबाव (High and Low Pressure) के क्षेत्रों, कोरिओलिस बल (Coriolis Force) और वैश्विक पवन प्रणालियों (जैसे Jet Streams) द्वारा संचालित होती है। 'वातस्य वर्तनिम्' (वायु का मार्ग) शब्द यह दर्शाता है कि जिसे हम अदृश्य और अनिश्चित मानते हैं, वह भी वरुण (प्राकृतिक नियमों) के गणितीय नियंत्रण में है।
ऊर्ध्व वायुमंडल और अंतरिक्ष (Upper Atmosphere & Exosphere): 'उरोः ऋष्वस्य बृहतः' विशेषण वायुमंडल की उन परतों की ओर संकेत करते हैं जो अत्यंत विशाल और विरल हैं। आधुनिक विज्ञान में इसे **Fluid Dynamics** के अंतर्गत पढ़ा जाता है, जहाँ हवा की विशाल धाराओं (Vast Currents) का सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है।
अध्यासते (The Higher Dwellers): दार्शनिक रूप से, यह उन सूक्ष्म ऊर्जाओं या 'कॉस्मिक रेडिएशन' की ओर संकेत हो सकता है जो पृथ्वी के वायुमंडल के ऊपरी हिस्सों में सक्रिय रहती हैं। वैज्ञानिक रूप से, यह सौर पवन (Solar Winds) और आयनमंडल (Ionosphere) में होने वाली गतिविधियों जैसा है, जिन्हें एक 'परम नियामक' (Universal Intelligence) संचालित करता है।
निष्कर्ष—भविष्य
यह मंत्र वरुण देव के अधिकार क्षेत्र को पृथ्वी की सतह से ऊपर उठाकर अनंत अंतरिक्ष और वायुमंडल तक ले जाता है। यह संदेश देता है कि ब्रह्मांड की सबसे चंचल शक्ति 'वायु' भी स्वच्छंद नहीं है, बल्कि एक निश्चित नियम (ऋत) के अधीन प्रवाहित होती है।
देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः छन्द: प्रतिष्ठागायत्री स्वर: षड्जः
नि ष॑साद धृ॒तव्र॑तो॒ वरु॑णः प॒स्त्या३॒॑स्वा।
साम्रा॑ज्याय सु॒क्रतुः॑॥ ऋग्वेद १.२५.१०
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
ni ṣasāda dhṛtavrato varuṇaḥ pastyāsv ā | sāmrājyāya sukratuḥ ||
पद पाठ
नि। स॒सा॒द॒। धृ॒तऽव्र॑तः। वरु॑णः। प॒स्त्या॑सु। आ। साम्ऽरा॑ज्याय। सु॒ऽक्रतुः॑॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:25» मन्त्र:10 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:17» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:10
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
जो मनुष्य इस वायु को ठीक-ठीक जानता है, वह किसको प्राप्त होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।
पदार्थान्वयभाषाः -जैसे जो (धृतव्रतः) सत्य नियम पालने (सुक्रतुः) अच्छे-अच्छे कर्म वा उत्तम बुद्धियुक्त (वरुणः) अति श्रेष्ठ सभा सेना का स्वामी (पस्त्यासु) अत्युत्तम घर आदि पदार्थों से युक्त प्रजाओं में (साम्राज्याय) चक्रवर्त्ती राज्य को करने की योग्यता से युक्त मनुष्य (आनिषसाद) अच्छे प्रकार स्थित होता है, वैसे ही हम लोगों को भी होना चाहिये॥१०॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे परमेश्वर सब प्राणियों का उत्तम राजा है, वैसे जो ईश्वर की आज्ञा में वर्त्तमान धार्मिक शरीर और बुद्धि बलयुक्त मनुष्य हैं, वे ही उत्तम राज्य करने योग्य होते हैं॥१०॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु का साम्राज्य
पदार्थान्वयभाषाः -१. वह (सुक्रतुः) - शोभनकर्मा , शोभनप्रज्ञावाले (वरुणः) - सब अव्यवस्थाओं का निवारण करनेवाले प्रभु (धृतव्रतः) - सब व्रतों के धारण करनेवाले होकर (पस्त्यासु) - सब प्रजाओं में (साम्राज्याय) - साम्राज्य के लिए (निषसाद) - निषण्ण हैं । प्रभु हृदयस्थरूपेण सबका नियमन कर रहे हैं । [ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ।[गीता १८६१] हृदयस्थ होकर शरीररूप यन्त्रारूढ़ सब प्राणियों को अपनी माया से प्रभु घुमा रहे हैं । प्रभु के नियमों का कोई उल्लंघन नहीं कर पाता । यदि कोई असत्य बोलता है तो वरुण के पाशों से बँधता ही है , उन पाशों से वह बच नहीं सकता ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - अन्तर्यामिरूपेण प्रभु सबका नियमन कर रहे हैं । प्रभु की मर्यादाओं का कोई उल्लंघन नहीं कर सकता ।
ऋग्वेद के इस मंत्र में वरुण देव को एक सार्वभौमिक शासक और व्यवस्थापक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। यह मंत्र उनकी स्थिरता और न्यायपूर्ण शासन का वर्णन करता है।
मूल मंत्र
नि ष॑साद धृ॒तव्र॑तो॒ वरु॑णः प॒स्त्या३॒॑स्वा।
साम्रा॑ज्याय सु॒क्रतुः॑॥ — ऋग्वेद १.२५.१०
शब्द-दर-शब्द व्याख्या (Shabd-by-Shabd Analysis)
संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | English Meaning
नि षसाद | विराजमान हैं / स्थित हैं | Sits down / Is established |
धृ॒तव्र॑तः | नियमों को धारण करने वाले | Upholder of sacred laws |
वरुणः | वरुण देव | Lord Varuna |
पस्त्यासु| प्रजाओं के बीच / लोकों में | Among the people / In the dwellings |
आ | सम्यक रूप से | Thoroughly / Fully |
साम्राज्याय | पूर्ण स्वराज्य या साम्राज्य के लिए | For universal sovereignty |
सु-क्रतुः | उत्तम बुद्धि या संकल्प वाले | Highly wise / Of noble will |
व्याख्या और भावार्थ हिंदी:
नियमों के पालनकर्ता (धृतव्रत) और श्रेष्ठ बुद्धि वाले (सुकृतु) वरुण देव, समस्त प्रजाओं और लोकों के बीच अपने पूर्ण साम्राज्य (सार्वभौमिक शासन) के संचालन के लिए स्थिर होकर विराजमान हैं।
English:
Varuna, the sustainer of cosmic laws and possessed of excellent wisdom, has sat down among his subjects to exercise universal sovereignty over all realms.
वैज्ञानिक एवं वैधानिक व्याख्या (Scientific & Jurisprudential Perspective) यह मंत्र ब्रह्मांड की 'शासकीय व्यवस्था' और 'स्थिरता' के सिद्धांतों को व्यक्त करता है:
स्थिरता का सिद्धांत (Principle of Stability): 'नि षसाद' (विराजमान होना) यह संकेत देता है कि ब्रह्मांडीय नियम (Laws of Nature) चंचल या अस्थायी नहीं हैं। वे 'स्थिर' हैं। भौतिकी में इसे Constants of Nature (जैसे गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक G या प्रकाश की गति c) कहा जा सकता है, जो पूरे ब्रह्मांड के "साम्राज्य" में एक समान रूप से लागू होते हैं।
सार्वभौमिक व्यवस्था (Universal Governance): 'साम्राज्याय' शब्द यहाँ किसी भौगोलिक राज्य के लिए नहीं, बल्कि Cosmic Order (ऋत) के लिए है। यह दर्शाता है कि अणु से लेकर आकाशगंगा तक, सब कुछ एक ही 'केंद्रीय कानून' (Universal Governance) द्वारा संचालित है।
इंटेलिजेंट डिज़ाइन (Intelligent Will): 'सुक्रतुः' का अर्थ है "श्रेष्ठ संकल्प वाला"। वैज्ञानिक दृष्टि से यह Information-driven Universe की ओर इशारा करता है, जहाँ प्राकृतिक नियम केवल अंध-प्रक्रियाएँ नहीं हैं, बल्कि उनमें एक तर्कसंगत व्यवस्था (Rational Logic) निहित है।
उपस्थिति का सिद्धांत (Presence in Elements): 'पस्त्यासु' (प्रजाओं/स्थानों के बीच) यह स्पष्ट करता है कि वरुण (नियम) कहीं दूर नहीं हैं, बल्कि वे हर तत्व और हर जीव के भीतर 'स्थित' होकर कार्य कर रहे हैं।
निष्कर्ष
यह मंत्र हमें यह विश्वास दिलाता है कि संसार में अराजकता (Chaos) नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित शासन (Cosmic Order) है। वरुण देव का 'विराजमान होना' हमें अनुशासन और नैतिकता के साथ जीने की प्रेरणा देता है, क्योंकि हम एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा हैं जो न्यायपूर्ण और बुद्धिमत्तापूर्ण है।
देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः छन्द: विराड्गायत्री स्वर: षड्जः
अतो॒ विश्वा॒न्यद्भु॑ता चिकि॒त्वाँ अ॒भि प॑श्यति।
कृ॒तानि॒ या च॒ कर्त्वा॑॥ ऋग्वेद १.२५.११
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
ato viśvāny adbhutā cikitvām̐ abhi paśyati | kṛtāni yā ca kartvā ||
पद पाठ
अतः॑। विश्वा॑नि। अद्भु॑ता। चि॒कि॒त्वान्। अ॒भि। प॒श्य॒ति॒। कृ॒तानि॑। या। च॒। कर्त्वा॑॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:25» मन्त्र:11 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:18» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:11
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर अगले मन्त्र में उक्त अर्थ का ही प्रकाश किया है॥
पदार्थान्वयभाषाः -जिस कारण जो (चिकित्वान्) सबको चेतानेवाला धार्मिक सकल विद्याओं को जानने न्याय करनेवाला मनुष्य (या) जो (विश्वानि) सब (कृतानि) अपने किये हुए (च) और (कर्त्त्वा) जो आगे करने योग्य कर्मों और (अद्भुतानि) आश्चर्य्यरूप वस्तुओं को (अभिपश्यति) सब प्रकार से देखता है (अतः) इसी कारण वह न्यायाधीश होने को समर्थ होता है॥११॥
भावार्थभाषाः -जिस प्रकार ईश्वर सब जगह व्याप्त और सर्वशक्तिमान् होने से सृष्टि रचनादि रूपी कर्म और जीवों के तीनों कालों के कर्मों को जानकर इनको उन-उन कर्मों के अनुसार फल देने को योग्य है, इसी प्रकार जो विद्वान् मनुष्य पहिले हो गये उनके कर्मों और आगे अनुष्ठान करने योग्य कर्मों के करने में युक्त होता है, वही सबको देखता हुआ सब के उपकार करनेवाले उत्तम से उत्तम कर्मों को कर सब का न्याय करने को योग्य होता है॥११॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
विभूतियाँ
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र में कहा था कि इस ब्रह्माण्ड को वह वरुण ही शासित कर रहे हैं । वे ही सम्राट् हैं । संसार के सब पदार्थों का निर्माण करनेवाले भी वे ही हैं । (चिकित्वान्) - ज्ञानी पुरुष (विश्वानि) - सब (कृतानि) - उत्पन्न हुए - हुए (या च कर्त्वा) - और जो आगे उत्पन्न होनेवाले हैं उन (अद्भुता) - अद्भुत पदार्थों को (अतः) - उस परमात्मा से ही होता हुआ (अभिपश्यति) - सर्वतः देखता है । २. सूर्य , चन्द्र , तारों में प्रभु के नेत्र का ही अंश चमक रहा है - 'तेजस्तेजस्विनामहम्' सब तेजस्वियों का तेज प्रभु ही हैं - 'यद्यद् विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमर्जितमेव वा । तत्तदेवावाच्छ त्वं मम तेजोंशसम्भवः ॥' [गीता १०४२] सब विभूति व श्रीवाले पदार्थ उस प्रभु के तेजोंश से ही तो हुए हैं । ३. प्रभु की इन विभूतियों में प्रभु की महिमा को देखता हुआ 'शुनः शेप' प्रभु के प्रति नतमस्तक होता है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - सूर्य , चन्द्र , तारे आदि सब अद्भुत पदार्थ उस वरुण की ही विभूतियाँ हैं ।
ऋग्वेद के इस मंत्र में वरुण देव की 'त्रिकालदर्शिता' और उनकी सर्वज्ञता का वर्णन है। यह मंत्र स्पष्ट करता है कि ईश्वरीय चेतना के लिए भूतकाल और भविष्यकाल दोनों वर्तमान की तरह प्रत्यक्ष हैं।
मूल मंत्र
अतो॒ विश्वा॒न्यद्भु॑ता चिकि॒त्वाँ अ॒भि प॑श्यति।
कृ॒तानि॒ या च॒ कर्त्वा॑॥ — ऋग्वेद १.२५.११
शब्द-दर-शब्द व्याख्या (Shabd-by-Shabd Analysis)
संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | English Meaning
अतः| इसके बाद / इस कारण | From this / Hence |
विश्वानि | समस्त / सभी | All / Universal |
अद्भुता | आश्चर्यजनक कार्यों / रहस्यों को | Wonders / Mysterious things |
चिकित्वान् | ज्ञानवान् / चेतन स्वरूप | The conscious / Wise one |
अभि पश्यति| सब ओर से देखता है | Beholds / Sees clearly |
कृतानि | जो किए जा चुके हैं (भूतकाल) | What has been done (Past) |
या च | और जो | And those which |
कर्त्वा | किए जाने वाले हैं (भविष्यकाल) | To be done (Future) |
व्याख्या और भावार्थ हिंदी:
वे ज्ञानस्वरूप वरुण देव, अपने सर्वज्ञ ज्ञान से उन सभी आश्चर्यजनक कार्यों को प्रत्यक्ष देखते हैं जो पहले किए जा चुके हैं (भूतकाल) और जो भविष्य में किए जाने वाले हैं (भविष्यकाल)। उनके लिए ब्रह्मांड का कोई भी रहस्य छिपा हुआ नहीं है।
English:
The all-wise Varuna, by virtue of His divine consciousness, beholds all wondrous things—both those that have already been accomplished in the past and those that are yet to be performed in the future.
