ऋग्वेद मंडल १ सूक्त 24 हिन्दी व्याख्या एवं वैज्ञानिक व्याख्या

 

ऋग्वेद मंडल १ सूक्त 24 हिन्दी व्याख्या

देवता: प्रजापतिः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

कस्य॑ नू॒नं क॑त॒मस्या॒मृता॑नां॒ मना॑महे॒ चारु॑ दे॒वस्य॒ नाम॑। को नो॑ म॒ह्या अदि॑तये॒ पुन॑र्दात्पि॒तरं॑ च दृ॒शेयं॑ मा॒तरं॑ च॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kasya nūnaṁ katamasyāmṛtānām manāmahe cāru devasya nāma | ko no mahyā aditaye punar dāt pitaraṁ ca dṛśeyam mātaraṁ ca ||

पद पाठ

कस्य॑। नू॒नम्। क॒त॒मस्य॑। अ॒मृता॑नाम्। मना॑महे। चारु॑। दे॒वस्य॑। नाम॑। कः। नः॑। म॒ह्यै। अदि॑तये। पुनः॑। दा॒त्। पि॒तर॑म्। च॒। दृ॒शेय॑म्। मा॒तर॑म्। च॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:24» मन्त्र:1 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:13» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:1

उपलब्ध भाष्य

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब चौबीसवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके पहिले मन्त्र में प्रजापति का प्रकाश किया है-

पदार्थान्वयभाषाः -हम लोग (कस्य) कैसे गुण कर्म स्वभाव युक्त (कतमस्य) किस बहुतों (अमृतानाम्) उत्पत्ति विनाशरहित अनादि मोक्षप्राप्त जीवों और जो जगत् के कारण नित्य के मध्य में व्यापक अमृतस्वरूप अनादि तथा एक पदार्थ (देवस्य) प्रकाशमान सर्वोत्तम सुखों को देनेवाले देव का निश्चय के साथ (चारु) सुन्दर (नाम) प्रसिद्ध नाम को (मनामहे) जानें कि जो (नूनम्) निश्चय करके (कः) कौन सुखस्वरूप देव (नः) मोक्ष को प्राप्त हुए भी हम लोगों को (मह्यै) बड़ी कारणरूप नाशरहित (अदितये) पृथिवी के बीच में (पुनः) पुनर्जन्म (दात) देता है। जिससे कि हम लोग (पितरम्) पिता (च) और (मातरम्) माता (च) और स्त्री पुत्र बन्धु आदि को (दृशेयम्) देखने की इच्छा करें॥१॥

भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में प्रश्न का विषय है कौन ऐसा पदार्थ है जो सनातन अर्थात् अविनाशी पदार्थों में भी सनातन अविनाशी है कि जिसका अत्यन्त उत्कर्षयुक्त नाम का स्मरण करें वा जानें? और कौन देव हम लोगों के लिये किस-किस हेतु से एक जन्म से दूसरे जन्म का सम्पादन करता? और अमृत वा आनन्द के करानेवाली मुक्ति को प्राप्त होकर भी फिर हम लोगों को माता-पिता से दूसरे जन्म में शरीर को धारण कराता है॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

क - कतम 

पदार्थान्वयभाषाः -१. (नूनम्) - अब जीवन को नीरोग व निर्मल बनाकर हम (कस्य) - उस अनिर्वचनीय प्रजापति के (अमृतानाम्) - विषय - वासनाओं के पीछे न मरनेवाले देवों में (कतमस्य) - अत्यन्त आनन्दमय (देवस्य) - सब दिव्य गुणों से युक्त प्रभु के (चारु नाम) - सुन्दर नाम का (मनामहे) - अभ्यास व उच्चारण करते हैं । प्रभु का यह नाम - स्मरण मुझे निर्मल व नीरोग बनाये रक्खेगा ।  २. (कः) - वह अनिर्वचनीय प्रभु (नः) - हमें (मह्यै+अदितये) - महनीय - अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अखण्डन व जीवन के लिए (पुनः) - फिर (दात्) - देता है , ताकि मैं (पितरम् च) - पिता को और (मातरम् च) - माता को (दृशेयम्) - देख सकूँ ।  ३. विषयों में फंसकर हमारा दृष्टिकोण बड़ा विचित्र हो जाता है , हमारा ज्ञान लुप्त - सा हो जाता है और हम उस सबके माता - पिता प्रभु को तो देख ही क्या पाते हैं , सांसारिक माता - पिता को भी नहीं देखते ; केवल अपने सुख का ही ध्यान करते हैं । उस समय हमारा जीवन महनीय नहीं रहता , उसका सब सौन्दर्य समाप्त हो जाता है ।  ४. यदि हम प्रभु - नामस्मरण से पृथक् नहीं हो जाते तो हमें जन्म मिलता भी है तो बड़ा सुन्दर । इस जीवन को प्राप्त करके हमारा प्रयत्न सबके माता - पिता प्रभु के दर्शन के लिए होता है । 

भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम 'क - कतम' देव के सुन्दर नाम का स्मरण करते हैं , ताकि हमें महनीय जीवन ही प्राप्त हो । 

देवता: अग्निः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

अ॒ग्नेर्व॒यं प्र॑थ॒मस्या॒मृता॑नां॒ मना॑महे॒ चारु॑ दे॒वस्य॒ नाम॑। स नो॑ म॒ह्या अदि॑तये॒ पुन॑र्दात्पि॒तरं॑ च दृ॒शेयं॑ मा॒तरं॑ च॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agner vayam prathamasyāmṛtānām manāmahe cāru devasya nāma | sa no mahyā aditaye punar dāt pitaraṁ ca dṛśeyam mātaraṁ ca ||

पद पाठ

अ॒ग्नेः। व॒यम्। प्रथ॒मस्य॑। अ॒मृता॑नाम्। मना॑महे। चारु॑। दे॒वस्य॑। नाम॑। सः। नः॑। म॒ह्यै। अदि॑तये। पुनः॑। दा॒त्। पि॒तर॑म्। च॒। दृ॒शेय॑म्। मा॒तर॑म्। च॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:24» मन्त्र:2 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:13» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:2

उपलब्ध भाष्य

स्वामी दयानन्द सरस्वती

इन प्रश्नों के उत्तर अगले मन्त्र में प्रकाशित किये हैं-

पदार्थान्वयभाषाः -हम लोग जिस (अग्ने) ज्ञानस्वरूप (अमृतानाम्) विनाश धर्मरहित पदार्थ वा मोक्ष।प्राप्त जीवों में (प्रथमस्य) अनादि विस्तृत अद्वितीय स्वरूप (देवस्य) सब जगत् के प्रकाश करने वा संसार में सब पदार्थों के देनेवाले परमेश्वर का (चारु) पवित्र (नाम) गुणों का गान करना (मनामहे) जानते हैं, (सः) वही (नः) हमको (मह्यै) बड़े-बड़े गुणवाली (अदितये) पृथिवी के बीच में (पुनः) फिर जन्म (दात्) देता है, जिससे हम लोग (पुनः) फिर (पितरम्) पिता (च) और (मातरम्) माता (च) और स्त्री-पुत्र-बन्धु आदि को (दृशेयम्) देखते हैं॥२॥

भावार्थभाषाः -हे मनुष्यो ! हम लोग जिस अनादिस्वरूप सदा अमर रहने वा जो हम सब लोगों के किये हुए पाप और पुण्यों के अनुसार यथायोग्य सुख-दुःख फल देनेवाले जगदीश्वर देव को निश्चय करते और जिसकी न्याययुक्त व्यवस्था से पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं, तुम लोग भी उसी देव को जानो, किन्तु इससे और कोई उक्त कर्म करनेवाला नहीं है, ऐसा निश्चय हम लोगों को है कि वही मोक्षपदवी को पहुँचे हुए जीवों का भी महाकल्प के अन्त में फिर पाप-पुण्य की तुल्यता से पिता-माता और स्त्री आदि के बीच में मनुष्यजन्म धारण कराता है॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अग्नि' नाम का स्मरण

पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र की भावना को ही पुनः कहते हैं कि (वयम्) - हम (अग्नेः) - अग्नि के , सारे संसार के अग्रणी उस प्रभु के (अमृतानां प्रथमस्य) - देवताओं में प्रथम स्थान में स्थित प्रभु के (देवस्य) - दिव्यगुणों से युक्त , प्रकाशमय , सब - कुछ देनेवाले प्रभु के (चारु नाम) - सुन्दर नाम का (मनामहे) - उच्चारण करते हैं , अर्थात् प्रभु का स्मरण करते हैं ।  २. (सः) - वे प्रभु (नः) - हमें (मह्या अदितये) - महनीय , उत्कृष्ट जन्म के (दात्) - देनेवाले हैं , जिससे उस उत्कृष्ट जीवन में हम (पुनः) - फिर (पितरम् च) - पिता को और (मातरम् च) - माता को (दृशेयम्) - देखनेवाले बनें । जिस समय एक बालक माता - पिता की आँखों से ओझल होता है , उसी समय वह मार्गभ्रष्ट हुआ करता है । इसी प्रकार हमारे जीवनों में भी हम प्रभु को भूले और भटके । प्रभु का स्मरण हमें भटकने से बचाता है ।  ३. यह संसार इतना चमकीला व आर्कषक है कि इसमें न फंसना कठिन ही है । बस , प्रभु का नामस्मरण ही हमें वह शक्ति प्राप्त कराता है कि हम इस संसार में उलझते नहीं । 

भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम 'अग्नि' नामक प्रभु का स्मरण करते हुए निरन्तर आगे बढ़ें और विषयासक्ति से सदा बचे रहें । 

देवता: सविता भगो वा ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

अ॒भि त्वा॑ देव सवित॒रीशा॑नं॒ वार्या॑णाम्। सदा॑वन्भा॒गमी॑महे॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhi tvā deva savitar īśānaṁ vāryāṇām | sadāvan bhāgam īmahe ||

पद पाठ

अ॒भि। त्वा॒। दे॒व॒। स॒वि॒तः॒। ईशा॑नम्। वार्या॑णाम्। सदा॑। अ॒व॒न्। भा॒गम्। ई॒म॒हे॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:24» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:13» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:3

उपलब्ध भाष्य

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह जगदीश्वर कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

पदार्थान्वयभाषाः -हे (सवितः) पृथिवी आदि पदार्थों की उत्पत्ति वा (अवन्) रक्षा करने और (देव) सब आनन्द के देनेवाले जगदीश्वर ! हम लोग (वार्य्याणाम्) स्वीकार करने योग्य पृथिवी आदि पदार्थों की (ईशानम्) यथायोग्य व्यवस्था करने (भागम्) सब के सेवा करने योग्य (त्वा) आपको (सदा) सब काल में (अभि) (ईमहे) प्रत्यक्ष याचते हैं अर्थात् आप ही से सब पदार्थों को प्राप्त होते हैं॥३॥

भावार्थभाषाः -मनुष्यों को योग्य है कि जो सब का प्रकाशक सकल जगत् को उत्पन्न वा सब की रक्षा करनेवाला जगदीश्वर है, वही सब समय में उपासना करने योग्य है, क्योंकि इसको छोड़ के अन्य किसी की उपासना करके ईश्वर की उपासना का फल चाहे तो कभी नहीं हो सकता, इससे इसकी उपासना के विषय में कोई भी मनुष्य किसी दूसरे पदार्थ का स्थापन कभी न करे॥३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वार्य - वस्तुओं के ईशान

पदार्थान्वयभाषाः -१. हे (देव) - सब दिव्यगुणों के पुञ्ज प्रभो! (सवितः) - हृदयस्थरूपेण सदा उत्तम प्रेरणा को प्राप्त करानेवाले प्रभो! हम गत मन्त्रों के अनुसार 'क - कतम - अग्नि व प्रथम देव' आदि नामों से आपका स्मरण करते हुए (त्वा अभि) - आपकी ओर ही आते हैं । हम आपसे दूर नहीं होते ।  २. हे (सदावन्) - [सदा - अवन्] सदा रक्षा करनेवाले प्रभो! (वार्याणाम् ईशानम्) - वरणीय वस्तुओं के स्वामी आपको (भागम्) - भजनीय धन के लिए (ईमहे) - प्रार्थना करते हैं । आप हमें रक्षा के लिए आवश्यक वरणीय पदार्थ प्राप्त कराएँगे ही ।  ३. इन धनों को प्राप्त करते हुए हम इस बात को भूल न जाएँ कि इनके स्वामी आप ही हैं , हमें इन धनों का गर्व न हो जाए । इनमें फँसकर हम आपको ही न भूल जाएँ । यदि दुर्भाग्यवश ऐसा हुआ तो ये धन हमारे निधन का ही कारण होंगे । 

भावार्थभाषाः -भावार्थ - हे प्रभो! हम सदा आपको अपना लक्ष्य रखें । आपसे ही भजनीय धन को प्राप्त करें । 

देवता: सविता भगो वा ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

यश्चि॒द्धि त॑ इ॒त्था भगः॑ शशमा॒नः पु॒रा नि॒दः। अ॒द्वे॒षो हस्त॑योर्द॒धे॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yaś cid dhi ta itthā bhagaḥ śaśamānaḥ purā nidaḥ | adveṣo hastayor dadhe ||

पद पाठ

यः। चि॒त्। हि। ते॒। इ॒त्था। भगः॑। श॒श॒मा॒नः। पु॒रा। नि॒दः। अ॒द्वे॒षः। हस्त॑योः। द॒धे॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:24» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:13» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:4

उपलब्ध भाष्य

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर भी अगले मन्त्र में परमेश्वर ने अपना ही प्रकाश किया है-

पदार्थान्वयभाषाः -हे जीव ! जैसे (अद्वेषः) सब से मित्रतापूर्वक वर्तनेवाला द्वेषादि दोषरहित मैं ईश्वर (इत्था) इस प्रकार सुख के लिये (यः) जो (शशमानः) स्तुति (भगः) और स्वीकार करने योग्य धन है, उसको (ते) तेरे धर्मात्मा के लिये (हि) निश्चय करके (हस्तयोः) हाथों में आमले का फल वैसे धर्म के साथ प्रशंसनीय धन को (दधे) धारण करता हूँ और जो (निदः) सब की निन्दा करनेहारा है, उसके लिये उस धनसमूह का विनाश कर देता हूँ, वैसे तुम लोग भी किया करो॥४॥

भावार्थभाषाः -यहाँ वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मैं ईश्वर सब के निन्दक मनुष्य के लिये दुःख और स्तुति करनेवाले के लिये सुख देता हूँ, वैसे तुम भी सदा किया करो॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उत्तम धन

पदार्थान्वयभाषाः -१. हे प्रभो! आपकी कृपा से मैं (हस्तयोः दधे) - हाथों में धारण करता हूँ , उस धन को [क] (यः भगः) - जो धन कि (चित् हि) - पूर्ण निश्चय से (इत्था ते) - सचमुच तेरा ही है , अर्थात् जिस धन के स्वाभाविक प्रभु तो आप ही हैं । मैं तो उस धन को आपका मानता हुआ अपने को उसका रक्षकमात्र [Trustee] समझता हूँ । [ख] (शशमानः) - [शस्यमानः] जो धन सदा प्रशंसित किया जाता है , अर्थात् जो निन्दनीय नहीं है अथवा जो धन प्लुत गतिवाला है , अर्थात् आलस्यशून्य क्रियाशीलता के द्वारा प्राप्त किया गया है ।  २. [ग] (पुरा निदः) - जो निन्दा से पहले है , अर्थात् जो कभी निन्दित नहीं होता , अर्थात् जिसे हम निन्दनीय उपायों से तो कमाते ही नहीं , जिसे हम निन्द्य प्रकार से व्यय भी नहीं करते । [घ] (अद्वेषः) - जिस धन में किसी प्रकार का द्वेष नहीं है , जिस धन के कारण हमारा आपस में प्रेम नष्ट नहीं हो जाता ।  ३. स्पष्ट है कि उत्तम धन वही है कि जो हमें स्वामित्व के गर्ववाला नहीं कर देता , जो पुरुषार्थ से प्राप्त किया जाता है , जो कभी लोकनिन्दा का पात्र नहीं बनता तथा जिसके कारण परस्पर प्रीति में कमी नहीं आ जाती । 

भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम धनों का गर्व न करें , पुरुषार्थ से उन्हें प्राप्त करें , अनिन्द्य प्रकार से प्रयुक्त करें , उन्हें प्रीतिवर्धन का साधन बनाएँ । 

देवता: सविता भगो वा ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

भग॑भक्तस्य ते व॒यमुद॑शेम॒ तवाव॑सा। मू॒र्धानं॑ रा॒य आ॒रभे॑॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

bhagabhaktasya te vayam ud aśema tavāvasā | mūrdhānaṁ rāya ārabhe ||

पद पाठ

भग॑ऽभक्तस्य। ते॒। व॒यम्। उत्। अ॒शे॒म॒। तव॑। अव॑सा। मू॒र्धान॑म्। रा॒यः। आ॒ऽरभे॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:24» मन्त्र:5 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:13» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:5

उपलब्ध भाष्य

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर भी अगले मन्त्र में परमेश्वर ही का प्रकाश किया है-

पदार्थान्वयभाषाः -हे जगदीश्वर ! जिससे हम लोग (भगभक्तस्य) जो सब के सेवने योग्य पदार्थों का यथा योग्य विभाग करनेवाले (ते) आपकी कीर्त्ति को (उदशेम) अत्यन्त उन्नति के साथ व्याप्त हों कि उसमें (तव) आपकी (अवसा) रक्षणादि कृपादृष्टि से (रायः) अत्यन्त धन के (मूर्द्धानम्) उत्तम से उत्तम भाग को प्राप्त होकर (आरभे) आरम्भ करने योग्य व्यवहारों में नित्य प्रवृत्त हों अर्थात् उसकी प्राप्ति के लिये नित्य प्रयत्न कर सकें॥५॥

भावार्थभाषाः -जो मनुष्य अपने क्रिया कर्म से ईश्वर की आज्ञा में प्राप्त होते हैं, वही उससे रक्षा को सब प्रकार से प्राप्त और सब मनुष्यों में उत्तम ऐश्वर्यवाले होकर प्रशंसा को प्राप्त होते हैं, क्योंकि वही ईश्वर जीवों को उनके कर्मों के अनुसार न्यायव्यवस्था से विभाग कर फल देता है ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

