जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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साहित्यदर्पणः नवमः परिच्छेद मुल संस्कृत

 



नवमः परिच्छेदः

 

अथोद्देशक्रमप्राप्तमलङ्कारनिरूपणं बहुवक्तव्यत्वेनोल्लङ्घ्य रीतिमाह---

 

पदसंघटना रीतिरङ्गसंस्थाविरोषवत् ।

उपकर्त्रो रसादीनां---

 

रसादीनामर्थाच्छब्दार्थशरीरस्य काव्यस्यात्मभूतानाम् ।

---सा पुनः स्याच्चतुर्विधा ।। साद-९.१ ।।

 

वैदर्भो चाथ गौडी च पाञ्चाली लाटिका तथा ।

सरीतिः ।

तत्र---

 

माधुर्यव्यञ्जकेर्वर्णै रचना ललितात्मिका ।। साद-९.२ ।।

 

अवृत्तिरल्पवृत्तिर्वा वैदर्भो रीतिरिष्यते ।

यथा---"अनङ्गमङ्गलभुवः--" इत्यादि ।

रुद्रटस्त्वाह--- असमस्तैकसमस्ता युक्ता दशभिर्गुणैश्च वैदर्भो ।

वर्गद्वितीयबहुला स्वल्पप्राणाक्षरा च सुविधेया ।।

 

अत्र दशगुणास्तन्मतोक्ताः श्लेषादयः ।

ओजः प्रकाशकैर्वणैर्बन्ध आडम्बरः पुनः ।। साद-९.३ ।।

 

समासबहुला गौडी---

 

यथा---"चञ्चद्भुज--" इत्यादि ।

पुरुषोत्तमस्त्वाह--- "बहुतरसमासयुक्ता सुमहाप्राणाक्षरा च गौडीया ।

रीतिरनुप्रासमहिमपरतन्त्रा स्तोकवाक्या च" ।।

 

---वर्णैः शेषैः पुनर्द्वयोः ।

समस्तपञ्चषपदो बन्धः पाञ्चालिका मता ।। साद-९.४ ।।

 

द्वयोर्वैदर्भोगौड्योः ।

यथा--- "मधुरया मधुबोधितमाधवीमधुसमृद्धिसमेधितमेधया ।

मधुकराङ्गनया मुहुरुन्मदध्वनिभृता निभृताक्षरमुज्जगे" ।।

 

भोजस्त्वाह---"समस्तपञ्चषपदामोजः कान्तिसमन्विताम् ।

मधुरां सुकुमारां च पाञ्चालीं कवयो विदुः" ।।

 

लाटी तु रीतिर्वैदर्भोपाञ्चाल्योरन्तरे स्थिता ।

यथा---"अयमुदयति मुद्राभञ्जनः पद्मिनीनामुदयगिरिवनालीबालमन्दारपुष्पम् ।

विरहविधुरकोकद्वन्द्वबन्धुविभिन्दन् कुपितकपिकपोलक्रोडताम्रस्तमांसि" ।।

 

कश्चिदाह---"मृदुपदसमाससुभगा युक्तैर्वर्णैर्न चातिभूयिष्ठा ।

उचितविशेषणपूरितवस्तुन्यासा भवेल्लाटी" ।।

 

अन्ये त्वाहुः---"गौडी डम्बरबद्धा स्याद्वैदर्भो ललितक्रमा ।

पाञ्चाली मिश्रभावेन लाटी तु मृदुभैः पदैः" ।।

 

क्वचित्तु वक्त्राद्यौचित्यादन्यथा रचनादयः ।। साद-९.५ ।।

 

वाक्त्रदीत्यादिशब्दाद्वाच्यप्रबन्धौ . रचनादीत्यादिशब्दाद्वृत्तिवर्णौ ।

तत्र वक्त्रौचित्याद्यथा--- "मन्थायस्तार्णवाम्भः प्लुतकुहरचलन्मन्दरध्वानधईरः कोणाघातेषु गर्जत्प्रलयघनघटान्योन्यसङ्घट्टचण्डः ।

कृष्णाक्रोधग्रढूतः कुरुकुलनिधनोत्पातनिर्घातवातः केनास्मत्सिंहनादप्रतिरसितसखो दुन्दुभिस्ताडितो ऽयम्" ।।

 

अत्र वाच्यक्रोधाद्य(न) भिव्यञ्जकत्वे ऽपि भीमसेनवक्तत्वेनोद्धता रचनादयः ।

वाच्यौचित्याद्यथोदाहृते "मूर्धव्याधूयमान---" इत्यादौ ।

प्रबन्धौचित्याद्यथा नाटकादौ रौद्रे ऽप्यभिनयप्रतिकूलत्वेन न दीर्घसमासादयः ।

एवमाख्यायिकायां शृङ्गारे ऽपि न मसृणवर्णादयः ।

कथायां रौद्रे ऽपि नात्यन्तमुद्धताः ।

एवमन्यदपि ज्ञेयम् ।

इति साहित्यादर्पणे रीतिविवेचनो नाम नवमः परिच्छेदः ।

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