वैज्ञानिक एवं दार्शनिक व्याख्या (Scientific & Philosophical Perspective) यह मंत्र समय (Time) और सूचना (Information) के गहरे सिद्धांतों को स्पर्श करता है:
समय का सातत्य (Space-Time Continuum): आधुनिक भौतिकी में Block Universe Theory के अनुसार, भूत, वर्तमान और भविष्य सभी एक साथ अस्तित्व में हैं। 'अभि पश्यति' (सब ओर से देखना) यह संकेत देता है कि एक उच्च चेतना (Higher Dimension) से देखने पर समय की धारा एक साथ दिखाई दे सकती है, ठीक वैसे ही जैसे हम एक ऊँचे स्थान से पूरी सड़क को एक साथ देख सकते हैं।
कार्य-कारण संबंध (Causality): 'कृतानि' और 'कर्त्वा' का संबंध 'Cause and Effect' से है। विज्ञान मानता है कि यदि हमें वर्तमान की सभी स्थितियों (Initial Conditions) का पूर्ण ज्ञान हो, तो हम भविष्य की घटनाओं का पूर्वानुमान लगा सकते हैं। वरुण को 'चिकित्वान्' (चेतन ज्ञानी) कहकर इसी 'परम डेटा' की उपस्थिति बताई गई है।
क्वांटम सूचना (Quantum Information): वैज्ञानिक सिद्धांत कहते हैं कि ब्रह्मांड में सूचना कभी नष्ट नहीं होती। जो 'हो चुका' है, वह ब्रह्मांडीय मेमोरी में सुरक्षित है। यह मंत्र वरुण देव को उस **Cosmic Observer** के रूप में प्रस्तुत करता है जिसके सामने ब्रह्मांड का पूरा इतिहास और भविष्य एक खुली किताब की तरह है।
निष्कर्ष
यह मंत्र हमें कर्म के प्रति सचेत करता है। यह बताता है कि हमारा हर छोटा-बड़ा कार्य, चाहे वह हो चुका हो या होने वाला हो, उस 'परम निरीक्षक' (Universal Observer) की दृष्टि में है। यह वैज्ञानिक नियतिवाद (Determinism) और ईश्वरीय न्याय का एक अद्भुत संगम है।
देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
स नो॑ वि॒श्वाहा॑ सु॒क्रतु॑रादि॒त्यः सु॒पथा॑ करत्।
प्र ण॒ आयूं॑षि तारिषत्॥ ऋग्वेद १.२५.१२
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
sa no viśvāhā sukratur ādityaḥ supathā karat | pra ṇa āyūṁṣi tāriṣat ||
पद पाठ
सः। नः॒। वि॒श्वाहा॑। सु॒ऽक्रतुः॑। आ॒दि॒त्यः। सु॒ऽपथा॑। क॒र॒त्। प्र। नः॒। आयूं॑षि। ता॒रि॒ष॒त्॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:25» मन्त्र:12 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:18» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:12
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर भी अगले मन्त्र में उसी अर्थ का प्रकाश किया है॥
पदार्थान्वयभाषाः -जैसे (आदित्यः) अविनाशी परमेश्वर, प्राण वा सूर्य्य (विश्वाहा) सब दिन (नः) हम लोगों को (सुपथा) अच्छे मार्ग में चलाने और (नः) हमारी (आयूंषि) उमर (प्रतारिषत्) सुख के साथ परिपूर्ण (करत्) करते हैं, वैसे ही (सुक्रतुः) श्रेष्ठ कर्म और उत्तम-उत्तम जिससे ज्ञान हो, वह (आदित्यः) विद्या धर्म प्रकाशित न्यायकारी मनुष्य (विश्वाहा) सब दिनो में (नः) हम लोगों को (सुपथा) अच्छे मार्ग में (करत्) करे। और (नः) हम लोगों की (आयूंषि) उमरों को (प्रतारिषत्) सुख से परिपूर्ण करे॥१२॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। जो मनुष्य ब्रह्मचर्य्य और जितेन्द्रियता आदि से आयु बढ़ाकर धर्ममार्ग में विचरते हैं, उन्हीं को जगदीश्वर अनुगृहीत कर आनन्दयुक्त करता है। जैसे प्राण और सूर्य्य अपने बल और तेज से ऊँचे-नीचे स्थानों को प्रकाशित कर प्राणियों को सुख के मार्ग से युक्त करके उचित समय पर दिन-रात आदि सब कालविभागों को अच्छे प्रकार सिद्ध करते हैं, वैसे ही अपने आत्मा, शरीर और सेना के बल से न्यायाधीश मनुष्य धर्मयुक्त छोटे मध्यम और बड़े कर्मों के प्रचार से अधर्मयुक्त को छुड़ा उत्तम और नीच मनुष्यों का विभाग सदा किया करे॥१२॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सुमार्गयुक्त जीवन
पदार्थान्वयभाषाः -१. (सः) - वह सारे ब्रह्माण्ड का निर्माता (सुक्रतुः) - उत्तम कर्मों व प्रज्ञानोंवाला (आदित्यः) - जीव को खण्डन से बचानेवाला वरुण (नः) - हमें (विश्वाहा) - सदा (सुपथा) - उत्तम मार्ग से युक्त (करत्) - करे , अर्थात् वरुण की प्रेरणा व दण्डादि व्यवस्था से हम कुमार्ग से बचकर सदा सुमार्ग पर चलनेवाले बनें । २. इस प्रकार सुमार्ग पर चलते हुए (नः) - हमारी (आयूंषि) - आयुओं को वे (प्रतारिषत्) - खुब दीर्घ करनेवाले हों । उत्तम आचरण व दीर्घजीवन का सम्बन्ध है ही 'आचारल्लभते ह्यायुः सदाचार से दीर्घ जीवन प्राप्त होता है' , ऐसा मनु कहते हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - वरुण की प्रेरणा व व्यवस्था से हम सुपथ से चलते हुए दीर्घजीवी हों ।
ऋग्वेद के इस मंत्र में ऋषि वरुण देव (अदिति पुत्र) से मार्गदर्शन और दीर्घायु की प्रार्थना कर रहे हैं। यह मंत्र जीवन की सार्थकता और सही दिशा प्राप्त करने का एक आध्यात्मिक संकल्प है।
मूल मंत्र
स नो॑ वि॒श्वाहा॑ सु॒क्रतु॑रादि॒त्यः सु॒पथा॑ करत्।
प्र ण॒ आयूं॑षि तारिषत्॥ — ऋग्वेद १.२५.१२
शब्द-दर-शब्द व्याख्या (Shabd-by-Shabd Analysis)
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | English Meaning
सः | वह (वरुण देव) | He (Lord Varuna) |
नः | हमारे लिए / हमें | For us / Us |
विश्वाहा | सदैव / प्रतिदिन | Always / Every day
सु-क्रतुः | श्रेष्ठ संकल्प/बुद्धि वाले | Of noble will / wise |
आदित्यः | अदिति के पुत्र (वरुण) | The son of Aditi (Varuna) |
सु-पथा | सन्मार्ग पर / श्रेष्ठ मार्ग पर | On the righteous path |
करत् | प्रेरित करें / चलाएँ | Lead / May lead |
प्र तारिषत्| बढ़ाएँ / विस्तार करें | Extend / Prolong |
आयूंषि | हमारी आयु को | Our lifespans
व्याख्या और भावार्थ हिंदी:
वे श्रेष्ठ बुद्धि और संकल्प वाले आदित्य (वरुण देव) हमें सदैव सन्मार्ग (सत्य के पथ) पर प्रेरित करें और हमारी आयु को बढ़ाएँ। अर्थात्, वे हमें केवल दीर्घायु ही न दें, बल्कि वह जीवन सही दिशा और उद्देश्य की ओर अग्रसर हो।
English:
May that wise and noble-willed Aditya (Varuna) lead us every day on the righteous path, and may He prolong our lives for the performance of good deeds.
वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक व्याख्या (Scientific & Psychological Perspective) इस मंत्र में 'सन्मार्ग' और 'दीर्घायु' के बीच का संबंध आधुनिक विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में अत्यंत गहरा है:
न्यूरो-मैनेजमेंट और सही निर्णय (Decision Making): 'सुक्रतुः' (श्रेष्ठ संकल्प) और 'सुपथा' (सही मार्ग) का सीधा संबंध मस्तिष्क के 'एग्जीक्यूटिव फंक्शन' से है। जब कोई व्यक्ति मानसिक रूप से स्पष्ट और संकल्पवान होता है, तो उसके शरीर में तनाव (Stress) का स्तर कम होता है। सही मार्ग पर चलने से मिलने वाली मानसिक शांति 'कोर्टिसोल' को कम कर 'डोपामाइन' और 'सेरोटोनिन' जैसे सुखद रसायनों को बढ़ाती है।
एपिजेनेटिक्स और दीर्घायु (Longevity & Epigenetics): 'आयूंषि तारिषत्' (आयु का विस्तार) केवल एक आशीर्वाद नहीं है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार, एक अनुशासित और तनावमुक्त जीवन (Righteous Path) हमारे Telomeres (क्रोमोसोम के सिरे) की रक्षा करता है, जिससे कोशिकाएं लंबे समय तक स्वस्थ रहती हैं और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है।
सद्गति का सिद्धांत (Path of Least Resistance): 'सुपथा' वह मार्ग है जो प्रकृति के नियमों के अनुकूल है। जैसे नदी अपने ढाल की दिशा में बहती है, वैसे ही जब मनुष्य प्राकृतिक और नैतिक नियमों (Laws of Nature) के साथ तालमेल बिठाकर चलता है, तो उसके जीवन की ऊर्जा का अपव्यय नहीं होता, जिससे जीवन की गुणवत्ता और अवधि स्वतः बढ़ जाती है।
निष्कर्ष
यह मंत्र केवल भौतिक आयु की वृद्धि की माँग नहीं करता, बल्कि "गुणवत्तापूर्ण दीर्घायु" (Quality Longevity) की बात करता है। यह सिखाता है कि जीवन की लंबाई तभी सार्थक है जब वह श्रेष्ठ बुद्धि और सही मार्ग (Righteous Direction) के साथ जुड़ी हो। यह एक पूर्ण 'होलिस्टिक वेलनेस' (Holistic Wellness) का सूत्र है।
देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
बिभ्र॑द्द्रा॒पिं हि॑र॒ण्ययं॒ वरु॑णो वस्त नि॒र्णिज॑म्।
परि॒ स्पशो॒ निषे॑दिरे॥ ऋग्वेद १.२५.१३
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
bibhrad drāpiṁ hiraṇyayaṁ varuṇo vasta nirṇijam | pari spaśo ni ṣedire ||
पद पाठ
बिभ्र॑त्। द्रा॒पिम्। हि॒र॒ण्यय॑म्। वरु॑णः। व॒स्त॒। निः॒ऽनिज॑म्। परि॑। स्पशः॑। नि। से॒दि॒रे॒॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:25» मन्त्र:13 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:18» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:13
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह किस प्रकार का है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदार्थान्वयभाषाः -जैसे इस वायु वा सूर्य्य के तेज में (स्पशः) स्पर्शवान् अर्थात् स्थूल-सूक्ष्म सब पदार्थ (निषेदिरे) स्थिर होते हैं और वे दोनों (वरुणः) वायु और सूर्य्य (निर्णिजम्) शुद्ध (हिरण्ययम्) अग्न्यादिरूप पदार्थों को (बिभ्रत्) धारण करते हुए (द्रापिम्) बल तेज और निद्रा को (परिवस्त) सब प्रकार से प्राप्त कर जीवों के ज्ञान को ढाँप देते हैं, वैसे (निर्णिजम्) शुद्ध (हिरण्ययम्) ज्योतिर्मय प्रकाशयुक्त को (बिभ्रत्) धारण करता हुआ (द्रापिम्) निद्रादि के हेतु रात्रि को (परिवस्त) निवारण कर अपने तेज से सबको ढाँप लेता हैं॥१३॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जैसे वायु बल का करने हारा होने से सब अग्नि आदि स्थूल और सूक्ष्म पदार्थों को धरके आकाश में गमन और आगमन करता हुआ चलता और जैसे सूर्य्यलोक भी स्वयं प्रकाशरूप होने से रात्रि को निवारण कर अपने प्रकाश से सबको प्रकाशता है, वैसे विद्वान् लोग भी विद्या और उत्तम शिक्षा के बल से सब मनुष्यों को धारण कर धर्म में चल सब अन्य मनुष्यों को चलाया करें॥१३॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सुपथ
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र में सुपथ से चलने का संकेत था , प्रस्तुत मन्त्र में उस सुपथ का संकेत करते हैं - (वरुणः) - वरुण का उपासक , द्वेष का निवारण करनेवाला पुरुष [यहाँ 'वरुण' शब्द वरुण के उपासक के लिए है । वरुण का उपासक भी 'वरुण' है] (हिरण्ययम्)- ज्योतिर्मय (द्रापिम्) - कवच को (बिभ्रद्) - धारण करता हुआ होता है । 'ज्ञान' ही वह ज्योतिर्मय कवच है । 'ब्रह्म वर्म ममान्तरम्' इस वेदवाक्य में ज्ञान को आन्तर कवच कहा है । यह वासनाओं के आक्रमण से मनुष्य की रक्षा करता है, एवं ज्ञान - प्राप्ति सुपथ की पहली सीढ़ी है ।
२. (वरुणः)- द्वेष का निवारण करनेवाला व्यक्ति (निर्णिजम्) - अति शुद्ध हृदय को (वस्ते) - धारण करता है । द्वेष ही तो मन की मैल है । इसे दूर करके यह शुद्ध मन को धारण करता है । यह 'मनःशुद्धि' सुपथ की दूसरी सीढ़ी है ।
३. (स्पशः) [हिरण्यस्पर्शिनो रश्मयः - सा०] ज्ञान - ज्योति का स्पर्श करनेवाली ज्ञानेन्द्रियों की रश्मियाँ (परिनिषेदिरे) - इसके चारों ओर निषण्ण होती हैं, अर्थात् यह इन्द्रियों को शुद्ध बनाकर उन्हें ज्ञान - प्राप्ति में लगाता है, एवं 'ज्ञानन्द्रियों का ज्ञान - प्राप्ति में लगे रहना' सुपथ की तीसरी सीढ़ी है । संक्षेप में 'बुद्धि, मन व इन्द्रियों' का शोधन, इन्हें असुरों का निवासस्थान न बनने देना ही 'सुपथ' है । इस सुपथ का आक्रमण करके ही हम दीर्घजीवी होंगे ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - ज्ञान हमारा दीप्तिमय कवच हो, ज्ञान द्वारा हम मन को निर्मल करें और ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान - प्राप्ति के कार्य में व्यापृत रहें ।
ऋग्वेद के इस मंत्र में वरुण देव के तेजस्व स्वरूप और उनके व्यापक गुप्तचर तंत्र (Universal Surveillance) का अत्यंत काव्यात्मक और प्रतीकात्मक वर्णन किया गया है। यहाँ वरुण को एक सम्राट के रूप में चित्रित किया गया है जो आभूषणों और प्रकाश से सुसज्जित हैं।
मूल मंत्र
बिभ्र॑द्द्रा॒पिं हि॑र॒ण्ययं॒ वरु॑णो वस्त नि॒र्णिज॑म्।
परि॒ स्पशो॒ निषे॑दिरे॥— ऋग्वेद १.२५.१३
शब्द-दर-शब्द व्याख्या (Shabd-by-Shabd Analysis)
संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | English Meaning |
बिभ्रत् | धारण करते हुए | Wearing / Bearing |
द्रापिम् | कवच या अंगरखा (सुनहरा चोगा) | Armor / Mantle |
हिरण्ययम् | स्वर्णमयी / तेजोमयी | Golden / Radiant |
वरुणः | वरुण देव | Lord Varuna |
वस्त | पहनते हैं / ढके हुए हैं | Clothes himself / Puts on |
निर्णिजम् | कान्ति को / उज्ज्वल रूप को | Shining form / Robe of light |
परि | चारों ओर | All around |
स्पशः| गुप्तचर / दृष्टा / रश्मियाँ | Spies / Observers / Messengers |
निषेदिरे | बैठे हुए हैं / स्थित हैं | Are seated / Established |
व्याख्या और भावार्थ हिंदी:
तेजस्वी वरुण देव स्वर्ण के समान चमकते हुए कवच (द्रापि) को धारण करते हैं और अपने ऊपर उज्ज्वल कान्ति (प्रकाश) का आच्छादन करते हैं। उनके चारों ओर उनके 'स्पश' (गुप्तचर या रश्मियाँ) निरंतर अपने स्थानों पर बैठे हुए (सतर्क) रहते हैं।
English:
Lord Varuna, wearing a golden mantle and robed in radiant light, is seated in his glory. Around him, his ever-watchful spies (observers) are stationed to monitor the cosmic order.
वैज्ञानिक एवं तकनीकी व्याख्या (Scientific & Technical Perspective) इस मंत्र के प्रतीकों में गहरे भौतिक और सूचनात्मक सत्य छिपे हैं:
विद्युत-चुंबकीय विकिरण (Electromagnetic Radiation): 'हिरण्ययम् द्रापिम्' (स्वर्णमयी कवच) सूर्य और अन्य नक्षत्रों से निकलने वाले प्रकाश के आभामंडल (Corona/Radiation) का प्रतीक हो सकता है। जैसे स्वर्ण विद्युत का उत्तम चालक है, वैसे ही वरुण (आकाश/ब्रह्मांड) प्रकाश और ऊर्जा की परतों से ढका हुआ है।
स्पशः - सूचना तंत्र (Universal Sensors/Information Field): 'स्पश' का शाब्दिक अर्थ गुप्तचर है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, ये ब्रह्मांड के वे 'सेंसर्स' हैं जो हर घटना को रिकॉर्ड करते हैं। आधुनिक भौतिकी में इसे Background Radiation या Neutrinos के रूप में देखा जा सकता है, जो ब्रह्मांड के हर हिस्से में मौजूद हैं और हर क्रिया की "सूचना" (Data) लिए हुए हैं।
प्रकाश की प्रकृति (Nature of Light): 'निर्णिजम्' (प्रकाश के वस्त्र) उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ दृश्यमान जगत प्रकाश के परावर्तन (Reflection) के कारण ही अस्तित्व में आता है। वरुण (Space) स्वयं को प्रकाश के माध्यम से व्यक्त करता है।
क्वांटम प्रेक्षण (Quantum Observation): 'परि निषेदिरे' का अर्थ है कि वे चारों ओर स्थित हैं। यह Quantum Entanglement या इस विचार की ओर संकेत करता है कि ब्रह्मांड का कोई भी हिस्सा "अनदेखा" नहीं है; हर कण दूसरे के साथ 'निरीक्षण' की स्थिति में जुड़ा हुआ है।
निष्कर्ष
यह मंत्र वरुण देव को एक ऐसे "परम निरीक्षक" (Ultimate Observer) के रूप में दिखाता है जो न केवल स्वयं प्रकाशवान है, बल्कि जिसका सूचना तंत्र (Spies/Sensors) इतना व्यापक है कि ब्रह्मांड की कोई भी क्रिया उनसे छिपी नहीं रह सकती। यह नैतिकता (कि कोई हमें देख रहा है) और विज्ञान (कि हर क्रिया का डेटा मौजूद है) का एक अद्भुत मेल है।
देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः छन्द: निचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
न यं दिप्स॑न्ति दि॒प्सवो॒ न द्रुह्वा॑णो॒ जना॑नाम्।
न दे॒वम॒भिमा॑तयः॥ ऋग्वेद १.२५.१४
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
na yaṁ dipsanti dipsavo na druhvāṇo janānām | na devam abhimātayaḥ ||
पद पाठ
न। यम्। दिप्स॑न्ति। दि॒प्सवः। न। द्रुह्वा॑णः। जना॑नाम्। न। दे॒वम्। अ॒भिऽमा॑तयः॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:25» मन्त्र:14 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:18» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:14
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह वरुण किस प्रकार का है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदार्थान्वयभाषाः -हे मनुष्यो ! तुम सब लोग (जनानाम्) विद्वान् धार्मिक वा मनुष्य आदि प्राणियों से (दिप्सवः) झूठे अभिमान और झूठे व्यवहार को चाहनेवाले शत्रुजन (यम्) जिस (देवम्) दिव्य गुणवाले परमेश्वर वा विद्वान् को (न) (दिप्सन्ति) विरोध से न चाहें (द्रुह्वाणः) द्रोह करनेवाले जिस को द्रोह से (न) चाहें तथा जिसके साथ (अभिमातयः) अभिमानी पुरुष (न) अभिमान से न वर्त्तें, उन उपासना करने योग्य परमेश्वर वा विद्वानों को जानो॥१४॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जो हिंसक परद्रोही अभिमानयुक्त जन हैं, वे अज्ञानपन से परमेश्वर वा विद्वानों के गुणों को जान कर उनसे उपकार लेने को समर्थ नहीं हो सकते। इसलिये सब मनुष्यों को योग्य है कि उनके गुण, कर्म और स्वभाव का सदैव ग्रहण करें॥१४॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वरुण कौन बना : दम्भ , द्रोह , दर्प का विनाश
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र के अनुसार सुपथ पर चलनेवाले लोग जीवन को श्रेष्ठ बना पाते हैं । श्रेष्ठ को ही 'वरुण' कहते हैं । यह 'वरुण' वह है जिसे (दिप्सवः) - दम्भ की इच्छावाले लोग (न , दिप्सन्ति) - दम्भ का शिकार बनाने की कामना नहीं करते , अर्थात् इसके सम्पर्क में आकर धोखा करनेवालों की धोखा करने की वृत्ति नष्ट हो जाती है । वे भी इसके जीवन से सरलता की शिक्षा लेते हैं ।
२. (जनानाम्) - लोगों से (द्रुह्वाणः) - द्रोह करनेवाले भी इसके सम्पर्क में आकर द्रोह से ऊपर उठ जाते हैं । यह किसी के प्रति मन में द्रोह की भावना नहीं रखता, परिणामतः 'अहिंसा प्रतिष्ठायां तत्संनिधौ वैरत्यागः'- इसमें अहिंसा की प्रतिष्ठा होने के कारण इसके समीप आकर लोग भी वैर को त्याग देते हैं ।
३. (देवम्) - इस दिव्य वृत्तिवाले को (अभिमातयः)- अभिमान आदि शत्रुभूत वृत्तियाँ भी (न) - पीड़ित नहीं कर पातीं, अर्थात् यह श्रेष्ठ जीवनवाला बनकर भी सब प्रकार के दर्प से ऊपर होता है और यही तो दिव्यता की शोभा है कि उसमें अभिमान का लेश भी नहीं होता ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम 'दम्भ, द्रोह व दर्प' से उठकर वरुण बनने का प्रयत्न करें ।
ऋग्वेद के इस मंत्र में वरुण देव की अजेयता और उनकी दिव्य सत्ता की सर्वोच्चता का वर्णन है। यह मंत्र स्पष्ट करता है कि जो सत्ता सत्य और नियमों (ऋत) पर आधारित है, उसे संसार की कोई भी नकारात्मक शक्ति पराजित या विचलित नहीं कर सकती।
मूल मंत्र
न यं दिप्स॑न्ति दि॒प्सवो॒ न द्रुह्वा॑णो॒ जना॑नाम्।
न दे॒वम॒भिमा॑तयः॥— ऋग्वेद १.२५.१४
शब्द-दर-शब्द व्याख्या (Shabd-by-Shabd Analysis)
संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | English Meaning |
न| नहीं | Not |
यम् | जिनको (वरुण देव को) | Whom (Lord Varuna) |
दिप्सन्ति | दमन कर सकते / धोखा दे सकते | Can harm / Can deceive |
दिप्सवः | दमन करने वाले / शत्रु | Deceivers / Harm-seekers |
द्रुह्वाणः | द्रोह करने वाले / हिंसक | Malevolent / Malicious ones |
जनानाम् | मनुष्यों के बीच के | Among the people |
देवम् | दिव्य देव को | The Divine Being |
अभिमातयः | पापी / अभिमानी / द्वेषी शक्तियाँ | Enemies / Sinful entities |
व्याख्या और भावार्थ हिंदी:
उन वरुण देव को न तो धोखा देने की इच्छा रखने वाले (शत्रु) हानि पहुँचा सकते हैं, न मनुष्यों से द्रोह करने वाले हिंसक जीव उन्हें प्रभावित कर सकते हैं, और न ही अभिमानी या द्वेषी शक्तियाँ उन दिव्य देव को नीचा दिखा सकती हैं। वे समस्त बाधाओं से परे और सर्वथा अजेय हैं।
English:
Neither can the deceivers harm Him, nor can the malicious among men affect Him. No envious or sinful power can overcome that Divine Being (Varuna). He remains untouched and invincible.