धन के शिखर पर

पदार्थान्वयभाषाः -१. हे [सवितः] - सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न करनेवाले प्रभो! (भगभक्तस्य) - धनों का विभाग करनेवाले (ते) - आपका (वयम्) - हम (उद् अशेम) - उत्कर्षेण व्यापन करें , अर्थात् हम इन धनों में आसक्त होने से ऊपर उठकर आपके उपासक बनें ।  २. हे प्रभो! (तव , अवसा) - आपके रक्षण से ही तो मैं (रायः) - धन के (मूर्धानम्) - शिखर को (आरभे) - [to reach or attain to] प्राप्त करता हूँ ,धन पर आरूढ़ होता हूँ और धन पर आरूढ़ होकर अपनी जीवन - यात्रा को सुन्दरता से पूर्ण कर सकता हूँ । धन का पति बनकर लक्ष्मी - पति विष्णु के समान बननेवाला होता हूँ ।  ३. आपके रक्षण से दूर होते ही यह धन मुझपर सवार हो जाता है और मैं लक्ष्मी का वाहन उल्लू बन जाता हूँ , मेरा ज्ञान नष्ट हो जाता है और मेरा अन्त निधन - मृत्यु में होता है । मैं जीवनभर धन का दास बना रहता हूँ , धन - निर्माण का यन्त्र - सा [Money - making machine] हो जाता हूँ , अतः हे प्रभो! मुझे आपका रक्षण सदा प्राप्त हो और मैं धन के शिखर पर रहूँ । 

भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम धनों के विभक्ता प्रभु का उपासन करें , प्रभु - रक्षण से धन के शिखर पर हों । 

देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः छन्द: निचृत्त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

न॒हि ते॑ क्ष॒त्रं न सहो॒ न म॒न्युं वय॑श्च॒नामी प॒तय॑न्त आ॒पुः। नेमा आपो॑ अनिमि॒षं चर॑न्ती॒र्न ये वात॑स्य प्रमि॒नन्त्यभ्व॑म्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

nahi te kṣatraṁ na saho na manyuṁ vayaś canāmī patayanta āpuḥ | nemā āpo animiṣaṁ carantīr na ye vātasya praminanty abhvam ||

पद पाठ

न॒हि। ते॒। क्ष॒त्रम्। न। सहः॑। न। म॒न्युम्। वयः॑। च॒न। अ॒मी इति॑। प॒तय॑न्तः। आ॒पुः। न। इ॒माः। आपः॑। अ॒नि॒ऽमि॒षम्। चर॑न्तीः। न। ये। वात॑स्य। प्र॒ऽमि॒नन्ति॑। अभ्व॑म्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:24» मन्त्र:6 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:14» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:6

उपलब्ध भाष्य

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः वह ईश्वर कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

पदार्थान्वयभाषाः -हे जगदीश्वर ! (क्षत्रम्) अखण्ड राज्य को (पतयन्तः) इधर-उधर चलायमान होते हुए (अमी) ये लोक-लोकान्तर (न) नहीं (आपुः) व्याप्त होते हैं और न (वयः) पक्षी भी (न) नहीं (सहः) बल को (न) नहीं (मन्युम्) जो कि दुष्टों पर क्रोध है, उसको भी (न) नहीं व्याप्त होते हैं (न) नहीं ये (अनिमिषम्) निरन्तर (चरन्तीः) बहनेवाले (आपः) जल वा प्राण आपके सामर्थ्य को (प्रमिनन्ति) परिमाण कर सकते और (ये) जो (वातस्य) वायु के वेग हैं, वे भी आपकी सत्ता का परिमाण (न) नहीं कर सकते। इसी प्रकार और भी सब पदार्थ आपकी (अभ्वम्) सत्ता का निषेध भी नहीं कर सकते॥६॥

भावार्थभाषाः -ईश्वर के अनन्त सामर्थ्य होने से उसका परिमाण वा उसकी बराबरी कोई भी नहीं कर सकता है। ये सब लोक चलते हैं, परन्तु लोकों के चलने से उनमें व्याप्त ईश्वर नहीं चलता, क्योंकि जो सब जगह पूर्ण है, वह कभी चलेगा? इस ईश्वर की उपासना को छोड़ कर किसी जीव का पूर्ण अखण्डित राज्य वा सुख कभी नहीं हो सकता। इससे सब मनुष्यों को प्रमेय वा विनाशरहित परमेश्वर की सदा उपासना करनी योग्य है॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अनन्त बल , सहनशक्ति व ज्ञान

पदार्थान्वयभाषाः -१. 'शुनः शेप' वरुण का स्तवन करता हुआ कहता है कि हे प्रभो! (ते क्षत्रम्) - तेरे बल को , (सहः) - सहनशक्ति को व (मन्युम्) - ज्ञान को (अमी) - ये (पतयन्तः) - उड़ते हुए (वयश्चन) - पक्षी भी (नहि आपुः) - नहीं प्राप्त कर सकते । उड़ते हुए पक्षी यदि प्रभु के बल , सहनशक्ति व ज्ञान के ओर - छोर को पाने की कामना करें तो यह उनके लिए सम्भव नहीं है । उस प्रभु का बल , शक्ति व ज्ञान सब अनन्त है ।  २. (इमाः) - ये (अनिमिषम्) - बिना पलक मारे , निरन्तर (चरन्तीः) - चलते हुए (आपः) - जल भी (न) - आपकी शक्ति व ज्ञान के अन्त को नहीं प्राप्त कर सकते ।  ३. (वातस्य) - वायु के (अभ्वम्) - वेग को (ये) - जो (प्रमिनन्ति) - हिंसित करते हैं , अर्थात् उससे भी अधिक वेगवान् होते हैं , वे भी (न) - प्रभु के बल व ज्ञान का अन्त नहीं पा सकते । 

भावार्थभाषाः -भावार्थ - प्रभु की शक्ति का ज्ञान अनन्त है  ; पक्षियों की उड़ान , जलों के निरन्तर प्रवाह व वायु के वेगों से उनके ओर - छोर का पाना सम्भव नहीं । 

देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः छन्द: निचृत्त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

अ॒बु॒ध्ने राजा॒ वरु॑णो॒ वन॑स्यो॒र्ध्वं स्तूपं॑ ददते पू॒तद॑क्षः। नी॒चीनाः॑ स्थुरु॒परि॑ बु॒ध्न ए॑षाम॒स्मे अ॒न्तर्निहि॑ताः के॒तवः॑ स्युः॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abudhne rājā varuṇo vanasyordhvaṁ stūpaṁ dadate pūtadakṣaḥ | nīcīnāḥ sthur upari budhna eṣām asme antar nihitāḥ ketavaḥ syuḥ ||

पद पाठ

अ॒बु॒ध्ने। राजा॑। वरु॑णः। वन॑स्य। ऊ॒र्ध्वम्। स्तूप॑म्। द॒द॒ते॒। पू॒तऽद॑क्षः। नी॒चीनाः॑। स्थुः॒। उ॒परि॑। बु॒ध्नः। ए॒षा॒म्। अ॒स्मे इति॑। अ॒न्तः। निऽहि॑ताः। के॒तवः॑। स्यु॒रिति॑ स्युः॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:24» मन्त्र:7 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:14» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:7

उपलब्ध भाष्य

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब अगले मन्त्र में वायु और सविता के गुण प्रकाशित करते हैं-

पदार्थान्वयभाषाः -हे मनुष्यो ! तुम जो (पूतदक्षः) पवित्र बलवाला (राजा) प्रकाशमान (वरुणः) श्रेष्ठ जलसमूह वा सूर्य्यलोक (अबुध्ने) अन्तरिक्ष से पृथक् असदृश्य बड़े आकाश में (वनस्य) जो कि व्यवहारों के सेवने योग्य संसार है, जो (ऊर्ध्वम्) उस पर (स्तूपम्) अपनी किरणों को (ददते) छोड़ता है, जिसकी (नीचीनाः) नीचे को गिरते हुए (केतवः) किरणें (एषाम्) इन संसार के पदार्थों (उपरि) पर (स्थुः) ठहरती हैं (अन्तर्हिताः) जो उनके बीच में जल और (बुध्नः) मेघादि पदार्थ (स्युः) हैं और जो (केतवः) किरणें वा प्रज्ञान (अस्मे) हम लोगों में (निहिताः) स्थिर (स्युः) होते हैं, उनको यथावत् जानो॥७॥

भावार्थभाषाः -जिससे यह सूर्य्य रूप के न होने से अन्तरिक्ष का प्रकाश नहीं कर सकता, इससे जो ऊपरली वा बिचली किरणें हैं, वे ही मेघ की निमित्त हैं, जो उनमें जल के परमाणु रहते तो हैं, परन्तु वे अतिसूक्ष्मता के कारण दृष्टिगोचर नहीं होते। इसी प्रकार वायु अग्नि और पृथिवी आदि के भी अतिसूक्ष्म अवयव अन्तरिक्ष में रहते तो अवश्य हैं, परन्तु वे भी दृष्टिगोचर नहीं होते॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु का विद्युद्दीप - सूर्य

