दस्रा॑ यु॒वाक॑वः सु॒ता नास॑त्या वृ॒क्तब॑र्हिषः।
आ या॑तं रुद्रवर्तनी॥ ऋग्वेद १.३.३
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर भी वे अश्वी किस प्रकार के हैं, सो अगले मन्त्र में उपदेश किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -हे (युवाकवः) एक दूसरी से मिली वा पृथक् क्रियाओं को सिद्ध करने (सुताः) पदार्थविद्या के सार को सिद्ध करके प्रकट करने (वृक्तबर्हिषः) उसके फल को दिखानेवाले विद्वान् लोगो ! (रुद्रवर्त्तनी) जिनका प्राणमार्ग है, वे (दस्रा) दुःखों के नाश करनेवाले (नासत्या) जिनमें एक भी गुण मिथ्या नहीं (आयातम्) जो अनेक प्रकार के व्यवहारों को प्राप्त करानेवाले हैं, उन पूर्वोक्त अश्वियों को जब विद्या से उपकार में ले आओगे, उस समय तुम उत्तम सुखों को प्राप्त होवोगे॥३॥
भावार्थभाषाः -परमेश्वर मनुष्यों को उपदेश करता है कि हे मनुष्य लोगो ! तुमको सब सुखों की सिद्धि के लिये तथा दुःखों के विनाश के लिये शिल्पविद्या में अग्नि और जल का यथावत् उपयोग करना चाहिये॥३॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वासना - विनाश
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र में वर्णित अश्विना को ही यहाँ (दस्रा) - नाम से स्मरण किया गया है । 'दसु उपक्षये' ये मन के काम - क्रोधादि शत्रुओं का संहार करनेवाले हैं और शरीर के रोगों को नष्ट करनेवाले हैं ।
२. (नासत्या) - ये असत्य से रहित हैं , सत्य का ही प्रणयन करनेवाले हैं , अर्थात् प्राणसाधना के होने पर हमारे जीवन से असत्य दूर हो जाता है । शरीर में रोग 'असत्य' हैं , मन में राग - द्वेष 'असत्य हैं , बुद्धि में मन्दता असत्य' है । ये प्राणापान इस सम्पूर्ण असत्य को दूर करनेवाले हैं ।
३. हे प्राणापानो ! तुम्हारे द्वारा ही ये सोमकण (सुताः) - शरीर में उत्पादित किये जाते हैं । प्राणापानों से ही इनका शरीर में रक्षण होता है । रक्षित हुए - हुए ये सोम (युवाकवः) - [यु मिश्रण - अमिश्रण] हमें अशुभ से दूर करते हैं और शुभ से हमारा सम्पर्क कराते हैं । इस प्रकार (वृक्तबर्हिषः) [वृक्तानि - मूलैर्विजितानि - सा०] - ये वासनाओं की जड़ों को भी हृदयान्तरिक्ष में से उखाड़ फेंकते हैं और हृदयों को बड़ा निर्मल बना देते हैं ।
४. हे प्राणापानो ! इस प्रकार सोमरक्षा के द्वारा वासनाओं व रोगों से संग्राम करनेवाले (रुद्रवर्तनी) [रोदयन्ति] - शत्रुओं को रुलानेवालों के मागाँवाले तुम (आयातम्) - हमें प्राप्त होओ । प्राणापानों का मार्ग वह हो जो कि रुद्रों का मार्ग है । रुद्र शत्रुओं को रुलानेवाले हैं । ये प्राणापान भी हमारे वासनात्मक शत्रुओं को रुलानेवाले हैं । इनके द्वारा हमारे हृदयदेश से काम-क्रोध-लोभ आदि शत्रु समूल नष्ट हो जाएँ ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - प्राणसाधना से सब वासनाएँ विनष्ट हो जाती हैं ।
ऋग्वेद के इस मंत्र (मण्डल 1, सूक्त 3, ऋचा 3) की वैज्ञानिक व्याख्या ऊर्जा के दोहरेपन (Duality), परिशोधन (Refining) और प्रवाह के पथ (Path of Flow) के सिद्धांतों को उजागर करती है। यहाँ 'अश्विनी कुमारों' (नासत्या) को केंद्र में रखकर ब्रह्मांडीय संतुलन की चर्चा की गई है।
मंत्र एवं शब्दार्थ
दस्रा॑ यु॒वाक॑वः सु॒ता नास॑त्या वृ॒क्तब॑र्हिषः।
आ या॑तं रुद्रवर्तनी॥