वैज्ञानिक एवं दार्शनिक व्याख्या (Scientific & Philosophical Perspective) इस मंत्र को आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांतों और 'सिस्टम स्टेबिलिटी' के संदर्भ में इस प्रकार समझा जा सकता है:
प्राकृतिक नियमों की अपरिवर्तनीयता (Inviolability of Natural Laws): वरुण देव 'ऋत' (Cosmic Order) के रक्षक हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से, ब्रह्मांड के मूलभूत नियम (जैसे गुरुत्वाकर्षण या ऊष्मागतिकी के नियम) किसी मानवीय इच्छा या 'द्रोह' से बदले नहीं जा सकते। चाहे कोई कितना भी 'अभिमानी' क्यों न हो, वह भौतिकी के नियमों (Laws of Physics) को धोखा नहीं दे सकता।
एन्ट्रोपी और स्थिरता (Entropy vs. Universal Stability): ब्रह्मांड में 'द्रुह्वाणः' (विनाशकारी शक्तियाँ) या एन्ट्रोपी हमेशा व्यवस्था को बिगाड़ने की कोशिश करती हैं। लेकिन यह मंत्र संकेत देता है कि जो 'परम व्यवस्था' (Universal Intelligence) है, वह इतनी सुदृढ़ है कि ये नकारात्मक बल उसे स्थायी रूप से नष्ट नहीं कर सकते।
सूचना की शुद्धता (Information Integrity): 'दिप्सवः' (धोखा देने वाले) का अर्थ है डेटा में हेरफेर करने वाली शक्तियाँ। वरुण देव 'सर्वज्ञ' हैं, जिसका वैज्ञानिक अर्थ है कि सार्वभौमिक सूचना तंत्र (Universal Information Field) में कोई 'करप्शन' या 'धोखा' संभव नहीं है। सत्य (Data Integrity) हमेशा बना रहता है।
निष्कर्ष
यह मंत्र हमें सुरक्षा का बोध कराता है। यह संदेश देता है कि यदि हम सत्य और ब्रह्मांडीय नियमों (वरुण के व्रत) के साथ जुड़े हैं, तो संसार की कोई भी नकारात्मकता हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। यह अज्ञान और अहंकार के विरुद्ध "सत्य की अजेयता" का जयघोष है।
देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः छन्द: पादनिचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
उ॒त यो मानु॑षे॒ष्वा यश॑श्च॒क्रे असा॒म्या।
अ॒स्माक॑मु॒दरे॒ष्वा॥ ऋग्वेद १.२५.१५
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
uta yo mānuṣeṣv ā yaśaś cakre asāmy ā | asmākam udareṣv ā ||
पद पाठ
उ॒त। यः। मानु॑षेषु। आ। यशः॑। च॒क्रे। असा॑मि। आ। अ॒स्माक॑म्। उ॒दरे॑षु। आ॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:25» मन्त्र:15 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:18» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:15
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह वरुण किस प्रकार का है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदार्थान्वयभाषाः -(यः) जो हमारे (उदरेषु) अर्थात् भीतर (उत) और बाहर भी (असामि) पूर्ण (यशः) प्रशंसा के योग्य कर्म को (आचक्रे) सब प्रकार से करता है, जो (मानुषेषु) जीवों और जड़ पदार्थों में सर्वथा कीर्त्ति को किया करता है, सो वरुण अर्थात् परमात्मा वा विद्वान् सब मनुष्यों को उपासनीय और सेवनीय क्यों न होवें॥१५॥
भावार्थभाषाः -जिस सृष्टि करनेवाले अन्तर्यामी जगदीश्वर ने परोपकार वा जीवों को उनके कर्म के अनुसार भोग कराने के लिये सम्पूर्ण जगत् कल्प-कल्प में रचा है, जिसकी सृष्टि में पदार्थों के बाहर-भीतर चलनेवाला वायु सब कर्मों का हेतु है और विद्वान् लोग विद्या का प्रकाश और अविद्या का हनन करनेवाले प्रयत्न कर रहे हैं, इसलिये इस परमेश्वर के धन्यवाद के योग्य कर्म सब मनुष्यों को जानना चाहिये॥१५॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
यशस्वी होता
पदार्थान्वयभाषाः -१. वरुण का उपासक वरुण का स्तवन करते हुए कहता है कि (उत) - और वरुण वे हैं (यः) - जोकि (मानुषेषु) - मनुष्यों में (यशः) - हमारे यश को (असामि) - पूर्ण (आचक्रे) - करते हैं । गत मन्त्र के अनुसार वरुण की उपासना करते हुए हम वरुण - जैसे ही बनते हैं और 'दम्भ , द्रोह व दर्प' से ऊपर उठते हैं , ऐसा बनने पर हमारा जीवन यशस्वी बनता है । यह सब वरुण की कृपा से ही होता है ।
२. वे वरुण (अस्माकम्) - हम सबके (उदरेषु) - अन्दर (आ) - सर्वत्र विद्यमान हैं । उस वरुण के दर्शन के लिए हमें कहीं इधर - उधर थोड़े ही जाना है । वे तो अन्दर ही विद्यमान हैं । ये प्रभु ही वस्तुतः हमें पूर्ण यशस्वी बनाते हैं । इस वरुण को अन्दर अनुभव करने पर ही हम दम्भादि आसुर वृत्तियों से हिंसित नहीं होते । 'पुराण' की भाषा में ये अन्तस्थ वरुण 'दम्भासुर , द्रोहासुर व दर्पासुर' का ध्वंस कर देते हैं और परिणामतः हम 'देव' बन जाते हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - 'दम्भ, द्रोह व दर्प' से ऊपर उठकर हम देव बनें ।
ऋग्वेद के इस मंत्र में ऋषि वरुण देव की उस महिमा का वर्णन कर रहे हैं, जो न केवल बाहरी जगत (अंतरिक्ष और प्रकृति) में व्याप्त है, बल्कि मनुष्य के शरीर और उसके आंतरिक पोषण तंत्र में भी सक्रिय है।
मूल मंत्र
उ॒त यो मानु॑षे॒ष्वा यश॑श्च॒क्रे असा॒म्या।
अ॒स्माक॑मु॒दरे॒ष्वा॥ — ऋग्वेद १.२५.१५
शब्द-दर-शब्द व्याख्या (Shabd-by-Shabd Analysis)
संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | English Meaning |
उत | और भी / इसके अतिरिक्त | And / Also |
यः | जो (वरुण देव) | Who (Lord Varuna) |
मानुषेषु | मनुष्यों में / मानव जाति के भीतर | Among men / Within humans |
आ | सम्यक रूप से / पूर्णतः | Completely / Fully |
यशः | अन्न, तेज, या कीर्ति | Food, Energy, or Glory |
चक्रे| स्थापित किया है / बनाया है | Has established / Created |
असाम्या | पूर्ण रूप से / अद्वितीय (अ-साम्य) | Unmatched / Peerless |
अस्माकम् | हमारे | Our |
उदरेषु | उदरों (पेट) में | In the bellies / stomachs |
व्याख्या और भावार्थ हिंदी:
उन वरुण देव ने, जो ब्रह्मांड के स्वामी हैं, मनुष्यों के भीतर भी अपनी महिमा स्थापित की है। उन्होंने हमारे उदरों (पेट) में 'अन्न' और 'पाचन शक्ति' के रूप में वह अद्वितीय सामर्थ्य प्रदान किया है, जिससे हमारा जीवन सुरक्षित और पुष्ट रहता है।
English:
The same Lord Varuna, who rules the cosmos, has established unmatched glory within human beings. He has placed within our bellies the essential energy (food and digestive power) that sustains our existence.