पदार्थान्वयभाषाः -१. वह (राजा) - सारे संसार को व्यवस्था में चलानेवाला (पूतदक्षः) - पवित्र बलवाला अथवा हमारे बलों को पवित्र करनेवाला (वरुणः) - सबका नियामक प्रभु (अबुध्ने) - मूलरहित अन्तरिक्ष प्रदेश में (वनस्य) - वननीय तेज के सेवन के योग्य रश्मियों के (स्तूपम्) - संघभूत सूर्य को धारण करता है ।  २. इस सूर्य की रश्मियों (नीचीनाः) - [वि अञ्चन्ति] नीचे की ओर आनेवाली होकर (स्थुः) - उस सूर्य में ठहरती हैं । (एषाम्) - इनका (बुध्नः) - मूल (उपरि) - ऊपर है । ऊपर से जैसे कोई विद्युद्दीप [Torch] के प्रकाश को नीचे की ओर छोड़े उसी प्रकार यह सूर्य प्रभु की Torch [विद्युदीप] ही तो है । प्रभु इससे किरणों को नीचे इस पृथिवीलोक पर छोड़ता है ।  ३. छोड़ता इसलिए है कि (अस्मे अन्तः) - हमारे अन्दर (केतवः) - [प्रज्ञापकाः प्राणाः, सा०] प्रकाश की किरणें व प्राणदायी तत्त्व , रोगनाशक तत्त्व (निहिताः स्युः) - स्थापित हों । सूर्यकिरणें केवल प्रकाश प्राप्त कराएँ , ऐसी बात नहीं है , ये किरणें हमारे अन्दर प्राणदायी तत्त्वों को भी स्थापित करती हैं । वस्तुतः सूर्य तो है ही प्राण - 'प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः।' तेल मलकर सूर्य - किरणों में बैठा जाए तो सारी त्वचा के साथ - साथ 'विटामिन डी' पैदा हो जाता है । 

भावार्थभाषाः -भावार्थ - सूर्य भी एक अद्भुत वस्तु है । यह प्रभु का मानो विद्युदीप है । इसकी किरणें नीचे आ रही हैं । ये हमें प्रकाश व प्राणशक्ति प्राप्त कराती हैं । 

देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः छन्द: निचृत्त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

उ॒रुं हि राजा॒ वरु॑णश्च॒कार॒ सूर्या॑य॒ पन्था॒मन्वे॑त॒वा उ॑। अ॒पदे॒ पादा॒ प्रति॑धातवेऽकरु॒ताप॑व॒क्ता हृ॑दया॒विध॑श्चित्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uruṁ hi rājā varuṇaś cakāra sūryāya panthām anvetavā u | apade pādā pratidhātave kar utāpavaktā hṛdayāvidhaś cit ||

पद पाठ

उ॒रुम्। हि। राजा॑। वरु॑णः। च॒कार॑। सूर्या॑य। पन्था॑म्। अनु॑ऽए॒त॒वै। ऊँ॒ इति॑। अ॒पदे॑। पादा॑। प्रति॑ऽधातवे। अ॒कः॒। उ॒त। अ॒प॒ऽव॒क्ता। हृ॒द॒य॒ऽविधः॑। चित्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:24» मन्त्र:8 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:14» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:8

उपलब्ध भाष्य

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब अगले मन्त्र में वरुण शब्द से आत्मा और वायु के गुणों का प्रकाश करते हैं-

पदार्थान्वयभाषाः -(चित्) जैसे (अपवक्ता) मिथ्यावादी छली दुष्ट स्वभावयुक्त पराये पदार्थ (हृदयाविधः) अन्याय से परपीड़ा करनेहारे शत्रु को दृढ़ बन्धनों से वश में रखते हैं, वैसे जो (वरुणः) (राजा) अतिश्रेष्ठ और प्रकाशमान परमेश्वर वा श्रेष्ठता और प्रकाश का हेतु वायु (सूर्याय) सूर्य के (अन्वेतवै) गमनागमन के लिये (उरुम्) विस्तारयुक्त (पन्थाम्) मार्ग को (चकार) सिद्ध करते (उत) और (अपदे) जिसके कुछ भी चाक्षुष चिह्न नहीं है, उस अन्तरिक्ष में (प्रतिधातवे) धारण करने के लिये सूर्य के (पादा) जिनसे जाना-आना बने, उन गमन और आगमन गुणों को (अकः) सिद्ध करते हैं (उ) और जो परमात्मा सब का धर्त्ता (हि) और वायु इस काम के सिद्ध कराने का हेतु है, उसकी सब मनुष्य उपासना और प्राण का उपयोग क्यों न करें॥८॥

भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। जिस परमेश्वर ने निश्चय के साथ जिस सब से बड़े सूर्यलोक के लिये बड़ी-सी कक्षा अर्थात् उसके घूमने का मार्ग बनाया है, जो इसको वायुरूपी ईंधन से प्रदीप्त करता और जो सब लोक अन्तरिक्ष में अपनी-अपनी परिधियुक्त हैं कि किसी लोक का किसी लोकान्तर के साथ संग नहीं है, किन्तु सब अन्तरिक्ष में ठहरे हुए अपनी-अपनी परिधि पर चारों और घूमा करते हैं और जो आपस में जिस ईश्वर और वायु के आकर्षण और धारणशक्ति से अपनी-अपनी परिधि को छोड़कर इधर-उधर चलने को समर्थ नहीं हो सकते तथा जिस परमेश्वर और वायु के विना अन्य कोई भी इनका धारण करनेवाला नहीं है, जैसे परमेश्वर मिथ्यावादी अधर्म करनेवाले से पृथक् है, वैसे प्राण भी हृदय के विदीर्ण करनेवाले रोग से अलग है, उसकी उपासना वा कार्य्यों में योजना सब मनुष्य क्यों न करें॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

हृदय रोगों का प्रतिकार [चिकित्सा]

पदार्थान्वयभाषाः -१. (राजा वरुणः) - उस नियामक वरुण ने (सूर्याय अन्वेतवा उ) - सूर्य के चलने के लिए (हि) - निश्चय से (उरुम्) - विशाल (पन्थाम्) - मार्ग को (चकार) - बनाया है । लगभग ६० करोड़ मील का यह मार्ग है जिसमें सूर्य गति करता है ।  २. (उ) - और (अपदे) - जहाँ पाँव रखने का स्थान नहीं है उस आकाश में (पादा प्रति धातवे) - पाँव को रखने के लिए (अकः) - उस प्रभु ने व्यवस्था की है और यह सूर्य जब इस (ज्योतिश्चक्र) - में अगला - अगला कदम रखता है तो उस दिन को हम लोक में संक्रान्ति कहते हैं ।  ३. (उत) - और यह सूर्य (हृदयाविधः) - हृदय को विद्ध करनेवाली बीमारियों को (चित्) - निश्चय से (अपवक्ता) - झिड़ककर दूर भगा देनेवाला है । सूर्याभिमुख होकर प्रभु का ध्यान करने से छाती पर पड़नेवाली सूर्य - किरणे हदय के सब रोगों को दूर करती हैं । 'उद्यन्नादित्यः क्रिमीन् हन्तु निमरोचन् हन्तु रश्मिभिः।' उदय होता हुआ सूर्य कृमियों को नष्ट करता है और अस्त होता हुआ सूर्य भी रश्मियों से कृमियों को नष्ट करे । 

भावार्थभाषाः -भावार्थ - प्रभु द्वारा आकाश में स्थापित सूर्य हृदय के रोगों को दूर करता है । 

देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः छन्द: निचृत्त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

श॒तं ते॑ राजन्भि॒षजः॑ स॒हस्र॑मु॒र्वी ग॑भी॒रा सु॑म॒तिष्टे॑ अस्तु। बाध॑स्व दू॒रे निर्ऋ॑तिं परा॒चैः कृ॒तं चि॒देनः॒ प्र मु॑मुग्ध्य॒स्मत्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śataṁ te rājan bhiṣajaḥ sahasram urvī gabhīrā sumatiṣ ṭe astu | bādhasva dūre nirṛtim parācaiḥ kṛtaṁ cid enaḥ pra mumugdhy asmat ||

पद पाठ

श॒तम्। ते॒। रा॒ज॒न्। भि॒षजः॑। स॒हस्र॑म्। उ॒र्वी। ग॒भी॒रा। सु॒ऽम॒तिः। ते॒। अ॒स्तु॒। बाध॑स्व। दू॒रे। निःऽऋ॑तिम्। परा॒चैः। कृ॒तम्। चि॒त्। एनः॒। प्र। मु॒मु॒ग्धि॒। अ॒स्मत्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:24» मन्त्र:9 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:14» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:9

उपलब्ध भाष्य

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब जो राजा और प्रजा के मनुष्य हैं, वे किस प्रकार के हों, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