दस्रा: कष्टों का नाश करने वाले या अद्भुत कर्म करने वाले (Performers of miracles/Destroyers of disease)।
युवाकवः ऊर्जा को मिश्रित या एकीकृत करने वाले (Unifiers/Mixers of energy)।
सुता: तैयार किया गया अर्क या ऊर्जा का संचित रूप (Processed energy/Soma)।
नासत्या: जो कभी असत्य नहीं होते, यानी अटल प्राकृतिक नियम (Eternal laws of nature/Truth)।
वृक्तबर्हिषः जिन्होंने बाधाओं (कुश/बर्हि) को हटाकर मार्ग साफ कर लिया है (Those who have cleared the path/Refined the seat)।
आ यातम्: पधारें या सक्रिय हों।
रुद्रवर्तनी: प्रचंड गति वाले मार्ग से आने वाले (Those whose path is fiery or high-velocity)।
वैज्ञानिक विवेचना (Scientific Analysis)
1. नासत्या और युवाकवः: ऊर्जा का द्वैतवाद (Wave-Particle Duality)
अश्विनी कुमार दो हैं, जो हमेशा साथ चलते हैं। विज्ञान में कई चीजें जोड़ों में कार्य करती हैं:
Duality: जैसे प्रकाश 'कण' (Particle) और 'तरंग' (Wave) दोनों है।
Polarity: जैसे चुम्बक के दो ध्रुव (North & South) या विद्युत के दो आवेश (Positive & Negative)।
'युवाकवः' शब्द उस प्रक्रिया को दर्शाता है जहाँ ये दो विपरीत या पूरक शक्तियाँ मिलकर एक 'परिणाम' (Result) उत्पन्न करती हैं।
2. वृक्तबर्हिषः बाधा मुक्त संचरण (Superconductivity)
'बर्हि' का अर्थ है वह आसन या माध्यम जहाँ ऊर्जा बैठती है। 'वृक्त' का अर्थ है काटना या परिष्कृत करना।
Resistance-free Path: वैज्ञानिक दृष्टि से, जब किसी माध्यम से बाधा (Resistance) हटा दी जाती है, तो ऊर्जा बिना क्षय के बहती है। यह Superconductivity के सिद्धांत जैसा है, जहाँ अवरोधों को हटाकर धारा का सुचारू प्रवाह सुनिश्चित किया जाता है।
3. सुता: डेटा प्रोसेसिंग (Refined Input)
'सुता' का अर्थ है वह ऊर्जा जिसे परिष्कृत (Extract) किया गया है।
Signal Refining: यह मंत्र बताता है कि दिव्य शक्तियाँ (अश्विनी कुमार) तभी आकर्षित होती हैं जब हमारा इनपुट 'सुत' (प्रोसेस्ड) और 'वृक्त-बर्हि' (साफ-सुथरा/अनुकूल) हो। यानी, अव्यवस्थित डेटा (Noise) की जगह व्यवस्थित सूचना (Signal) पर ही प्रकृति प्रतिक्रिया करती है।
4. रुद्रवर्तनी: गतिज ऊर्जा और घर्षण (Kinetic Energy & Friction)
'रुद्र' शब्द ऊर्जा की प्रचंडता और 'वर्तनी' मार्ग को दर्शाता है।
High-Velocity Trajectory: अश्विनी कुमारों के आने का मार्ग 'रुद्र' (तीव्र/ऊर्जस्वित) है। यह उच्च ऊर्जा वाले कणों (High-energy particles) के मार्ग को दर्शाता है जो अंतरिक्ष में अत्यंत वेग से चलते हैं।
निष्कर्ष: 'Gyan Vigyan' तालमेल
| वैदिक शब्द | वैज्ञानिक अवधारणा | प्रभाव |
|---|---|---|
| नासत्या (दो अश्विन) | Dual Forces / Polarity | संतुलन और पूरकता |
|युवाकवः | Energy Fusion / Integration | शक्तियों का एकीकरण |
|वृक्तबर्हिषः | Zero Resistance / Refinement | सुचारू प्रवाह (Flow) |
|रुद्रवर्तनी | High-velocity Path | तीव्र परिणाम और क्रिया |
व्यावहारिक सूत्र:
यह मंत्र हमें 'Efficiency' (कार्यक्षमता) का पाठ पढ़ाता है। यदि हमें अद्भुत परिणाम (दस्रा) चाहिए, तो हमें अपने कार्य के माध्यम से बाधाओं को हटाना होगा (वृक्तबर्हिषः) और शक्तियों का सही संयोजन (युवाकवः) करना होगा।