वैज्ञानिक एवं जैविक व्याख्या (Scientific & Biological Perspective) यह मंत्र अध्यात्म को बायोलॉजी (जीव विज्ञान) से जोड़ता है:
मेटाबॉलिज्म और पाचन अग्नि (Metabolism & Digestive Fire): 'उदरेषु यशः' का वैज्ञानिक अर्थ जठराग्नि या पाचन प्रक्रिया है। हमारे पेट में मौजूद हाइड्रोक्लोरिक एसिड (HCl) और एंजाइम्स जटिल भोजन को ऊर्जा (ATP) में बदलते हैं। वरुण (जो जल और रसों के स्वामी हैं) यहाँ उस 'तरल रासायनिक व्यवस्था' का प्रतीक हैं जो जीवन को ऊर्जा प्रदान करती है।
पोषण का संतुलन (Homeostasis): 'असाम्या' (अद्वितीय/पूर्ण) शब्द शरीर के उस जटिल संतुलन को दर्शाता है जिसमें भोजन से रस, रक्त, मांस आदि का निर्माण होता है। यह एक ऐसी "इंजीनियरिंग" है जिसे कृत्रिम रूप से बनाना आज भी असंभव है।
सूक्ष्म जैविकी (Microbiome): हमारे उदर (Gut) में करोड़ों सूक्ष्म जीव (Bacteria) होते हैं जो हमारे स्वास्थ्य और मस्तिष्क को नियंत्रित करते हैं। आधुनिक विज्ञान इसे Gut-Brain Axis कहता है। ऋग्वेद का यह मंत्र संकेत देता है कि हमारी आंतरिक शारीरिक व्यवस्था भी उसी वैश्विक नियम (Cosmic Law) का हिस्सा है जिससे तारे और ग्रह चलते हैं।
निष्कर्ष
यह मंत्र ऋषि की सूक्ष्म दृष्टि को दर्शाता है कि ईश्वर केवल मंदिरों या बादलों में नहीं है, बल्कि वह हमारे भीतर 'पाचन' और 'पोषण' के रूप में साक्षात् कार्य कर रहा है। यह शरीर को एक "यज्ञशाला" मानने की प्रेरणा देता है, जहाँ भोजन का पचना भी एक दैवीय प्रक्रिया है।
देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
परा॑ मे यन्ति धी॒तयो॒ गावो॒ न गव्यू॑ती॒रनु॑। इ॒च्छन्ती॑रुरु॒चक्ष॑सम्॥ ऋग्वेद १.२५.१६
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
parā me yanti dhītayo gāvo na gavyūtīr anu | icchantīr urucakṣasam ||
पद पाठ
पराः॑। मे॒। य॒न्ति॒। धी॒तयः। गावः॑। न। गव्यू॑तीः। अनु॑। इ॒च्छन्तीः॑। उ॒रु॒ऽचक्ष॑सम्॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:25» मन्त्र:16 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:19» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:16
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदार्थान्वयभाषाः -जैसे (गव्यूतीः) अपने स्थानों को (इच्छन्तीः) जाने की इच्छा करती हुई (गावः) गो आदि पशु जाति के (न) समान (मे) मेरी (धीतयः) कर्म की वृत्तियाँ (उरुचक्षसम्) बहुत विज्ञानवाले मुझ को (परायन्ति) अच्छे प्रकार प्राप्त होती हैं, वैसे सब कर्त्ताओं को अपने-अपने किये हुए कर्म प्राप्त होते ही हैं, ऐसा जानना योग्य है॥१६॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को ऐसा निश्चय करना चाहिये कि जैसे गौ आदि पशु अपने-अपने वेग के अनुसार दौड़ते हुए चाहे हुए स्थान को पहुँच कर थक जाते हैं, वैसे ही मनुष्य अपनी-अपनी बुद्धि बल के अनुसार परमेश्वर वायु और सूर्य्य आदि पदार्थों के गुणों को जानकर थक जाते हैं। किसी मनुष्य की बुद्धि वा शरीर का वेग ऐसा नहीं हो सकता कि जिस का अन्त न हो सके, जैसे पक्षी अपने-अपने बल के अनुसार आकाश को जाते हुए आकाश का पार कोई भी नहीं पाता, इसी प्रकार कोई मनुष्य विद्या विषय के अन्त को प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकता है॥१६॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वरुण की ही कामना
पदार्थान्वयभाषाः -१. (उरुचक्षसम्) - अनन्त व विस्तीर्ण ज्ञानवाले उस वरुण को (इच्छन्ति) - चाहती हुई (मे) - मेरी (धीतयः) - चित्तवृत्तियाँ (परा यन्ति) - विषयों से पराङ्मुख होकर हृदयदेश की ओर जाती हैं । मेरी वृत्तियाँ हृदयदेश की ओर उसी प्रकार जाती हैं (न) - जैसेकि (गावः) - गौएँ (गव्यूतीः ,अनु) - चरागाहों को लक्ष्य करके जाती हैं । २. भूख लगी होने पर गौओं को चरागाह के अतिरिक्त कुछ सूझता नहीं । वे इधर - उधर ध्यान न करती हुई चरागाह की ओर ही बढ़ती हैं , इसी प्रकार मेरी चित्तवृत्तियाँ भी उस प्रभु की ओर ही बढ़ती हैं । उस प्रभु के सिवाय मेरी यह वृत्ति अन्यत्र नहीं जाती , उस प्रभु पर पहुँचकर ही विश्रान्त होती है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम विषयों से पृथक् होकर अपनी वृत्ति को 'वरुण' में ही लगाएँ । उसी का वरण करें और 'वरुण' ही बन जाएँ ।
यह मंत्र वरुण देव के दर्शन की तीव्र अभिलाषा और भक्त की वैचारिक एकाग्रता को दर्शाता है।
मूल मंत्र
परा मे यन्ति धीतयो गावो न गव्यूतीरनु। इच्छन्तीरुरुचक्षसम्॥— ऋग्वेद १.२५.१६
शब्द-दर-शब्द व्याख्या
परा: दूर तक / निरंतर
मे: मेरी
यन्ति: जाती हैं / गति करती हैं
धीतयः बुद्धियाँ / विचार / भावनाएँ
गावः गौएं (गायें)
न: समान / की तरह
गव्यूतीः गोचर भूमि / चरागाह
अनु: की ओर / पीछे-पीछे
इच्छन्तीः इच्छा करती हुई / खोजती हुई
उरुचक्षसम्: सर्वदर्शी / विशाल दृष्टि वाले (वरुण देव)
-भावार्थ
हिंदी: जिस प्रकार गाएं चरागाहों की ओर स्वतः ही आकर्षित होकर दौड़ती हैं, उसी प्रकार मेरी बुद्धियाँ और विचार उस महान सर्वदर्शी वरुण देव की प्राप्ति की इच्छा से निरंतर उन्हीं की ओर गतिशील हो रहे हैं।
English: Just as cows naturally hasten towards their pastures, my thoughts and meditations speed forth towards the far-seeing Varuna, longing for His divine presence.
वैज्ञानिक व्याख्या
न्यूरल पाथवे (Neural Pathways): मंत्र में 'गव्यूतीरनु' (चरागाह के पीछे चलना) एक प्राकृतिक मार्ग का संकेत है। विज्ञान के अनुसार, जब हमारा मन किसी एक विचार का बार-बार अभ्यास करता है, तो मस्तिष्क में 'न्यूरल पाथवे' मजबूत हो जाते हैं। भक्त की बुद्धि का वरुण की ओर जाना 'कॉग्निटिव फोकस' (Cognitive Focus) का चरम स्तर है।
मैग्नेटिक रिसेप्शन (Magnetic Reception): जैसे पशु (गाएं) अपने चरागाह या घर का रास्ता पहचानने के लिए प्राकृतिक दिशा-बोध का उपयोग करते हैं, वैसे ही मानव चेतना के भीतर भी एक आध्यात्मिक 'जीपीएस' (GPS) होता है जो उसे शांति और सत्य के केंद्र (वरुण) की ओर खींचता है।
ऑब्जर्वर प्रभाव (Observer Effect): यहाँ 'उरुचक्षसम्' (सब कुछ देखने वाला) का अर्थ वह 'यूनिवर्सल ऑब्जर्वर' है। भौतिकी में 'ऑब्जर्वर' की उपस्थिति से कणों का व्यवहार बदल जाता है। इसी प्रकार, जब मनुष्य के विचार यह जानकर चलते हैं कि वे एक 'सर्वदर्शी सत्ता' की ओर जा रहे हैं, तो विचारों की गुणवत्ता में स्वतः ही सुधार और अनुशासन आ जाता है।
देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः छन्द: निचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
सं नु वो॑चावहै॒ पुन॒र्यतो॑ मे॒ मध्वाभृ॑तम्।
होते॑व॒ क्षद॑से प्रि॒यम्॥ ऋग्वेद १.२५.१७
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
saṁ nu vocāvahai punar yato me madhv ābhṛtam | hoteva kṣadase priyam ||
पद पाठ
सम्। नु। वो॒चा॒व॒है॒। पुनः॑। यतः॑। मे॒। मधु॑। आऽभृ॑तम्। होता॑ऽइव। क्षद॑से। प्रि॒यम्॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:25» मन्त्र:17 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:19» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:17
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
मनुष्यों को यथायोग्य विद्या किस प्रकार प्राप्त होनी चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदार्थान्वयभाषाः -(यतः) जिससे हम आचार्य और शिष्य दोनों (होतेव) जैसे यज्ञ करानेवाला विद्वान् (नु) परस्पर (क्षदसे) अविद्या और रोगजन्य दुःखान्धकार विनाश के लिये (आभृतम्) विद्वानों के उपदेश से जो धारण किया जाता है, उस यजमान के (प्रियम्) प्रियसम्पादन करने के समान (मधु) मधुर गुण विशिष्ट विज्ञान का (वोचावहै) उपदेश नित्य करें कि उससे (मे) हमारी और तुम्हारी (पुनः) बार-बार विद्यावृद्धि होवे॥१७॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे यज्ञ कराने और करनेवाले प्रीति के साथ मिलकर यज्ञ को सिद्ध कर पूरण करते हैं, वैसे ही गुरु शिष्य मिलकर सब विद्याओं का प्रकाश करें। सब मनुष्यों को इस बात की चाहना निरन्तर रखनी चाहिये कि जिससे हमारी विद्या की वृद्धि प्रतिदिन होती रहे॥१७॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वरुण से वार्तालाप
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र के अनुसार वरुण का ही वरण करनेवाला प्रभु से कहता है कि हे प्रभो! (नु) - अब, जबकि मैं दम्भादि से ऊपर उठा हूँ [१४] । आपकी कृपा से यशस्वी जीवनवाला बना हूँ [१५] और मेरा ध्यान आपमें ही लगा है [१६] , (सं वोचावहै) - आप और मैं मिलकर बातचीत करनेवाले हों ।
२. एक समय वह था ही जबकि ब्रह्मलोक में रहते हुए मैं आपसे उसी प्रकार बात करता था जैसे कि पुत्र पिता से । दुर्भाग्यवश मैं आपसे दूर भटक गया । 'देवलोक व देवयोनिलोक' में से होता हुआ यहाँ 'मर्त्यलोक' में आ गया । मेरी वृत्तियाँ यहाँ विषय - प्रवण हो गई और मैं आपको भूल गया ।
३. विषयों के चंगुल से निकलकर , दम्भादि का ध्वंस करके आज मैं (पुनः) - फिर आपके समीप आया हूँ , जिससे हम फिर परस्पर बात करनेवाले हो सकें । (यतः) -क्योंकि (मे मधु आभृतम्) - अब मुझमें माधुर्य ही माधुर्य भर गया है , कड़वाहट से मैं ऊपर उठ गया हूं । न मैं किसी को धोखा देता है [मुझमें दम्भ नहीं] , न किसी से द्रोह करता हूँ , न ही दर्प को अपने में आने देता हूँ । माधुर्य से पूर्ण होकर आपसे बात कर सकने की योग्यता का मैंने सम्पादन किया है ।
४. मुझे पूर्ण विश्वास है कि (होता इव) - सब कुछ देनेवाले की भाँति आप ही यह उत्कृष्ट वृत्ति भी मुझे प्राप्त कराते हैं और (प्रियम्) - आपका प्रिय बना हुआ जो मैं हूँ , उसकी आप (क्षदसे) - [to protect , to cover] अपनी गोद में छिपाकर रक्षा करते हो । अब मुझपर दम्भादि का आक्रमण सम्भव ही नहीं रहता ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम अपने जीवन में माधुर्य भरकर प्रभु से बात करने के अधिकारी बनें और उस प्रभु की रक्षा के पात्र हों ।
यह मंत्र वरुण देव के साथ एक अत्यंत निकट और प्रेमपूर्ण संवाद (Dialogue) की अवस्था को दर्शाता है। यहाँ ऋषि और ईश्वर के बीच का संबंध एक औपचारिक प्रार्थना से ऊपर उठकर एक मधुर मिलन में बदल जाता है।
मूल मंत्र
सं नु वो॑चावहै॒ पुन॒र्यतो॑ मे॒ मध्वाभृ॑तम्।
होते॑व॒ क्षद॑से प्रि॒यम्॥ — ऋग्वेद १.२५.१७
शब्द-दर-शब्द व्याख्या
सम् नु वोचावहै: हम पुनः भली-भांति परस्पर संवाद करें
पुनः फिर से / दोबारा
यतः क्योंकि / जिससे
मे: मेरे द्वारा
मधु: मधुर हवि / सोम रस / मीठा पदार्थ
आभृतम्: लाया गया है / अर्पित किया गया है
होता-इव: होता (यज्ञ करने वाले पुरोहित) की तरह
क्षदसे: आप ग्रहण करते हैं / खाते हैं
प्रियम्: प्रिय (भोजन/सोम) को
-भावार्थ हिंदी: हे वरुण देव! आइए, हम पुनः आपस में प्रेमपूर्वक संवाद करें। मैं आपके लिए मधुर सोम (भक्ति का रस) लेकर आया हूँ। जैसे यज्ञ में 'होता' श्रद्धा से अर्पित किए गए प्रिय अन्न को ग्रहण करता है, वैसे ही आप मेरे द्वारा लाए गए इस प्रिय मधु का भोग लगाएँ।
English: Let us speak together again, O Varuna! For I have brought the sweet honey-offering for you. Like a priest (Hota), you partake of the beloved food that is offered with devotion.
वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक व्याख्या
रेजोनेंस और फ्रीक्वेंसी (Resonance & Frequency): 'सं वोचावहै' (संवाद करना) का वैज्ञानिक अर्थ है दो प्रणालियों का एक ही आवृत्ति (Frequency) पर आना। जब भक्त का मन और ब्रह्मांडीय ऊर्जा (वरुण) एक ही स्तर पर कंपन (Vibrate) करते हैं, तो उसे ही 'संवाद' या 'साक्षात्कार' कहा जाता है। यह Harmonic Resonance की स्थिति है।
न्यूरो-केमिस्ट्री और 'मधु' (Neuro-chemistry of Bliss): वैदिक 'मधु' या 'सोम' को आधुनिक तंत्रिका विज्ञान में मस्तिष्क के भीतर उत्पन्न होने वाले 'आनंद दायक रसायनों' (जैसे Endorphins और Dopamine) के रूप में देखा जा सकता है। गहरे ध्यान या प्रार्थना की स्थिति में जब मस्तिष्क 'अल्फा' या 'थेटा' तरंगों में होता है, तब जो मानसिक शांति (मधु) उत्पन्न होती है, वही ईश्वर को समर्पित 'प्रिय भोजन' है।
फीडबैक लूप (Feedback Loop): यह मंत्र एक 'इंटरेक्टिव सिस्टम' की बात करता है। यहाँ केवल एक तरफ से प्रार्थना नहीं है, बल्कि 'पुनः संवाद' की बात है। विज्ञान में इसे Bidirectional Communication कहते हैं, जहाँ इनपुट (प्रार्थना/हवि) के बाद आउटपुट (कृपा/संवाद) की अपेक्षा होती है, जिससे चेतना का विकास होता है।
ऊर्जा का विनिमय (Energy Exchange): यज्ञ (होता) और भोग (क्षदसे) की प्रक्रिया वास्तव में ऊर्जा के रूपांतरण (Transformation of Energy) का प्रतीक है। स्थूल पदार्थ (हवि) का सूक्ष्म विचार और शक्ति में बदलना ही सृष्टि का मूल चक्र है।
देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
दर्शं॒ नु वि॒श्वद॑र्शतं॒ दर्शं॒ रथ॒मधि॒ क्षमि॑।
ए॒ता जु॑षत मे॒ गिरः॑॥ ऋग्वेद १.२५.१८
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
darśaṁ nu viśvadarśataṁ darśaṁ ratham adhi kṣami | etā juṣata me giraḥ ||
पद पाठ
दर्श॑म्। नु। वि॒श्वऽद॑र्शतम्। दर्श॑म्। रथ॑म्। अधि॑। क्षमि॑। ए॒ताः। जु॒ष॒त॒। मे॒। गिरः॑॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:25» मन्त्र:18 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:19» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:18
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर भी वे क्या-क्या करें, इस विषय का प्रकाश अगले मन्त्र में किया है।
पदार्थान्वयभाषाः -हे मनुष्यो ! तुम (अधिक्षमि) जिन व्यवहारों में उत्तम और निकृष्ट बातों का सहना होता है, उनमें ठहर कर (विश्वदर्शतम्) जो कि विद्वानों की ज्ञानदृष्टि से देखने के योग्य परमेश्वर है उसको (दर्शम्) बारंबार देखने (रथम्) विमान आदि यानों को (नु) भी (दर्शम्) पुनः-पुनः देख के सिद्ध करने के लिये (मे) मेरी (गिरः) वाणियों को (जुषत) सदा सेवन करो॥१८॥
भावार्थभाषाः -जिससे क्षमा आदि गुणों से युक्त मनुष्यों को यह जानना योग्य है कि प्रश्न और उत्तर के व्यवहार के किये विना परमेश्वर को जानने और शिल्पविद्या सिद्ध विमानादि रथों को कभी बनाने को शक्य नहीं और जो उनमें गुण हैं, वे भी इससे इनके विज्ञान होने के लिये सदैव प्रयत्न करना चाहिये॥१८॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
विश्वदर्शत का दर्शन
पदार्थान्वयभाषाः -१. वरुण का भक्त कहता है कि (नु) - निश्चय से अब मैंने (विश्वदर्शतम्) - सबसे देखने योग्य उस वरुण को (दर्शम्) - देखा है ।
२. मैंने इस जीवन - यात्रा के रथम् वाहनभूत उस प्रभु को (अधिक्षमि) - इस पार्थिव शरीर में ही (दर्शम्) - देखा है । सब चित्तवृत्तियों को विषयों से निवृत्त करके ज्योंहि मैं अन्तर्मुख यात्रा करनेवाला बना त्यों ही (दर्शम्) - उस प्रभु को मैंने देखा है ।
३. इस प्रभु ने (मे) - मेरी (एताः) - इन (गिरः) - स्तुतिवाणियों को (जुषत) -प्रीतिपूर्वक ग्रहण किया है, अर्थात् मेरी ये वाणियाँ प्रभु को प्रीणित करनेवाली हुई हैं।
४. वे प्रभु विश्वदर्शत हैं , सबसे देखने योग्य हैं अथवा सम्पूर्ण विश्व में प्रभु की महिमा दिखती है । वे प्रभु ही विश्वरूप हैं । ५. प्रभु का दर्शन शरीर में , हृदय में होता है । हृदय वह स्थान है जहाँ कि आत्मा व परमात्मा दोनों स्थित हैं । उस प्रभु का दर्शन इस भक्त को स्तुति के लिए प्रेरित करता है । यह भक्त स्तुतिवाणियों का उच्चारण करता है । उस प्रभु का दर्शन इस भक्त को स्तुति के लिए प्रेरित करता है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - उस विश्वदर्शत प्रभु का मैं हृदय में दर्शन करूं और उसके लिए स्तुतिवाणियों का उच्चारण करता हुआ उसे आराधित करूँ ।
यह मंत्र वरुण देव के साक्षात् दर्शन और भक्त की पुकार को स्वीकार किए जाने का मार्मिक वर्णन है। इसमें ऋषि शुनःशेप वरुण देव की उपस्थिति को पृथ्वी के धरातल पर अनुभव कर रहे हैं।
मूल मंत्र
दर्शं॒ नु वि॒श्वद॑र्शतं॒ दर्शं॒ रथ॒मधि॒ क्षमि॑।
ए॒ता जु॑षत मे॒ गिरः॑॥— ऋग्वेद १.२५.१८
शब्द-दर-शब्द व्याख्या
दर्शम्: मैंने देख लिया है / साक्षात्कार कर लिया है
नु: निश्चय ही
विश्व-दर्शतम्: सबको दिखाई देने वाले / सर्वदर्शनीय को
रथम्: (वरुण के) रथ को
अधि क्षमि: पृथ्वी के ऊपर / भूमि पर
एताः: इन (प्रार्थनाओं) को
जुषत: सेवन करें / प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करें
मे: मेरी
गिरः: स्तुतियों को / वाणी को
भावार्थ हिंदी: मैंने उन सर्वदर्शनीय (सबके द्वारा देखे जाने योग्य) वरुण देव को देख लिया है; मैंने पृथ्वी के ऊपर उनके दिव्य रथ के दर्शन कर लिए हैं। हे देव! आप मेरी इन स्तुतियों और पुकार को प्रेमपूर्वक स्वीकार करें।
English: I have verily seen Him who is visible to all; I have beheld His chariot upon the earth. May He graciously accept these prayers and songs of mine.
वैज्ञानिक एवं वैचारिक व्याख्या
विजुअलाइजेशन और धारणा (Visualization & Perception): 'दर्शम्' शब्द केवल चर्म चक्षुओं से देखने का नहीं, बल्कि मानसिक स्पष्टता का प्रतीक है। जब ध्यान की अवस्था गहरी होती है, तो मस्तिष्क एक आंतरिक 'छवि' निर्मित करता है। विज्ञान में इसे Mental Imagery कहते हैं, जो न्यूरॉन्स को उसी तरह सक्रिय करती है जैसे वास्तविक दर्शन।
दिव्य रथ - ऊर्जा का वाहन (Energy Dynamics): 'रथ' यहाँ गति और शक्ति का प्रतीक है। वैज्ञानिक दृष्टि से, वरुण (जो अंतरिक्ष और नियमों के अधिपति हैं) का पृथ्वी (क्षमि) पर रथ देखने का अर्थ है—आकाशीय नियमों (Cosmic Laws) का भौतिक धरातल पर क्रियान्वित होना। जैसे गुरुत्वाकर्षण अदृश्य है, परंतु उसका 'रथ' (प्रभाव) पृथ्वी पर हर वस्तु की गति में दिखाई देता है।
ध्वनि तरंगें और स्वीकृति (Acoustic Resonance): 'गिरः' (वाणी/स्तुति) ध्वनि ऊर्जा है। मंत्र का यह भाग 'जुषत मे गिरः' उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ साधक की ध्वनि तरंगें ब्रह्मांडीय चेतना (Cosmic Consciousness) के साथ Impedance Matching (प्रतिबाधा मिलान) करती हैं, जिससे प्रार्थना का 'सिग्नल' प्रभावी रूप से ग्रहण किया जाता है।
सार्वभौमिक दृश्यता (Universal Visibility): 'विश्वदर्शतम्' का वैज्ञानिक अर्थ है कि प्रकृति के नियम किसी के लिए गुप्त नहीं हैं; वे सबके लिए समान रूप से दृश्य और उपलब्ध हैं, यदि देखने वाली दृष्टि (Informed Intellect) पास हो।
देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः छन्द: निचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
इ॒मं मे॑ वरुण श्रुधी॒ हव॑म॒द्या च॑ मृळय।
त्वाम॑व॒स्युरा च॑के॥ ऋग्वेद १.२५.१९
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
imam me varuṇa śrudhī havam adyā ca mṛḻaya | tvām avasyur ā cake ||
पद पाठ
इ॒मम्। मे॒। व॒रु॒ण॒। श्रुधि॑। हव॑म्। अ॒द्य। च॒। मृ॒ळ॒य॒। त्वाम्। अ॒व॒स्युः। आ। च॒के॒॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:25» मन्त्र:19 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:19» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:19
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदार्थान्वयभाषाः -हे (वरुण) सब से उत्तम विपश्चित् ! (अद्य) आज (अवस्युः) अपनी रक्षा वा विज्ञान को चाहता हुआ मैं (त्वाम्) आपकी (आ चके) अच्छी प्रकार प्रशंसा करता हूँ, आप (मे) मेरी की हुई (हवम्) ग्रहण करने योग्य स्तुति को (श्रुधि) श्रवण कीजिये तथा मुझको (मृळय) विद्यादान से सुख दीजिये॥१९॥
भावार्थभाषाः -जैसे परमात्मा जो उपासकों द्वारा निश्चय करके सत्य भाव और प्रेम के साथ की हुई स्तुतियों को अपने सर्वज्ञपन से यथावत् सुन कर उनके अनुकूल स्तुति करनेवालों को सुख देता है, वैसे विद्वान् लोग भी धार्मिक मनुष्यों की योग्य प्रशंसा को सुन सुखयुक्त किया करें॥१९॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
स्तुतिवाणियाँ
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र के अनुसार प्रभु का दर्शन करनेवाला निवेदन करता है कि हे (वरुण) - सब कष्टों व पापों का निवारण करनेवाले प्रभो! (मे) - मेरी (इमम् , हवम्) - इस पुकार को (श्रुधी) - सुनिए (च) - और (अद्या) - आज ही (मृळय) - मुझे सुखी कीजिए । जीव की सब कामनाएँ अन्ततोगत्वा इसीलिए हैं कि वह कष्टों को दूर करके कल्याण व शान्ति को प्राप्त कर सके । 'गृह , प्रजा , पशुधन' आदि की कामना कष्टनिवारण के लिए होती है ।
२. हे प्रभो! (अवस्युः) - अपने रक्षण की कामनावाला मैं (त्वाम्) - आपको (आ चके) - [कै शब्दे] स्तुत करता हूँ । मैं वासनाओं से अपनी रक्षा करने के लिए आपकी स्तुतिवाणियों का उच्चारण करता हूँ । जहाँ आपका स्तवन होता है वहाँ वासनाओं का प्रवेश नहीं होता , प्रवेश क्या , वासनाएँ वहाँ भस्मीभूत हो जाती हैं । इनकी भस्म पर ही कल्याण के भवन का निर्माण होता है । प्रभु वासनाविनाश द्वारा ही हमारा कल्याण करते हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - प्रभु हमारी पुकार को सुनकर वासनाविनाश द्वारा हमारा रक्षण करें ।
यह मंत्र वरुण देव से तत्काल सहायता और दया की पुकार है। इसमें भक्त अपनी असहाय अवस्था में ईश्वर को पूर्ण समर्पण के साथ पुकार रहा है।
मूल मंत्र
इ॒मं मे॑ वरुण श्रुधी॒ हव॑म॒द्या च॑ मृळय।
त्वाम॑व॒स्युरा च॑के॥— ऋग्वेद १.२५.१९
शब्द-दर-शब्द व्याख्या
इमम्: इस (पुकार को)
मे: मेरी
वरुण: हे वरुण देव!