पदार्थान्वयभाषाः -(राजन्) हे प्रकाशमान प्रजाध्यक्ष वा प्रजाजन ! जिस (भिषजः) सर्व रोग निवारण करनेवाले (ते) आपकी (शतम्) असंख्यात औषधि और (सहस्रम्) असंख्यात (गभीरा) गहरी (उर्वी) विस्तारयुक्त भूमि है, उस (निर्ऋतिम्) भूमि की (त्वम्) आप (सुमतिः) उत्तम बुद्धिमान् हो के रक्षा करो, जो दुष्ट स्वभावयुक्त प्राणी के (प्रमुमुग्धि) दुष्ट कर्मों को छुड़ादे और जो (पराचैः) धर्म से अलग होनेवालों ने (कृतम्) किया हुआ (एनः) पाप है, उसको (अस्मत्) हम लोगों से (दूरे) दूर रखिये और उन दुष्टों को उनके कर्म के अनुकूल फल देकर आप (बाधस्व) उनकी ताड़ना और हम लोगों के दोषों को भी निवारण किया कीजिये॥९॥

भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को जानना चाहिये कि जो सभाध्यक्ष और प्रजा के उत्तम मनुष्य पाप वा सर्वरोग निवारण और पृथिवी के धारण करने, अत्यन्त बुद्धि बल देकर दुष्टों को दण्ड दिलवानेवाले होते हैं, वे ही सेवा के योग्य हैं और यह भी जानना कि किसी का किया हुआ पाप भोग के विना निवृत्त नहीं होता और इसके निवारण के लिये कुछ परमेश्वर की प्रार्थना वा अपना पुरुषार्थ करना भी योग्य ही है, किन्तु यह तो है जो कर्म जीव वर्त्तमान में करता वा करेगा, उसकी निवृत्ति के लिये तो परमेश्वर की प्रार्थना वा उपदेश भी होता है॥९॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

औषध व औषधज्ञान

पदार्थान्वयभाषाः -१. (राजन्) - सबको व्यवस्थित करनेवाले प्रभो! (ते) - आपकी (भिषजः) - ओषधियाँ (शतम्) - सैकड़ों हैं , (सहस्त्रम्) - हजारों हैं । प्रभु के बनाये हुए सभी वानस्पतिक पदार्थ औषधरूप हैं ।  २. परन्तु इन ओषधियों का समुचित प्रयोग ज्ञान के बिना सम्भव नहीं , अतः कहते हैं कि - हे प्रभो! (ते) - आपका (उर्वी) - विशाल (गभीरा) - गम्भीर (सुमतिः) - उत्तम ज्ञान भी (अस्तु) - हमें प्राप्त हो ।  ३. ज्ञान के द्वारा इन औषधों का ठीक प्रयोग करवाकर हे प्रभो! आप (निर्ऋतिम्) - रोगादि के कारण होनेवाली दुर्गति को (पराचैः) - पराङ्मुख गमनों से (दूरे बाधस्व) - हमसे दूर ही रोक दीजिए । रोग हमारे पास फटकें ही नहीं । दूसरे शब्दों में ये औषधद्रव्य रोगों का प्रतिकार [cure] ही नहीं करते , वे उन्हें आने से रोकनेवाले भी हैं [Preventive]|  ४. हे प्रभो! इस ज्ञान के द्वारा (कृतं चित् एनः) - उस पाप को जिसका कि हमें कुछ अभ्यास - सा पड़ गया है , (अस्मत्) - हमसे (प्रमुमुग्धि) - छुड़ा दीजिए । ज्ञान हमारे शारीरिक रोगों का ही निवर्तक न हो , यह हमारे मानस रोगों को भी दूर करनेवाला हो । 

भावार्थभाषाः -भावार्थ - हमें वरुण के औषध - द्रव्य प्राप्त हों , साथ ही गम्भीर ज्ञान प्राप्त हो । ज्ञान द्वारा औषध - प्रयोग से हम शारीरिक कष्टों को अपने से दूर करें और अभ्यस्त अशुभवृत्तियों को भी छोड़ पाएँ । 

देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

अ॒मी य ऋक्षा॒ निहि॑तास उ॒च्चा नक्तं॒ ददृ॑श्रे॒ कुह॑ चि॒द्दिवे॑युः। अद॑ब्धानि॒ वरु॑णस्य व्र॒तानि॑ वि॒चाक॑शच्च॒न्द्रमा॒ नक्त॑मेति॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

amī ya ṛkṣā nihitāsa uccā naktaṁ dadṛśre kuha cid diveyuḥ | adabdhāni varuṇasya vratāni vicākaśac candramā naktam eti ||

पद पाठ

अ॒मी इति॑। ये। ऋक्षाः॑। निऽहि॑तासः। उ॒च्चा। नक्त॑म्। ददृ॑श्रे। कुह॑। चि॒त्। दिवा॑। ई॒युः॒। अद॑ब्धानि। वरु॑णस्य। व्र॒तानि॑। वि॒ऽचाक॑शत्। च॒न्द्रमाः॑। नक्त॑म्। ए॒ति॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:24» मन्त्र:10 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:14» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:10

उपलब्ध भाष्य

स्वामी दयानन्द सरस्वती

जो लोक अन्तरिक्ष में दिखाई पड़ते हैं, वे किस के ऊपर वा किसने धारण किये हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

पदार्थान्वयभाषाः -हम पूछते हैं कि जो ये (अमी) प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष (ऋक्षाः) सूर्य्यचन्द्रतारकादि नक्षत्र लोक किसने (उच्चाः) ऊपर को ठहरे हुए (निहितासः) यथायोग्य अपनी-अपनी कक्षा में ठहराये हैं, क्यों ये (नक्तम्) रात्रि में (ददृश्रे) देख पड़ते हैं और (दिवा) दिन में (कुहचित्) कहाँ (ईयुः) जाते हैं। इन प्रश्नों के उत्तर-जो (वरुणस्य) परमेश्वर वा सूर्य के (अदब्धानि) हिंसारहित (व्रतानि) नियम वा कर्म हैं कि जिनसे ये ऊपर ठहरे हैं (नक्तम्) रात्रि में (विचाकशत्) अच्छे प्रकार प्रकाशमान होते हैं, ये कहीं नहीं जाते न आते हैं, किन्तु आकाश के बीच में रहते हैं (चन्द्रमाः) चन्द्र आदि लोक (एति) अपनी-अपनी दृष्टि के सामने आते और दिन में सूर्य्य के प्रकाश वा किसी लोक की आड़ से नहीं दीखते हैं, ये प्रश्नों के उत्तर हैं॥१०॥

भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है तथा इस मन्त्र के पहिले भाग से प्रश्न और पिछले भाग से उनका उत्तर जानना चाहिये कि जब कोई किसी से पूछे कि ये नक्षत्र लोक अर्थात् तारागण किसने बनाये और किसने धारण किये हैं और रात्रि में दीखते तथा दिन में कहाँ जाते हैं, इनके उत्तर ये हैं कि ये सब ईश्वर ने बनाये और धारण किये हैं, इनमें आप ही प्रकाश नहीं किन्तु सूर्य्य के ही प्रकाश से प्रकाशमान होते हैं और ये कहीं नहीं जाते, किन्तु दिन में ढपे हुए दीखते नहीं और रात्रि में सूर्य की किरणों से प्रकाशमान होकर दीखते हैं, ये सब धन्यवाद देने योग्य ईश्वर के ही कर्म हैं, ऐसा सब सज्जनों को जानना चाहिये॥२०॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सृष्टि का वैचित्र्य

पदार्थान्वयभाषाः -१. संसार में एक - एक वस्तु अद्भुत है । प्रभु की बनाई हुई प्रत्येक कृति उसकी विभूति है , परन्तु प्रकृति - निरीक्षण करनेवाले को यह विचित्र प्रतीत होता है कि (अमी ये - जो वे (ऋक्षाः) - तारे (उच्चा निहितासः) - ऊपर आकाश में रखे हुए हैं (नक्तम् ददृश्रे) - अरे , रात को दिखते थे , ये सब तारे (दिवा) - दिन में (कुह चित्) - कहाँ (ईयुः) - चले गये? ये तो अब दिख नहीं रहे , यह हुआ क्या? रात में सारे आकाश को इन्होंने आवृत किया हुआ था । टिमटिमाते हुए ये तारे उस प्रभु का स्तवन कर रहे थे , ये गये कहाँ?  २. इस प्रश्न का स्वयं उत्तर देते हुए वह अपने से कहता है कि (वरुणस्य) - उस सारे ब्रह्माण्ड के नियामक प्रभु के (व्रतानि) - व्रत (अदब्धानि) - अहिंसित हैं । प्रभु के नियमों को कौन तोड़ सकता है? देखो न , यह (विचाकशत्) - अत्यन्त चमकता हुआ (चन्द्रमा) - चाँद (नक्तम्) - रात्रि में (एति) - फिर आ जाता है ।   

भावार्थभाषाः -भावार्थ - यह सारा काव्य कितना सुन्दर है कि रात में चमकते तारे न जाने दिन में कहाँ छिप जाते हैं और फिर रात में चमकता हुआ चन्द्रमा उदय हो जाता है । 

देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः छन्द: निचृत्त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

तत्त्वा॑ यामि॒ ब्रह्म॑णा॒ वन्द॑मान॒स्तदा शा॑स्ते॒ यज॑मानो ह॒विर्भिः॑। अहे॑ळमानो वरुणे॒ह बो॒ध्युरु॑शंस॒ मा न॒ आयुः॒ प्र मो॑षीः॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tat tvā yāmi brahmaṇā vandamānas tad ā śāste yajamāno havirbhiḥ | aheḻamāno varuṇeha bodhy uruśaṁsa mā na āyuḥ pra moṣīḥ ||