श्रुधि: सुनिए
हवम्: आह्वान को / पुकार को
अद्य: आज / इसी समय
च: और
मृळय: सुखी कीजिए / दया कीजिए
त्वाम्: आपको
अवस्युः: रक्षा की इच्छा रखने वाला (मैं)
आ चके: पुकारता हूँ / आपकी कामना करता हूँ
भावार्थ हिंदी: हे वरुण देव! मेरी इस पुकार को सुनिए और आज (इसी समय) मुझ पर दया करके मुझे सुखी कीजिए। अपनी रक्षा की कामना करता हुआ मैं अनन्य भाव से केवल आपको ही पुकार रहा हूँ।
English: Hear this cry of mine, O Varuna! Be gracious to me this very day. Seeking your protection, I call upon you with all my heart.
वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक व्याख्या
तात्कालिकता का सिद्धांत (The Power of 'Now'): मंत्र में 'अद्य' (आज/अभी) शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। मनोविज्ञान में इसे Mindfulness और 'वर्तमान क्षण की शक्ति' कहा जाता है। जब संकट के समय मस्तिष्क पूरी तरह वर्तमान में केंद्रित होकर सहायता मांगता है, तो शरीर का Fight-or-Flight तंत्र (Sympathetic Nervous System) शांत होने लगता है और Parasympathetic तंत्र सक्रिय होता है, जिससे मानसिक स्पष्टता आती है।
अनुनाद और पुकार (Resonance of Intent): 'हवम्' (पुकार) केवल ध्वनि नहीं है, बल्कि एक 'इरादा' (Intention) है। भौतिकी के अनुसार, जब किसी तंत्र में 'संकट' आता है, तो उसे ठीक करने के लिए बाहर से एक 'इनपुट' या 'सिग्नल' की आवश्यकता होती है। यह मंत्र उस 'कॉस्मिक सिग्नल' को भेजने की प्रक्रिया है।
आत्म-समर्पण का विज्ञान (Psychology of Surrender): 'अवस्युः' (रक्षा की इच्छा) यह स्वीकारोक्ति है कि व्यक्ति अपनी सीमाओं को जानता है। जब अहंकार (Ego) हटता है और व्यक्ति स्वीकार करता है कि उसे सहायता की आवश्यकता है, तो मस्तिष्क के 'कोर्टेक्स' को शांति मिलती है, जिससे समाधान खोजने की क्षमता बढ़ जाती है।
वरुण और होमियोस्टैसिस (Universal Equilibrium): वरुण 'ऋत' (नियमों) के स्वामी हैं। रक्षा की मांग करने का वैज्ञानिक अर्थ है—अपने बिगड़े हुए मानसिक या शारीरिक संतुलन को पुनः Homeostasis (प्राकृतिक साम्यावस्था) में लाने के लिए ब्रह्मांडीय नियमों का आह्वान करना।
देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः छन्द: निचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
त्वं विश्व॑स्य मेधिर दि॒वश्च॒ ग्मश्च॑ राजसि।
स याम॑नि॒ प्रति॑ श्रुधि॥ ऋग्वेद १.२५.२०
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
tvaṁ viśvasya medhira divaś ca gmaś ca rājasi | sa yāmani prati śrudhi ||
पद पाठ
त्वम्। विश्व॑स्य। मे॒धि॒र॒। दि॒वः। च॒। ग्मः। च॒। रा॒ज॒सि॒। सः याम॑नि॒। प्रति॑। श्रु॒धि॒॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:25» मन्त्र:20 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:19» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:20
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह परमात्मा कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदार्थान्वयभाषाः -हे (मेधिर) अत्यन्त विज्ञानयुक्त वरुण विद्वन् ! (त्वम्) आप जैसे जो ईश्वर (दिवः) प्रकाशवान् सूर्य्य आदि (च) वा अन्य सब लोक (ग्मः) प्रकाशरहित पृथिवी आदि (विश्वस्य) सब लोकों के (यामनि) जिस-जिस काल में जीवों का आना-जाना होता है, उस-उसमें प्रकाश हो रहे हैं (सः) सो हमारी स्तुतियों को सुनकर आनन्द देते हैं, वैसे होकर इस राज्य के मध्य में (राजसि) प्रकाशित हूजिये और हमारी स्तुतियों को (प्रतिश्रुधि) सुनिये॥२०॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे परब्रह्म ने इस सब संसार के दो भेद किये हैं-एक प्रकाशवाला सूर्य्य आदि और दूसरा प्रकाशरहित पृथिवी आदि लोक। जो इनकी उत्पत्ति वा विनाश का निमित्तकारण काल है, उसमें सदा एक-सा रहनेवाला परमेश्वर सब प्राणियों के संकल्प से उत्पन्न हुई बातों का भी श्रवण करता है, इससे कभी अधर्म के अनुष्ठान की कल्पना भी मनुष्यों को नहीं करनी चाहिये, वैसे इस सृष्टिक्रम को जानकर मनुष्यों को ठीक-ठीक वर्त्तना चाहिये॥२०॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
मेधिर की उपासना
पदार्थान्वयभाषाः -१. हे (मेधिर) - मेधा के देनेवाले वरुण! (त्वम्) - आप ही (दिवः च) - इस द्युलोक और अन्तरिक्ष के (ग्मः च) - और इस पृथिवीलोक के तथा (विश्वस्य) - सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के (राजसि) - क्षेम व कल्याण करनेवाले हो । सारा ब्रह्माण्ड आपके ही शासन में चल रहा है ।
२. (सः) - वे आप (यामनि) - क्षेम व कल्याण के प्राप्त कराने में [या प्रापणे] (प्रतिश्रुधि) - हमारी प्रार्थना का 'हाँ' में उत्तर दीजिए , अर्थात् हमारी प्रार्थना को अवश्य स्वीकार कीजिए ।
३. प्रभु मेधिर हैं । मेधा देकर ही वे हमारा कल्याण करते हैं । इस मेधा से ही वे हमारे जीवन को दीप्त बनाते हैं । वस्तुतः प्रभु का रक्षण - प्रकार यही है कि वे बुद्धि दे देते हैं । इस बुद्धि से ठीक मार्ग पर चलते हुए हम अपनी मङ्गल की कामना को पूर्ण कर पाते हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - बुद्धि के अनुसार चलते हुए हम जीवन को मङ्गलमय बनाएँ ।
ऋग्वेद के इस मंत्र में वरुण देव को ब्रह्मांड के सर्वोपरि शासक और बुद्धि के स्वामी के रूप में संबोधित किया गया है। यह मंत्र उनकी व्यापकता और भक्त की प्रार्थना के प्रति उनकी संवेदनशीलता को दर्शाता है।
मूल मंत्र
त्वं विश्व॑स्य मेधिर दि॒वश्च॒ ग्मश्च॑ राजसि।
स याम॑नि॒ प्रति॑ श्रुधि॥ — ऋग्वेद १.२५.२०
शब्द-दर-शब्द व्याख्या
त्वम्: आप (वरुण देव)
विश्वस्य: संपूर्ण जगत के / ब्रह्मांड के
मेधिर: बुद्धिमान् / मेधावी / प्रज्ञावान्
दिवः: द्युलोक के (आकाश/अंतरिक्ष)
च: और
ग्मः: पृथ्वी के
राजसि: शासन करते हैं / सुशोभित होते हैं
सः: वह (आप)
यामनि: यात्रा के समय / संकट के मार्ग में / यज्ञ के अवसर पर
प्रति श्रुधि: प्रत्युत्तर दें / मेरी प्रार्थना सुनें
भावार्थ हिंदी: हे मेधावी वरुण देव! आप ही इस संपूर्ण विश्व के स्वामी हैं और आकाश तथा पृथ्वी दोनों पर आपका ही शासन है। अतः, जीवन के इस यात्रा-पथ पर चलते हुए आप मेरी पुकार को सुनें और मुझे उत्तर (प्रतिसाद) दें।
English: O wise Varuna, You rule over the entire universe, governing both the heavens and the earth. Hear my call and respond to me as I traverse the path of my journey.
वैज्ञानिक एवं वैचारिक व्याख्या
सार्वभौमिक नियम (Universal Governance): मंत्र में 'दिवश्च ग्मश्च राजसि' (आकाश और पृथ्वी पर शासन) का वैज्ञानिक अर्थ उन Unified Laws of Physics से है जो सूक्ष्म परमाणु से लेकर विशाल आकाशगंगाओं तक समान रूप से लागू होते हैं। यह संकेत देता है कि भौतिक जगत (Earth) और अंतरिक्ष (Space) अलग नहीं, बल्कि एक ही 'इंटेलिजेंट डिज़ाइन' के अधीन हैं।
मेधिर - कॉस्मिक इंटेलिजेंस (Universal Intelligence): वरुण को 'मेधिर' (बुद्धिमान) कहना यह सिद्ध करता है कि ब्रह्मांड का संचालन केवल अंध-शक्तियों (Blind Forces) द्वारा नहीं, बल्कि एक तर्कसंगत और सूचना-युक्त व्यवस्था (Information-rich system) द्वारा हो रहा है। इसे आज के विज्ञान में Cosmic Intelligence या Quantum Logic के रूप में देखा जा सकता है।
यामनि - गतिशीलता का सिद्धांत (Dynamics of Motion): 'यामनि' शब्द यात्रा या गति का सूचक है। ब्रह्मांड की हर वस्तु गतिमान है। विज्ञान के अनुसार, जब कोई पिंड (Object) गति में होता है, तो उसे निरंतर दिशा-निर्देश और स्थिरता की आवश्यकता होती है। यह मंत्र उस 'गाइडिंग फोर्स' (Guiding Force) से जुड़ने की प्रार्थना है जो जीवन की गति को भटकने से बचाती है।
प्रति श्रुधि - फीडबैक और रिस्पॉन्स (Feedback System): 'प्रति श्रुधि' (सुनकर उत्तर देना) एक Feedback Loop का प्रतीक है। जैसे एक कंप्यूटर प्रोग्राम इनपुट मिलने पर आउटपुट देता है, वैसे ही साधक का विश्वास है कि उसकी चेतना का 'इनपुट' ब्रह्मांडीय चेतना से 'रिस्पॉन्स' प्राप्त करेगा। यह प्रार्थना और परिणाम के बीच के वैज्ञानिक संबंध को दर्शाता है।
निष्कर्ष
यह मंत्र वरुण देव को एक 'ग्लोबल कंट्रोलर' के रूप में स्थापित करता है। यह हमें सिखाता है कि हम जिस भी मार्ग या 'यात्रा' पर हों, यदि हम उस सर्वोच्च मेधा (Universal Wisdom) के साथ तालमेल बिठाते हैं, तो हमें सही दिशा और सुरक्षा का प्रत्युत्तर अवश्य प्राप्त होता है।
देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
उदु॑त्त॒मं मु॑मुग्धि नो॒ वि पाशं॑ मध्य॒मं चृ॑त।
अवा॑ध॒मानि॑ जी॒वसे॑॥ ऋग्वेद १.२५.२१
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
ud uttamam mumugdhi no vi pāśam madhyamaṁ cṛta | avādhamāni jīvase ||
पद पाठ
उत्। उ॒त्ऽत॒मम्। मु॒मु॒ग्धि॒। नः॒। वि। पाश॑म्। म॒ध्य॒मञ् चृ॒त॒। अव॑। अ॒ध॒मानि॑। जी॒वसे॑॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:25» मन्त्र:21 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:19» मन्त्र:6 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:21
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह परमेश्वर कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदार्थान्वयभाषाः -हे अविद्यान्धकार के नाश करनेवाले जगदीश्वर ! आप (नः) हम लोगों के (जीवसे) बहुत जीने के लिये हमारे (उत्तमम्) श्रेष्ठ (मध्यमम्) मध्यम दुःखरूपी (पाशम्) बन्धनों को (उन्मुमुग्धि) अच्छे प्रकार छुड़ाइये तथा (अधमानि) जो कि हमारे दोषरूपी निकृष्ट बन्धन हैं, उनका भी (व्यवचृत) विनाश कीजिये॥२१॥
भावार्थभाषाः -जैसे धार्मिक परोपकारी विद्वान् होकर ईश्वर की प्रार्थना करते हैं, जगदीश्वर उनके सब दुःख बन्धनों को छुड़ाकर सुखयुक्त करता है, वैसे कर्म हम लोगों को क्या न करना चाहिये॥२१॥चौबीसवें सूक्त में कहे हुए प्रजापति आदि अर्थों के बीच जो वरुण शब्द है, उसके अर्थ को इस पच्चीसवें सूक्त में कहने से सूक्त के अर्थ की सङ्गति पहिले सूक्त के अर्थ के साथ जाननी चाहिये॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
पाश - विमुक्त उत्तम जीवन
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र के अनुसार जब हम बुद्धिपूर्वक चलेंगे तो इस प्रार्थना के योग्य बनेंगे कि हे वरुण! आप (नः) - हमारे (उत्तमं पाशम्) - उत्कृष्ट पाश को अर्थात् सात्त्विक बन्धन को भी (मुमुग्धि) - छिन्न करने की कृपा कीजिए । आपकी कृपा से प्रकृति का सत्त्वगुण मुझे सुखसङ्ग व ज्ञानसङ्ग से बाँध न सके । आप ही मुझे इससे मुक्त करने का सामर्थ्य रखते हैं । २. हे वरुण! (मध्यमं पाशम्) - रजोगुण नामक मध्यमपाश को भी (विचृत) - विच्छिन्न कीजिए । यह भी अपने कर्मसङ्ग से मुझे बाँधनेवाला न हो । 'मैं एक भी क्षण शान्त होकर न बैठ सकूँ' , ऐसी स्थिति न हो जाए । ३. हे प्रभो! (अधमानि) - तमोगुण - जनित प्रमाद , आलस्य व निद्रारूप अधम पाशों को भी (अव) - आप मुझसे दूर कीजिए । मैं कभी भी प्रमाद , आलस्य व निद्रा का शिकार न हो जाऊँ । ४. यह सब आप इसलिए करने की कृपा कीजिए जिससे जीवसे मैं अपना जीवन उत्तम बना सकूँ । जीवन - उत्कर्ष के लिए , जीवन में निरन्तर आगे बढ़ने के लिए 'सात्विक , राजस् व तामस्' सभी बन्धनों से मुक्त होना आवश्यक है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - प्रभु - कृपा से मेरी बन्धनत्रयी नष्ट हो और मैं उत्तम जीवनवाला बनूँ ।
टिप्पणी:विशेष - सूक्त इन शब्दों से आरम्भ होता है कि हम ग़लती करते हैं तो भी हैं तो प्रभु की ही प्रजा [१] । प्रभु हमें घृणा व क्रोध से ऊपर उठाएँ [२] । हम अपने मनों को प्रभु से जोड़ने का यत्न करें [३] । हमारी चित्तवृत्तियाँ प्रभु में ही लगें [४] । वे प्रभु 'क्षत्रश्री , नर व उरुचक्षा' हैं [५] । उस प्रभु को ही मेरे प्राण व अपान प्राप्त करने का प्रयत्न करें [६] । उस प्रभु से कोई स्थान व समय छिपा नहीं [७ - ८] । सब प्रजाओं में स्थित होकर वे उनका शासन कर रहे हैं [१०] । सभी अद्भुत वस्तुओं के वे ही कर्ता हैं [११] । वे प्रभु ही हमें सुपथ से चलाकर दीर्घजीवी करें [१२] । हम ज्ञानमय कवच को धारण करें , हृदय को शुद्ध रखें [१३] । दम्भ , द्रोह व दर्प से ऊपर उठें [१४] । प्रभु - कृपा से यशस्वी बनें [१५] । प्रभु से मिलकर बात कर सकने के लिए जीवन को माधुर्य से भरें [१७] । उस विश्वदर्शत का दर्शन करते हुए [१८] , उसी से कल्याण की प्रार्थना करें [१९] । वे प्रभु ही हमें मेधा देंगे [२०] और बन्धनत्रयी से मुक्त करके कल्याणभागी बनाएँगे [२१] । अब प्रभु जीव को निर्देश देते हैं कि -
यह मंत्र ऋग्वेद के इस सूक्त का अंतिम और अत्यंत प्रभावशाली मंत्र है, जो बंधनों से मुक्ति और पूर्ण स्वतंत्रता की प्रार्थना करता है।
मूल मंत्र
उदु॑त्त॒मं मु॑मुग्धि नो॒ वि पाशं॑ मध्य॒मं चृ॑त।
अवा॑ध॒मानि॑ जी॒वसे॑॥ — ऋग्वेद १.२५.२१
शब्द-दर-शब्द व्याख्या
उत्-मुमुग्धि: ऊपर की ओर खोल दें / मुक्त करें
उत्तमम्: सबसे ऊपरी (पाश/बंधन) को
नः: हमारे
वि-चृत: अलग कर दें / ढीला कर दें
पाशम्: बंधन को
मध्यमम्: बीच वाले (मध्य के)
अधमानि: सबसे नीचे के (बंधनों को)
अव (चृत): नीचे की ओर खोलकर गिरा दें
जीवैसे: जीवित रहने के लिए / सार्थक जीवन के लिए
भावार्थ हिंदी: हे वरुण देव! हमारे सिर के ऊपर स्थित (उत्तम) बंधनों को खोल दें, हमारे मध्य (हृदय/नाभि) के बंधनों को ढीला कर दें, और हमारे सबसे नीचे के बंधनों को पूरी तरह हटा दें, ताकि हम आपके नियमों में स्थित होकर एक स्वतंत्र और लंबी आयु का जीवन जी सकें।
English: O Varuna, loosen the highest bond from us, untie the middle one, and remove the lowest, so that we may live a full and free life in your service.
वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक व्याख्या
इस मंत्र में 'तीन प्रकार के पाशों' (Triple Bonds) का वर्णन मिलता है, जिसे आधुनिक संदर्भों में इस प्रकार समझा जा सकता है:
त्रि-स्तरीय बंधन (Three Levels of Constraints):
उत्तम पाश (Top/Intellectual): यह मस्तिष्क और विचारों का बंधन है। वैज्ञानिक रूप से यह हमारे 'मानसिक पूर्वाग्रह' (Cognitive Biases) और अज्ञानता हैं जो हमें सत्य देखने से रोकते हैं।
मध्यम पाश (Middle/Emotional): यह हृदय और भावनाओं का बंधन है। यह तनाव, चिंता और भावनात्मक अस्थिरता (Emotional Turmoil) को दर्शाता है जो हमारे 'नर्वस सिस्टम' को जकड़े रहता है।
अधम पाश (Bottom/Physical): यह शरीर और भौतिक आवश्यकताओं के बंधन हैं। यह जैविक व्याधियों (Biological Illness) और जड़ता का प्रतीक है।
जैविक लय और मुक्ति (Biological Freedom): 'जीवैसे' (जीने के लिए) का अर्थ केवल सांस लेना नहीं है, बल्कि Optimal Functioning है। जब शरीर के ऊपरी (Cerebral), मध्य (Thoracic/Abdominal) और निचले अंगों के ऊर्जा केंद्र अवरोधों से मुक्त होते हैं, तभी शरीर में 'होमियोस्टैसिस' (Homeostasis) यानी पूर्ण संतुलन स्थापित होता है।
पाश और न्यूरोलॉजी (The Concept of Bonds): विज्ञान में किसी भी 'सिस्टम' के सुचारू संचालन के लिए 'कंस्ट्रेंट्स' (Constraints) को हटाना आवश्यक होता है। यह मंत्र उन Inhibitions को हटाने की बात करता है जो मानवीय क्षमता के पूर्ण विकास (Self-Actualization) में बाधा डालते हैं।
ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन (Ascension of Energy): 'उत्-मुमुग्धि' (ऊपर की ओर खोलना) यह दर्शाता है कि मुक्ति का मार्ग नीचे से ऊपर की ओर चेतना का विस्तार है। यह प्राचीन 'प्राणिक ऊर्जा' के प्रवाह के विज्ञान की ओर संकेत करता है।
निष्कर्ष
यह मंत्र एक 'लिबरेशन प्रोटोकॉल' (Liberation Protocol) है। यह मनुष्य को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक—तीनों स्तरों पर विकारों से मुक्त होकर एक अनुशासित और नियमबद्ध (वरुण के व्रत) जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
ऋग्वेद के प्रथम मण्डल का २५वाँ सूक्त, जिसमें २१ मंत्र हैं, वरुण देव की स्तुति में रचा गया एक अद्वितीय 'कॉस्मिक कोड' है। इसका निष्कर्ष हम निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं में समझ सकते हैं:
१. ब्रह्मांडीय नियमों की सर्वोच्चता (The Rule of Law)
पूरे सूक्त में वरुण देव को 'धृतव्रत' (नियमों को धारण करने वाला) कहा गया है। इसका निष्कर्ष यह है कि यह ब्रह्मांड अराजक (Chaos) नहीं है, बल्कि निश्चित भौतिक और नैतिक नियमों (Cosmic Laws) से बंधा है। चाहे वह पक्षियों का मार्ग हो, समुद्र की नौकाएँ हों या ग्रहों की गति, सब कुछ एक 'यूनिवर्सल प्रोटोकॉल' के तहत संचालित है।
२. सर्वज्ञता और सूचना तंत्र (Universal Information Field)
मंत्र ७ से ११ तक वरुण की सर्वज्ञता का वर्णन है। निष्कर्ष यह निकलता है कि प्रकृति में 'सूचना' (Information) कभी नष्ट नहीं होती। जो बीत चुका है और जो होने वाला है, वह सब उस परम चेतना (Cosmic Observer) के डेटाबेस में अंकित है। यह आज के 'क्वांटम इंफॉर्मेशन थ्योरी' के अत्यंत निकट है।
३. काल और अंतरिक्ष का विज्ञान (Science of Spacetime)
इस सूक्त में १२ महीनों के साथ १३वें महीने (अधिकमास) का उल्लेख और वायु के विशाल मार्गों का वर्णन यह सिद्ध करता है कि यह सूक्त केवल भक्ति का नहीं, बल्कि उच्च कोटि के खगोल विज्ञान (Astronomy) और मौसम विज्ञान का भी निष्कर्ष है।
४. मानवीय मनोविज्ञान और व्यवहार (Behavioral Science)
ऋषि शुनःशेप के माध्यम से यह सूक्त सिखाता है कि मानवीय विचार (धीतयः) चंचल हैं, जिन्हें वरुण (नियमों) की ओर मोड़ना अनिवार्य है। 'विमन्यवः' (क्रोध रहित विचार) पर जोर देना यह दर्शाता है कि मानसिक शांति और स्पष्टता ही प्रगति का आधार है।
५. तीन स्तरों पर मुक्ति (The Triple Bondage)
अंतिम मंत्र (२१वाँ) इस सूक्त का सबसे बड़ा निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। मनुष्य तीन स्तरों पर बंधा है—बौद्धिक, भावनात्मक और शारीरिक। वरुण देव की उपासना का अर्थ है इन तीनों पाशों (Bonds) से मुक्त होकर पूर्ण सामर्थ्य के साथ जीवित रहना (जीवेसे)।
अंतिम परिणाम: यह सूक्त हमें 'सत्य' और 'नियम' के साथ जीने की प्रेरणा देता है। यह सिखाता है कि जब हम प्रकृति के नियमों (ऋत) के अनुकूल चलते हैं, तो संपूर्ण ब्रह्मांड हमारी रक्षा और मार्गदर्शन (सुपथा) करने लगता है।
सूक्त का सार-संक्षेप (Summary Table)
आयाम निष्कर्ष संदेश
प्रशासनिक ईश्वर एक 'सम्राट' (साम्राज्याय) की तरह न्यायप्रिय और व्यवस्थापक है।
वैज्ञानिक समय, स्थान और गति के नियम अपरिवर्तनीय और सटीक हैं।
आध्यात्मिक समर्पण और नियमों का पालन ही भय और पाप से मुक्ति का मार्ग है।
शारीरिक हमारी आंतरिक जैविक अग्नि (पाचन) भी उसी ब्रह्मांडीय व्यवस्था का हिस्सा है।