पद पाठ

तत्। त्वा॒। या॒मि॒। ब्रह्म॑णा। वन्द॑मानः। तत्। आ। शा॒स्ते॒। यज॑मानः। ह॒विःऽभिः॑। अहे॑ळमानः। व॒रु॒ण॒। इ॒ह। बो॒धि॒। उरु॑ऽशंस। मा। नः॒। आयुः॑। प्र। मो॒षीः॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:24» मन्त्र:11 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:15» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:11

उपलब्ध भाष्य

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह वरुण कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

पदार्थान्वयभाषाः -हे (उरुशंस) सर्वथा प्रशंसनीय (वरुण) जगदीश्वर ! जिस (त्वा) आपका आश्रय लेके (यजमानः) उक्त तीन प्रकार यज्ञ करनेवाला विद्वान् (हविर्भिः) होम आदि साधनों से (तत्) अत्यन्त सुख की (आशास्ते) आशा करता है, उन आप को (ब्रह्मणा) वेद से स्मरण और अभिवादन तथा (अहेळमानः) आपका अनादर अर्थात् अपमान नहीं करता हुआ मैं (यामि) आपको प्राप्त होता हूँ, आप कृपा करके मुझे (इह) इस संसार में (बोधि) बोधयुक्त कीजिये और (नः) हमारी (आयुः) उमर (मा) (प्रमोषीः) मत व्यर्थ खोइये अर्थात् अति शीघ्र मेरे आत्मा को प्रकाशित कीजिये॥१॥११॥(तत्) सुख की इच्छा करता हुआ (यजमानः) तीन प्रकार के यज्ञ का अनुष्ठान करनेवाला जिस (उरुशंस) अत्यन्त प्रशंसनीय (वरुण) सूर्य को (आशास्ते) चाहता है (त्वा) उस सूर्य्य को (ब्रह्मणा) वेदोक्त क्रियाकुशलता से (वन्दमानः) स्मरण करता हुआ (अहेळमानः) किन्तु उसके गुणों को न भूलता और (इह) इस संसार में (तत्) उक्त सुख की इच्छा करता हुआ मैं (यामि) प्राप्त होता हूँ कि जिससे यह (उरुशंस) अत्यन्त प्रशंसनीय सूर्य्य हमको (बोधि) विदित होकर (नः) हम लोगों की (आयुः) उमर (मा) (प्रमोषीः) न नष्ट करे अर्थात् अच्छे प्रकार बढ़ावे॥२॥११॥

भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को वेदोक्त रीति से परमेश्वर और सूर्य को जानकर सुखों को प्राप्त होना चाहिये और किसी मनुष्य को परमेश्वर वा सूर्य विद्या का अनादर न करना चाहिये, सर्वदा ईश्वर की आज्ञा का पालन और उसके रचे हुए जो कि सूर्यादिक पदार्थ हैं, उनके गुणों को जानकर उनसे उपकार लेके अपनी उमर निरन्तर बढ़ानी चाहिये॥११॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभुकृपा व दीर्घायुष्य

पदार्थान्वयभाषाः -१. स्तुति करते हुए भक्त कहता है कि (ब्रह्मणा) - स्तोत्रो से (वन्दमानः) - स्तवन करता हुआ मैं (त्वा) - आपसे (तत् यामि) - यही याचना करता हूँ और (यजमानः) - यज्ञशील पुरुष (हविर्भिः) - दानपूर्वक अदन से (तत् आशास्ते) - वही बात कहता है कि हे (वरुण) - सारे ब्रह्माण्ड के नियामक प्रभो! (इह) - इस जीवन में (अहेळमानः) - हमपर किसी प्रकार का क्रोध न करते हुए (बोधि) - हमारा ध्यान करिए [Look after us] और हे (उरुशंस) - खूब स्तुति के योग्य प्रभो ! (नः आयु) - हमारी आयु को (मा प्रमोषीः) - मत चुरने दीजिए , अर्थात् हमारी आयु को चूने मत दीजिए , क्षीण मत होने दीजिए ।  २. हम यज्ञों व ज्ञानों को इसीलिए प्राप्त करते हैं कि हम वरुण के क्रोध - पात्र न हों और हमारा जीवन दीर्घ हो । 

भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम मन्त्रों व ज्ञानों से तथा यजमान बनकर हवियों से प्रभु की अर्चना करते हुए यही चाहते हैं कि हम प्रभु के प्रिय बने रहें और दीर्घायु हों । 

देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः छन्द: निचृत्त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

तदिन्नक्तं॒ तद्दिवा॒ मह्य॑माहु॒स्तद॒यं केतो॑ हृ॒द आ वि च॑ष्टे। शुनः॒शेपो॒ यमह्व॑द्गृभी॒तः सो अ॒स्मान्राजा॒ वरु॑णो मुमोक्तु॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tad in naktaṁ tad divā mahyam āhus tad ayaṁ keto hṛda ā vi caṣṭe | śunaḥśepo yam ahvad gṛbhītaḥ so asmān rājā varuṇo mumoktu ||

पद पाठ

तत्। इत्। नक्त॑म्। तत्। दिवा॑। मह्य॑म्। आ॒हुः॒। तत्। अ॒यम्। केतः॑। हृ॒दः। आ। वि। च॒ष्टे॒। शुनः॒शेपः॑। यम्। अह्व॑त्। गृ॒भी॒तः। सः। अ॒स्मान्। राजा॑। वरु॑णः। मु॒मो॒क्तु॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:24» मन्त्र:12 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:15» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:12

उपलब्ध भाष्य

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह वरुण कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

पदार्थान्वयभाषाः -विद्वान् लोग (नक्तम्) रात (दिवा) दिन जिस ज्ञान का (आहुः) उपदेश करते हैं (तत्) उस और जो (मह्यम्) विद्या धन की इच्छा करनेवाले मेरे लिये (हृदः) मन के साथ आत्मा के बीच में (केतः) उत्तम बोध (आविचष्टे) सब प्रकार से सत्य प्रकाशित होता है (तदित्) उसी वेद बोध अर्थात् विज्ञान को मैं मानता कहता और करता हूँ (यम्) जिस को (शुनःशेपः) अत्यन्त ज्ञानवाले विद्याव्यवहार के लिये प्राप्त और परमेश्वर वा सूर्य्य का (अह्वत्) उपदेश करते हैं, जिससे (वरुणः) श्रेष्ठ (राजा) प्रकाशमान परमेश्वर हमारी उपासना को प्राप्त होकर छुड़ावे और उक्त सूर्य्य भी अच्छे प्रकार जाना और क्रिया कुशलता में युक्त किया हुआ बोध (मह्यम्) विद्या धन की इच्छा करनेवाले मुझ को प्राप्त होता है (सः) हम लोगों को योग्य है कि उस ईश्वर की उपासना और सूर्य्य का उपयोग यथावत् किया करें॥१२॥

भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। सब मनुष्यों को इस प्रकार उपदेश करना तथा मानना चाहिये कि विद्वान् वेद और ईश्वर हमारे लिये जिस ज्ञान का उपदेश करते हैं तथा हम जो अपनी शुद्ध बुद्धि से निश्चय करते हैं, वही मुझ को और हे मनुष्य ! तुम सब लोगों को स्वीकार करके पाप अधर्म करने से दूर रक्खा करे॥१२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभुस्तवन व मुक्ति

पदार्थान्वयभाषाः -१. (तत् इत्) - यह वरुण स्तवन की बात ही (नक्तम्) - रात्रि में (तत् दिवा) - उसी स्तवन की बात को दिन में (मह्यम्) - मुझे (आहुः) सब विद्वान् कहते हैं , अर्थात् दिन - रात सभी विद्वान् यही कहते हैं कि "वरुण का ही स्तवन करना चाहिए ।" २. (अयम्) - यह (हृदः केतः) - मेरे अपने हृदय का ज्ञान भी (तत्) - इसी वरुणस्तवन की बात को (आविचष्टे) - बारम्बार कहता है ।  ३. अतः मैं तो यही कहता हूँ कि (शुनः शेपः) - अपने - आपको सुखी बनाने की इच्छावाला यह पुरुष (गृभीतः) - इन विषयों से पकड़ा हुआ (यम्) - जिस वरुण को (अह्वत्) - पुकारता है , (सः वरुणः राजा) - वह नियामक प्रभु (अस्मान्) - हमें (मुमोक्तु) - इन विषय - बन्धनों से मुक्त करे ।  ४. संसार के विषय इतने अधिक आकर्षक व प्रबल हैं प्रभु - कृपा से ही हम इनके बन्धनों से छूट सकते हैं , अतः हम निरन्तर प्रभु - स्तवन करते हुए इनसे बचने के लिए प्रयत्नशील हों । 

भावार्थभाषाः -भावार्थ - प्रभुस्तवन ही हमें विषय - बन्धन से छुड़ा सकता है । 

देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः छन्द: भुरिक्पङ्क्ति स्वर: धैवतः

शुनः॒शेपो॒ ह्यह्व॑द्गृभी॒तस्त्रि॒ष्वा॑दि॒त्यं द्रु॑प॒देषु॑ ब॒द्धः। अवै॑नं॒ राजा॒ वरु॑णः ससृज्याद्वि॒द्वाँ अद॑ब्धो॒ वि मु॑मोक्तु॒ पाशा॑न्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śunaḥśepo hy ahvad gṛbhītas triṣv ādityaṁ drupadeṣu baddhaḥ | avainaṁ rājā varuṇaḥ sasṛjyād vidvām̐ adabdho vi mumoktu pāśān ||

पद पाठ

शुनः॒शेपः॑। हि। अह्व॑त्। गृ॒भी॒तः। त्रि॒षु। आ॒दि॒त्यम्। द्रु॒ऽप॒देषु॑। ब॒द्धः। अव॑। ए॒न॒म्। राजा॑। वरु॑णः। स॒सृ॒ज्या॒त्। वि॒द्वान्। अद॑ब्धः। वि। मु॒मो॒क्तु॒। पाशा॑न्॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:24» मन्त्र:13 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:15» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:13

उपलब्ध भाष्य

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह वरुण कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

पदार्थान्वयभाषाः -जैसे (शुनःशेपः) उक्त गुणवाला विद्वान् (त्रिषु) कर्म उपासना और ज्ञान में (आदित्यम्) अविनाशी परमेश्वर का (अह्वत्) आह्वान करता है, वह हम लोगों ने (गृभीतः) स्वीकार किया हुआ उक्त तीनों कर्म उपासना और ज्ञान को प्रकाशित कराता है और जो (द्रुपदेषु) क्रिया कुशलता की सिद्धि के लिये विमान आदि यानों के खम्भों में (बद्धः) नियम से युक्त किया हुआ वायु ग्रहण किया है, वैसे वह लोगों को भी ग्रहण करना चाहिये, जैसे-जैसे गुणवाले पदार्थ को (अदब्धः) अति प्रशंसनीय (वरुणः) अत्यन्त श्रेष्ठ (राजा) और प्रकाशमान परमेश्वर (अवससृज्यात्) पृथक्-पृथक् बनाकर सिद्ध करे, वह हम लोगों को भी वैसे ही गुणवाले कामों में संयुक्त करे। हे भगवन् ! परमेश्वर ! आप हमारे (पाशान्) बन्धनों को (विमुमोक्तु) बार-बार छुड़वाइये। इसी प्रकार हम लोगों की क्रियाकुशलता में संयुक्त किये हुए प्राण आदि पदार्थ (पाशान्) सकल दरिद्ररूपी बन्धनों को (विमुमोक्तु) बार-बार छुड़वा देवें वा देते हैं॥१३॥

भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में भी लुप्तोपमा और श्लेषालङ्कार है। परमेश्वर ने जिस-जिस गुणवाले जो-जो पदार्थ बनाये हैं, उन-उन पदार्थों के गुणों को यथावत् जानकर इन-इन को कर्म, उपासना और ज्ञान में नियुक्त करे, जैसे परमेश्वर न्याय अर्थात् न्याययुक्त कर्म करता है, वैसे ही हम लोगों को भी कर्म नियम के साथ नियुक्त कर जो बन्धनों के करनेवाले पापात्मक कर्म हैं, उनको दूर ही से छोड़कर पुण्यरूप कर्मों का सदा सेवन करना चाहिये॥१३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तीन बन्धन

पदार्थान्वयभाषाः -१. 'संसार' शब्द "सृ गतौ" धातु से बना है । 'जगत्' 'गम गतौ' से तथा 'द्रु' 'द्रु गतौ' से । एवं 'द्रु' का अभिप्राय यहाँ संसार है । संसार के तीन 'पद' - स्थान 'सत्त्व , रज व तम' हैं । ये तीनों मनुष्य को बाँधते हैं । इनके बन्धन से पीड़ित होकर वह (शुनःशेपः) - सुख के निर्माण को चाहनेवाला पुरुष (हि) - निश्चय से (त्रिषु द्रुपदेषु) - इन तीनों संसार के स्थानों में (बद्धः) - बँधा हुआ (गृभीतः) - उनसे जकड़ा हुआ (आदित्यम्) - उस आदित्य को [अविद्यमाना - दितिर्यस्मात्] जिससे खण्डन का सम्भव ही नहीं उस वरुण को (अह्वत्) - पुकारता है । मनुष्य विवश होने पर तो प्रभु का स्मरण अवश्य करता है ।  २. जब वह 'शुनः शेप' पुकारता है तब (राजा वरुणः) - वह व्यवस्थापक प्रभु (एनम्) - इस बद्ध पुरुष को (अवससृज्यात्) - इन बन्धनों से छुड़ाए ।  ३. यह बन्धनों से छूटा हुआ (विद्वान्) - ज्ञानी पुरुष (अदब्धः) - स्वयं विषयों से हिंसित न होता हुआ (पाशान्) - सब जालों को (विमुमोक्तु) - छुड़ा दे । प्रभु ने इसे मुक्त किया । यह ज्ञान देकर औरों को मुक्त करनेवाला बने । इस प्रकार यह थोड़ा - सा प्रभु - ऋण से अनृण हो जाएगा अथवा प्रभु के निर्देशों का पालन करता हुआ प्रभु का प्रिय बन पाएगा । 

भावार्थभाषाः -भावार्थ - प्रभु हमें बन्धन - मुक्त करें तथा हम औरों को बन्धन - मुक्त करने का प्रयास करें । 

देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

अव॑ ते॒ हेळो॑ वरुण॒ नमो॑भि॒रव॑ य॒ज्ञेभि॑रीमहे ह॒विर्भिः॑। क्षय॑न्न॒स्मभ्य॑मसुर प्रचेता॒ राज॒न्नेनां॑सि शिश्रथः कृ॒तानि॑॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ava te heḻo varuṇa namobhir ava yajñebhir īmahe havirbhiḥ | kṣayann asmabhyam asura pracetā rājann enāṁsi śiśrathaḥ kṛtāni ||

पद पाठ

अव॑। ते॒। हेळः॑। व॒रु॒ण॒। नमः॑ऽभिः। अव॑। य॒ज्ञेभिः॑। ई॒म॒हे॒। ह॒विःऽभिः॑। क्षय॑न्। अ॒स्मभ्य॑म्। अ॒सु॒र॒। प्र॒चे॒त॒ इति॑ प्रऽचेतः। राज॑न्। एनां॑सि। शि॒श्र॒थः॒। कृ॒तानि॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:24» मन्त्र:14 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:15» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:14

उपलब्ध भाष्य

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह वरुण कैसा है, इस का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

पदार्थान्वयभाषाः -हे (राजन्) प्रकाशमान ! (प्रचेतः) अत्युत्तम विज्ञान (असुर) प्राणों में रमने (वरुण) अत्यन्त प्रशंसनीय (अस्मभ्यम्) हमको विज्ञान देनेहारे भगवन् जगदीश्वर ! जिसलिये हम लोगों के (कृतानि) किये हुए (एनांसि) पापों को (क्षयन्) विनाश करते हुए (अवशिश्रथः) विज्ञान आदि दान से उनके फलों को शिथिल अच्छे प्रकार करते हैं, इसलिये हम लोग (नमोभिः) नमस्कार वा (यज्ञेभिः) कर्म उपासना और ज्ञान और (हविर्भिः) होम करने योग्य अच्छे-अच्छे पदार्थों से (ते) आपका (हेळः) निरादर (अव) न कभी (ईमहे) करना जानते और मुख्य प्राण की भी विद्या को चाहते हैं॥१४॥

भावार्थभाषाः -जिन मनुष्यों ने परमेश्वर के रचे हुए संसार में पदार्थ करके प्रकट किये हुए बोध से किये पाप कर्मों को फलों से शिथिल कर दिया, वैसा अनुष्ठान करें। जैसे अज्ञानी पुरुष को पापफल दुःखी करते हैं, वैसे ज्ञानी पुरुष को दुःख नहीं दे सकते॥१४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु के क्रोध से बचना व पापों से दूर होना

पदार्थान्वयभाषाः -१. हे वरुण - सब बन्धनों के निवारण करनेवाले प्रभो ! (ते हेळः) - आपके क्रोध को (नमोभिः) - नमस्कारों के द्वारा अथवा नम्रता - धारण के द्वारा अब (ईमहे) - दूर हुआ - हुआ चाहते हैं अथवा दूर करते हैं ।  २. (यज्ञेभिः) - देवपूजा , संगतीकरण व दानों के द्वारा (अव) [ईमहे] - आपके क्रोध को दूर करते हैं तथा  ३. (हविर्भिः) - सदा दानपूर्वक अदन की वृत्तियों से (अव) - आपके क्रोध को हटाते हैं ।  ४. हे (क्षयन्) - हमारे अन्दर निवास करते हुए सब गतियों के करनेवाले प्रभो ! हे (असर , अस्मभ्यम्) - हमारी सब बुराइयों को परे फेंकनेवाले प्रभो ! अथवा प्राणशक्ति का हममें सञ्चार करनेवाले प्रभो ! [असून राति] (प्रचेतः) - प्रकृष्ट चेतनावाले प्रभो ! (राजन्) - हमारे जीवनों को व्यवस्थित करनेवाले प्रभो ! (कृतानि) - अभ्यस्त (एनांसि) - पापों को (शिश्रथः) - शिथिल करने की कृपा करिए । वस्तुतः पापों को ढीला करने के लिए आवश्यक है कि हम [क] गतिशील बनें [क्षयन्] , [ख] प्राणशक्ति - सम्पन्न हों [असुर] , [ग] ज्ञान को बढ़ाने का प्रयत्न करें [प्रचेतः] , [घ] जीवन को व्यवस्थित करने का प्रयत्न करें [राजन्] । 

भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम नम्रता , यज्ञ व हवि द्वारा प्रभु के क्रोध को दूर करें । गतिशील , प्राणशक्ति सम्पन्न , ज्ञानी व व्यवस्थित जीवनवाले बनकर हम अपनी पाप करने की आदत को दूर करें । 

देवता: वरुणः ऋषि: शुनःशेप आजीगर्तिः स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः छन्द: विराट्त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

उदु॑त्त॒मं व॑रुण॒ पाश॑म॒स्मदवा॑ध॒मं वि म॑ध्य॒मं श्र॑थाय। अथा॑ व॒यमा॑दित्य व्र॒ते तवाना॑गसो॒ अदि॑तये स्याम॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ud uttamaṁ varuṇa pāśam asmad avādhamaṁ vi madhyamaṁ śrathāya | athā vayam āditya vrate tavānāgaso aditaye syāma ||

पद पाठ

उत्। उ॒त्ऽत॒मम्। व॒रु॒ण॒। पाश॑म्। अ॒स्मत्। अव॑। अ॒ध॒मम्। वि। म॒ध्य॒मम्। श्र॒थ॒य॒। अथ॑। व॒यम्। आ॒दि॒त्य॒। व्र॒ते। तव॑। अना॑गसः। अदि॑तये। स्या॒म॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:24» मन्त्र:15 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:15» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:6» मन्त्र:15

उपलब्ध भाष्य

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर भी अगले मन्त्र में वरुण शब्द ही का प्रकाश किया है॥

पदार्थान्वयभाषाः -हे (वरुण) स्वीकार करने योग्य ईश्वर ! आप (अस्मत्) हम लोगों से (अधमम्) निकृष्ट (मध्यमम्) अर्थात् निकृष्ट से कुछ विशेष (उत्) और (उत्तमम्) अति दृढ़ अत्यन्त दुःख देनेवाले (पाशम्) बन्धन को (व्यवश्रथाय) अच्छे प्रकार नष्ट कीजिये (अथ) इसके अनन्तर हे (आदित्य) विनाशरहित जगदीश्वर ! (तव) उपदेश करनेवाले सब के गुरु आपके (व्रते) सत्याचरणरूपी व्रत को करके (अनागसः) निरपराधी होके हम लोग (अदितये) अखण्ड अर्थात् विनाशरहित सुख के लिये (स्याम) नियत होवें॥१५॥

भावार्थभाषाः -जो ईश्वर की आज्ञा को यथावत् नित्य पालन करते हैं, वे ही पवित्र और सब दुःख बन्धनों से अलग होकर सुखों को निरन्तर प्राप्त होते हैं॥१५॥तेईसवें सूक्त के कहे हुए वायु आदि अर्थों के अनुकूल प्रजापति आदि अर्थों के कहने से इस चौबीसवें सूक्त की उक्त सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'उत्तमाधम मध्यम' पाश

पदार्थान्वयभाषाः -१. हे (वरुण) - सब पापों का विनाश करनेवाले प्रभो! (उत्तमम् , पाशम्) - सत्त्व गुण के उत्कृष्ट पाश को , 'सत्त्वं सुखे संजयति' , 'सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ' , अर्थात् सुख व ज्ञान के संग को (उत् श्रथाय) - हमें उनसे ऊपर उठाकर ढीला कर दो , अर्थात् हम आपकी कृपा से सुखसङ्ग व ज्ञानसङ्ग से भी ऊपर उठे ।  २. (अधमम् पाशम्) - तमोगुण के प्रमाद , आलस्य व निद्रा रूप बन्धन को (अवश्रथाय) - हम से दूर [away] कीजिए ।  ३. आप कृपा करके (मध्यम् पाशम्) - रजोगुण के कर्मसङ्ग को [रजः कर्मणि भारत] भी (विश्रथाय) - विशेष रूप से ढीला कीजिए । हम कर्म के अभिमान से ऊपर उठें । हम अहंकारविमूढात्मा बनकर अपने को ही कर्ता न मानते रहें ।  ४. इस प्रकार सब बन्धनों के ढीले हो जाने पर (अथा) - अब (वयम्) - हम हे (आदित्य) - हमें खण्डन व विनाश से बचानेवाले प्रभो ! (तव व्रते) - आपके व्रतों में चलते हुए (अनागसः) - निष्पाप होकर (अदितये) - अविनाश व मोक्ष के लिए (स्याम) - हों । यहाँ 'आदित्य' वरुण का ही नाम है । 'वरुण' हमें व्रतों के बन्धन में अपने को बाँधने का निर्देश करते हैं । हमारा जीवन व्रती होगा तो ये उत्तम , मध्यम व अधम सभी पाश टूट सकेंगे । 

भावार्थभाषाः -भावार्थ - प्रभुकृपा से हमारे सारे बन्धन ढीले हो जाएं , इसके लिए हम अपने - आपको व्रतों के बन्धन में बाँधे । 

टिप्पणी: सूक्त का आरम्भ प्रभु के नामस्मरण से होता है , जो प्रभु हमें महनीय जीवन प्राप्त कराते हैं [१] , वे प्रभु ही हमें भजनीय धनों को भी देते हैं [३] । उस प्रभु का बल , सहनशक्ति व ज्ञान अनन्त है [६] । सूर्य प्रभु का वह विद्युद्दीप [Torch] है , जिससे कि किरणों के द्वारा वे प्रकाश व प्राण - शक्ति को नीचे भेजते हैं [७] । सूर्यकिरणें हृदयरोग को दूर करनेवाली हैं [८] । एक - एक वनस्पति औषध है , इनका ज्ञान प्राप्त करके हम इनके उपयोग से आधि - व्याधियों से ऊपर उठते हैं [९] । क्या तारे क्या चन्द्र - ये प्रभु की अद्भुत विभूतियाँ हैं [१०] । हम प्रभु से यही चाहते हैं कि हम प्रभु के क्रोध के पात्र न बनें [११] । वस्तुतः प्रभु ही हमें पापों से मुक्त करेंगे [१२] । वे ही हमारे त्रिविध बन्धनों को ढीला करेंगे [१५] । अब कहते हैं कि हम प्रभु के व्रतों को तोड़ते भी हैं तो हे प्रभो ! आपकी ही तो प्रजा हैं । आप ही तो हमें ठीक करेंगे -

ऋग्वेद 1.24: अंतरिक्ष विज्ञान और वरुण

ऋग्वेद मण्डल 1 | सूक्त 24

देवता: अग्नि, सविता, वरुण | ऋषि: शुन:शेप आजीगर्ति

1. वरुण: ब्रह्मांडीय नियमों का अधिपति

इस सूक्त में वरुण देव को 'ऋत' (Cosmic Order) का रक्षक माना गया है। वह केवल एक पौराणिक देवता नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की भौतिक शक्तियों का रूपक हैं।

"उरुं हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थामनुवेतवा उ ।" (ऋग्वेद 1.24.8)
वैज्ञानिक व्याख्या: यह मंत्र स्पष्ट करता है कि सूर्य एक निश्चित पथ (Orbit) पर चलता है जिसे वरुण (अंतरिक्षीय गुरुत्वाकर्षण/Space-time) ने बनाया है। यह प्राचीन भारत की खगोलीय समझ को दर्शाता है।

2. प्रकाश का निराधार संचरण

मंत्र 7 में वरुण की शक्ति द्वारा प्रकाश की किरणों के नीचे की ओर प्रसार का वर्णन है, जिसका आधार (Root) ऊपर की ओर है।

वैज्ञानिक तथ्य: सूर्य की रश्मियाँ अंतरिक्ष (Vacuum) में बिना किसी ठोस सहारे के यात्रा करती हैं। वैदिक ऋषि ने 'अबुध्ने' शब्द का प्रयोग करके यह सिद्ध किया कि प्रकाश को यात्रा करने के लिए किसी 'जड़' या भौतिक आधार की आवश्यकता नहीं होती।

3. बंधन और मुक्ति (The Concept of Bonds)

सूक्त के अंत में वरुण के 'पाश' (Bondage) से मुक्ति की प्रार्थना है।

  • उत्तम पाश: ऊपरी वायुमण्डल (Ionosphere/Atmosphere).
  • मध्यम पाश: मध्य वायुमण्डल।
  • अधम पाश: पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण।
वैज्ञानिक व्याख्या: यह मानवीय चेतना और भौतिक शरीर पर गुरुत्वाकर्षण (Gravity) और वायुमण्डलीय दबाव (Atmospheric Pressure) के प्रभाव का सूक्ष्म वर्णन हो सकता है।

"सत्य और विज्ञान का संगम ही वेदों का मूल है।"

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